Wednesday, May 9, 2018

आत्मकथाओं के संसार में बच्चन की आत्मकथा

आत्मकथा लेखन को साहित्य की एक विशिष्ट विधा माना जाता है । आत्मकथा प्रायः वे ही व्यक्ति लिखते हैं जो अपने जीवन में सफलता के किसी लक्ष्य को स्पर्श कर चुके हों तथा जिनके जीवन का अधिकांश भाग व्यतीत हो चुका हो । किसी भी युवा के आत्मकथा लिखने की अधिक सार्थकता नहीं होती क्योंकि उसके जीवन का एक बहुत बड़ा भाग अभी शेष होता है जिसमें उसे कई नवीन एवं अब तक के जीवन से भिन्न अनुभव हो सकते हैं जो उसके व्यक्तित्व एवं विचार, दोनों पर ही गहन प्रभाव डाल सकते हैं । मेरा मानना है कि मनुष्य अपने अनुभवों का ही उत्पाद होता है क्योंकि उसके विचार, धारणाएं एवं दृष्टिकोण उसके खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभवों पर ही आधारित होते हैं । अपने जीवन का अधिकांश भाग व्यतीत कर चुका व्यक्ति जब अपने उस अतीत का स्मृतियों में अवलोकन करता है तो अपने अनुभवों की दीर्घ शृंखला में उसे समानताओं की वे लड़ियां (कॉमन थ्रेड्स) मिलती हैं जो उसकी अपनी मानसिकता तथा उसमें अंतर्निहित अवधारणाओं की आधारशिला रखती हैं । जब वह आत्मकथा लिखता है तो अपनी उन्हीं अवधारणाओं को अपने विचारों (जो कि उसके पूर्वाग्रह भी हो सकते हैं) के रूप में प्रस्तुत करता है । यदि वह एक सुलझा हुआ एवं परिपक्व व्यक्ति है तो उसकी वह आत्मकथा पाठकों के लिए तथ्यों, राष्ट्र के इतिहास, समय के प्रवाह के साथ-साथ सामाजिक परिवेश में आए परिवर्तनों तथा ठोस विचारों रूपी रत्नों का भंडार सिद्ध हो सकती है । महात्मा गाँधी की आत्मकथा – सत्य के साथ प्रयोग एक ऐसी ही आत्मकथा है यद्यपि वह उनके जीवन की संध्या में नहीं लिखी गई होने के कारण ऊपर वर्णित कसौटी पर खरी नहीं उतरती क्योंकि वह (संभवतः व्यस्तता के कारण) उनके द्वारा १९२१ के बाद आगे नहीं लिखी जा सकी और इस प्रकार से उनके जीवन की अंतिम चौथाई सदी से अधिक के बहुमूल्य अनुभव उसमें समाहित नहीं हो सके । तथापि यह स्वीकार करना ही होगा कि अपूर्ण होकर भी वह एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्रलेख है जिसमें उनके जीवन के रूप में उनके व्यक्तित्व तथा विचारों की झलक है । वैसे भी वे कहा करते थे – मेरा जीवन ही मेरा संदेश है

लेकिन यदि आत्मकथा-लेखक कोई पक्षपाती, आत्मकेंद्रित या अपरिपक्व व्यक्ति हो अथवा ऐसा तिकड़मी हो जो कि उस आत्मकथा को भी अपने किसी स्वार्थ या छवि-मंजन का साधन बनाना चाहता हो तो ऐसी आत्मकथा तथ्यों को विकृत करके पाठकों को भ्रमित करने वाली भी हो सकती है । ऐसी तथाकथित आत्मकथाओं से दूरी ही भली क्योंकि ये अनुपयोगी ही नहीं, हानिकारक भी होती हैं । अपने जीवन में तिकड़मबाज़ी से आगे बढ़ने वाले कई भारतीय राजनेताओं की ऐसी ही आत्मकथाएं विगत कुछ वर्षों में प्रस्तुत हुई हैं जिसमें उन्होंने अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन के समयकाल से सम्बद्ध तथ्यों को कुछ इस प्रकार तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया है जिससे उनके अनुचित कृत्य या तो छुपे रहें या उनका भी औचित्य स्थापित हो जाए । ऐसी आत्मकथाओं में उन्होंने अपनी छवि को दुग्ध-धवल बनाकर प्रस्तुत किया है जबकि दूसरों पर दोषारोपण किए हैं । आख़िर अपनी कमीज़ को सफ़ेद बताने के लिए दूसरे की कमीज़ पर काला रंग तो डालना ही पड़ता है । पढ़ने वाले तो पुस्तक में वर्णित तथ्यों के सत्यापन के लिए जाने से रहे । और जिनके बारे में उल्टा-सीधा लिखा गया है, यदि वे जीवित ही नहीं हैं या कानूनी लड़ाई की सामर्थ्य नहीं रखते हैं तो लेखक महोदय के लिए किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने की संभावना ही नहीं है । अर्थात् जोखिम कोई नहीं और विवादास्पद कथ्य के कारण चर्चित हो जाने से पुस्तक के बिकने की संभावना भरपूर । यही तो चाहिए होता है ऐसे लेखकों को – पैसा और चर्चा । पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की आत्मकथा पर मैं अपने एक अन्य लेख में विस्तार से विमर्श कर चुका हूँ और उसमें उनके द्वारा उद्धृत झूठों को रेखांकित कर चुका हूँ । अब राष्ट्रपति के स्तर के व्यक्ति द्वारा लिखी गई पुस्तक का सत्यान्वेषण कौन करे ? रही बात विक्रय की तो जनता नहीं ख़रीदेगी तो देशभर में (और विदेशों में भी) हज़ारों पुस्तकालय हैं जो उसकी प्रति अवश्य लेंगे उसकी गुणवत्ता के कारण नहीं वरन उसके लेखक की हैसियत (सेलीब्रिटी स्टेटस) के कारण ।

राजनेताओं के अतिरिक्त खिलाड़ी, अभिनेता और व्यवसायी भी आत्मकथाएं लिखते आते हैं । जो भी जीवन में (भौतिक रूप से) सफल हो जाता है (या अपने आपको सफल समझने लगता है), अपनी दृष्टि में आत्मकथा-लेखन का (या यूँ कहिए कि पढ़ने वालों को अपने अमूल्य ज्ञान और उपदेशों से कृतकृत्य करने का) अधिकारी मान बैठता है । सदाबहार अभिनेता देव आनंद ने अपने देहावसान से कुछ वर्षों पूर्व अपनी आत्मकथा लिखी थी जिसमें उन्होंने अपने विभिन्न प्रेम-प्रसंगों पर (अनावश्यक) चर्चा की थी । वह रोचक एवं तथ्याधारित होकर भी एक आत्ममुग्ध व्यक्ति का एकालाप ही थी । एडम गिलक्रिस्ट तथा शोएब अख़्तर जैसे प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ियों ने भी विषय-सामग्री में विवादास्पद टिप्पणियों का तड़का लगाते हुए अपनी आत्मकथाएं प्रस्तुत की हैं । हाल ही में हिन्दी के अत्यंत लोकप्रिय उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा का पहला भाग भी न बैरी न कोई बेगाना के शीर्षक से आ गया है और उसे पढ़ने के उपरांत मैं कह सकता हूँ कि वह उनके उपन्यासों की भाँति ही रोचक है । इसे उन्होंने लिखा भी उसी शैली में है ।

लेकिन हिन्दी भाषा में लिखी गई जिस आत्मकथा ने सर्वाधिक प्रसिद्धि और साहित्यिक जगत में सम्मान अर्जित किया है, वह है हिन्दी के मूर्धन्य कवि स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन की चार खंडों में प्रसृत आत्मकथा जिसे सरस्वती सम्मान से पुरस्कृत किया गया है । बीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक में अपनी मधुशाला के माध्यम से हिन्दी कविता के परिदृश्य पर छा जाने वाले एवं अन्य अनेक काव्य-संकलनों के माध्यम से हिन्दी कविता के प्रेमियों के हृदय जीत लेने वाले बच्चन जी की आत्मकथा को उनकी कालजयी कृति माना गया है और उसकी उत्कृष्टता को उनकी कविताओं से भी अधिक आँका गया है । इस आत्मकथा के चार खंड हैं – १. क्या भूलूँ क्या याद करूँ, २. नीड़ का निर्माण फिर, ३. बसेरे से दूर, ४. दशद्वार से सोपान तक । मैंने चारों खंड पढ़े लेकिन स्वर्गीय बच्चन जी से क्षमा-याचना के साथ कह रहा हूँ कि कालजयी कहलाने की अर्हता मुझे केवल इसके प्रथम खंड  - क्या भूलूँ क्या याद करूँ में ही दृष्टिगोचर हुई । मैंने असाधारण सत्यनिष्ठा एवं साहस से ओतप्रोत आत्माभिव्यक्ति को समाहित करती इस अद्भुत कृति को एक बार नहीं, अनेक बार पढ़ा और इसकी विस्तृत समीक्षा (अंगरेज़ी में) लिखी । उस समय तक मैंने इसके परवर्ती तीनों खंड नहीं पढ़े थे । जब मैंने चार खंडों में आबद्ध इस आत्मकथा को सम्पूर्ण पढ़ लिया तो मुझे यही लगा कि खंड-दर-खंड इसकी गुणवत्ता में ह्रास ही हुआ अर्थात् प्रत्येक नया खंड अपने पूर्ववर्ती खंड (या खंडों) से कमतर ही निकला । इसका कारण सभवतः यह है कि बच्चन जी की जो बेबाकी क्या भूलूँ क्या याद करूँ में उपस्थित है, वह अन्य खंडों में क्रमशः घटती चली गई है यद्यपि उन्होंने आरंभ में ही महान फ्रांसीसी साहित्यकार मानतेन की आत्मकथा का संदर्भ देते हुए इसे स्वांतः सुखाय अथवा अपने मन की शांति के निमित्त लिखा हुआ बताया है और यह भी कहा है कि सार्वजनिक शालीनता के आग्रह ने उनकी स्पष्टवादिता पर अंकुश लगाया है अन्यथा वे स्वयं को पाठकों के सम्मुख आपादमस्तक नग्न उपस्थित कर देते । मानतेन द्वारा अपनी आत्मकथा में पाठकों से मांगी गई विदा की ही भांति बच्चन जी ने भी अपने पाठकों से अपनी विदा को स्वीकार करने का आग्रह किया है और यह भी कहा है कि अपनी पुस्तक का विषय वे स्वयं हैं और पाठकों के लिए कोई कारण नहीं कि वे अपना समय ऐसे निरर्थक और नगण्य विषय पर व्यय करें । लेकिन कम-से-कम उनकी आत्मकथा का पहला खंड तो एक अद्वितीय रचना ही है जो उनके पूर्वजों के, उनके वंशवृक्ष के तथा उनके अपने जीवन के इतिहास को ही नहीं वरन भारत देश, भारतीय समाज एवं हिन्दी कविता के भी समकालीन इतिहास को पाठकों के समक्ष जीवंत कर देता है ।

बच्चन जी ने दो विवाह किये । उनकी पहली पत्नी श्यामा के जो अपने जीवन के अधिकांश भाग में रूग्णावस्था में ही रहीं तथा उनके आगमन से भी पूर्व उनके अभिन्न मित्र कर्कल की पत्नी चम्पा के सान्निध्य ने ही वस्तुतः उनके भीतर के कवि को जागृत एवं विकसित किया । उन दोनों ही नारियों का असामयिक निधन उन्हें कभी न भरने वाले घाव और जीवनभर की पीड़ा दे गया लेकिन व्यक्ति के आहत अंतःस्थल से उठने वाली ऐसी पीड़ा ही तो कविता की जननी होती है । सुमित्रानंदन पंत जी के शब्दों में – वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान; निकलकर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान । चम्पा और श्यामा दोनों ही अपने जीवन से भी कहीं अधिक अपनी मृत्यु के माध्यम से हरिवंशराय बच्चन के भीतर के कवि को निखार गईं, संवार गईं । अपने वंश के वटवृक्ष तथा अपने संबंधियों से जुड़े विविध तथ्यों एवं गाथाओं के प्रकीर्णन के मध्य अपने जीवन की ऐसी अनुभूतियों एवं भावनाओं को बच्चन जी ने क्या भूलूँ क्या याद करूँ में कुछ इस प्रकार से अंकित किया है कि इस कृति के एक-एक हर्फ़ से उनकी ईमानदारी झाँकती है । पुस्तक के पृष्ठों से गुज़रते हुए पाठक को सब कुछ चित्रपट की भाँति अपने नेत्रों के समक्ष घटित होता-सा प्रतीत होता है और ऐसा आभास होता है मानो वह बच्चन जी के जीवन के अनुभवों की नदी में उनके साथ-साथ बह रहा हो । अपनी आत्मकथा के इस प्रथम भाग में अपने अनुभवों को बाँटते हुए बच्चन जी ने कहीं भी आत्मश्लाघा या स्वयं को दुग्ध-धवल सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया है तथा स्वयं को मानवीय दुर्बलताओं से युक्त एक साधारण व्यक्ति के रूप में ही चित्रित किया है । यह ईमानदारी एवं स्पष्टवादिता ही इस कृति का सबसे बड़ा गुण है जो इसे आत्मकथाओं के संसार में ऐसी उच्चता प्रदान करता है जिसे स्पर्श करना ऐसी किसी अन्य कृति के लिए असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन अवश्य है ।

लेकिन कवि या शायर या कथाकार बनना एक बात है, जीवन में भौतिक सफलता प्राप्त करना दूसरी । प्रायः जो भावुकता एवं संवेदनशीलता किसी को सृजन की शक्ति एवं प्रेरणा देती है, वही प्रायः स्वार्थाधारित संसार में उसकी भौतिक सफलता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा भी बन जाती है । बच्चन जी परम सौभाग्यशाली रहे जो श्यामा जी के निधन के उपरांत जब वे अवसाद रूपी सरिता में डोल रही अपनी जीवन-नैया को संभालने का यत्न कर रहे थे, तब उनके जीवन में तेजी सूरी नामक एक पंजाबी युवती ने प्रवेश किया और लगभग किसी फ़िल्म की पटकथा की भाँति ही सम्पन्न हुए उनके इस द्वितीय विवाह ने ही उनके भौतिक रूप से सफल और समृद्ध जीवन की आधारशिला रखी । तेजी जी भीतर से अत्यंत दृढ़ एवं व्यावहारिक महिला थीं एवं उनका बच्चन जी के प्रति प्रेमासक्त होना एवं उनकी जीवन-संगिनी बनना बच्चन जी के लिए वरदान सिद्ध हुआ । जैसे कवि हृदय बच्चन में कुछ स्त्रियोचित गुण थे, वैसे ही तेजी में कुछ पुरुषोचित गुण थे और इन दोनों का संगम कुछ ऐसा रहा कि वे सम्पूर्ण जीवन एक दूसरे के पूरक बने रहे । तेजी के साथ बच्चन ने अपने भग्न नीड़ का फिर से निर्माण किया और उनके जीवन के इस भाग का विवरण उनकी आत्मकथा के दूसरे खंड नीड़ का निर्माण फिर में है । एक सद्गृहस्थ बनकर बच्चन अपने दो पुत्रों अमिताभ एवं अजिताभ को जीवन में सफलता एवं समृद्धि की असाधारण ऊंचाइयों तक पहुँचने के योग्य बना सके एवं स्वयं भी विदेश जाकर शोधकार्य करने से लेकर केंद्रीय सरकार की सेवा में नियुक्त होने तथा राज्यसभा के मानद सदस्य बनने तक की उपलब्धियां प्राप्त कर सके तो इसमें उनकी हमसफ़र तेजी के साथ ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई । बच्चन एवं तेजी का प्रेम कैसे उद्भूत हुआ एवं कैसे उसने आनन-फानन परिणय का गंतव्य प्राप्त कर लिया, यह पुस्तक को पढ़कर स्पष्ट नहीं होता ।

बच्चन अपनी आत्मकथा के तीसरे खंड का नाम हंस का पश्चिम प्रवास रखना चाहते थे क्योंकि इसमें उनके अपनी विश्वविद्यालय की नौकरी से दो वर्षों का अवैतनिक अवकाश लेकर इंग्लैंड में रहकर आंग्ल कवि विलियम बटलर ईट्स के साहित्य पर शोधकार्य करके केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने से जुड़े अनुभवों का विवरण आना था लेकिन लेखन के उपरांत उन्होंने इस खंड को बसेरे से दूर शीर्षक प्रदान किया । इसमें बच्चन ने अपने व्यावहारिक (मूलतः आर्थिक) कठिनाइयों से युक्त अनुभवों के साथ-साथ अपनी अनुपस्थिति में अपनी धर्मपत्नी तेजी पर आई एक विशिष्ट विपत्ति का भी उल्लेख किया है । लेकिन इस खंड में बच्चन के कवि-हृदय की स्वाभाविक संवेदनशीलता के दर्शन कम ही स्थानों पर होते हैं एवं अधिकांश भाग एक रूखे विवरण की भाँति प्रतीत होता है । बच्चन ने इस भाग में और अपनी आत्मकथा के अंतिम खंड दशद्वार से सोपान तक में अपने द्वारा घूमे गए विभिन्न विदेशी स्थलों का वर्णन किया है जो कई स्थानों पर इतना विस्तृत एवं विशिष्ट हो गया है कि पाठक को ऊबा देता है । इसके अतिरिक्त अपनी अनुपस्थिति में अपनी अर्द्धांगिनी पर आई विपत्ति के वर्णन में वे उस स्पष्टता से काम नहीं ले सके जिसका परिचय उन्होंने आत्मकथा के प्रथम खंड में दिया है । सच्चाई के बयान में उनकी इस झिझक का कोई कारण दिखाई नहीं देता । अपनी पत्नी पर कुदृष्टि डालने वाले जिस दुष्ट व्यक्ति की ओर वे संकेत करते हैं, उसका नामोल्लेख करने में कैसा संकोच ? या फिर वे स्वयं ही अपने मन में उस घटनाक्रम को लेकर स्पष्ट नहीं थे जिसके वे साक्षी नहीं थे और जिसके बारे में उन्हें केवल दूसरों से ही जानकारी मिली । बहरहाल इस प्रसंग के विषय में बच्चन ने जो भी कहा, वह कुछ अधूरा-सा (और नाटकीय भी) लगा । इसके अतिरिक्त यह खंड बच्चन की अपने विश्वविद्यालय से मिली उपेक्षा तथा अपनी उपलब्धि को समुचित सम्मान न दिये जाने से उपजी कुंठा को चित्रित करता है । अपनी उस मनोदशा का उनका वर्णन स्वाभाविक तो लगता है, प्रेरक नहीं । अपनी ओर से बच्चन ने इसी खंड के अंत में अपनी आत्मकथा का समापन कर दिया है । संभवतः उन्हें नहीं लगता था कि वे ऐसी एक पुस्तक और लिखेंगे जो उनकी आत्मकथा का चौथा खंड होगी । यह अंतिम खंड एक लंबे अंतराल के उपरांत लिखा गया । 

आख़िर बच्चन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा से विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़कर पहले आकाशवाणी में लगे और तदोपरांत दिल्ली चले आए । इलाहाबाद भी उनसे छूट गया और अध्यापन का उनका प्रिय कार्य भी । विदेश मंत्रालय में हिन्दी के संवर्द्धन से जुड़ी नौकरी, राज्यसभा की सदस्यता, दिल्ली में रहने के अनुभव, पुत्रों के करियर एवं विवाह, दिल्ली एवं मुंबई के बीच की आवाजाही, देह को घेरने वाले रोग एवं उनका उपचार तथा समय-समय पर की गई विदेश-यात्राओं का लेखा-जोखा है उनकी आत्मकथा के अंतिम खंड –दशद्वार से सोपान तक में । इलाहाबाद में अपने क्लाइव रोड के आवास को उन्होंने दशद्वार नाम दिया था क्योंकि उसमें रोशनी एवं हवा के आगमन हेतु दस खुले स्थान थे जबकि सोपान नामकरण उन्होंने दिल्ली में गुलमोहर पार्क क्षेत्र में बनवाए गए अपने नवीन आवास का किया । दशद्वार से प्रस्थान तथा सोपान में प्रवेश के मध्य सत्ताईस वर्षों की समयावधि में उनके जीवन में क्या-क्या हुआ, यही उनकी आत्मकथा के अंतिम खंड की विषय-वस्तु है । चूंकि उनकी मूल आत्मकथा अपने तृतीय खंड – बसेरे से दूर में ही समाप्त हो गई थी, दीर्घावधि के उपरांत रचा गया यह अंतिम खंड अपनी शैली में प्रथन तीन खंडों से भिन्न है । संभवतः इस प्रक्षिप्त खंड पर बच्चन की उत्तरोत्तर बढ़ती आयु का भी कुछ प्रभाव पड़ा हो क्योंकि वार्धक्य में मनुष्य की बढ़ती हुई वय प्रायः उसके मनोभावों तथा मस्तिष्क की गतिविधियों पर अपना स्नायविक प्रभाव डालती है ।

इस खंड में बच्चन ने ओशो अथवा रजनीश के साथ के अपने संबंध का भी वर्णन किया है और अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिपादित किया है कि ऐसे कथित भगवान भी मानव मन की संकीर्णताओं से मुक्त नहीं हो पाते । बाकी इसमें उन्होंने अपने पुत्र अमिताभ की उपलब्धियों का बखान एक अभिमानी पिता के स्वर में किया है और अमिताभ के प्रति उनका सम्बोधन भी स्नेहयुक्त न होकर आदरयुक्त है जो विचित्र एवं अप्रभावी है । अमिताभ और जया की मैत्री, प्रेम और परिणय का संदर्भ मात्र दिया गया है और १९८२ में फ़िल्म कुली की शूटिंग के दौरान अमिताभ के साथ हुई दुर्घटना और उसके परवर्ती घटनाक्रम को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है । लेकिन अमिताभ के जीवन से जुड़ी कतिपय महत्वपूर्ण घटनाओं और तथ्यों को वे छुपा गए (या संभवतः वे उनके बारे में जानते ही नहीं थे) । आत्मश्लाघा तथा दूसरों पर दोषारोपण करके स्वयं को निष्कलंक सिद्ध करने से अपनी आत्मकथा के प्रथम खंड में जो परहेज़ बच्चन ने रखा था, वह परहेज़ बाद के तीन खंडों में दिखाई नहीं देता । इसलिए मुझे ऐसा लगा मानो जिस ईमानदारी के आवरण ने उनके वास्तविक व्यक्तित्व को क्या भूलूँ क्या याद करूँ में ढक लिया था, बाद के खंडों में उसके हट जाने से उनका सच्चा व्यक्तित्व अनायास ही (और उनके अनचाहे ही) पाठकों के सम्मुख अपने वास्तविक रूप में प्रस्तुत हो गया । दशद्वार से सोपान तक में उन्होंने न केवल सुख-सुविधाओं की प्राप्ति (अथवा असुविधाओं से बचने) के निमित्त अपने घोषित आदर्शों के साथ किए गए विभिन्न समझौतों का उल्लेख बिना किसी अपराध-बोध के किया है, वरन कुछ पत्रों के प्रकाशन को लेकर सुमित्रानंदन पंत के साथ हुए अपने विवाद को भी अपने ही दृष्टिकोण से पाठकों के समक्ष रखा है । श्रीमती इन्दिरा गाँधी के सत्ताच्युत होने के उपरांत उनके विरोधियों द्वारा नियंत्रित व्यवस्था ने उन्हें किस प्रकार प्रताड़ित किया, इसका विवरण भी उन्होंने सापेक्ष भाव से ही किया है । उन्होंने सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की अव्यावहारिकता की अप्रत्यक्ष रूप से आलोचना की है लेकिन ऐसा करते समय वे यह विस्मृत कर गए कि निराला जी ने निर्धनता एवं कष्टों भरे जीवन (एवं कारुणिक मृत्यु) को स्वीकार किया, उनकी तरह कभी अपने आदर्शों एवं जीवन-मूल्यों से समझौता नहीं किया । इन्हीं सब कारणों से यह खंड विशेष प्रभावित नहीं करता और बच्चन की मानवीय दुर्बलताओं का आख्यान ही अधिक लगता है । विभिन्न विदेशी स्थलों एवं उनसे सम्बद्ध शुष्क तथ्यों का अनावश्यक और ऊबाऊ विवरण पुस्तक की उपादेयता को सीमित करता है । 

जो एक बात बच्चन की किसी महागाथा सरीखी आत्मकथा को आद्योपांत पढ़ने के उपरांत मुझे खटकी, वह यह थी कि यद्यपि बच्चन का जीवन भारत के स्वाधीनता आंदोलन एवं राष्ट्र के विभाजन के ऐतिहासिक कालखंड का साक्षी रहा, उन्होंने अपनी आत्मकथा में उन घटनाओं तथा उनके कारण राष्ट्र एवं नागरिकों के जीवन में हुई हलचल का कोई विशेष विवरण नहीं दिया । क्या भूलूँ क्या याद करूँ में क्रांतिकारी यशपाल (जो बाद में हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक बने), उनकी वाग्दत्ता सरीखी प्रकाशो तथा अपने एक अन्य मित्र श्रीकांत के साथ जुड़ी कुछ घटनाओं का विवरण अवश्य है लेकिन ऐसा लगता है कि बच्चन सम्पूर्ण राष्ट्र को उद्वेलित करने वाली विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं से निर्लिप्त अथवा अप्रभावित-से रहे ।

बहरहाल आत्मकथाओं के संसार में बच्चन की आत्मकथा अपना एक विशिष्ट स्थान तो रखती ही है, इसका वस्तुपरक एवं निष्पक्ष दृष्टिकोण से किया गया पारायण भावी आत्मकथा-लेखकों को यह भी बताता है कि एक आत्मकथा में क्या होना चाहिए एवं क्या नहीं होना चाहिए । मेरा अपना यह मानना है कि आत्मकथा में चूंकि व्यक्ति अपने साथ-साथ अनेक अन्य व्यक्तियों का भी उल्लेख करता है, अतः उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि जो कुछ भी वह कहे, वह न केवल प्रामाणिक हो, वरन अन्य व्यक्तियों पर अनावश्यक लांछन लगाने वाला न हो क्योंकि ऐसे अनेक व्यक्ति यदि दिवंगत हो चुके हैं अथवा जीवित तो हैं लेकिन शारीरिक-मानसिक रूप से सक्षम अथवा साधन-सम्पन्न नहीं हैं तो यह निश्चय ही उनके प्रति अन्यायपूर्ण है । आत्मकथा-लेखक जिस तरह अपनी छवि को महत्व देता है, उसी तरह उसे दूसरों की छवि एवं सामाजिक सम्मान का भी महत्व समझना चाहिए एवं यह न भूलना चाहिए कि जब आप अपनी एक उंगली किसी की तरफ़ उठाते हैं तो आपकी उस हथेली की तीन उंगलियाँ ख़ुद आप ही की ओर उठ जाती हैं । 
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Wednesday, May 2, 2018

सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी

हम सभी इस बात से वाक़िफ़ हैं कि सुरेन्द्र मोहन पाठक का अगला उपन्यास पिछले पचपन सालों से हमारा मनोरंजन कर रहे सुनील कुमार चक्रवर्ती का एक सौ बाईसवां कारनामा होगा । राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र 'ब्लास्ट' में पत्रकार की नौकरी कर रहे इस लगभग तीस वर्षीय नौजवान से हम उतने ही परिचित हैं जितने कि इसके प्रणेता पाठक साहब से । यह जीवन के ऊंचे मूल्यों को लेकर चलने वाला, हाज़िर-जवाब, शानदार खान-पान का शौकीन, शानदार कपड़े पहनने और ठाठ से रहने का रसिया, एम. वी. आगस्ता अमेरिका बाइक पर शाही ढंग से विचरने वाला और हर किसी की दुख-तकलीफ़ से पिघल कर उसकी मदद करने को तैयार हो जाने वाला चिर-कुंवारा शख़्स १९६३ से पाठकों के दिलों पर राज कर रहा है । 

पाठक साहब ने ऐसे अनेक उपन्यास लिखे हैं जिनमें सुनील एक पत्रकार से इतर एक गुप्तचर की भूमिका में हमारे समक्ष आता है और 'ब्लास्ट' के लिए नहीं बल्कि भारत के लिए, हमारे राष्ट्र के लिए काम करता है । देश के हितों की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों पर खेल जाने वाला यह युवक 'ब्लास्ट' के मालिक और मुख्य संपादक बलदेव कृष्ण मलिक साहब का कर्मचारी ही नहीं बल्कि भारत सरकार के केंद्रीय जाँच ब्यूरो के एक अत्यंत विशिष्ट विभाग स्पेशल इंटेलिजेंस का सदस्य भी है जिसके प्रमुख हैं कर्नल मुखर्जी ।

सुनील की ही तरह कई विश्वासपात्र और योग्य गुप्तचर हैं जो कर्नल साहब के निर्देशों पर देश के हित के लिए काम करते हैं । यहाँ तक कि कई विदेशी मुल्कों में भी स्पेशल इंटेलिजेंस के एजेंट मौजूद हैं । राजनगर में कर्नल मुखर्जी के सुनील के अलावा दो अन्य अत्यंत कार्यकुशल एजेंट हैं – १. विंग कमांडर रामू, २. गोपाल । जैसा कि प्रत्यक्ष है,  विंग कमांडर रामू कर्नल मुखर्जी की ही तरह सेना से जुड़ा रहा  है जबकि गोपाल राजनगर के होटल 'नीलकमल' में वेटर की नौकरी करता है । जिस तरह सुनील की 'ब्लास्ट' की नौकरी उसके जासूसी कारोबार के लिए ओट है, वैसे ही गोपाल की वेटरगिरी उसके लिए है । गोपाल कई भाषाएं जानता है और होटल की नौकरी के दौरान अपने कान खुले रखते हुए लोगों की बातें ग़ौर से सुनता है । फिर जो जानकारी काम की लगे, उसे कर्नल साहब को हस्तांतरित कर देता है ।

कर्नल साहब का एक नौकर है – धर्म सिंह । जब भी सुनील विदेश जाता है, उसका पासपोर्ट, वीज़ा, टिकट तथा अन्य कागज़ात धर्म सिंह ही हवाई अड्डे पर जाकर उस तक पहुँचाता है । सुनील धर्म सिंह पर हमेशा संदेह करता है । उसे लगता है कि धर्म सिंह महत्वपूर्ण सूचनाएं दुश्मनों को लीक कर देता है । लेकिन उसका संदेह सदा ही निराधार सिद्ध होता है जबकि कर्नल मुखर्जी का धर्म सिंह पर विश्वास सही सिद्ध होता है ।

पाठक साहब ने 'ब्लास्ट' के संवाददाता के रूप में अभी सुनील के कुल जमा पाँच ही उपन्यास लिखे थे कि उन्हें इस सीरीज़ में विविधता पैदा करने की ज़रूरत महसूस होने लगी और सुनील का छठा कारनामा – हांगकांग में हंगामा ही ऐसा आ गया जो कि उसे एक जासूस के रूप में पेश करता था । फिर तो सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी बराबर चली और क्या खूब चली !

सुनील के कई ऐसे उपन्यास पढ़ते समय हम उसके साथ विदेशों की सैर करते हैं । उनमें हमें विदेशों का ऐसा सजीव और प्रामाणिक चित्रण देखने को मिलता है जिसे करना केवल पाठक साहब के बस की ही बात है और किसी भारतीय लेखक के बस की नहीं । इनमें सुनील जमकर ख़ूनख़राबा करता है, जेल जाता है, जेल तोड़कर भागता है और ऐसे-ऐसे साहसिक काम करता है जिनकी कल्पना उसे एक पत्रकार के रूप में देखते हुए नहीं की जा सकती ।

लेकिन सुनील द्वारा किए जा रहे रक्तपात के बीच भी पाठक साहब ने एक संवेदनशील मनुष्य होने का उसका मूल रूप बनाए रखा है क्योंकि वह, जहाँ तक संभव हो, बिना किसी की हत्या किए अपना काम बना लेने का प्रयास करता है । योरोप में हंगामा में लुईसा पेकाटी उसे एस्पियानेज के खेल का कच्चा खिलाड़ी बताती है क्योंकि वह उसके और उसके साथी के प्राण लेने की जगह केवल उन्हें रस्सियों से बाँधकर छोड़ गया था ।

बसरा में हंगामा और स्पाई चक्र उपन्यासों में हमारी मुलाक़ात त्रिवेणी प्रसाद शास्त्री से होती है जो कि काहिरा में स्पेशल इंटेलिजेंस का कर्ताधर्ता है । कई उपन्यासों में सुनील की टक्कर अंतर्राष्ट्रीय अपराधी कार्ल प्लूमर से होती है तो कई उपन्यासों में सुनील को पाकिस्तान की गुप्तचर सेवा के अधिकारी अब्दुल वहीद कुरैशी को मात देते हुए दिखाया जाता है । कभी सुनील पीकिंग (यानी कि बीजिंग) जा पहुँचता है तो कभी सिंगापुर तो कभी हांगकांग तो कभी ओस्लो (नार्वे) तो कभी पेरिस तो कभी रोम तो कभी तेहरान लंदन में हंगामा में सुनील 'ब्लास्ट' के लंदन स्थित संवाददाता सरदार जगतार सिंह का सहयोग हासिल करता है जो कि अपनी बातों से पाठकों को हँसा-हँसाकर लोटपोट कर देने में कसर नहीं छोड़ता ।

अमन के दुश्मन और हाईजैक (संयुक्त संस्करण – लहू पुकारेगा आस्तीं का’) बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम पर आधारित हैं । ये पाठक साहब ने इतने भावुक ढंग से लिखे हैं कि इन्हें पढ़कर किसी भी वतनपरस्त की आँखें भर आएं । पाठक साहब हमें यह भी बताते हैं कि सुनील का जन्म भी अविभाजित बंगाल के गोपालगंज नामक स्थान पर हुआ था जो कि अब बांग्लादेश में है ।  
सवाल यह है कि इन सब कारनामों के बीच सुनील की नौकरी कैसे चलती है ? स्पाई चक्र में तो सुनील को डकैती डालकर जानबूझकर गिरफ़्तारी देने के बाद और अदालत से सज़ायाफ़्ता होकर काहिरा की जेल में भी बंद होना पड़ता है । तो फिर वह 'ब्लास्ट' की नौकरी कैसे करता है ? बसरा में हंगामा के अंत में पाठक साहब ने इस सवाल का जवाब दिया है कि जब वह मिशन से लौटकर 'ब्लास्ट' में जॉइन करता है तो तुरंत ही उसे मलिक साहब की लिखित चेतावनी मिल जाती है कि अगर फिर कभी वह इस तरह से बिना सूचना दिए गायब हो तो अपने आपको नौकरी से बर्खास्त समझे ।

एक गुप्तचर के रूप में सुनील का अंतिम उपन्यास ऑपरेशन सिंगापुर  है जो कि इस सीरीज़ का उनसठवां उपन्यास है लेकिन सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी सुनील के बासठवें उपन्यास ख़ून का खेल में भी कायम रहती है जिसमें उपन्यास के पूर्वार्द्ध में तो सुनील एक पत्रकार के रूप में ही सक्रिय रहता  है लेकिन उत्तरार्द्ध में वह कर्नल मुखर्जी के सहयोग और मार्गदर्शन से वतन के दुश्मनों को थाम लेता है ।

कर्नल मुखर्जी को आख़िरी बार पाठक साहब ने सुनील के तिरेसठवें उपन्यास नया दिन नई लाश में पलक झपकने जैसी अपीयरेंस में दिखाया है । जिस एकमात्र दृश्य में वे हाज़िरी भरते हैं उसमें सुनील के मौजूद होते हुए भी उनकी आपस में कोई बातचीत या अन्य संपर्क नहीं होता है ।

नया दिन नई लाश के बाद कर्नल साहब सुनील सीरीज़ से विदा हो गए, ख़ून का खेल के बाद सुनील ब्लास्ट के कर्मचारी और पत्रकार के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में दिखाई देना बंद हो गया और ऑपरेशन सिंगापुर के बाद पाठक साहब ने सुनील के जासूसी कारनामे लिखने पूरी तरह छोड़ दिए । लेकिन सुनील सीरीज़ के ये उपन्यास जितने भी हैं, काबिल-ए-दाद हैं । रोलरकोस्टर राइड जैसी उत्तेजना और रोमांच देने वाले ये उपन्यास न केवल पाठकों का मनोरंजन करते हैं बल्कि उन्हें अनमोल जानकारियों से नवाज़ते हैं और दिल में वतनपरस्ती का जज़्बा जगाते हैं ।

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