Saturday, May 28, 2016

मेरे अश्कों के दरिया में बहती है कागज़ की नाव (पुस्तक-समीक्षा - कागज़ की नाव)


रणवीर सिंह तथा सोनाक्षी सिन्हा द्वारा अभिनीत एवं विक्रमादित्य मोटवाने द्वारा निर्देशित हिन्दी फिल्म लुटेरा देखकर मन अनमना सा हो गया । दिल में उदासी भी है और एक अनजानी सी महक भी । फिल्म देखते समय मन कहीं यादों के खंडहरों में भटकने लगा था । वो कौन सा मर्द है जिसने ज़िंदगी में कभी किसी औरत से प्यार नहीं किया और वो कौन सी औरत है जिसने ज़िंदगी में कभी किसी मर्द को अपना दिल नहीं दिया ? प्यार खुदा की नेमत है दोस्तों । प्यार को पाना नसीब की बात है मगर यह कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं होता हर इंसान को है । दुनिया में कोई विरला ही ऐसा होगा जिसने ज़िंदगी में कभी किसी को चाहा न हो ।

 

सुरेन्द्र मोहन पाठक का नाम रहस्यकथाओं और थ्रिलर कथानकों के लेखक के रूप में जाना जाता है । मगर आज मैं उनके एक ऐसे उपन्यास का ज़िक्र कर रहा हूँ जो कहलाता तो थ्रिलर है मगर जो अपने भीतर प्रेम और दर्द की दास्तानें छुपाए हुए है । इस उपन्यास का नाम है – कागज़ की नाव

 


कागज़ की नाव 1986 में डायमंड प्रकाशन से छपा था और मैंने इसे पहली बार 1991 में तब पढ़ा जब मैं कलकत्ता में रहता था और सी. ए.  फ़ाइनल परीक्षा की तैयारी कर रहा था । उन दिनों मेरे निवास से थोड़ी ही दूर महात्मा गांधी रोड पर रोज़ शाम को उपन्यासों की ढेरियाँ लगाए बहुत से लोग एक लंबी कतार में बैठे रहते थे और किराए पर उपन्यास पढ़ने को देते थे । मैंने पाठक साहब के ज़्यादातर उपन्यास उसी दौर में उन लोगों से किराए पर लेकर पढ़े । एक दिन कागज़ की नाव लेकर आया । उपन्यास मैं आम-तौर पर अपने कोर्स की पढ़ाई के बीच-बीच में विश्राम लेने के लिए पढ़ता था और विश्राम के बाद फिर से अपने अध्ययन में जुट जाता था । पर कागज़ की नाव के साथ ऐसा हुआ कि उसे पढ़ने के दौरान कई मर्तबा मेरे आँसू निकल पड़े और जब उपन्यास पूरा हुआ तो मेरा किसी काम में मन नहीं लगा – न पढ़ाई में और न ही और किसी बात में ।

 

तीन साल बाद । 1994 में जब मैं राजस्थान के सिरोही ज़िले में एक सीमेंट के कारखाने में नौकरी कर रहा था तो भारतीय सिविल सेवा की प्रारम्भिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भाग्य से मिली लंबी छुट्टी के सदके मैं जयपुर आ गया और शहर के मानसरोवर स्थित क्षेत्र में अपने एक मित्र के यहाँ रहकर मुख्य परीक्षा की तैयारी करने लगा । मेरे मित्र के निवास से थोड़ी ही दूर पर एक उपन्यास किराए पर देने की दुकान थी । एक दिन यूं ही वहाँ गया तो पाठक साहब के बहुत सारे उपन्यास वहाँ पाए । अब यहाँ भी मैं परीक्षा की तैयारी के बीच-बीच में विश्राम लेने के लिए उपन्यास किराए पर लाकर पढ़ने लगा । एक दिन कागज़ की नाव लाकर पढ़ा तो तीन साल पहले जो हुआ था, वो फिर हो गया । उपन्यास अकेले में (जब मेरा दोस्त अपनी बैंक की नौकरी पर गया हुआ था) पढ़ते हुए मैंने अनगिनत अश्क बहाए और उसके बाद मेरा न पढ़ने में मन लगा, न खाने में ।

 

उन्नीस साल बाद । जून 2013 में एक पुस्तकालय से कागज़ की नाव को निर्गमित करवाकर फिर से पढ़ा । नतीज़ा फिर से ढाक के तीन पात । पढ़ते समय आँखें बार-बार भर आतीं और दूसरों से अपने अश्क बमुश्किल छुपा पाता । क्यों ? क्यों यह उपन्यास हर बार मुझे अश्कों के दरिया में डुबो देता है ? ऐसा क्या है इसमें ?

 

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने कागज़ की नाव को बंबई की बदनाम बस्ती धारावी की पृष्ठभूमि में एक अपराध-कथा के रूप में लिखा है । नाम कागज़ की नाव इसलिए है क्योंकि पाठक साहब ने उपन्यास के एक पात्र इंस्पेक्टर यशवंत अष्टेकर के मुख से कहलवाया है कि अपराध कागज़ की नाव की तरह होता है जो बहुत देर तक, बहुत दूर तक नहीं चल सकती । बिलकुल ठीक है । मगर क्या यह केवल एक अपराध-कथा है ? नहीं !

 

कागज़ की नाव अपने भीतर कई प्रेम-कथाओं को समेटे हुए है । पहली प्रेम-कथा है विलियम और मोनिका की । एंथोनी और अब्बास के साथ मिलकर अपराध करने वाला विलियम क्रिसमस की रात को जिस तरह से चर्च पर लगे क्रॉस पर चढ़कर मोनिका को अपनी हमराह बनने के लिए मजबूर करता है, वो शोले फिल्म के प्रशंसकों को वीरू के पानी की टंकी पर चढ़कर बसंती से शादी करने के लिए दबाव डालने वाले दृश्य की याद दिला सकता है । मोनिका न केवल विलियम की उस रात के लिए हमराह बनती है बल्कि अगले ही दिन उससे शादी करके उसकी बीवी और फिर उसके बेटे की माँ भी बनती है । मगर ...

 

मगर एक दूसरी इकतरफ़ा प्रेम-कहानी विलियम के दोस्त एंथोनी के मन में भी चल रही थी जिससे मोनिका और विलियम बेखबर थे । मोनिका को मन-ही-मन चाहने वाला एंथोनी विलियम से उसकी शादी बर्दाश्त नहीं कर पाता और ऐसी चाल चलता है कि विलियम को खोकर मोनिका बेवा हो जाती है । उसे आसरा देने के बहाने एंथोनी उसे अपने पास बुला लेता है और उसके दिल को नहीं तो कम-से-कम उसके जिस्म को तो पा ही लेता है ।

 

तीसरी प्रेम-कहानी तीस साल पुरानी थी । यशवंत अष्टेकर और विलियम की माँ मार्था की प्रेम-कहानी । बेहद बदसूरत अष्टेकर बेहद खूबसूरत मार्था के दिल में जगह बना लेता है और वे जिस्मानी तौर पर करीब आ जाते हैं । मार्था के ईसाई होने के कारण अष्टेकर के माँ-बाप उसकी शादी मार्था से नहीं होने देते और वह अपने पेट में अष्टेकर के बच्चे को लिए किसी और की बीवी बनने पर मजबूर हो जाती है । इसकी सज़ा अष्टेकर अपने माँ-बाप को भी और अपनी बुज़दिली के लिए अपने आप को भी इस तरह देता है कि वह न तो शादी करता है और न ही ज़िंदगी में फिर किसी औरत से जिस्मानी ताल्लुकात बनाता है । अष्टेकर का बेटा विलियम मार्था के पेट से जन्म लेता है । अष्टेकर जो अब पुलिस वाला बन चुका है, न तो अपने बेटे की माँ से मिल सकता है और न ही अपने बेटे को अपना बेटा कह सकता है । मगर जब विलियम की हत्या हो जाती है तो बाप का दिल कराह उठता है और वह विलियम के हत्यारे को सज़ा दिलवाने के लिए कमर कस लेता है । इधर मार्था ज़िंदगी भर अपने पति की गालियां और ताने सहती हुई, अपमान के कड़वे घूंट पीती हुई जीती है । और जब उसका इकलौता बेटा भी नहीं रहता तो उसके लिए ज़िंदगी एक बहुत भारी बोझ बन जाती है ।

 

चौथी और दिल को चीर देने वाली प्रेम-कहानी है अष्टेकर के मरहूम दोस्त वसंत हज़ारे के बेटे लालचंद हज़ारे और खुर्शीद की । जहां लालचंद उर्फ़ लल्लू एंथोनी और अब्बास के साथ मिलकर काम करने वाला अपराधी है जिस पर अपनी माँ और दादी के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी है वहीं खुर्शीद उन बदनसीब लड़कियों में से है जिन्हें उनकी जन्मदात्री माँएं ही जिस्मफ़रोशी की दलदल में धकेल देती हैं । उसके जिस्म का सौदा करने वाले सब हैं, उसके दिल को देखने, समझने और महसूस करने वाला कोई नहीं । ऐसे में उसे सच्चे दिल से प्यार करने वाला लल्लू के रूप में मिलता है । लल्लू इक्कीस साल का है, खुर्शीद चौबीस साल की । लल्लू हिन्दू है, खुर्शीद मुसलमान । मगर जगजीत सिंह साहब की आवाज़ में ये अमर पंक्तियाँ हर संगीत-प्रेमी ने सुनी होंगी – ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन । दोनों एक दूसरे का मन देखते हैं और संग-संग  जीने-मरने की कसमें खा बैठते हैं । लालचंद कहलाने की ख़्वाहिश रखने वाला लल्लू खुर्शीद के कहने पर जुर्म की दुनिया को छोड़ देने का फैसला करता है मगर तक़दीर की मार उसे पहले जेल पहुंचा देती है और जेल से छूटने के बाद एक नाकाबिलेबर्दाश्त सदमा देती है खुर्शीद की मौत के रूप में । दिल तड़प उठता है मोहब्बत करने वाले का और ले जाता है उपन्यास को उसके क्लाइमेक्स की तरफ़ ।

 

उपन्यास के पहले संस्करण के लेखकीय में सुरेन्द्र मोहन पाठक ने लिखा था कि उन्होंने उपन्यास को पात्र-प्रधान बनाने की जगह घटना-प्रधान बनाने का प्रयास किया था । और सचमुच उपन्यास घटना-प्रधान ही है क्योंकि कथानक में लगभग सभी पात्र बराबरी का दर्ज़ा रखते हैं । किसी को कम और किसी को ज़्यादा अहमियत नहीं दी गई है । पात्र घटनाओं के बहाव के साथ-साथ बहते हैं और मेरी इस धारणा को पुष्ट करते हैं कि इंसान किस्मत के हाथों में केवल एक खिलौना है । इंसान लाख दावे करे यह करने के, वह करने के; होता तो वही है जो मंज़ूरे खुदा होता है । मगर मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह उपन्यास घटना-प्रधान होने के साथ-साथ भावना-प्रधान भी है । जज़्बात का सैलाब है इसमें जिसमें बार-बार भीगा हूँ मैं और भीगे होंगे मेरे जैसे न जाने कितने ही पाठक ।

 

कागज़ की नाव की अंतिम पंक्तियाँ कभी न भुलाई जा सकने वाली हैं जब अपने पति की मृत्यु के उपरांत अष्टेकर से विवाह कर चुकी मार्था लल्लू को पानी का गिलास देते हुए उसका नाम पूछती है तो वह पहले तो लालचंद बताता है मगर फिर हड़बड़ाकर संशोधन करता है – नहीं नहीं, मेरा नाम लल्लू है लल्लू । अब लालचंद कहलाने की ख़्वाहिश नहीं रही उसकी । अब वह केवल लल्लू है, अपराध की दुनिया को छोड़ चुका अपनी खुर्शीद को दिलोजान से चाहने वाला लल्लू जिसे केवल खुर्शीद की यादों के सहारे अपनी बाकी की ज़िंदगी बसर करनी है ।

 

कागज़ की नाव पाठक साहब की वह कालजयी रचना है जिसके अमरत्व की अनुभूति स्वयं इसके रचयिता को भी नहीं है । जैसे लुटेरा कोई परफ़ेक्ट फ़िल्म नहीं है, वैसे ही कागज़ की नाव भी कोई परफ़ेक्ट रचना नहीं है । इसमें कमजोरियाँ हैं, कमियाँ हैं । लेकिन क्या भौहें न होने के बावजूद मोनालिसा एक अमर चित्र नहीं ? ठीक इसी तरह कागज़ की नाव भी अपनी चंद कमियों के बावजूद एक अत्यंत श्रेष्ठ कृति है, मास्टरपीस है । यह मेरे लिए सदा अश्कों का एक दरिया रही है और रहेगी ।

 

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Monday, May 9, 2016

ताराचंद बड़जात्या : सादगी एवं भारतीय जीवन मूल्यों के ध्वजवाहक

आज पारिवारिक हिन्दी फ़िल्में बनाने वाले सूरज बड़जात्या के नाम से सभी सिनेमा-प्रेमी परिचित हैं । उनका राजश्री बैनर भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित फ़िल्में बनाने के लिए पहचाना जाता है । लेकिन राजश्री बैनर और उसकी गौरवशाली परंपरा के संस्थापक सूरज के पितामह स्वर्गीय ताराचंद बड़जात्या के नाम से वर्तमान पीढ़ी के बहुत कम लोग परिचित हैं । ताराचंद बड़जात्या को दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित चाहे न किया गया हो, भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका योगदान बलदेवराज चोपड़ा, बी. नागी रेड्डी और सत्यजित रे सरीखे फ़िल्म निर्माताओं से किसी भी तरह कम नहीं है । १९६२ से १९८६ तक के लगभग ढाई दशक लंबे काल में उनके द्वारा निर्मित हिन्दी फ़िल्में भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय हैं । वह हिन्दी सिनेमा का एक युग था - सादगी और भारतीयता से ओतप्रोत युग जिसके प्रवर्तक और मार्गदर्शक ताराचंद जी थे ।
 
राजस्थान के कुचामन नामक छोटे शहर में १० मई, १९१४ को जन्मे  ताराचंद बड़जात्या ने अपनी किशोरावस्था में बंबई के फ़िल्मी संसार में अपना करियर एक अवैतनिक प्रशिक्षु के रूप में आरंभ किया तथा अपनी नियोक्ता कंपनी मोती महल थिएटर्स के लिए वर्षों तक लगन से कार्य करके फ़िल्म-निर्माण की बारीकियों को समझा । १९४७ में उन्होंने अपने नियोक्ताओं के सहयोग और प्रेरणा से राजश्री पिक्चर्स के नाम से हिन्दी फ़िल्मों के वितरण की संस्था आरंभ की । जिस दिन भारत की स्वाधीनता का सूर्योदय हुआ, उसी दिन अर्थात १५ अगस्त, १९४७ को ताराचंद जी की राजश्री संस्था का भी उदय हुआ । एक दशक से अधिक समय तक फ़िल्म वितरण के क्षेत्र में पर्याप्त अनुभव ले लेने के उपरांत उन्होंने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने का निश्चय किया और राजश्री के बैनर तले अपनी पहली फ़िल्म प्रस्तुत की - ‘आरती' (१९६२) जिसमें प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं अशोक कुमार, प्रदीप कुमार एवं मीना कुमारी ने । इस पारिवारिक फ़िल्म को पर्याप्त सराहना और सफलता मिली । ताराचंद जी के नेतृत्व में राजश्री ने लंगड़े और अंधे बालकों की आदर्श मित्रता के विषय पर आधारित अपनी अगली ही फ़िल्म ‘दोस्ती' (१९६४) से सफलता की ऊंचाइयाँ छू लीं । ‘दोस्ती' ने न केवल भारी व्यावसायिक सफलता अर्जित की वरन कई पुरस्कार भी जीते । फिर तो भारतीय जीवन मूल्यों एवं आदर्शों पर आधारित कथाओं वाली सादगीयुक्त फ़िल्मों का क्रम ऐसा चला कि दो दशक तक नहीं थमा ।

ताराचंद जी केवल फ़िल्म निर्माता थे । वे न तो फ़िल्मों के लेखक थे और न ही निर्देशक । लेकिन राजश्री द्वारा बनाई गई अधिकांश फ़िल्मों पर उनके जीवन-दर्शन तथा सादगी एवं भारतीयता में उनके अटूट विश्वास की स्पष्ट छाप है । यहाँ तक कि राजश्री की फ़िल्मों की नामावली भी हिन्दी में ही दी जाती थी जबकि परंपरा फ़िल्मों की नामावली अंग्रेज़ी में देने की ही थी (और आज तक है) । राजश्री के प्रतीक चिह्न में वीणावादिनी माँ सरस्वती का होना भी भारतीय संस्कृति में उनकी आस्था को ही दर्शाता है । भारतीय पारिवारिक मूल्यों तथा भारत-भूमि एवं भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित सनातन आदर्शों से किसी भी प्रकार का समझौता उन्हें स्वीकार्य नहीं था । उनका दृढ़ विश्वास था कि हिंसा, कामुकता तथा धन के अभद्र प्रदर्शन जैसे स्थापित फ़ॉर्मूलों से दूर रहकर सादगी तथा उत्तम भारतीय परम्पराओं को प्रोत्साहित करना ही भारतीय दर्शकों के हृदय को विजय करने की कुंजी है । अपनी इस आस्था को उन्होंने जीवनपर्यंत बनाए रखा और भारतीय सिनेमा-प्रेमियों से उन्हें इसका अपेक्षित प्रतिसाद भी मिला । उनके द्वारा निर्मित छोटे बजट की फ़िल्मों में से अधिकतर ने अपनी लागत और लाभ वसूल किया जबकि कई फ़िल्मों ने अखिल भारतीय स्तर पर भारी व्यावसायिक सफलता भी अर्जित की ।

ताराचंद जी ने कभी अपनी फ़िल्म निर्माण संस्था को बड़े बजट की भव्य फ़िल्में नहीं बनाने दीं जिनमें धन-वैभव का अभद्र प्रदर्शन हो । सादगी के जीवन-दर्शन में उनकी आस्था अटल थी जिससे वे कभी विचलित नहीं हुए । वैभव और विलास से रहित साधारण किन्तु सदाचार पर आधारित जीवन जीने की महान भारतीय परंपरा में उनकी अगाध श्रद्धा थी । उनके सक्रिय जीवन में राजश्री के लेखक भारतीय जनसामान्य के दिन-प्रतिदिन के जीवन से उभरने वाली साधारण व्यक्तियों की संवेदनशील कथाएं रचा करते थे । ऐसी बहुत-सी फ़िल्मों की पृष्ठभूमि एवं परिवेश ग्रामीण हुआ करते थे एवं उनमें भारतीय ग्राम्य जीवन की सादगी, परम्पराओं एवं आदर्शों को इतनी सुंदरता के साथ चित्रित किया जाता था कि दर्शक उन कथाओं के निश्छल पात्रों के प्रेम में पड़ जाते थे, उन्हें हृदय में बसा लेते थे ।

राजश्री की फ़िल्मों का एक बहुत बड़ा गुण उत्कृष्ट संगीत रहा । इन फ़िल्मों के संगीतकारों ने पश्चिमी संगीत के प्रभाव को पूर्णतः दूर रखते हुए भारतीय मिट्टी से जुड़े और भारतीय शास्त्रीय संगीत के मूल तत्वों से युक्त संगीत से ही गीतों हेतु धुनों की रचना की । रवीन्द्र जैन नामक अत्यंत प्रतिभाशाली किन्तु जन्मांध कलाकार को राजश्री ने सौदागर' (१९७३) में सगीत देने का अवसर दिया जिसके उपरांत वे राजश्री की फ़िल्मों के नियमित संगीतकार बन गए । वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जो न केवल मधुर संगीत रचते थे वरन हृदयस्पर्शी गीत भी लिखते थे । चितचोर (१९७६) फ़िल्म के लिए अपने द्वारा लिखित एवं संगीतबद्ध गीतों को गाने के लिए उन्होंने हेमलता एवं येसुदास जैसी नवीन प्रतिभाओं को अवसर प्रदान किया और परिणाम यह निकला कि चितचोर' के मधुर गीतों ने देश भर में धूम मचा दी ।

नवीन अभिनेताओं एवं अभिनेत्रियों को अवसर देने में भी राजश्री बैनर सदा ही अग्रणी रहा । संजय खान (दोस्ती - १९६४), राखी (जीवन-मृत्यु - १९७०), सचिन एवं सारिका (गीत गाता चल - १९७५), ज़रीना वहाब (चितचोर - १९७६), अरुण गोविल (पहेली - १९७७), रामेश्वरी (दुलहन वही जो पिया मन भाए - १९७७), माधुरी दीक्षित (अबोध - १९८४), अनुपम खेर (सारांश - १९८४) आदि अनेक कलाकारों को उनके अभिनय जीवन की अलसभोर में राजश्री ने ही अवसर दिया और वे आगे चलकर सफल हुए । अपनी पदार्पण फ़िल्म मृगया' (१९७६) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले मिथुन चक्रवर्ती को वास्तविक पहचान और भौतिक सफलता राजश्री की संगीतमय फ़िल्म तराना' (१९७९) से मिली । अरुण गोविल ने फ़िल्म पहेली' (१९७७) में मिली एक सहायक भूमिका में अपने अभिनय से फ़िल्म का निर्माण करने वालों को ऐसा प्रभावित किया कि उन्हें राजश्री की फ़िल्म साँच को आँच नहीं' (१९७९) में मधु कपूर नामक नवोदित नायिका के साथ मुख्य नायक की भूमिका दी गई । साँच को आँच नहीं' मुंशी प्रेमचंद की अमर कथा - पंच परमेश्वर' से प्रेरित थी । राजश्री की अगली ही फ़िल्म सावन को आने दो' (१९७९) में अरुण गोविल पुनः नायक बनकर आए जिसकी देशव्यापी व्यावसायिक सफलता ने उन्हें सितारा बना दिया । आगे चलकर वे रामानन्द सागर द्वारा दूरदर्शन हेतु निर्मित रामायण' में राम की भूमिका निभाकर घर-घर में पहचाने जाने लगे । बाल कलाकारों - कोमल महुवाकर तथा अलंकार को पायल की झंकार' (१९८१) में प्रमुख भूमिकाएं दी गईं । मैंने भारतीय नृत्यों तथा भारतीय जीवन मूल्यों के अद्भुत संगम वाली ऐसी कोई और फ़िल्म नहीं देखी जिसका एक-एक प्रसंग हृदय को उदात्त भावनाओं से भर देता हो । इसमें कोमल महुवाकर की नृत्य प्रतिभा दर्शकों के सम्मुख पूर्णतः निखरकर आई थी । अनुपम खेर नामक प्रतिभाशाली युवा अभिनेता को सारांश' (१९८४) में एक वृद्ध व्यक्ति की चुनौतीपूर्ण भूमिका दी गई जिसकी सफलता के उपरांत अनुपम खेर तथा फ़िल्म के निर्देशक महेश भट्ट दोनों ही हिन्दी फ़िल्मों के संसार के सम्मानित नाम बन गए ।

नदिया के पार (१९८२) राजश्री की एक ऐसी प्रस्तुति है जिसके सभी गीत तथा अधिकांश संवाद भोजपुरी भाषा में हैं । लेकिन ग्रामीण पृष्ठभूमि में रची गई इस संगीतमय पारिवारिक फ़िल्म ने केवल हिन्दी पट्टी में ही नहीं वरन प्रादेशिक सीमाओं को तोड़ते हुए सम्पूर्ण राष्ट्र में अद्भुत सफलता अर्जित की । सूरज बड़जात्या की अत्यंत सफल एवं बहुचर्चित फ़िल्म - हम आपके हैं कौन (१९९४) वस्तुतः इसी कथा का नगरीय संस्करण है ।

बाबुल (१९८६) की असफलता के उपरांत ताराचंद जी ने फ़िल्म निर्माण बंद कर दिया तथा अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे सक्रिय नहीं रहे । उनका देहावसान २१ सितंबर, १९९२ को हुआ । उनके पोते सूरज ने १९८९ में फ़िल्ममैंने प्यार किया' से राजश्री बैनर को पुनर्जीवित किया लेकिन उसने अपने पितामह द्वारा स्थापित सादगी की परंपरा को तोड़ते हुए बड़े बजट की विलासितापूर्ण फ़िल्में बनानी आरंभ कर दीं जिनके प्रमुख पात्र अत्यंत धनी होते हैं एवं उनके जीवन में वैभव तथा भौतिक सुख-सुविधाएं भरपूर होती हैं । सूरज की कतिपय फ़िल्मों में अंग-प्रदर्शन भी है जो ताराचंद जी के लिए पूर्णतः निषिद्ध था । इतना अवश्य है कि सूरज द्वारा निर्मित फ़िल्में भी भारतीय पारिवारिक मूल्यों को ही प्रतिष्ठित करती हैं ।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सादा जीवन उच्च विचार' के आदर्श को अपने जीवन में अपनाया तथा दूसरों को भी उसे अपनाने के लिए प्रेरित किया । ताराचंद जी के रूप में बापू को एक सच्चा अनुयायी मिला जिसने उनके इस आदर्श को हृदयंगम करके अपने द्वारा निर्मित फ़िल्मों में पूरी निष्ठा के साथ प्रस्तुत किया । ताराचंद जी के कार्यकाल में राजश्री द्वारा निर्मित फ़िल्मों के पात्र इसी पथ पर चलते दिखाए गए तथा अपने सम्पूर्ण जीवन में ताराचंद जी हिन्दी सिनेमा में सादगी तथा भारतीयता के ध्वजवाहक बने रहे । यदि आप धन-वैभव के अतिरेकपूर्ण प्रदर्शन वाली भव्य फ़िल्मों तथा डिज़ाइनर वस्त्रों में सुसज्जित उनके कृत्रिम पात्रों को देख-देखकर ऊब गए हों तो आरती, दोस्ती, तक़दीर, उपहार, गीत गाता चल, चितचोर, तपस्या, पहेली, दुलहन वही जो पिया मन भाए, अँखियों के झरोखों से, सुनयना, सावन को आने दो, मान-अभिमान, हमकदम, एक बार कहो, पायल की झंकार, नदिया के पार जैसी कोई फ़िल्म देखिए और भारतीय मिट्टी तथा जीवन की सादगी की सुगंध से अपने हृदय को सुवासित होने दीजिए ।

हिन्दी सिनेमा में सादगी, भारतीयता तथा जीवन के उच्च मूल्यों की परंपरा के इस पुरोधा को उसके १०२ वें जन्मदिवस पर मेरा शत-शत नमन ।

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