Saturday, June 16, 2018

राज़ी: कुछ अनसुलझे सवाल


मेघना गुलज़ार द्वारा निर्देशित फ़िल्म राज़ी बहुचर्चित एवं बहुप्रशंसित रही है तथा इसने पर्याप्त व्यावसायिक सफलता भी प्राप्त कर ली है । मैंने भी इस फ़िल्म को सिनेमाघर में देखा और इससे बहुत प्रभावित हुआ । फ़िल्म मनोरंजन की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है और एक सौ चालीस मिनट तक दर्शकों को बाँधे रखती है । केंद्रीय भूमिका में आलिया भट्ट सहित सभी कलाकारों ने सराहनीय अभिनय किया है । गीत-संगीत भी श्रोताओं के कानों तथा हृदय को भाने वाला है । एकबारगी देखने के उपरांत यह अपने आपमें थ्रिलर श्रेणी (तथा देशप्रेम श्रेणी) की एक ऐसी फ़िल्म प्रतीत होती है जिसे एक सम्पूर्ण फ़िल्म कहा जा सकता है । लेकिन क्या वस्तुतः भी ऐसा ही है ?

प्रायः किसी भी अच्छी फ़िल्म को देखने के उपरांत उसके विषय में विचार व्यक्त करते समय सामान्य दर्शकों एवं समीक्षकों दोनों ही के साथ समस्या यह होती है कि वे उसकी अच्छाइयों की रौ में बह जाते हैं और इसीलिए उसके दोषों पर ध्यान नहीं दे पाते । इसलिए फ़िल्म की कमियां अनदेखी (और अनकही) रह जाती हैं । यदि समीक्षक या विश्लेषक ईमानदार एवं निष्पक्ष है तो ऐसा जान-बूझकर तो नहीं होता लेकिन अनचाहे ही सही, हो अवश्य जाता है । वर्षों पूर्व राजकुमार हिरानी निर्देशित एवं आमिर ख़ान अभिनीत थ्री ईडियट्स के मामले में अनेक स्थापित समीक्षकों के और स्वयं मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था । फ़िल्म के मनोरंजक एवं प्रेरक पक्षों ने कुछ ऐसा मन मोह लिया था कि उसके अनेक दोषों पर तत्काल नज़र गई ही नहीं । फ़िल्म को पुनः देखने तथा उसके गुण-दोषों पर वस्तुपरक भाव से पुनर्विचार करने पर ही यह तथ्य उजागर हुआ कि फ़िल्म में अनेक दोष थे जिनके कारण वह केवल प्रशंसा की ही नहीं वरन आलोचना की भी पात्र थी । राज़ी के साथ भी यही हुआ है ।   

फ़िल्म भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ़्टीनेंट कमांडर हरिंदर सिक्का के उपन्यास कॉलिंग सहमत पर आधारित है और ऐसा बारंबार कहा गया है कि यह एक वास्तविक महिला के जीवन की उन वास्तविक घटनाओं की गाथा है जो १९७१ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समयकाल में घटित हुई थीं । उपन्यास में (और फ़िल्म में भी) एक पाकिस्तानी सैनिक परिवार में विवाह करके भारत के लिए गुप्तचरी करने वाली उस युवती का नाम सहमत ख़ान है जिसे कि उपन्यास के लेखक परिवर्तित नाम बताते हैं (अर्थात् वास्तविक नाम कुछ और था) और लेखक का यह भी कथन है कि उस वास्तविक महिला का पिछले साल निधन हो गया था । मैं लेखक महोदय के कथन की सत्यता पर उंगली नहीं उठाना चाहता लेकिन चाहे उसके जीवनकाल में उसके नाम को गोपनीय रखना आवश्यक था, अब तो भारत की उस पुत्री का नाम बताया जा सकता है जिसने अपने देश के लिए बहुत कुछ किया, बहुत कुछ सहा और बहुत कुछ त्यागा । उसके नाम को अब भी गोपनीय रखा जाना तर्कहीन है विशेष रूप से तब जब फ़िल्म के (और उपन्यास के भी) अंत में उसके पुत्र को भारतीय सेना में कार्यरत बताया गया है । यह अनावश्यक गोपनीयता और कथा में उस विवाहिता का सैनिक अधिकारियों से भरे अपने ससुराल में इतनी सरलता से जासूसी करना जो कहीं से भी सहज संभव नहीं लगता, यह संदेह उत्पन्न करता है कि सच्ची बताई जाने वाली कथाएं वास्तव में भी सच्ची ही हों, यह आवश्यक नहीं ।

मेरा उर्दू भाषा का ज्ञान इस मामले में अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है कि 'सहमत' जो कि एक स्त्रीलिंग शब्द है, का अर्थ क्या होता है लेकिन हिन्दी में सहमत शब्द का वही अर्थ होता है जो कि फ़िल्म के शीर्षक राज़ी का है अर्थात् वह व्यक्ति जो किसी बात या विचार के लिए अथवा किसी कार्य को करने (या न करने) के लिए रज़ामंद हो, उसके लिए अपनी स्वीकृति प्रदान करे । यह स्वीकृति या रज़ामंदी स्वेच्छा से भी हो सकती है और किसी दबाव में भी । इस कथा की नायिका पाकिस्तान में गुप्तचरी करने और इसके निमित्त एक प्रतिष्ठित पाकिस्तानी परिवार की पुत्रवधू बनने का कार्य अपनी स्वेच्छा से करती है और इसके लिए उसका तर्क है अपने देश की सेवा । लेकिन गहराई से देखने पर यह उद्देश्य उथला-सा प्रतीत होता है और जो कुछ भी नैतिक-अनैतिक उसके द्वारा किया जाता है, उसे न्यायोचित ठहराने की एक खोखली चेष्टा ही लगता है । यदि देशसेवा के नाम पर दूसरे देश में जाकर स्वयं पर विश्वास करने वाले भले लोगों को धोखा देना और निर्दोषों की हत्याएं करना न्यायोचित है तो जो लोग धर्म या अपने देश के हित के नाम पर हमारे देश में यही सब करते हैं, उन्हें हम कैसे ग़लत ठहरा सकते हैं ? नायिका को पाकिस्तान द्वारा ग़ाज़ी नामक पनडुब्बी से भारतीय जहाज़ आईएनएस विक्रांत पर किए जाने वाले हमले की योजना की सूचना एवं दस्तावेज़ भारत में खुफिया एजेंसी के संबन्धित लोगों तक पहुँचाते हुए दिखाया गया है और इसी आधार पर उसके कार्यकलापों को जायज़ ठहराया गया है लेकिन ये तथ्य न तो प्रामाणिक हैं और न ही ऐसी गोपनीय बातें इस तरह से खुलेआम की जाती हैं जिस तरह से फ़िल्म में नायिका के ससुराल वालों को करते हुए दिखाया गया है । यह सब कुछ सतही-सा लगता है जिसे केवल इसीलिए दिखाया गया है कि येन-केन-प्रकारेण नायिका के किरदार, नज़रिये और करतूतों पर देशप्रेम का ठप्पा लगाकर उन्हें सही करार दिया जा सके ।

कर्नल सिक्का ने अपने उपन्यास में गुप्तचरी नायिका के चरित्र को संवेदनहीन बताया है जो बिना किसी अपराध-बोध के निस्संकोच उन लोगों की हत्याएं करती है जो न केवल उस पर पूरा भरोसा करते हैं बल्कि उसे अत्यंत स्नेह भी करते हैं जबकि फ़िल्म में नायिका को संवेदनशील बताते हुए और अपने अन्तर्मन में अपने किए के अपराध-बोध से जनित पीड़ा को अनुभव करते हुए दिखाया गया है लेकिन वस्तुतः ज़रा ग़ौर करने पर ही उसकी यह संवेदनशीलता उसके चरित्र पर थोपी हुई लगने लगती है और उसका वास्तविक रूप वही दिखाई देने लगता है जो लेखक ने अपने उपन्यास की नायिका का रखा है – कठोर, बेरहम और किसी भी किस्म की नैतिकता या ज़मीर नामक शै को अपने भीतर जगह न देने वाली । फ़िल्म में दिखाई गई घटनाओं की रू में नायिका के किरदार पर चढ़ाए गए वतनपरस्ती के मुलम्मे को ज़रा-सा खरोंचते ही उसके किरदार की असलियत दिखाई देने लगती है जो ख़ुद को छोटी बहन की तरह चाहने वाली अपनी जेठानी को बेहिचक विधवा बना देती है; उस पति को मार डालने को तैयार हो जाती है जो उसे प्यार ही नहीं करता बल्कि उसकी इबादत करता है, उसके समूचे जज़्बात को समझता है और उसे हल्की-सी ठेस तक लगने देना जिसे गवारा नहीं और अपनी जान बचाने के लिए उस बच्चे को अपनी ढाल बनाकर भागती है जो उसे अपनी शिक्षिका के रूप में देखते हुए उस पर पूरी तरह विश्वास करता है । यह सब न तो किसी भी प्रकार का त्याग है और न ही देशसेवा, यह केवल स्वार्थपरता है और कुछ नहीं ।  

राज़ी एक ओवर-रेटेड फ़िल्म है जिसे एक अच्छी फ़िल्म कहा जा सकता है, कोई महान फ़िल्म नहीं । जो महानता इस पर अनेक समीक्षक आरोपित कर रहे हैं, उसका कोई लक्षण इसमें नहीं है क्योंकि किसी भी पुस्तक या फ़िल्म या काव्य की महानता का संबंध उसके आंतरिक मूल्य से होता है जो किसी महान आदर्श को स्थापित करता हो । राज़ी में ऐसा कुछ भी नहीं है । मानवीय मूल्यों के क्रूर हनन पर देशप्रेम का बिल्ला लगा देने से कोई फ़िल्म महान नहीं हो जाती । दूसरा देश चाहे हमसे युद्धरत ही क्यों न हो, उसे और उसके निवासियों को शत्रु कहकर उनके विरूद्ध किए जाने वाले किसी भी कार्य को देशप्रेम के नाम पर उचित नहीं माना जा सकता । अपने पर सच्चे दिल से ऐतबार करने वाले स्नेही लोगों की पीठ में छुरा भोंकने का काम देशप्रेम की चाशनी में डुबोकर करने के बाद भी गुनाह ही रहेगा, सवाब नहीं बन जाएगा । हम और वे पर आधारित यह देशप्रेम अब एक कालातीत संकल्पना है जो आधुनिक मानवीय मूल्यों तथा व्यवहार के निकष पर स्वीकार्य नहीं है । जंग में सब जायज़ है कहकर हर ग़लत को सही ठहराने का काम गुज़रे जमाने की बात है ।

राज़ी को जो चौतरफ़ा वाहवाही मिल रही है, वह इसलिए है कि पाकिस्तान में जाकर और अपने पति तथा ससुराल वालों के प्राणों को कथित देशप्रेम की वेदी पर बलि चढ़ाकर भारत के लिए जासूसी करने का काम एक मुस्लिम लड़की करती है । और तुर्रा यह है कि उस मुस्लिम लड़की को काश्मीरी बताया गया है जिसके पिता भी पाकिस्तान में एक सैनिक उच्चाधिकारी के साथ दोस्ती की आड़ में भारत के लिए जासूसी ही करते थे । आज दुर्भाग्यवश हम उस दौर में हैं जब भारतीय मुस्लिमों पर पाकिस्तान-परस्त होने का ठप्पा बड़ी सहजता से लगाया जा रहा है और वे इस दबाव में रहते हैं कि चाहे जैसे भी हो, यह साबित करके दिखाएं कि वे भारत के साथ हैं । और भारत के साथ होने को साबित करने का साफ़ मतलब यह साबित करना है कि वे पाकिस्तान के खिलाफ़ हैं । ऐसे में एक मुस्लिम लड़की के अपने पाकिस्तानी पति, जेठ और जेठानी की (और उनके नज़दीकी बहुत-से लोगों की) आँखों में धूल झोंककर भारत के लिए जासूसी करने की कहानी को हाथोंहाथ लिया जाना कोई हैरानी की बात नहीं है । वह लड़की यानी सहमत बार-बार भारत को अपना मुल्क बताती है जिसके आगे उसे और कुछ भी वक़त या तवज्जो दिए जाने के काबिल नहीं लगता । लेकिन सच्चाई तो यह है कि काश्मीरी न केवल आज बल्कि जिस ज़माने की यह कहानी है, उस ज़माने में भी अपने आपको हिंदुस्तानी कहने से परहेज़ ही करते थे । एक काश्मीरी मुस्लिम का हिंदुस्तान को अपना मुल्क, अपना वतन बताना और उसी बुनियाद पर पाकिस्तान में जाकर हिंदुस्तान के लिए जासूसी करना इस बात का सबूत है कि इस फ़िल्म में हक़ीक़त का नहीं, हमारे देश के मौजूदा हालात और हुकूमत के मौजूदा मिज़ाज के मद्देनज़र पॉलिटिकल करेक्टनेस का ख़याल रखा गया है । यह इस तथ्य से और भी पुष्ट होता है कि फ़िल्म में सहमत को प्रशिक्षण देने वाले तथा पाकिस्तान में उसकी सहायता करने वाले भी मुस्लिम पात्र ही हैं । ग़ैर-मुस्लिम पात्र तो फ़िल्म में रखे ही नहीं गए हैं । तलवार जैसी साहसी और यथार्थपरक फ़िल्म बनाने वाली मेघना गुलज़ार से ऐसी उम्मीद नहीं थी । उन्होंने ज़मीर, जज़्बात और इंसानियत को ताक पर रखकर चलने वाली गुप्तचर महिला को महिमामंडित किया है और ऐसा करने में कोई महानता नहीं है क्योंकि, जैसा मैंने पहले भी कहा है, यह महिमामंडन केवल एक मुलम्मा है जो बड़ी आसानी से उतर जाता है ।

मेघना गुलज़ार द्वारा निरूपित सहमत ख़ान का चरित्र विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता क्योंकि उसे फ़िल्म के आरंभ में ही अपनी जान पर खेलकर एक गिलहरी को बचाते हुए दिखाया गया है । ऐसी संवेदनशील और दयालु कन्या कुछ ही समय में ऐसी पाषाण-हृदय हो जाए कि निस्संकोच निर्दोषों की जान लेने लगे (चाहे अपना भेद खुलने से रोकने हेतु ही सही),  किसी भी दृष्टि से विश्वास के योग्य तथ्य नहीं लगता । ऐसा दिखाकर अनजाने में ही मेघना ने सहमत को एक काल्पनिक चरित्र के रूप में दर्शा दिया है जो कपोलकल्पित कथा में भी गले नहीं उतरता । उसका अपने पिता (और कथित पारिवारिक परंपरा) की ख़ातिर इस विश्वासघाती कार्य के लिए मान जाना भी स्वाभाविक नहीं लगता (हालांकि इसके लिए भी वह मुल्क के नाम का ही आसरा लेती है जब इस बाबत उससे सवाल होता है) । वह घर के नौकर की हत्या करने के बाद तो रोती है, अपने जेठ की हत्या करने के बाद नहीं (क्या इसलिए कि अब किसी की भी हत्या कर देना उसके लिए सामान्य कार्य हो गया है और क्या इसी वजह से वह अपने पति पर भी पिस्तौल तान देती है ?) । ये सारी बातें उसके चरित्र को अत्यंत विरोधाभासी बना देती हैं जिसमें कुछ भी आदर्श या सराहनीय नहीं लगता । इसके विपरीत मेघना ने जिस पाकिस्तानी परिवार को दिखाया है उसके (पुराने नौकर को छोड़कर) सदस्य इतने भले, स्नेही और विश्वासी हैं कि उनके इन गुणों के आगे सूरज बड़जात्या के फ़िल्मी परिवार भी कहीं नहीं ठहरते । सहमत के पति इक़बाल को इतना अधिक संवेदनशील और अपनी पत्नी को समझने वाला दिखाया गया है कि जिस किसी भी लड़की को ऐसा देवता-स्वरूप पति मिल जाए उसे अपने पति के चरण धो-धोकर पीने चाहिए क्योंकि प्रेम तो कोई भी कर सकता है, समझने वाले विरले ही मिलते हैं । वह सहमत को भावनात्मक रूप से अपने से जोड़े बिना शारीरिक रूप से भी उसके निकट नहीं जाता है । और मुझे इंतहा तो तब नज़र आई जब सहमत का भेद खुल जाने और यह पता लग जाने कि उसने ही परिवार के नौकर और बड़े बेटे की हत्याएं की थीं, र भी वह उसे ग़लत नहीं समझता बल्कि अपने पिता (पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर) के समक्ष उसके दृष्टिकोण को रखते हुए कहता है कि उसने वही किया है जो हम भी अपने मुल्क के लिए करते हैं । इस सबसे उसका किरदार सहमत के किरदार से बहुत ऊपर उठ जाता है । ऐसे विवेकशील, क्षमाशील था दूसरों के दृष्टिकोण एवं स्थिति को समझने वाले लोगों का बहुमत यदि भारत और पाकिस्तान में हो जाए तो दोनों देशों की शत्रुता सदा के लिए समाप्त हो जाए ।

राज़ी फ़िल्म ही नहीं, उसमें आलिया भट्ट का अभिनय भी ओवर-रेटेड ही है । उन्होंने अच्छा अभिनय किया है लेकिन उसे असाधारण या महान अभिनय की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता । वस्तुतः फ़िल्म के अन्य पात्रों ने (विशेषतः इक़बाल की भूमिका में विकी कौशल ने तथा खालिद मीर की भूमिका में जयदीप अहलावत ने) उनसे बेहतर अभिनय किया है । मैं कभी राजा सेन की फ़िल्म समीक्षाओं का कायल नहीं रहा लेकिन पहली बा मैं उनकी समीक्षा में किए गए आलिया के अभिनय के मूल्यांकन से सहमत हुआ हूँ । उन्होंने बिलकुल ठीक कहा है कि आलिया (और इस फ़िल्म में उनके अभिनय के कसीदे पढ़ने वाले भी) मोस्ट एक्टिंग को बेस्ट एक्टिंग समझकर भ्रमित हो गए हैं । सहमत की भूमिका में आलिया इतना अधिक प्रयास करती हैं कि उनके हाव-भावों की स्वाभाविकता नष्ट नहीं तो बहुत कम अवश्य हो जाती है । इस फ़िल्म में उन्होंने पात्र को प्रस्तुत किया है, उसे जिया नहीं ।

सहमत ख़ान जैसी कोई महिला यदि वास्तव में थीं तो उनकी प्रशंसा तथा वंदन अवश्य ही होना चाहिए । लेकिन राज़ी फ़िल्म (तथा कॉलिंग सहमत उपन्यास) की नायिका को आधुनिक युवतियों के लिए आदर्श अथवा रोल मॉडल नहीं माना जा सकता (चाहे ऐसी युवतियां भारतीय हों या पाकिस्तानी) । विश्वासघात और निर्दोषों का रक्तपात कोई सत्कर्म नहीं जिन्हें न्यायसंगत माना जाए और ऐसा करने वाले का महिमामंडन एक अपराध ही है जो धर्म एवं देश सरीखी अवधारणाओं की संकीर्ण व्याख्या करते हुए उनके नाम पर कुमार्ग पर चलने को ही प्रेरित कर सकता है, सुमार्ग पर चलने को नहीं । आज आवश्यकता हम के विस्तार की है जिसमें वे को विलीन  देने का प्रयास सभी समुदायों, सभी धर्मों तथा सभी देशों को करना चाहिए ताकि अंतिम विजय गुप्तचरों एवं सेनाओं की नहीं, मानवता की हो । राज़ी फ़िल्म जो अनसुलझे सवाल पीछे छोड़ती है, उन्हें सुलझाया जाना चाहिए ताकि फिर कभी किसी को सहमत बनने के लिए राज़ी न होना पड़े ।
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पुनश्च : यह लेख मैंने २१ मई, २०१८ के हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित नन्दिता पटेल जी के अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए लेख – ‘A spy without a conscience shouldn’t be glorified, even by Bollywood’ से प्रेरणा लेकर लिखा है जिसमें मुझे अपने विचारों एवं भावनाओं का प्रतिबिंब दिखाई दिया । मैं नन्दिता जी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ । 

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