Wednesday, December 12, 2018

राजनगर : हिंदी जासूसी उपन्यासों के संसार का एक कल्पित किन्तु लोकप्रिय नगर

भारत में एक ही नाम के कई नगर या कस्बे मिल जाना एक सामान्य बात है । ऐसा ही एक नाम राजनगर है । हमारे देश में राजनगर नाम के कई नगर, कस्बे और विधानसभा क्षेत्र हैं । राजनगर आपको छत्तीसगढ़ में भी मिलेगा, बिहार में भी, ओडिशा में भी, राजस्थान में भी, पश्चिम बंगाल में भी । यहाँ तक कि बांग्लादेश में भी एक राजनगर है । लेकिन मेरा यह लेख राजनगर नामधारी वास्तविक स्थानों के सम्बन्ध में नहीं है बल्कि एक काल्पनिक राजनगर के सम्बन्ध में है जिसे पिछली आधी शताब्दी भी अधिक समय से हिंदी में लुगदी साहित्य के नाम से सस्ता और लोकप्रिय गल्प रचने वाले लेखकों ने अपनी रचनाओं (उपन्यासों) में बड़ी उदारता से स्थान दिया है और उसके विभिन्न स्थलों का ऐसा सजीव वर्णन किया है मानो वह भारत के नक़्शे पर स्थित कोई वास्तविक नगर हो । संयोगवश ऐसी लगभग सभी रचनाएं जासूसी कथा साहित्य अथवा रहस्यकथाओं की श्रेणी में आती हैं । वैसे तो राज कॉमिक्स से प्रकाशित होने वाली कॉमिक पुस्तकों में भी विभिन्न पात्रों के कार्यकलापों का स्थल राजनगर ही है लेकिन इस लेख की विषय-वस्तु मैंने राजनगर को घटनाओं के केंद्र में रखने वाले लोकप्रिय उपन्यासों तथा उनके रचयिताओं को बनाया है ।

पहले वेद प्रकाश काम्बोज ऐसे उपन्यास अपनी विजय-रघुनाथ सीरीज़ के अंतर्गत लिखते थे, बाद में स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा अपनी विजय-विकास सीरीज़ में राजनगर का चित्रण करने लगे । काम्बोज जी अभी जीवित हैं लेकिन उनके नवीन उपन्यास आने बहुत पहले ही बंद हो गए थे । सत्तर का दशक बीतने के बाद हिंदी जासूसी उपन्यासों के क्षितिज पर दो ही नाम छाए हुए थे – वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक । वेद जी के निधन के उपरांत अब केवल पाठक साहब ही हैं जो हिंदी में इस विधा के झंडाबरदार के रूप में कायम हैं और अपनी सुनील सीरीज़ के माध्यम से पाठक वर्ग को राजनगर नामक काल्पनिक नगर से जोड़े हुए हैं । लेकिन २०१६ में इस आकाश पर एक नया सितारा भी उभर कर आया – कँवल शर्मा जिनके पहले ही उपन्यास वन शॉटने हिंदी में लुप्तप्राय होते जा रहे लुगदी साहित्य (या पल्प फ़िक्शन) की लोकप्रियता को फिर से परिभाषित किया । और कँवल शर्मा ने भी अपने पदार्पण उपन्यास में घटनाक्रम का आधार उसी कल्पित राजनगर को बनाया जिससे कि हिंदी जासूसी साहित्य पढ़ने वाले पुराने पाठक अपने हाथ के पृष्ठ भाग की भाँति परिचित हो चुके हैं ।


मैं खेद के साथ लिख रहा हूँ कि मैंने एक ज़माने के अत्यंत लोकप्रिय जासूसी उपन्यासकार वेद प्रकाश काम्बोज का कोई उपन्यास नहीं पढ़ा है (कोई मिला तो अवश्य पढूंगा) लेकिन उनके उत्तराधिकारी वेद प्रकाश शर्मा के और सुरेन्द्र मोहन पाठक के लगभग सभी उपन्यास पढ़े हैं । हिंदी जासूसी कथा-साहित्य के सिरमौर रहे इन दोनों ही उपन्यासकारों ने राजनगर के भूगोल को अपने-अपने ढंग से गढ़ा । इन दोनों ने ही इस कल्पित नगर के आसपास के तथा इससे सड़क, रेल या वायु मार्ग से जुड़े हुए नगरों के नाम भी कल्पित ही रखे हैं । नवोदित उपन्यासकार कँवल शर्मा अलबत्ता वन शॉटलिखते समय राजनगर को शिमागो नामक वास्तविक स्थान से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ बता बैठे । शिमागो कर्नाटक राज्य में है । बहरहाल चूंकि राजनगर को उन्होंने भी एक काल्पनिक नगर ही रखा है, अतः उसके भीतर के उल्लिखित स्थान (जहाँ कि उपन्यास की घटनाएं घटित होती हैं) भी स्वभावतः काल्पनिक ही हैं । कँवल जी ने अपने  राजनगरमें जिन जगहों को खास तवज्जो के काबिल माना है, वे हैं – पलटन बाज़ार, रॉयाल एस्टेट और पूर्वा इलाही बक्श ।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने वेद प्रकाश काम्बोज की विजय-रघुनाथ सीरीज़ में विकास नाम का एक नवीन पात्र सृजित करके उसे विजय-विकास सीरीज़ के रूप में ढाला । विजय-विकास भारतीय सीक्रेट सर्विस के लिए काम करने वाले सरकारी जासूस हैं और राजनगर में रहते हैं । राष्ट्रहित के काम करने के लिए वे चाहे सारी दुनिया में घूमते रहें लेकिन उनका स्थाई ठिकाना राजनगर ही है । यहीं विकास के पिता और विजय के मित्र पुलिस सुपरिटेंडेंट रघुनाथ भी अपनी धर्मपत्नी (जो  विजय की चचेरी बहन है) रैना के साथ रहते हैं और विजय के पिता इंस्पेक्टर जनरल ऑव पुलिस ठाकुर निर्भयसिंह भी अपनी धर्मपत्नी उर्मिलादेवी के साथ रहते हैं । विकास तो अपने माता-पिता के साथ ही रहता है लेकिन विजय अपने माता-पिता से अलग रहता है । विजय की बहन कुसुम का विवाह हो चुका है जबकि विकास अपने माता-पिता की इकलौती संतान है ।

वेद प्रकाश शर्मा के इस सीरीज़ के उपन्यासों में अकसर होटल डिगारिगा का ज़िक्र आता है । यह होटल वस्तुतः राजनगर में स्थित एक रेस्तरां है जिसमें विजय जब-तब रघुनाथ की जेब से दावत उड़ाता है । जब भी रघुनाथ को किसी केस को हल करने के लिए विजय की मदद की ज़रूरत पड़ती है, उसे विजय को पटाने के लिए पहले उसे होटल डिगारिगा में शाही दावत देनी पड़ती है । होटल डिगारिगा में (रघुनाथ के खर्च पर) अपनी पसंद का भरपेट भोजन करने के बाद ही विजय उसकी मदद के लिए हाथ-पाँव हिलाने को राज़ी होता है । इसी होटल में विकास और उसका साथी बंदर धनुषटंकार उर्फ़ मोंटो भी गाहे-बगाहे चक्कर लगाते रहते हैं । मोंटो एक अद्भुत प्राणी है जिसका शरीर बंदर का है लेकिन उसमें मस्तिष्क मनुष्य का है । वह शराब और सिगार का रसिया है और वक़्त-वक़्त पर विजय-विकास की उनके कामों में मदद करने के अलावा विकास के साथ राजनगर में तफ़रीह करना ही उसका शगल है । होटल डिगारिगा विकास और मोंटो का पसंदीदा अड्डा है ।

वेद प्रकाश शर्मा ने अपने इस सीरीज़ के उपन्यासों में राजनगर की भौगोलिक स्थिति का अधिक विस्तार से चित्रण नहीं किया है । कुछ उपन्यासों में राजनगर के निकट स्थित एक अन्य नगर रामनगर का उल्लेख अवश्य उन्होंने किया है । सुपरिटेंडेंट रघुनाथ की कोठी, आई. जी. पुलिस ठाकुर साहब की कोठी और विजय की अपनी कोठी कहाँ स्थित हैं (उन्होंने इन सभी को कोठियों में रहते हुए ही बताया है), वे नहीं बताते । लेकिन राजनगर की जिस जगह ने उनके विजय-विकास सीरीज़ वाले उपन्यासों में सबसे ज़्यादा ज़िक्र हासिल किया है, वह है – गुप्त भवन। अब नाम ही गुप्त भवनहै तो ज़ाहिर-सी बात है कि उसके बारे में सामान्य लोगों को जानकारी नहीं हो सकती । इस गुप्त स्थान पर सीक्रेट सर्विस का मुखिया ब्लैक ब्वॉय तथा सीक्रेट सर्विस के अन्य सदस्य मिलते हैं । यहीं पर सीक्रेट सर्विस द्वारा निपटाए गए मामलों की फ़ाइलें रखी जाती हैं । यहाँ एक डेथ चैम्बर भी है । इसमें पहुँचने के सभी रास्ते आम लोगों की निगाहों से छुपे हुए हैं जिनमें से एक रास्ता विजय की कोठी के भीतर से जाता है । जब भी ब्लैक ब्वॉय को विजय-विकास या अन्य सदस्यों से सीक्रेट सर्विस के किसी अभियान या अन्य संबंधित विषय पर बात करनी होती है, वह अपनी भर्राई हुई आवाज़ में उन्हें गुप्त भवनपहुँचने का हुक्म देता है जहाँ वह अपनी चीफ़ वाली कुरसी पर बैठकर सिगार पीते हुए उनसे बातचीत करता है ।

लेकिन जिस उपन्यासकार ने अपने उपन्यासों में सचमुच एक जीता-जागता राजनगर दर्शाया है, वे हैं वन एंड द ओनली सुरेन्द्र मोहन पाठक । पाठक साहब ने अपनी सुनील सीरीज़ का आग़ाज़ १९६३ में पुराने गुनाह नए गुनाहगारके साथ किया और तब से अब तक वे इस खोजी पत्रकार नायक के पुस्तकाकार में १२२ उपन्यास लिख चुके हैं और उसे लेकर कई लघु उपन्यास तथा लघु कथाएं भी उन्होंने रची हैं । सुनील कुमार चक्रवर्ती का राजनगर स्थित आवासीय पता - ३, बैंक स्ट्रीट उसी तरह प्रसिद्ध हो चुका है जिस तरह सर आर्थर कॉनन डॉयल के अमर चरित्र शेरलॉक होम्स का लंदन स्थित आवासीय पता - २२१ बी, बेकर स्ट्रीट हो चुका है । ब्लास्टनामक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र में नौकरी करने वाला यह साहसी और निष्ठावान पत्रकार अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने के लिए सारे राजनगर में घूमता रहता है । सुरेन्द्र मोहन पाठक ने राजनगर का बाकायदा एक विस्तृत नक़्शा बना रखा है जिसके विभिन्न स्थानों का वर्णन वे बड़ी प्रामाणिकता के साथ करते हैं । उनके द्वारा रचित इस राजनगर में मैजेस्टिक सर्कल है, मुग़ल बाग़ है, जौहरी बाज़ार है, शंकर रोड है, हर्नबी रोड है, मेहता रोड है, धोबी नाका क्रीक है, शेख सराय है, नेपियन हिल रोड है, कूपर रोड है, धर्मपुरा है, विक्रमपुरा है,  लिंक रोड है (जहाँ श्मशान घाट है),  ईसाई  समुदाय की बहुतायत वाला इलाका जॉर्जटाउन है, मुख्य शहर से कोई तीस मील दूर समुद्र के किनारे स्थित इलाका नाॅर्थ शोर है और भी बहुत-से स्थल हैं जिनके बारे में पढ़ते समय पाठकों को लगता ही नहीं कि उनके द्वारा पढ़ी जा रही कहानी किसी काल्पनिक नगर में घट रही है । सुनील का मित्र रमाकांत मल्होत्रा 'यूथ क्लब' के नाम से एक मनोरंजन प्रदान करने वाला क्लब चलाता है जिसमें सुनील नियमित रूप से आता-जाता रहता है पाठक साहब ने  हमेशा से राजनगर को एक घनी आबादी वाले महानगर के रूप में चित्रित किया है जिसकी आबादी अब कम-से-कम करोड़ में होनी चाहिए  इस महानगर में सुनील कभी अपनी मोटर साइकिल पर घूमता है तो कभी रमाकांत से उधार ली हुई कार पर । और सुनील के साथ भ्रमण करते हैं उपन्यास के पाठक ।  

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने एक अन्य नायक प्रमोद को लेकर भी चार उपन्यास लिखे हैं और प्रमोद का निवास भी उन्होंने राजनगर में ही बताया है । समय-समय पर भारत छोड़कर विदेश चला जाने वाला प्रमोद राजनगर में कमर्शियल स्ट्रीट में मार्शल हाउस नामक एक इमारत में रहता है । बहरहाल सुरेन्द्र मोहन पाठक के शैदाइयों का राजनगर भ्रमण प्रमोद के स्थान पर सुनील के ही साथ भलीभाँति हो पाया है । 

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने राजनगर से पैंसठ मील दूर एक रमणीक पर्यटन-स्थल भी बताया है जिसका नाम झेरीहै और जिसका मुख्य आकर्षण एक झील है । उससे भी कोई छह मील आगे वे सुंदरबन नामक एक और पर्यटन-स्थल बताते हैं जो एक विशेष मौसम में ट्राउट-फिशिंग के लिए प्रसिद्ध है । उससे भी और आगे एक पंचधारा नामक स्थान है और है स्कैंडल प्वॉइंट

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने राजनगर को न केवल समुद्र के किनारे स्थित महानगर बताया है बल्कि उसके भीतर बहने वाली एक नदी भी बताई है – कृष्णा नदी । उन्होंने राजनगर के आसपास स्थित नगर और कस्बों के नाम भी काल्पनिक ही रखे हैं । ये हैं – विशालगढ़, विश्वनगर, इक़बालपुर, तारकपुर, सुनामपुर, सोनपुर, नूरपुर, खैरगढ़ आदि । इनमें से पहले चार नगरों के और झेरी के चक्कर पाठक साहब ने सुनील से लगवाए हैं तो बाकी जगहों के चक्कर अपने दूसरे लोकप्रिय नायक विमल से लगवाए हैं । अपने कुछ अत्यंत लोकप्रिय कारनामों में विमल ने भी राजनगर में काफ़ी वक़्तगुज़ारी की है तो एक असाधारण उपन्यास के असाधारण क्लाईमेक्स में विमल के साथ-साथ सुनील भी नूरपुर जा पहुँचता है । पाठक साहब का इन काल्पनिक नगरों से लगाव कितना ज़्यादा है, इस बात का प्रमाण यह है कि उनके कई थ्रिलर उपन्यास भी इनमें ही अपनी कथा को प्रवाहित करते हैं ।

राजनगर के बाद पाठक साहब का सबसे ज़्यादा दुलार किसी कल्पित नगर ने पाया है तो वह है – विशालगढ़ जिसमें उनके कई लोकप्रिय थ्रिलर उपन्यासों का पूरा-का-पूरा घटनाक्रम चलता है । पाठक साहब ने जहाँ राजनगर को एक महानगर बताया है, वहीं विशालगढ़ को वे एक छोटा शहर बताते हैं । लेकिन राजनगर की तरह इसे भी एक नदी का सान्निध्य प्राप्त है – सोना नदी । इसके अतिरिक्त यहाँ रिचमंड रोड है जो एक कारोबारी चहल-पहल वाला इलाका लगता है । पाठक साहब के किसी उपन्यास की कहानी जब विशालगढ़ में घटती है तो रिचमंड रोड का उल्लेख आए बिना नहीं रहता । 

कथ्य की प्रामाणिकता स्थापित करने के लिए पाठक साहब सहित अधिकांश रहस्य-कथा लेखक प्रायः वास्तविक शहरों और उनके भीतर स्थित वास्तविक स्थानों के नाम ही अपनी रचनाओं में प्रयुक्त करते हैं लेकिन काल्पनिक शहरों विशेतः लुगदी साहित्य की दुनिया में एक किवदंती का दर्ज़ा पा चुके राजनगर और उसके निकटस्थ नगरों में उपन्यासों के पृष्ठों के द्वारा बैठे-बैठे ही विभिन्न स्थानों की सैर करने का आनंद ही कुछ और है । यह आनंद हक़ीक़त में नहीं लिया जा सकता क्योंकि ये नगर कहीं मौजूद नहीं हैं । बहरहाल तसव्वुर में ही सही, इस सैर से मिलने वाला आनंद अद्भुत है और इस बात का ज़ामिन मैंं ख़ुद हूँ 


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Tuesday, November 27, 2018

कँवल शर्मा करवाते हैं विनय रात्रा के साथ एक रहस्यभरी यात्रा


एक समय था जब न तो हिंदी में जासूसी उपन्यासों अथवा रहस्यकथाओं को पढ़ने वालों की कोई कमी थी और न ही लिखने वालों और छापने वालों की । ऐसे कथा-साहित्य का बाज़ार बहुत बड़ा था, इसलिए ढेर सारी किताबें लुगदी कागज़ पर छपती थीं और माँग के हिसाब से पठन-सामग्री का इंतज़ाम करने के लिए प्रकाशक बहुत-से लेखकों को मौका देते थे । इसीलिए बहुत-से (वास्तविक नाम वाले भी और छद्म नाम वाले भी) लेखक सक्रिय थे तथा असेम्बली लाइन उत्पादन की तरह दर्ज़नों जासूसी उपन्यास विभिन्न प्रकाशनों के सौजन्य से प्रति माह हिंदी के पाठकों की रहस्य-रोमांच की क्षुधा  को तृप्त करने हेतु पुस्तकों की दुकानों पर अवतरित हो जाया करते थे ।

वक़्त बदला और इक्कीसवीं सदी में पाठकों और किताबों, दोनों की ही तादाद घटने से प्रकाशक भी घटे जबकि हिंदी के जासूसी उपन्यास लेखक तो केवल दो ही रह गए – सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा । १७ फ़रवरी, २०१७ को वेद प्रकाश शर्मा का असामयिक निधन हो गया जबकि बढ़ती आयु तथा प्रकाशन में लगातार आ रही अड़चनों के कारण सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित नवीन पुस्तकें भी अब कम आ रही हैं । इन वजूहात से कुछ अरसा पहले ऐसा लगने लगा था कि पाठक साहब के बाद हिंदी में जासूसी उपन्यास छपने ही बंद हो जाएंगे । इस निराशाजनक स्थिति में आशा की एक किरण बनकर उभरे हैं एक युवा लेखक - कँवल शर्मा । प्रारम्भ में जेम्स हेडली चेज़ के उपन्यासों के हिंदी अनुवादों के माध्यम से रहस्य-रोमांच के शैदाई हिंदी के पाठकों को अपना तआरूफ़ देने वाले कँवल शर्मा ने अपने पहले मौलिक उपन्यास - वन शॉट’ के द्वारा हिंदी जासूसी उपन्यासों के संसार में पदार्पण किया । कँवल जी का यह प्रथम उपन्यास दो वर्ष पूर्व आया था एवम् इसके उपरांत भी उनके द्वारा रचित कई उपन्यास हिंदी के पाठक समुदाय के समक्ष आ चुके हैं, इसलिए वन शॉट’ की यह समीक्षा निश्चय ही विलम्बित है लेकिन यह उपन्यास मुझे इतना पसंद आया था कि देर से ही सही, इस पर कुछ लिखे बिना मेरा मन नहीं माना ।

कँवल शर्मा का यह पहला उपन्यास उनके कथा-नायक विनय रात्रा का भी पहला कारनामा है । विनय रात्रा प्रत्यक्षतः एक प्राध्यापक है लेकिन वस्तुतः वह एक गुप्तचर है जो अपने देश अर्थात् भारत के लिए सम्पूर्ण निष्ठा, कुशलता एवम् साहस के साथ काम करते हुए राष्ट्र की सुरक्षा में संलग्न रहता है । उपन्यास की शुरुआत एक तूफ़ानी रात में घनघोर अंधकार और बरसात के माहौल में एक कार से एक लाश को वीराने में फेंके जाने के दृश्य से होती है लेकिन उसके बाद उपन्यास का घटनाक्रम विनय रात्रा के साथ-साथ ही चलता है । देश की धरती से दूर विदेशी धरा पर देश के हित में कार्यरत विनय को स्वदेश लौटकर एक निजी अभियान आरम्भ करना  पड़ता है – अपने भाई रोहन रात्रा की निर्मम हत्या की छानबीन करके हत्यारे तक पहुँचने का अभियान । यह कार्य सरल नहीं है क्योंकि इस कार्य के लिए उसे कोई विभागीय सहायता उपलब्ध नहीं है । यद्यपि निजी सम्बन्धों एवम् मित्रता के आधार पर वह विभाग में अपने सहकर्मी मथुरा प्रसाद का सहयोग प्राप्त कर लेता है, तथापि इस सत्य से वह परिचित है कि अधिकांश कार्य उसे अपने आप ही करना है । उसके लिए अच्छी बात यह होती है कि वह पूरी तरह अकेला नहीं पड़ जाता, राजेश नामक उसका एक मित्र एवम् विभाग में लिपिकीय स्तर का कामकाज देखने वाला युवक इस सिलसिले में उसकी परछाईं की मानिंद उसके साथ रहता है और उसके दर्द को समझते हुए उसकी भरपूर मदद करता है । विनय किस प्रकार विभिन्न लोगों से मिलते हुए और नगर के प्रभावशाली व्यक्तियों से टकराव मोल लेते हुए वास्तविक अपराधियों तक पहुँचता है, यह इस उपन्यास का शेष भाग बताता है ।

कँवल शर्मा ने उपन्यास में विनय रात्रा का प्रवेश ही अत्यंत प्रभावी और स्टाइलिश ढंग  से करवाया है । विनय रात्रा किसी गल्प के नायक की भाँति ही वन शॉट’ के पाठकों के समक्ष अवतरित होता है और उनके दिलों पर अपनी छाप छोड़ देता है । और सही मायनों में नायक तो वही होता है जो दिलों पर छाप छोड़ जाए । इस रूप में विनय रात्रा एक पारम्परिक नायक की मानिंद ही कथानक में आता है और अपनी विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से उसी रूप में उसके अंत तक छाया रहता है । ये गतिविधियां दिमागी दांव-पेच, जासूसी, मारधाड़ और एक्शन के साथ-साथ वतनपरस्ती और इनसानी जज़्बात से भी लबरेज़ रहती हैं । उपन्यास के सारे वाक़यात क़त्ल और उसके राज़ के फ़ाश होने से जुड़े हुए नहीं हैं लेकिन वे नायक को नायक के रूप में स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाते हैं और इसीलिए अपनी अहमियत रखते हैं । उपन्यास के संवाद (विशेषतः नायक के संवाद) भी अत्यंत प्रभावशाली हैं जो उपन्यास की गुणवत्ता एवम् मनोरंजन-तत्व को बहुत अधिक बढ़ा देते हैं । लेखक हत्या के रहस्य को अंतिम पृष्ठों तक बनाए रखने में सफल रहा है जो एक उत्तम रहस्यकथा की पहचान है । उपन्यास का अंतिम दृश्य भी अत्यंत रोचक और प्रभावी है जो नायक के कद को और भी ऊंचा उठा देता है । सभी पात्र स्वाभाविक एवम् सजीव हैं तथा नायक के अतिरिक्त अन्य पात्रों को भी उभरने का अवसर मिला है जो इस बात का प्रमाण है कि लेखक ने उपन्यास-लेखन की विधा को भलीभाँति समझा और साधा है ।

उपन्यास में प्रयुक्त हिंदी सरल एवम् बोधगम्य होते हुए भी अपने भाषाई सौंदर्य को आद्योपांत बनाए रखती है (यद्यपि कहीं-कहीं यह प्रयोगधर्मी भी है) । उपन्यास में प्रूफ़-रीडिंग तथा सम्पादन की त्रुटियां हैं जो न होतीं तो यह उपन्यास अधिक सराहना का पात्र होता । कथ्य में कहीं-कहीं कसावट की कमी है लेकिन किसी भी स्थान पर मनोरंजन की कमी नहीं है । उपन्यास किसी कुशल निर्देशक द्वारा निर्मित साफ़-सुथरी बॉलीवुड फ़िल्म सरीखा सम्पूर्ण मनोरंजन प्रदान करता है जिसमें कहीं किसी प्रकार की अश्लीलता अथवा अभद्रता विद्यमान नहीं है । उपन्यास में क़त्ल के रहस्य के अतिरिक्त भी कई मनोरंजक घटक हैं जो पाठक को आदि से अंत तक उपन्यास से चिपकाए रखते हैं तथा समापन के उपरांत उसे संतुष्टि की सुखद अनुभूति होती है । इस उपन्यास को इसे पढ़ने वाले के लिए एक ऐसा रहस्यभरा सफ़र कहा जा सकता है जिसमें मंज़िल अहम तो है लेकिन सफ़र अपने आप में ऐसा दिलचस्प और खुशनुमा है कि उसकी अहमियत भी मंज़िल से कुछ कम नहीं । इसीलिए मंज़िल मिल जाने के बाद भी (यानी रहस्य खुल जाने के बाद भी) ऐसे सफ़र को बार-बार करने का मन करता है । किसी रहस्यकथा की इतनी रिपीट वैल्यू होना उसके रचयिता की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । मैं स्वयम् वन शॉट’ को कई बार पढ़ चुका हूँ और मेरा आंकलन यही है कि जो भी हिंदी पाठक विनय रात्रा के साथ इस रहस्यभरी यात्रा को एक बार कर लेगा, वह इस यात्रा पर पुनः जाना चाहेगा ।  

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Tuesday, November 20, 2018

दुनिया से निराले, मतवाले जादूगर की दास्तान


श्री पराग डिमरी मेरे अत्यंत प्रिय मित्र हैं और हम दोनों के स्वभाव की समानताओं के अतिरिक्त जो दो तथ्य हमें निकट लेकर आए (विगत छह वर्षों से हमारी मित्रता अनवरत चल रही है), वे हैं – श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित उपन्यासों का रसिया होना तथा संगीत से लगाव । मैं यह जानता था कि पराग जी संगीत में गहन रुचि रखते हैं एवम् स्वर्गीय ओ.पी. नैय्यर साहब द्वारा सृजित गीतों के प्रति उनका अनुराग असाधारण है लेकिन मैं यह कभी नहीं भाँप सका था कि इस संबंध में उनका ज्ञान इतना अधिक है जब तक कि मैंने उनके द्वारा रचित पुस्तक – दुनिया से निराला हूँ, जादूगर मतवाला हूँनहीं पढ़ी थी ।



दुनिया से निराला हूँ, जादूगर मतवाला हूँओ.पी. नैय्यर के नाम से सुविख्यात ओंकार प्रसाद नैय्यर की दास्तान है, जीवन-कथा है । नैय्यर साहब सचमुच ही निराले थे, दूसरों से अलग थे, फिल्मी संगीतकारों की भीड़ में अपना अलग ही अस्तित्व, अलग ही परिचय रखते थे । वे अतुलनीय संगीतकार थे जिसने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी और जिसे शास्त्रीय संगीत का आधारभूत ज्ञान तक नहीं था लेकिन जिसकी बनाई हुई धुनों में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाला सम्मोहन था । उन्हें सदा एक ऐसे संगीतकार के रूप में स्मरण किया जाएगा जिसने स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर से कभी कोई गीत नहीं गवाया । यहाँ तक कि लता मंगेशकर के नाम से दिए जाने वाले सरकारी सम्मान को भी उन्होंने निस्संकोच ठुकरा दिया था ।

सम्प्रति समीक्षाधीन पुस्तक के रचयिता पराग डिमरी इस अनूठे संगीतकार के मुरीद हैं जिन्होंने इस पुस्तक को अत्यंत परिश्रमपूर्वक लिखा है और इसके लिए गहन शोध द्वारा प्रामाणिक तथ्य एकत्र किए हैं । न केवल नैय्यर साहब के निजी तथा कार्यसाधक जीवन वरन उनके सृजन से संबंधित तथ्यों के वर्णन की भी एक-एक पंक्ति, एक-एक शब्द डिमरी जी की निष्ठा, श्रम तथा सुरों के इस जादूगर के प्रति उनकी अनन्य आस्था को प्रतिबिम्बित करता है । तथापि यह श्रेय उन्हें देना ही होगा कि उन्होंने  भावनाओं में बहकर किसी अंधभक्त की भाँति लेखन नहीं किया है । उनका लेखन-कार्य पूर्णरूपेण वस्तुपरक एवम् निष्पक्ष है और इसीलिए विश्वसनीय है । स्वयम् मुरीद होकर भी उन्होंने अपने आराध्य को पीर-पैगम्बर या भगवान के समकक्ष न रखते हुए दुर्बलताओं से युक्त एक साधारण मानव के रूप में ही चित्रित किया है ।  
  
ओ.पी. नैय्यर मनमौजी थे और काम के साथ-साथ जीवन का भरपूर आनंद लेने में विश्वास रखते थे । सम्पूर्ण जीवन अपनी शर्तों पर जीने वाले इस अलबेले संगीतकार ने अपनी ज़िन्दगी का अंदाज़ हमेशा  शानो-शौक़त और स्टाइल से लबरेज़ रखा । अपनी रसिकमिज़ाजी के कारण महिलाओं का साथ उन्हें बहुत भाता था । संभवतः महिलाएं उनके सृजन के लिए प्रेरणा-स्रोत की भाँति थीं । इसके कारण उन्होंने अपने परिवार के प्रति दायित्वों से तो मुंह नहीं मोड़ा लेकिन अपने जीवन की संध्या में वे संगीत से मुंह मोड़कर अपना वार्धक्य एक ऐसे अजनबी परिवार (नख़वा परिवार) के साथ बिताने लगे जिससे उनके संबंध को समझ पाना किसी बाहरी व्यक्ति के लिए  असम्भव ही था (और है) । उन्होंने गीता दत्त तथा लता मंगेशकर की बहन आशा भोसले को गायिकाओं के रूप में स्थापित करने में महती भूमिका निभाई (चाहे आज आशा इसे स्वीकार न करती हों) । लेकिन गुरु दत्त को आत्मघात से न रोक पाने तथा गीता दत्त के जीवन के बुरे दौर में उन्हें सहारा न देने के लिए वे स्वयं को कभी मा नहीं कर सके और इन बातों के लिए आजीवन पछताते रहे । उनके स्वभाव का अक्खड़पन भी सदा बना रहा – जैसा उनके बेहतरीन वक़्त में था, वैसा ही उनके ढलते दौर में भी रहा । लेकिन भारतीय फ़िल्मी संगीत में शास्त्रीय परम्परा से हटकर नवाचरण की नई बयार चलाने वाले इस विद्रोही संगीतकार ने प्रत्येक फ़िल्म में अपना सर्वश्रेष्ठ ही दिया चाहे फ़िल्म किसी प्रतिष्ठित निर्माता की हो या फिर वह किसी छोटे निर्माता द्वारा बनाई गई दोयम दर्ज़े की फ़िल्म रही हो । अपने मिज़ाज के साथ समझौता नहीं करने वाले ओ.पी. नैय्यर ने कभी अपने काम की बेहतरी और पैसा देने वाले को उसका पूरा सिला देने की अपनी ईमानदाराना नीयत से भी कभी समझौता नहीं किया । नतीज़ा यह रहा कि लोग चाहे फ़िल्मों को भूल गए, ओ.पी. नैय्यर द्वारा रचे गए उनके गीतों को नहीं भूले । इन सभी तथा ओ.पी. नैय्यर के जीवन से संबंधित ऐसे अनेक अन्य तथ्यों को लेखक ने विभिन्न अध्यायों में विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया है ।

शब्दों में पिरोए गए महत्वपूर्ण तथ्यों के अतिरिक्त जो बात इस पुस्तक को विशिष्ट एवम् संग्रहणीय बनाती है, वह है उस बीत चुके स्वर्णिम युग की दुर्लभ तसवीरें । जो श्वेत-श्याम चित्र लेखक ने अपने अनथक परिश्रम से जुटाए हैं, उन्होंने इस किताब को केवल ओ.पी. नैय्यर की संगीत-यात्रा के ही नहीं, वरन हिंदी फ़िल्मों के इतिहास के एक अहम दस्तावेज़ में बदल डाला है । ओ.पी. नैय्यर के साथ-साथ विभिन्न गायक-गायिकाओं, गीतकारों, संगीतकारों और फ़िल्म-जगत के स्वनामधन्य लोगों की छवियां दर्शाते ये चित्र सच्चे संगीत-प्रेमियों के लिए उस युग का झरोखा हैं जब गीत-संगीत केवल एक व्यवसाय-मात्र न होकर एक साधना हुआ करता था

किताब की ख़ामियों की अगर बात की जाए तो यह कहना ही होगा कि प्रूफ़-रीडिंग स्तरीय नहीं है और अशुद्धियों की भरमार है । पुस्तक का विन्यास भी बेहतर हो सकता था । कुछ अध्यायों के शीर्षक भिन्न और अधिक उपयुक्त हो सकते थे । अलबत्ता कागज़ और छपाई की गुणवत्ता उच्च है तथा आवरण-पृष्ठ भी आकर्षक एवम् प्रशंसनीय है । चूंकि यह लेखक का प्रथम प्रयास है, अतः सिने-संगीत के प्रेमी विशेषतः ओ.पी. नैय्यर के प्रशंसक पुस्तक की त्रुटियों को क्षम्य मानकर उदार हृदय से इसे स्वीकार कर सकते हैं । आशा है, लेखक इन बातों को अपने ध्यान में रखेंगे तथा सुनिश्चित करेंगे कि उनकी अगली पुस्तक दोषमुक्त हो एवम् उसका प्रस्तुतीकरण बेहतर हो । बहरहाल ओ.पी. नैय्यर की मौसीक़ी के शैदाइयों के लिए यह किताब एक अनमोल तोहफ़ा है, इस बात में शक़ की कोई गुंजाइश नहीं ।

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Monday, July 16, 2018

भारतीय कार्य-संस्कृति और व्यवस्था की कड़वी सच्चाई


जॉन अब्राहम द्वारा निर्मित तथा अभिनीत चर्चित हिन्दी फ़िल्म परमाणु को देखने का सौभाग्य मुझे तनिक विलंब से ही मिला जब इसे मेरे नियोक्ता संगठन भेल के क्लब में प्रदर्शित किया गया । फ़िल्म बहुत ही अच्छी निकली । मई १९९८ में पोखरण में किए गए परमाणु विस्फोट जिसने भारत को नाभिकीय शक्ति सम्पन्न देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया, की पृष्ठभूमि को इस फ़िल्म में फ़िल्मकार ने अपनी कल्पना का तड़का लगाकर मनोरंजक तथा प्रभावी स्वरूप में प्रस्तुत किया है तथा इसके माध्यम से वह दर्शक-वर्ग में राष्ट्रप्रेम तथा राष्ट्रीय कर्तव्य के प्रति निष्ठा की भावनाएं जगाने में भी सफल रहा है । फ़िल्म आद्योपांत दर्शक को बाँधे रखती है तथा उसके समापन पर वह अपने मन में राष्ट्र के सम्मान को सर्वोपरि रखने के ध्येय के साथ राष्ट्र के प्रति कर्तव्यपालन का भाव अनुभव करता है । फ़िल्म का तकनीकी पक्ष, अभिनय पक्ष तथा संगीत सभी सराहनीय हैं तथा कुल मिलाकर इसे निस्संदेह एक अच्छी फ़िल्म कहा जा सकता है ।
लेकिन जिस संदर्भ में इस फ़िल्म को एक कटु सत्य का उद्घाटन करने वाली आलोचनात्मक फ़िल्म कहा जा सकता है, वह है भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था एवं तंत्र तथा उसमें समाहित कार्य-संस्कृति का बिना किसी लाग-लपेट के बेबाक चित्रण । यद्यपि यह फ़िल्म परोक्ष रूप से तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री वाजपेयी जी का महिमामंडन-सी करती प्रतीत होती है, तथापि नेताओं एवं मंत्रियों के अधीन जो अफ़सर प्रशासनिक तंत्र की बागडोर संभाले होते हैं, उनकी सोच एवं काम करने के ढंग पर यह फ़िल्म एक करारा व्यंग्य है । यह फ़िल्म उस सम्पूर्ण कार्य-संस्कृति पर भी एक तीखा व्यंग्य है जिसमें अपनी निजी हित के अतिरिक्त प्रत्येक बात को अत्यंत हलके रूप में लिया जाता है चाहे वह कितने ही बड़े राष्ट्रीय अथवा सार्वजनिक हित से जुड़ी हो । 
फ़िल्म में नायक जो कि तकनीकी विशेषज्ञता रखने वाला एक युवा प्रशासनिक अधिकारी है, अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सम्मुख एक बैठक में देश की आणविक क्षमता को प्रतिपादित करने वाले एक परीक्षण का प्रस्ताव तथा उससे सम्बद्ध सम्पूर्ण योजना की रूपरेखा प्रस्तुत करता है । उसके उच्चाधिकारी न केवल उसका एवं उसकी बातों का उपहास करते हैं, बल्कि जिस फ़्लॉपी डिस्क में उसने अपनी विस्तृत कार्य-योजना को संरक्षित किया था, एक अधिकारी उसे चाय का कप रखने वाली तश्तरी की तरह काम में लेते हुए अपनी चाय का कप उसी पर रख देता है । बैठक की अध्यक्षता करने वाला उच्चाधिकारी उस पर मानो कोई अहसान-सा करते हुए उसे प्रधानमंत्री कार्यालय तक ले तो जाता है लेकिन प्रधानमंत्री से उसे नहीं मिलवाता और स्वयं ही प्रधानमंत्री से मिलकर (युवा अधिकारी के परिश्रम का श्रेय स्वयं लेने के लिए) सब कुछ तय कर लेता है । सम्पूर्ण योजना को पढ़ने का कष्ट तक ये वरिष्ठ एवं अनुभवी नौकरशाह नहीं करते और योजना के सबसे आवश्यक अंग गोपनीयता का कोई ख़याल नहीं रखा जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि जो कार्य पूर्णतः गुप्त रूप से बिना किसी को भनक तक लगे किया जाना था, उसकी ख़बर चौतरफ़ा हो जाती है । बिना तकनीकी दक्षता के किया गया वह परीक्षण असफल भी हो जाता है और देश की बदनामी होती है सो अलग । अब इस विफलता का ठीकरा फोड़ने के लिए एक बलि का बकरा भी चाहिए जो कि उसी निष्ठावान एवं कर्तव्यपरायण अत्यंत प्रतिभासम्पन्न युवक को बनाया जाता है जिसने परीक्षण से संबंधित विचार एवं योजना को प्रस्तुत किया था । उस निर्दोष एवं योग्य युवा अधिकारी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है । निकम्मी एवं क्रूर व्यवस्था का मारा वह देशप्रेमी युवा अपने देश के लिए यह परीक्षण तभी कर पाता है जब तीन वर्ष की अवधि के उपरांत शासन-प्रशासन में हुए कतिपय परिवर्तनों के कारण उसके भाग्य से उसे दूसरा अवसर मिलता है ।
फ़िल्म में दिखाई गई यह काल्पनिक कथा हमारे इस अभागे देश की निरंतर दृष्टिगोचर होने वाली वह कड़वी सच्चाई है जिससे क्षुद्र स्वार्थों के हाथों की कठपुतली बनी इस भ्रष्ट, काहिल एवं हृदयहीन व्यवस्था में वे चंद ईमानदार एवं प्रतिभाशाली व्यक्ति दिन-प्रतिदिन दो-चार होते हैं जो अपनी सम्पूर्ण निष्ठा एवं सम्पूर्ण क्षमता के साथ अपने देश के लिए कुछ सार्थक करना चाहते हैं । आए दिन प्रतिभा-पलायन का राग अलापने वाले शृगालों से कोई पूछे कि भारत से प्रतिभा-पलायन का वास्तविक कारण क्या है और क्या कोई उसे दूर करने में सचमुच रुचि रखता है । क्या प्रतिभा-पलायन का झूठा रोना रोने वाले नहीं जानते कि प्रतिभाओं को हमारी संवेदनहीन एवं उत्तरदेयताविहीन व्यवस्था किस प्रकार प्रताड़ित, हतोत्साहित एवं कुंठित करती है एवं उनका मनोबल पूरी तरह तोड़ देती है । ऐसे में या तो वे फ़िल्म के नायक की भाँति बलि के बकरे बन जाते हैं या फिर उसी निकम्मे, स्वार्थी एवं भ्रष्ट तंत्र के अंग बन जाते हैं जिससे जूझना अब उन्हें संभव नहीं लगता । इस तरह कीचड़ में कमल की तरह खिलने का स्वप्न देखने वाली इन कलियों को कीचड़ अपने ही रंग में रंग देता है । ऐसे प्रतिभावान एवं कुछ हटकर करने के इच्छुक युवाओं को बार-बार स्मरण कराया जाता है कि रोम में रहना है तो रोमनों जैसे बनकर रहो । यह कोई नहीं सोचता कि रोम में आने वाला प्रत्येक आगंतुक यदि वहाँ पहले से रह रहे रोमनों के ही रंग में रंगकर उनके जैसा ही बन जाएगा तो रोम में सुधार कैसे होगा ?
सार्वजनिक क्षेत्र की सेवा के उपक्रमों में वर्षों बिता देने के उपरांत मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि भारत की सरकारी कार्य-संस्कृति में तर्क, औचित्य एवं विवेकशीलता का कोई स्थान नहीं है । निष्ठापूर्वक कर्तव्यपालन, प्रतिभा एवं परिश्रम सभी पार्श्व में रहते हैं तथा सभी प्रकार के पुरस्कारों का वितरण रेवड़ियों की भाँति पहुँच के आधार पर किया जाता है । ताक़तवर कुर्सियों पर प्रायः वे ही पहुँचते हैं जो चापलूसी एवं तिकड़मबाजी में तेज़ हैं और कुर्सियां लेने के उपरांत वे अपने जैसे लोगों को ही शासकीय पदानुक्रम में आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं । जिसकी सत्ता के गलियारों में पहुँच है, वह सभी तरह के पुरस्कार ले लेता है और दंड से बच जाता है जबकि जिसकी ऐसी पहुँच नहीं है, उसे उसके परिश्रम का पुरस्कार तो नहीं ही मिलता है, साथ ही वह गाहे-बगाहे बलि का बकरा बना दिया जाता है । ऐसे सभी सुयोग्य एवं कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति परमाणु फ़िल्म के नायक की भाँति सौभाग्यशाली नहीं होते जिन्हें ज़िंदगी अपने आपको साबित करने का दूसरा मौका दे, अपने दिल पर पड़े असह्य भार से मुक्ति पाने का दुर्लभ सुअवसर दे । ऐसी वंचित प्रतिभाएं आजीवन मन मसोसकर रह जाने और अपने भाग्य को कोसने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पातीं । लेकिन यह दुर्भाग्य क्या केवल उन्हीं का है ? क्या यह इस राष्ट्र का दुर्भाग्य नहीं ? क्या सत्ता के शीर्ष पदों पर व्यवस्था को इस दृष्टिकोण से देख सकने वाले सही सोच से युक्त व्यक्ति कभी नहीं पहुंचेंगे ?

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Friday, July 13, 2018

डॉक्टर हाथी की ज़िंदगी और ज़िंदादिली


गुज़री नौ जुलाई को जब मैं सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित एक बहुत पुराने हिन्दी उपन्यास नौ जुलाई की रात पर अपना लेख लिख रहा था, तब मुझे शानो-गुमान भी नहीं था कि हिंदुस्तानी छोटे परदे के एक बहुत ही मक़बूल अदाकार डॉक्टर हाथी नहीं रहे थे । इंटरनेट से ही मैंने जाना कि उनका वास्तविक नाम कवि कुमार आज़ाद था अन्यथा उनके करोड़ों प्रशंसकों की ही तरह मैं भी उन्हें उनके स्क्रीन नेम डॉक्टर हंसराज हाथी के नाम से ही जानता था । दुख की बात है कि इतने लोकप्रिय कलाकार के निजी जीवन के विषय में इंटरनेट पर कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है । उनकी आयु तथा विवाहित एवं पारिवारिक जीवन के विषय में अलग-अलग साइटें विरोधाभासी तथ्य बता रही हैं । बहरहाल इतना तय है कि उनकी आयु अधिक नहीं थी और वे अल्पायु में ही दिवंगत हो गए ।
सब टी.वी. पर एक दशक से अभी अधिक समय से निरंतर प्रसारित हो रहे अत्यंत लोकप्रिय सिटकॉम तारक मेहता का उल्टा चश्मा में डॉक्टर हाथी के किरदार को जीने वाले इस बहुत मोटे लेकिन बेहद ज़िंदादिल अदाकार की इस अकाल मृत्यु से मुझे न केवल गहरा धक्का लगा बल्कि मुझे अपने पिता की याद हो गई जिनके देहावसान को पंद्रह वर्ष पूरे हो रहे हैं । मेरे पिता भी अपने स्वस्थ जीवनकाल में लंबे-चौड़े व्यक्तित्व के स्वामी थे जब तक कि मधुमेह के कारण अपने अंतिम वर्षों में उन्हें दुर्बलता ने नहीं घेर लिया । जीवन की समस्याओं और दुखों से दिन-प्रतिदिन जूझते हुए भी वे सदा हँसते-मुसकराते रहते थे । उनके ज़िंदादिली भरे ठहाकों और ऊंची आवाज़ से उनके आसपास का सारा वातावरण गूँजता रहता था । १९४४ में ही अध्यापक के रूप में नौकरी पर लग जाने के उपरांत वे लगभग सम्पूर्ण जीवन हमारे गृहनगर साम्भर झील (साम्भर लेक जो कि नमक की विश्वप्रसिद्ध झील है) में मोटे मास्टर साहब के नाम से जाने जाते रहे । उनके गुस्से से बहुत-से लोग उनसे नाराज़ हो जाते थे लेकिन उनकी साफ़दिली उस नाराजगी को दूर भी कर देती थी । पंद्रह जुलाई को उनका जन्मदिन पड़ता है और अपने जन्मदिन से एक दिन पहले चौदह जुलाई दो हज़ार तीन को उनका निधन हो गया । उनके अवसान के बाद मेरा अपने हँसना-मुसकराना बहुत कम हो गया लेकिन तब से अब तक मेरे मन में कई बार यही ख़याल आता है कि काश मैं उनकी तरह ज़िंदादिल होता क्योंकि अगर ऐसा होता तो ज़िंदगी की दुश्वारियों से दो-चार होने की जैसी कूव्वत उनमें थी, मुझमें भी होती ।

मैंने अपने परिवार के साथ तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखना २००८ में आरंभ किया था । प्रारम्भ में डॉक्टर हाथी की भूमिका एक दूसरे कलाकार (निर्मल सोनी) निभाते थे लेकिन कुछ समय के उपरांत ही कवि कुमार आज़ाद इस भूमिका में ले लिए गए । यथा नाम तथा गुण को चरितार्थ करते हुए इस धारावाहिक में डॉक्टर हाथी के चरित्र को एक अत्यंत मोटे व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया और इस कसौटी पर कवि कुमार आज़ाद पूरी तरह खरे उतरते थे । दो सौ किलो से भी अधिक वज़न वाले इस मोटे कलाकार ने किसी बालक की भाँति निर्दोष और निश्छल डॉक्टर हंसराज हाथी के रूप में एक दशक तक भारतीय दर्शकों को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान किया । धारावाहिक में उन्हें एक उत्तर-भारतीय व्यक्ति बताया गया है जो पेशे से चिकित्सक है, धारावाहिक के अन्य स्थायी पात्रों के साथ गोकुलधाम नामक हाउसिंग सोसायटी में रहता है, कोमल नामक अपने जैसी ही एक भारी देह वाली महिला का पति है और वैसे ही मोटे गोली नामक एक बालक का पिता है । खाने-पीने के बेहद शौकीन तथा सदा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहने वाले इस किरदार में ज़िंदादिली कूट-कूटकर भरी है । कवि कुमार आज़ाद ने इस किरदार को बाख़ूबी निभाया और सम्पूर्ण देश में अपने वास्तविक नाम के स्थान पर डॉक्टर हाथी के रूप में ही जाने जाने लगे ।  
जैसे धारावाहिक में अपने नाम के अनुरूप वे हाथी जैसे व्यक्तित्व के स्वामी थे, वैसे ही वास्तविक जीवन में भी अपने नाम के अनुरूप वे एक (हिन्दी भाषा के) कवि थे । नाम और काम में ऐसा अद्भुत साम्य कम ही देखने को मिलता है । धारावाहिक में वे परदे पर आते ही अपनी छाप छोड़ देते थे । उनका सही बात है कहने का अंदाज़ कौन भूल सकता है ? एक अत्यंत सामान्य-सा यह वाक्य वे सहज भाव से ही बोलते थे लेकिन उनका बोलने का यह सहज स्वाभाविक ढंग ही सुनने वाले दर्शकों का दिल जीत लेता था । उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी अभिनय किया लेकिन अंततः उन्होंने डॉक्टर हाथी के चरित्र को ही आत्मसात् कर लिया था या यूँ कहा जाए कि इस चरित्र ने उन्हें आत्मसात् कर लिया था । उनके इस अकस्मात् और असमय ही  संसार छोड़ देने से जैसा आघात उनके साथी कलाकारों को लगा है, वैसा ही उनके अनगिनत चाहने वालों को भी लगा है । धारावाहिक के निर्माता असित कुमार मोदी ने उन्हें जो श्रद्धांजलि अर्पित की है (यह टी.वी. पर प्रसारित हुई है), वह सर्वथा उचित है ।

ऐसा कहा जा रहा है कि कवि कुमार आज़ाद को अभिनेता बनने के लिए प्रसिद्ध हास्य अभिनेत्री स्वर्गीया टुनटुन ने प्रेरित किया था । और जैसे उमा देवी नामक सुरीली आवाज़ वाली पार्श्व गायिका अपनी भारी देह के साथ हास्य-अभिनेत्री टुनटुन बन गईं, वैसे ही कवि कुमार आज़ाद नामक हिन्दी कवि अपने भारी शरीर के साथ डॉक्टर हाथी रूपी अभिनेता बन गए । जैसे टुनटुन की भारी देह बाद में उनको फ़िल्मों में भूमिकाएं मिलने का माध्यम बन गई, वैसे ही कवि कुमार आज़ाद का भारी शरीर आगे चलकर उन्हें अभिनय का काम दिलाने वाला ज़रिया बन गया । अब अपनी आजीविका के साधन से जैसे टुनटुन कभी मुक्ति नहीं पा सकीं, वैसे ही कवि कुमार आज़ाद भी नहीं पा सके । आजीविका कमाने की यह भी कितनी बड़ी विडम्बना है कि शारीरिक न्यूनताओं या दोषों को भी अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में सदा साथ रखना होता है और उनसे मुक्त होने के विषय में सोचा भी नहीं जा सकता चाहे वे प्राणों के लिए संकट ही क्यों न खड़ा कर दें । कवि कुमार आज़ाद का मोटापा ही अंततः उनके हृदयाघात और प्राणान्त का कारण  बना ।  

अपनी अभिनेता बनने की लगन के चलते घर से भागकर अभिनय के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले ज़िंदादिल कवि कुमार आज़ाद उर्फ़ डॉक्टर हाथी को मैं अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिनके साथ ही मुझे अपने पिता स्वर्गीय श्री सूरज नारायण माथुर की भी याद आ रही है जिनके बाह्य व्यक्तित्व में मेरे साथ कुछ भी उभयनिष्ठ (कॉमन) नहीं था क्योंकि उन्हें साहित्य, संगीत, सिनेमा या ललित कलाओं में कोई रुचि नहीं थी, वे तो प्रायः हिन्दी भी नहीं बोलते थे (वे राजस्थानी भाषा में ही बात करना पसंद करते थे) लेकिन भीतर से मैं उन्हीं के (और डॉक्टर हाथी के) जैसा ही हूँ – संवेदनशील और किसी के भी दुख-तकलीफ़ से पिघल जाने वाला जो पीड़ा सह सकता है, दे नहीं सकता; दूसरों के द्वारा ठगा जा सकता है, किसी को ठग नहीं सकता । काश उनकी ज़िंदादिली भी मुझे मिल गई होती तो ज़िन्दगी की जंग को लड़ना कुछ आसान होता मेरे लिए ! ख़ैर ... ।
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Monday, July 9, 2018

आख़िर क्या हुआ था उस रात को ? (पुस्तक समीक्षा : नौ जुलाई की रात)

मैं हिन्दी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, इस तथ्य से अब मेरे लेख एवं समीक्षाएं पढ़ने वाले सभी लोग परिचित हैं । सुरेन्द्र मोहन पाठक अपने उपन्यासों में समाज एवं सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों को टटोलते हैं लेकिन उनके नाम के साथ मिस्ट्री राइटर अथवा  रहस्यकथा लेखक का बिल्ला लग गया है । उन्होंने स्वयं कभी फ़िल्मों के लिए नहीं लिखा लेकिन फ़िल्मी दुनिया (और टी.वी. की दुनिया भी) तथा फ़िल्मी लोगों से जुड़ी तल्ख सच्चाइयों को उन्होंने अपने कई उपन्यासों के कथानकों में छुआ है । उनका ऐसा ही एक उपन्यास है – नौ जुलाई की रात जिसकी याद मुझे प्रत्येक वर्ष नौ जुलाई के दिन आ ही जाती है । आज भी आ गई और मेरी लेखनी इसी उपन्यास पर कुछ लिखने के लिए मचल पड़ी ।

नौ जुलाई की रात सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित सुनील सीरीज़ का उपन्यास है । यह उनकी ऐसी लोकप्रिय सीरीज़ है कि अब तक इसके अंतर्गत वे एक सौ बाईस उपन्यास लिख चुके हैं । इस सीरीज़ का नायक एक खोजी पत्रकार है जिसका नाम है सुनील कुमार चक्रवर्ती और जो ब्लास्ट नामक एक राष्ट्रीय समाचार-पत्र में नौकरी करता है । मूल रूप से बंगाली यह युवक अब ब्लास्ट की नौकरी के सिलसिले में राजनगर नाम एक उत्तर-भारतीय महानगर में रहता है और अपने पेशे के प्रति इतना समर्पित है कि दिन हो या रात, धूप हो या बरसात; जब भी उसे किसी सनसनीखेज़ सामग्री के मिलने की संभावना दिखाई दे, वह तुरंत अपने सूत्र का पीछा करते हुए निकल पड़ता है उस कहानी की तलाश में जो उसे उस सूत्र के अंतिम सिरे पर मिल सकती है और जो ब्लास्ट के पाठकों के लिए रोचक हो सकती है ।
नौ जुलाई की रात का आरंभ वस्तुतः नौ जुलाई के दस दिन बाद यानी कि उन्नीस जुलाई को होता है जबकि ब्लास्ट के कार्यालय में समाचार संपादक (न्यूज़ एडिटर) जो कि राय नाम का एक अधेड़ व्यक्ति है, को एक गुमनाम टेलीफ़ोन कॉल आती है । कॉल करने वाले से राय को यह पता चलता है कि नौ जुलाई की रात को शहर के रूपनगर नामक एक इलाके में चौदह नंबर की कोठी में से गोली चलने की आवाज़ आई थी । राय इस सूत्र को टटोलने और वास्तविकता, यदि कोई है, का पता लगाने का दायित्व उपन्यास के नायक सुनील को सौंपता है । और इसके साथ ही शुरू हो जाता है सुनील का ख़बरें सूंघने का काम ।

सुनील को पता लगता है कि चौदह नंबर की कोठी जवाहर चौधरी नामक एक प्रसिद्ध फ़िल्मी लेखक की है । कोठी तो उसे बंद मिलती है लेकिन पिछवाड़े के एक खुले दरवाज़े से उसे भीतर घुसने का मौका मिलता है तो वह भीतर जाकर देखता है और पाता है कि वहाँ कुछ समय पहले कोई पार्टी हुई थी जिसके बाद साफ-सफ़ाई करवाने से पहले ही कोठी के बाशिंदे कहीं चले गए थे । लेकिन सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथा चौंकाने वाला तथ्य उसे यह मिलता है कि एक कमरे में बिछे एक पलंग की चादर तथा उस कमरे से जुड़े स्नानघर में पड़े कुछ तौलियों पर खून के सूख चुके दाग हैं जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उस रात उस कोठी में निश्चय ही कोई गंभीर रूप से घायल हुआ था । कौन ? कैसे ? क्यों ? क्या हुआ था उस रात उस कोठी में ?

इन सवालों के माकूल जवाब ढूंढने के लिए सुनील अपनी खोजबीन शुरू करता है और उसके साथ-साथ उपन्यास के पाठक भी परत-दर-परत खुलते रहस्यों से रू-ब-रू होते हैं । सुनील फ़िल्मी दुनिया से जुड़े विभिन्न लोगों से मिलता है जिनमें जवाहर चौधरी के अतिरिक्त गौतम सान्याल नामक कला-निर्देशक (आर्ट-डायरेक्टर) तथा काली मजूमदार नामक अत्यंत प्रतिष्ठित फ़िल्म-निर्देशक सम्मिलित हैं । उसका वास्ता फ़िल्मों में नायिका बनने का स्वप्न लेकर आईं तथा क्षेत्र के दिग्गजों के हाथों की कठपुतली बन बैठी चंद युवतियों से भी होता है । पहले ही से गहराते इस रहस्य में बढ़ोतरी तब हो जाती है जब सुनील की नाक के नीचे ही रजनी बाला नामक ऐसी एक महत्वाकांक्षी युवती का क़त्ल हो जाता है । सुनील का साबका बैरिस्टर मंगल दास महंत नामक एक तिकड़मी वकील से भी पड़ता है जिसके दाव-पेच सुनील को ही नहीं, एक ईमानदार तथा निष्ठावान पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर प्रभुदयाल को भी उलझाकर रख देते हैं लेकिन अंत में सुनील मामले के सभी रहस्यों से परदा उठाकर वास्तविक अपराधी को कानून की पकड़ में ले आता है । 

नौ जुलाई की रात एक अत्यंत रोचक उपन्यास है जिसे एक बार पढ़ना शुरू कर देने के बाद बीच में छोड़ना किसी भी पाठक के लिए बेहद मुश्किल है । उपन्यास कोई अधिक लंबा नहीं है और आदि से अंत तक पढ़ने वाले को बाँधे रखता है । उपन्यास कोई चार दशक पहले लिखा गया था जब टी.वी. के धारावाहिकों का ज़माना नहीं आया था और रूपहले परदे की चकाचौंध से भरी दुनिया का हिस्सा केवल फ़िल्में ही थीं । लेकिन रूपहले परदे की चमक के पीछे का जो अंधेरा फ़िल्मी दुनिया में है, उससे टी.वी. के धारावाहिकों की दुनिया जिसका आग़ाज़ भारत में अस्सी के दशक में हुआ था, भी अछूती नहीं है । गाँव-खेड़ों से निकलकर नाम-दाम कमाने की इच्छुक युवतियों पर घर से भागने के बाद क्या बीतती है, यह उपन्यास में बहुत प्रभावी ढंग से दर्शाया गया है । ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उपन्यास तथा इस सीरीज़ के नायक सुनील का चरित्र लेखक ने प्रारम्भ से ही ऐसा गढ़ा है कि वह अत्यंत संवेदनशील है और सदा ज़रूरतमंदों की मदद के लिए ही नहीं वरन भटके हुओं को रास्ता दिखाने के लिए भी तैयार रहता है ।

मैं आज नौ जुलाई सन दो हज़ार अट्ठारह के दिन हिन्दी उपन्यास नौ जुलाई की रात को पढ़ने की अनुशंसा उन सभी हिन्दी पाठकों के लिए करता हूँ जो रहस्यकथाओं को पढ़ने में रुचि रखते हैं । कोई चार दशक पहले लिखे गए इस उपन्यास की विषय-वस्तु आज भी प्रासंगिक है तथा इसे पढ़कर किसी को भी कोई खेद नहीं होगा ।
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Saturday, June 16, 2018

राज़ी: कुछ अनसुलझे सवाल


मेघना गुलज़ार द्वारा निर्देशित फ़िल्म राज़ी बहुचर्चित एवं बहुप्रशंसित रही है तथा इसने पर्याप्त व्यावसायिक सफलता भी प्राप्त कर ली है । मैंने भी इस फ़िल्म को सिनेमाघर में देखा और इससे बहुत प्रभावित हुआ । फ़िल्म मनोरंजन की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है और एक सौ चालीस मिनट तक दर्शकों को बाँधे रखती है । केंद्रीय भूमिका में आलिया भट्ट सहित सभी कलाकारों ने सराहनीय अभिनय किया है । गीत-संगीत भी श्रोताओं के कानों तथा हृदय को भाने वाला है । एकबारगी देखने के उपरांत यह अपने आपमें थ्रिलर श्रेणी (तथा देशप्रेम श्रेणी) की एक ऐसी फ़िल्म प्रतीत होती है जिसे एक सम्पूर्ण फ़िल्म कहा जा सकता है । लेकिन क्या वस्तुतः भी ऐसा ही है ?

प्रायः किसी भी अच्छी फ़िल्म को देखने के उपरांत उसके विषय में विचार व्यक्त करते समय सामान्य दर्शकों एवं समीक्षकों दोनों ही के साथ समस्या यह होती है कि वे उसकी अच्छाइयों की रौ में बह जाते हैं और इसीलिए उसके दोषों पर ध्यान नहीं दे पाते । इसलिए फ़िल्म की कमियां अनदेखी (और अनकही) रह जाती हैं । यदि समीक्षक या विश्लेषक ईमानदार एवं निष्पक्ष है तो ऐसा जान-बूझकर तो नहीं होता लेकिन अनचाहे ही सही, हो अवश्य जाता है । वर्षों पूर्व राजकुमार हिरानी निर्देशित एवं आमिर ख़ान अभिनीत थ्री ईडियट्स के मामले में अनेक स्थापित समीक्षकों के और स्वयं मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था । फ़िल्म के मनोरंजक एवं प्रेरक पक्षों ने कुछ ऐसा मन मोह लिया था कि उसके अनेक दोषों पर तत्काल नज़र गई ही नहीं । फ़िल्म को पुनः देखने तथा उसके गुण-दोषों पर वस्तुपरक भाव से पुनर्विचार करने पर ही यह तथ्य उजागर हुआ कि फ़िल्म में अनेक दोष थे जिनके कारण वह केवल प्रशंसा की ही नहीं वरन आलोचना की भी पात्र थी । राज़ी के साथ भी यही हुआ है ।   

फ़िल्म भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ़्टीनेंट कमांडर हरिंदर सिक्का के उपन्यास कॉलिंग सहमत पर आधारित है और ऐसा बारंबार कहा गया है कि यह एक वास्तविक महिला के जीवन की उन वास्तविक घटनाओं की गाथा है जो १९७१ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समयकाल में घटित हुई थीं । उपन्यास में (और फ़िल्म में भी) एक पाकिस्तानी सैनिक परिवार में विवाह करके भारत के लिए गुप्तचरी करने वाली उस युवती का नाम सहमत ख़ान है जिसे कि उपन्यास के लेखक परिवर्तित नाम बताते हैं (अर्थात् वास्तविक नाम कुछ और था) और लेखक का यह भी कथन है कि उस वास्तविक महिला का पिछले साल निधन हो गया था । मैं लेखक महोदय के कथन की सत्यता पर उंगली नहीं उठाना चाहता लेकिन चाहे उसके जीवनकाल में उसके नाम को गोपनीय रखना आवश्यक था, अब तो भारत की उस पुत्री का नाम बताया जा सकता है जिसने अपने देश के लिए बहुत कुछ किया, बहुत कुछ सहा और बहुत कुछ त्यागा । उसके नाम को अब भी गोपनीय रखा जाना तर्कहीन है विशेष रूप से तब जब फ़िल्म के (और उपन्यास के भी) अंत में उसके पुत्र को भारतीय सेना में कार्यरत बताया गया है । यह अनावश्यक गोपनीयता और कथा में उस विवाहिता का सैनिक अधिकारियों से भरे अपने ससुराल में इतनी सरलता से जासूसी करना जो कहीं से भी सहज संभव नहीं लगता, यह संदेह उत्पन्न करता है कि सच्ची बताई जाने वाली कथाएं वास्तव में भी सच्ची ही हों, यह आवश्यक नहीं ।

मेरा उर्दू भाषा का ज्ञान इस मामले में अपर्याप्त सिद्ध हो रहा है कि 'सहमत' जो कि एक स्त्रीलिंग शब्द है, का अर्थ क्या होता है लेकिन हिन्दी में सहमत शब्द का वही अर्थ होता है जो कि फ़िल्म के शीर्षक राज़ी का है अर्थात् वह व्यक्ति जो किसी बात या विचार के लिए अथवा किसी कार्य को करने (या न करने) के लिए रज़ामंद हो, उसके लिए अपनी स्वीकृति प्रदान करे । यह स्वीकृति या रज़ामंदी स्वेच्छा से भी हो सकती है और किसी दबाव में भी । इस कथा की नायिका पाकिस्तान में गुप्तचरी करने और इसके निमित्त एक प्रतिष्ठित पाकिस्तानी परिवार की पुत्रवधू बनने का कार्य अपनी स्वेच्छा से करती है और इसके लिए उसका तर्क है अपने देश की सेवा । लेकिन गहराई से देखने पर यह उद्देश्य उथला-सा प्रतीत होता है और जो कुछ भी नैतिक-अनैतिक उसके द्वारा किया जाता है, उसे न्यायोचित ठहराने की एक खोखली चेष्टा ही लगता है । यदि देशसेवा के नाम पर दूसरे देश में जाकर स्वयं पर विश्वास करने वाले भले लोगों को धोखा देना और निर्दोषों की हत्याएं करना न्यायोचित है तो जो लोग धर्म या अपने देश के हित के नाम पर हमारे देश में यही सब करते हैं, उन्हें हम कैसे ग़लत ठहरा सकते हैं ? नायिका को पाकिस्तान द्वारा ग़ाज़ी नामक पनडुब्बी से भारतीय जहाज़ आईएनएस विक्रांत पर किए जाने वाले हमले की योजना की सूचना एवं दस्तावेज़ भारत में खुफिया एजेंसी के संबन्धित लोगों तक पहुँचाते हुए दिखाया गया है और इसी आधार पर उसके कार्यकलापों को जायज़ ठहराया गया है लेकिन ये तथ्य न तो प्रामाणिक हैं और न ही ऐसी गोपनीय बातें इस तरह से खुलेआम की जाती हैं जिस तरह से फ़िल्म में नायिका के ससुराल वालों को करते हुए दिखाया गया है । यह सब कुछ सतही-सा लगता है जिसे केवल इसीलिए दिखाया गया है कि येन-केन-प्रकारेण नायिका के किरदार, नज़रिये और करतूतों पर देशप्रेम का ठप्पा लगाकर उन्हें सही करार दिया जा सके ।

कर्नल सिक्का ने अपने उपन्यास में गुप्तचरी नायिका के चरित्र को संवेदनहीन बताया है जो बिना किसी अपराध-बोध के निस्संकोच उन लोगों की हत्याएं करती है जो न केवल उस पर पूरा भरोसा करते हैं बल्कि उसे अत्यंत स्नेह भी करते हैं जबकि फ़िल्म में नायिका को संवेदनशील बताते हुए और अपने अन्तर्मन में अपने किए के अपराध-बोध से जनित पीड़ा को अनुभव करते हुए दिखाया गया है लेकिन वस्तुतः ज़रा ग़ौर करने पर ही उसकी यह संवेदनशीलता उसके चरित्र पर थोपी हुई लगने लगती है और उसका वास्तविक रूप वही दिखाई देने लगता है जो लेखक ने अपने उपन्यास की नायिका का रखा है – कठोर, बेरहम और किसी भी किस्म की नैतिकता या ज़मीर नामक शै को अपने भीतर जगह न देने वाली । फ़िल्म में दिखाई गई घटनाओं की रू में नायिका के किरदार पर चढ़ाए गए वतनपरस्ती के मुलम्मे को ज़रा-सा खरोंचते ही उसके किरदार की असलियत दिखाई देने लगती है जो ख़ुद को छोटी बहन की तरह चाहने वाली अपनी जेठानी को बेहिचक विधवा बना देती है; उस पति को मार डालने को तैयार हो जाती है जो उसे प्यार ही नहीं करता बल्कि उसकी इबादत करता है, उसके समूचे जज़्बात को समझता है और उसे हल्की-सी ठेस तक लगने देना जिसे गवारा नहीं और अपनी जान बचाने के लिए उस बच्चे को अपनी ढाल बनाकर भागती है जो उसे अपनी शिक्षिका के रूप में देखते हुए उस पर पूरी तरह विश्वास करता है । यह सब न तो किसी भी प्रकार का त्याग है और न ही देशसेवा, यह केवल स्वार्थपरता है और कुछ नहीं ।  

राज़ी एक ओवर-रेटेड फ़िल्म है जिसे एक अच्छी फ़िल्म कहा जा सकता है, कोई महान फ़िल्म नहीं । जो महानता इस पर अनेक समीक्षक आरोपित कर रहे हैं, उसका कोई लक्षण इसमें नहीं है क्योंकि किसी भी पुस्तक या फ़िल्म या काव्य की महानता का संबंध उसके आंतरिक मूल्य से होता है जो किसी महान आदर्श को स्थापित करता हो । राज़ी में ऐसा कुछ भी नहीं है । मानवीय मूल्यों के क्रूर हनन पर देशप्रेम का बिल्ला लगा देने से कोई फ़िल्म महान नहीं हो जाती । दूसरा देश चाहे हमसे युद्धरत ही क्यों न हो, उसे और उसके निवासियों को शत्रु कहकर उनके विरूद्ध किए जाने वाले किसी भी कार्य को देशप्रेम के नाम पर उचित नहीं माना जा सकता । अपने पर सच्चे दिल से ऐतबार करने वाले स्नेही लोगों की पीठ में छुरा भोंकने का काम देशप्रेम की चाशनी में डुबोकर करने के बाद भी गुनाह ही रहेगा, सवाब नहीं बन जाएगा । हम और वे पर आधारित यह देशप्रेम अब एक कालातीत संकल्पना है जो आधुनिक मानवीय मूल्यों तथा व्यवहार के निकष पर स्वीकार्य नहीं है । जंग में सब जायज़ है कहकर हर ग़लत को सही ठहराने का काम गुज़रे जमाने की बात है ।

राज़ी को जो चौतरफ़ा वाहवाही मिल रही है, वह इसलिए है कि पाकिस्तान में जाकर और अपने पति तथा ससुराल वालों के प्राणों को कथित देशप्रेम की वेदी पर बलि चढ़ाकर भारत के लिए जासूसी करने का काम एक मुस्लिम लड़की करती है । और तुर्रा यह है कि उस मुस्लिम लड़की को काश्मीरी बताया गया है जिसके पिता भी पाकिस्तान में एक सैनिक उच्चाधिकारी के साथ दोस्ती की आड़ में भारत के लिए जासूसी ही करते थे । आज दुर्भाग्यवश हम उस दौर में हैं जब भारतीय मुस्लिमों पर पाकिस्तान-परस्त होने का ठप्पा बड़ी सहजता से लगाया जा रहा है और वे इस दबाव में रहते हैं कि चाहे जैसे भी हो, यह साबित करके दिखाएं कि वे भारत के साथ हैं । और भारत के साथ होने को साबित करने का साफ़ मतलब यह साबित करना है कि वे पाकिस्तान के खिलाफ़ हैं । ऐसे में एक मुस्लिम लड़की के अपने पाकिस्तानी पति, जेठ और जेठानी की (और उनके नज़दीकी बहुत-से लोगों की) आँखों में धूल झोंककर भारत के लिए जासूसी करने की कहानी को हाथोंहाथ लिया जाना कोई हैरानी की बात नहीं है । वह लड़की यानी सहमत बार-बार भारत को अपना मुल्क बताती है जिसके आगे उसे और कुछ भी वक़त या तवज्जो दिए जाने के काबिल नहीं लगता । लेकिन सच्चाई तो यह है कि काश्मीरी न केवल आज बल्कि जिस ज़माने की यह कहानी है, उस ज़माने में भी अपने आपको हिंदुस्तानी कहने से परहेज़ ही करते थे । एक काश्मीरी मुस्लिम का हिंदुस्तान को अपना मुल्क, अपना वतन बताना और उसी बुनियाद पर पाकिस्तान में जाकर हिंदुस्तान के लिए जासूसी करना इस बात का सबूत है कि इस फ़िल्म में हक़ीक़त का नहीं, हमारे देश के मौजूदा हालात और हुकूमत के मौजूदा मिज़ाज के मद्देनज़र पॉलिटिकल करेक्टनेस का ख़याल रखा गया है । यह इस तथ्य से और भी पुष्ट होता है कि फ़िल्म में सहमत को प्रशिक्षण देने वाले तथा पाकिस्तान में उसकी सहायता करने वाले भी मुस्लिम पात्र ही हैं । ग़ैर-मुस्लिम पात्र तो फ़िल्म में रखे ही नहीं गए हैं । तलवार जैसी साहसी और यथार्थपरक फ़िल्म बनाने वाली मेघना गुलज़ार से ऐसी उम्मीद नहीं थी । उन्होंने ज़मीर, जज़्बात और इंसानियत को ताक पर रखकर चलने वाली गुप्तचर महिला को महिमामंडित किया है और ऐसा करने में कोई महानता नहीं है क्योंकि, जैसा मैंने पहले भी कहा है, यह महिमामंडन केवल एक मुलम्मा है जो बड़ी आसानी से उतर जाता है ।

मेघना गुलज़ार द्वारा निरूपित सहमत ख़ान का चरित्र विश्वसनीय प्रतीत नहीं होता क्योंकि उसे फ़िल्म के आरंभ में ही अपनी जान पर खेलकर एक गिलहरी को बचाते हुए दिखाया गया है । ऐसी संवेदनशील और दयालु कन्या कुछ ही समय में ऐसी पाषाण-हृदय हो जाए कि निस्संकोच निर्दोषों की जान लेने लगे (चाहे अपना भेद खुलने से रोकने हेतु ही सही),  किसी भी दृष्टि से विश्वास के योग्य तथ्य नहीं लगता । ऐसा दिखाकर अनजाने में ही मेघना ने सहमत को एक काल्पनिक चरित्र के रूप में दर्शा दिया है जो कपोलकल्पित कथा में भी गले नहीं उतरता । उसका अपने पिता (और कथित पारिवारिक परंपरा) की ख़ातिर इस विश्वासघाती कार्य के लिए मान जाना भी स्वाभाविक नहीं लगता (हालांकि इसके लिए भी वह मुल्क के नाम का ही आसरा लेती है जब इस बाबत उससे सवाल होता है) । वह घर के नौकर की हत्या करने के बाद तो रोती है, अपने जेठ की हत्या करने के बाद नहीं (क्या इसलिए कि अब किसी की भी हत्या कर देना उसके लिए सामान्य कार्य हो गया है और क्या इसी वजह से वह अपने पति पर भी पिस्तौल तान देती है ?) । ये सारी बातें उसके चरित्र को अत्यंत विरोधाभासी बना देती हैं जिसमें कुछ भी आदर्श या सराहनीय नहीं लगता । इसके विपरीत मेघना ने जिस पाकिस्तानी परिवार को दिखाया है उसके (पुराने नौकर को छोड़कर) सदस्य इतने भले, स्नेही और विश्वासी हैं कि उनके इन गुणों के आगे सूरज बड़जात्या के फ़िल्मी परिवार भी कहीं नहीं ठहरते । सहमत के पति इक़बाल को इतना अधिक संवेदनशील और अपनी पत्नी को समझने वाला दिखाया गया है कि जिस किसी भी लड़की को ऐसा देवता-स्वरूप पति मिल जाए उसे अपने पति के चरण धो-धोकर पीने चाहिए क्योंकि प्रेम तो कोई भी कर सकता है, समझने वाले विरले ही मिलते हैं । वह सहमत को भावनात्मक रूप से अपने से जोड़े बिना शारीरिक रूप से भी उसके निकट नहीं जाता है । और मुझे इंतहा तो तब नज़र आई जब सहमत का भेद खुल जाने और यह पता लग जाने कि उसने ही परिवार के नौकर और बड़े बेटे की हत्याएं की थीं, र भी वह उसे ग़लत नहीं समझता बल्कि अपने पिता (पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर) के समक्ष उसके दृष्टिकोण को रखते हुए कहता है कि उसने वही किया है जो हम भी अपने मुल्क के लिए करते हैं । इस सबसे उसका किरदार सहमत के किरदार से बहुत ऊपर उठ जाता है । ऐसे विवेकशील, क्षमाशील था दूसरों के दृष्टिकोण एवं स्थिति को समझने वाले लोगों का बहुमत यदि भारत और पाकिस्तान में हो जाए तो दोनों देशों की शत्रुता सदा के लिए समाप्त हो जाए ।

राज़ी फ़िल्म ही नहीं, उसमें आलिया भट्ट का अभिनय भी ओवर-रेटेड ही है । उन्होंने अच्छा अभिनय किया है लेकिन उसे असाधारण या महान अभिनय की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता । वस्तुतः फ़िल्म के अन्य पात्रों ने (विशेषतः इक़बाल की भूमिका में विकी कौशल ने तथा खालिद मीर की भूमिका में जयदीप अहलावत ने) उनसे बेहतर अभिनय किया है । मैं कभी राजा सेन की फ़िल्म समीक्षाओं का कायल नहीं रहा लेकिन पहली बा मैं उनकी समीक्षा में किए गए आलिया के अभिनय के मूल्यांकन से सहमत हुआ हूँ । उन्होंने बिलकुल ठीक कहा है कि आलिया (और इस फ़िल्म में उनके अभिनय के कसीदे पढ़ने वाले भी) मोस्ट एक्टिंग को बेस्ट एक्टिंग समझकर भ्रमित हो गए हैं । सहमत की भूमिका में आलिया इतना अधिक प्रयास करती हैं कि उनके हाव-भावों की स्वाभाविकता नष्ट नहीं तो बहुत कम अवश्य हो जाती है । इस फ़िल्म में उन्होंने पात्र को प्रस्तुत किया है, उसे जिया नहीं ।

सहमत ख़ान जैसी कोई महिला यदि वास्तव में थीं तो उनकी प्रशंसा तथा वंदन अवश्य ही होना चाहिए । लेकिन राज़ी फ़िल्म (तथा कॉलिंग सहमत उपन्यास) की नायिका को आधुनिक युवतियों के लिए आदर्श अथवा रोल मॉडल नहीं माना जा सकता (चाहे ऐसी युवतियां भारतीय हों या पाकिस्तानी) । विश्वासघात और निर्दोषों का रक्तपात कोई सत्कर्म नहीं जिन्हें न्यायसंगत माना जाए और ऐसा करने वाले का महिमामंडन एक अपराध ही है जो धर्म एवं देश सरीखी अवधारणाओं की संकीर्ण व्याख्या करते हुए उनके नाम पर कुमार्ग पर चलने को ही प्रेरित कर सकता है, सुमार्ग पर चलने को नहीं । आज आवश्यकता हम के विस्तार की है जिसमें वे को विलीन  देने का प्रयास सभी समुदायों, सभी धर्मों तथा सभी देशों को करना चाहिए ताकि अंतिम विजय गुप्तचरों एवं सेनाओं की नहीं, मानवता की हो । राज़ी फ़िल्म जो अनसुलझे सवाल पीछे छोड़ती है, उन्हें सुलझाया जाना चाहिए ताकि फिर कभी किसी को सहमत बनने के लिए राज़ी न होना पड़े ।
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पुनश्च : यह लेख मैंने २१ मई, २०१८ के हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित नन्दिता पटेल जी के अंग्रेज़ी भाषा में लिखे गए लेख – ‘A spy without a conscience shouldn’t be glorified, even by Bollywood’ से प्रेरणा लेकर लिखा है जिसमें मुझे अपने विचारों एवं भावनाओं का प्रतिबिंब दिखाई दिया । मैं नन्दिता जी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ । 

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