Wednesday, March 30, 2016

कामयाबी और नाकामयाबी को कैसे संभालें ?



६३ वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों की घोषणा हो गई है जिनमें हिमाचल प्रदेश के एक छोटे-से कस्बे से आने वाली तथा बिना किसी फ़िल्मी पृष्ठभूमि के केवल अपने साहस, आत्मविश्वास और पुरुषार्थ से फ़िल्मोद्योग में सफलता और सम्मान पाने वाली कंगना रानाउत ने सभी को चमत्कृत करते हुए अनवरत दूसरे वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लिया है । विगत वर्ष उन्हें यह सम्मान फ़िल्म 'क्वीन' के लिए मिला था तो इस वर्ष फ़िल्म 'तनु वेड्स मनु रिटर्न्स' के लिए मिला है । कंगना ने वर्ष २००९ में भी सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मधुर भंडारकर की फ़िल्म 'फ़ैशन' (२००८) के लिए जीता था । इस फ़िल्म में उन्होंने मॉडलिंग के व्यवसाय में पहले सफल और कालांतर में असफल होने वाली एक कुंठित युवती की भूमिका निभाई थी (जो कि एक वास्तविक मॉडल गीतांजलि नागपाल के जीवन से प्रेरित थी) जो जीवन से हताश होकर आत्मघात कर लेती है । वस्तुतः महत्वाकांक्षी युवतियों द्वारा अपने जीवन में सफलता और असफलता का भलीभाँति प्रबंधन न कर पाना ही 'फ़ैशन' फ़िल्म की विषय-वस्तु थी जिसका केन्द्रबिन्दु एक छोटे शहर से मुंबई आई एक महत्वाकांक्षी युवती थी जिसकी भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई थी और उन्होंने इसी फ़िल्म के लिए उसी वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था । रोचक तथ्य यह है कि प्रियंका स्वयं भी उत्तर प्रदेश के एक अपेक्षाकृत कम आधुनिक शहर बरेली से हैं और जब वर्ष २००० में उन्होंने विश्वसुंदरी बनने का गौरव पाया था तो इससे उनके पुरातन विचारों से ओतप्रोत गृहनगर में किसी विशेष प्रसन्नता या उत्साह का संचार नहीं हुआ था ।
 
बहरहाल कुल मिलकर एक अच्छी फ़िल्म मानी जा सकने योग्य 'फ़ैशन' इस तथ्य को रेखांकित करती है कि एक सार्थक और प्रसन्न जीवन के लिए मनुष्य को सफलता और असफलता दोनों का ही कुशल और विवेकपूर्ण प्रबंधन करना आना चाहिए । ऐसा इसलिए है क्योंकि सफलता और असफलता दोनों एक ही मुद्रा के दो पक्ष हैं जिन्हें जुड़वां बहनों की तरह देखा जा सकता है । इन दोनों ही के उद्गम के पीछे मानव के पुरुषार्थ और उसके प्रारब्ध दोनों ही की अपनी-अपनी स्वतंत्र भूमिका होती है । प्रायः इन दोनों ही का साक्षात्कार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में होता है । इनमें से किसी एक से भी वह बच नहीं सकता । एक स्थान पर बच भी गया तो किसी दूसरे स्थान पर उनसे साक्षात् होकर ही रहेगा । तो फिर क्यों न दोनों का ही स्वागत बाहें पसारकर प्रसन्नतापूर्वक मुक्तचित्त से किया जाए ? क्यों सफलता को अपने सर पर चढ़ने दिया जाए और क्यों असफलता के कारण विषाद में मग्न हो जाया जाए ? 'फ़ैशन' फ़िल्म की मुख्य नायिका (प्रियंका) इस वास्तविकता को समय रहते समझ जाती है और इसी ज्ञानोदय के कारण जब जीवन उसे दूसरा अवसर देता है तो वह उसका उचित उपयोग करके सफलता के सोपान पुनः चढ़ती है जबकि फ़िल्म की सहनायिका (कंगना) ऐसा नहीं कर पाती और असफलता तथा एकाकीपन से उपजी उसकी कुंठा का अतिरेक उसे आत्महनन के मार्ग पर ले जाता है ।
 

लिखते हुए बहुत दुख होता है लेकिन इस व्यावहारिक संसार का अत्यंत पीड़ादायक यथार्थ यही है कि असफलता के लिए कहीं कोई स्थान नहीं है । ऐसा आभास होता है मानो यह भौतिक संसार केवल सफल व्यक्तियों के निमित्त ही है । सफल व्यक्ति को सर्वगुणसंपन्न मानते हुए उसका यशोगान करने में लोग कोई न्यूनता नहीं रखते जबकि असफल व्यक्ति के गुणों पर कोई दृष्टिपात नहीं करता । सफल के साथ सभी चिपकना चाहते हैं जबकि असफल का साथ तो संभवतः उसकी प्रतिच्छाया भी छोड़ देती है । स्वयं कंगना ने इस यथार्थ को भोगा है और कुछ समय पूर्व ही उन्होंने एक साक्षात्कार में स्पष्ट कहा था कि विजय और सफलता बहुत ओवररेटेड हैं अर्थात उनका मूल्य अनुचित रूप से अधिक आँका जाता है । सफलता में परिवर्तित न हो तो संघर्षशील व्यक्ति के संघर्ष को कोई सराहना नहीं मिलती । संसार की इसी दोषपूर्ण मानसिकता का प्रभाव व्यक्तियों पर पड़ता है जिसके कारण सफल व्यक्ति अपने आपको गुणी और दूसरों को उपदेश देने की अर्हता रखने वाले मानने लगते हैं जबकि असफल व्यक्ति निराशा एवं अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं । दुनिया की इसी ग़लत सोच के कारण कामयाबी अकसर गुमराह करती है । सच तो यह है कि इससे ज़्यादा गुमराह करने वाली शै कोई दूसरी नहीं । ज़्यादातर कामयाब लोग हौले-हौले हक़ीक़त से आँखें मूंदने लगते हैं और समझने लगते हैं कि वे जो करते (या कहते या सोचते) हैं, बस वही ठीक है, बाकी कुछ नहीं । वे दूसरों को स्वयं से तुच्छ मानने लगते हैं एवं उनका व्यक्तित्व अहंकार में डूब जाता है । प्रायः इन्हीं कारणों से उनका पतन भी होता है । जब उनका बुरा वक़्त आता है तो उन्हें ख़बर भी नहीं लगती कि कब वे अर्श से फ़र्श पर पहुँच गए । 'फ़ैशन' फ़िल्म में मधुर भंडारकर ने इसी तथ्य को बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रतिपादित किया था ।

इसके विपरीत नाकाम शख़्स के साथ दुनिया कितनी बेरहमी से पेश आती है, यह स्वर्गीय गुरुदत्त ने अपनी बेहतरीन  फ़िल्म 'कागज़ के फूल' (१९५९) में बड़ी बेबाकी से दिखाया था । असफलता के प्रति संसार के तिरस्कार के कारण ही असफल व्यक्ति हीनभावना से पीड़ित होकर स्वयं का अवमूल्यन करने लगते हैं । वे अपने दोषों को अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से परखने लगते हैं जबकि अपने गुणों और क्षमताओं को भूलने लगते हैं । जब यह सिलसिला हद से आगे बढ़ जाता है तो उनके दिलोदिमाग में कुछ ऐसे ही ख़याल बार-बार गूंजने लगते हैं - 'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं' । उनकी यह मनोदशा उनका ब्रेकिंग प्वॉइंट होती है जब वे पूरी तरह से टूट जाते हैं क्योंकि दिल में पूरा हो सकने लायक कोई सपना नहीं होता और नज़दीक कोई अपना नहीं होता । तभी ख़ुदकुशी की नौबत भी आती है जैसी कि गुरुदत्त के ही साथ १९६४ में आ गई थी जब महज़ उनतालीस साल की उम्र में वे अपनी ज़िंदगी से आजिज़ आ गए थे ।

अतः उत्साह और प्रसन्नता से परिपूरित एक सामान्य जीवन जीने के लिए सफलता और असफलता दोनों को ही सहज भाव से स्वीकार करने की कला प्रत्येक सांसारिक व्यक्ति को अपने भीतर विकसित करनी चाहिए क्योंकि ये दोनों ही वरदान भी बन सकती हैं और अभिशाप भी । कामयाबी और नाकामयाबी दोनों को ही ठीक से संभालना न आए तो दोनों ही आख़िरकार भारी नुकसान पहुँचाती हैं । कामयाबी मिलने पर यह एहतियात ज़रूर बरतनी चाहिए कि उसका नशा दिमाग में न चढ़ जाए जो कामयाब इंसान को घमंडी बना दे, उसके रवैये और नज़रिये को ग़ैर-पेशेवराना बना दे । अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर जैसे लोग सफलता को दीर्घकाल तक अपने पास इसीलिए रख पाए क्योंकि उन्होंने प्रारम्भिक सफलता मिलने पर अपनी विनम्रता और संयमित व्यवहार को तिलांजलि नहीं दी । जब कालचक्र परिवर्तन के कारण उन्हें असफलता मिली, तब भी उन्होंने अपने दृष्टिकोण, वाणी और व्यवहार को पूर्णरूपेण संतुलित बनाए रखा और समय के पुनः अपने पक्ष में परिवर्तित होने की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की । और इस सब्र का इनाम उन्हें मिला भी जब उनका अच्छा वक़्त लौटा और वे फिर से कामयाब हुए । नाकामयाबी मिलने पर इंसान को यह याद रखना चाहिए कि वक़्त हमेशा बदलता रहता है और इसी वजह से बुरा वक़्त भी हमेशा टिका नहीं रह सकता । उसका भी गुज़र जाना उसी तरह तय है जिस तरह से हर रात के बाद दिन का आना तय है । अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जीवन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है । जीवन में अनेक कार्यों और अनेक क्षेत्रों में असफल होने के उपरांत अंततः अमरीका का राष्ट्रपति निर्वाचित होकर उन्होंने अपनी इस एक ही उपलब्धि से पूर्व की सभी असफलताओं और निराशाओं को धो डाला । नाकामयाब शख़्स यह न भूले कि ज़िंदगी बेशकीमती है और जान है तो जहान है । बाहर हार हो तो हो, मन में नहीं होनी चाहिए क्योंकि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत । ज़िंदगी तो दूसरा मौका कभी भी दे सकती है मगर ग़म में ही डूबे रहे तो उसे कैसे पकड़ेंगे ? नयन अश्रुओं से भरे हों तो अपनी ओर आता हुआ सुअवसर कैसे दिखाई दे सकता है ? असफलता के कारणों का विश्लेषण किया जाए और यह देखा जाए कि कौनसे कारणों को दूर किया जा सकता है । फिर उन्हें दूर करके नवीन प्रयास किया जाए क्योंकि जीवन तो चलने का ही नाम है । फिर जो कामयाबी बिना मशक़्क़त और बिना इंतज़ार के मिल जाए, उसका लुत्फ़ ही क्या ? वो राही क्या जो थककर बैठ जाए, वो मंज़िल क्या जो आसानी से तय हो

गीता में श्रीकृष्ण ने मनुष्य को स्थितप्रज्ञ बनने का जो परामर्श दिया है, वह अमूल्य है । स्थितप्रज्ञ का अर्थ है - वह मनुष्य जो अपने जीवन के प्रत्येक समय एवं प्रत्येक स्थिति में अपना मानसिक संतुलन बनाए रखे तथा चाहे सौभाग्य आए अथवा दुर्भाग्य, सुख मिले अथवा दुख, हानि हो अथवा लाभ; कभी असंतुलित न हो । जो सफलता मिलने पर प्रसन्नता में उन्मादित न हो तथा असफलता मिलने पर अवसादग्रस्त न हो जाए, वही स्थितप्रज्ञ है । ऐसा व्यक्ति ही जीवन-नौका को संसार-सागर में सहज रूप से खे सकता है क्योंकि उसके पास दो पतवारें हैं - सफलता के चढ़ाव के लिए आत्म-नियंत्रण की तथा असफलता के उतार के लिए धैर्य की । अपने जीवन में बहुत संघर्ष करने वाली तथा कठिन समय देखने वाली कंगना को उनकी इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई देते हुए मैं उनके लिए भी तथा हम सबके लिए भी स्थितप्रज्ञता की ही प्रार्थना करता हूँ ।

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Saturday, March 19, 2016

मानवता का कलंक - सैडिज़्म अथवा परपीड़ानन्द


कल गोरैया दिवस है । गोरैया को याद करके मेरा मन भावुक हो गया है । पहले बच्चे अपने घरों में गोरैया को देखते थे, उसको दाना चुगाते थे, पानी पिलाते थे तो उनके दिलोदिमाग में दया-करुणा जाग्रत होती थी पर आज बच्चों के अंदर वो सब संस्कार नहीं आ पा रहे । आज छोटे-छोटे-से बच्चे क्रोध में आपे से बाहर होते घरों में देखे जाते हैं ।  इसका एक कारण यह है कि वे प्रकृति से दूर घरों में अधिक बंद रहते हैं । अब वो कम उम्र में ही बड़े हो जाने लगे हैं जिसकी वजह यह है कि वे अब खुली हवा और वातावरण में न विचरकर घरों के अंदर ही बंद रहते हुए टी.वी. में प्रोग्राम देखते रहते हैं जिनमें से कई प्रोग्राम तो उनकी उम्र से बहुत आगे के होते हैं । इसके अतिरिक्त वे कम्प्यूटर, मोबाइल आदि में गेम खेलते हैं । अधिकांश ऐसे गेम हिंसा से भरे होते हैं । ये तथा ऐसी ही अनेक बातें जो दूसरों को पीड़ा पहुँचाने की प्रवृत्ति को दर्शाती हैं, बालकों में एक नकारात्मक गुण को विकसित करती हैं । उस नकारात्मक गुण का अंग्रेज़ी नाम है - सैडिज़्म अर्थात दूसरों को पीड़ा पहुँचाकर आनंदित होने की प्रवृत्ति ।

मैंने अपने साढ़े चार दशक के जीवनकाल में परपीड़ा से आनंदित होते हुए और उस वीभत्स आनंद को प्राप्त करने के लिए दूसरों को पीड़ा पहुँचाते हुए प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों को, प्रत्येक सामाजिक वर्ग के लोगों को, प्रत्येक संस्कृति और प्रदेश के लोगों को तथा स्त्रियों और पुरुषों दोनों को देखा । और इससे भी अधिक दुखद तथ्य मैंने यह देखा कि ऐसे परपीड़क प्रवृत्ति के लोगों को अपने इस अवगुण की अनुभूति तक नहीं होती है । जब अनुभूति ही न हो तो अवगुण को दूर करने का प्रयास भी कैसे हो ? मैंने स्वयं अत्यंत कठिन एवं तनावपूर्ण बाल्यकाल तथा किशोरावस्था को भुगता । लेकिन मेरे जीवन की कठिनाइयों ने मेरे भीतर जन्म से ही उपस्थित संवेदनशीलता को ही विकसित किया, परपीड़क प्रवृत्ति मेरे व्यक्तित्व का अंग कभी नहीं बन सकी । बल्कि मैंने तो अपना जीवन-सिद्धान्त यही बनाया कि कभी किसी का दिल न दुखाओ । मैंने अपना मूल व्यक्तित्व अपने स्वर्गीय पिता से विरासत में पाया है जो अधिक शिक्षित तो नहीं थे लेकिन स्वभाव ऐसा कोमल पाया था कि किसी की भी दुख-तक़लीफ से पिघल जाया करते थे और अपने सीमित साधनों से जो कुछ भी बन पड़ता था, उसके लिए करते थे । और मेरा मानना है कि चाहे ऐसे लोग अब बहुत कम रह गए हैं, फिर भी कुछ हैं अन्यथा यह धरती रसातल में चली गई होती ।

लेकिन मुझे अपने को किसी के द्वारा पहुँचाई गई पीड़ा से भी अधिक पीड़ा इस तथ्य से होती है कि आज परपीड़ानन्द के आकांक्षी अर्थात सैडिस्ट लोगों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है । दूसरों को कष्ट पहुँचाने में अपना आनंद पाने वाले लोग अब हर स्थान, हर संगठन और हर क्षेत्र में टिड्डी-दल की तरह मिलने लगे हैं । संवेदनशीलता घटती जा रही है, परपीड़क आनंद लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । ऐसा वीभत्स आनंद प्राप्त करने के लिए दूसरों को पीड़ा केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं वरन मानसिक स्तर पर भी पहुँचाई जाती है । अपने पद और अधिकार का दुरुपयोग करके अन्य व्यक्तियों को भौतिक अथवा आर्थिक हानि पहुँचाकर या उन्हें उनके उचित अधिकार से वंचित करके या उनका मानसिक उत्पीड़न करके भी परपीड़ानन्द प्राप्त किया जाता है । ऐसा नकारात्मक और अवांछनीय आनंद प्राप्त करने की मानसिकता  रखने वाले व्यक्ति भी विभिन्न संगठनों और संस्थानों में बहुतायत में पाए जाते है । मैं कभी नहीं समझ पाया कि किसी को उसके ऐसे लाभ से वंचित करके जिसकी वह सम्पूर्ण पात्रता रखता है या अनावश्यक असुविधा और मानसिक तनाव पहुँचाकर किसी विशिष्ट प्रस्थिति अथवा पद पर बैठे लोगों को आनंद कैसे प्राप्त होता है । लेकिन ऐसा होता तो है । बहुत-से लोग दूसरों को अपमानित करके भी ऐसा आनंद प्राप्त करते हैं । विचित्र बात यह है कि दूसरों को अपमानित करने में आनंद का अनुभव करने वाले स्वयं सदा दूसरों से सम्मान की ही अपेक्षा रखते हैं । अपने कार्यशील जीवन में कई अवसरों पर यह देखकर मैं दंग रह गया कि ऐसे लोग उनसे भी सम्मान चाहते हैं जिनका वे स्वयं ही अपमान करते हैं । ईसा मसीह और महात्मा गांधी जैसे लोगों ने कहा था कि दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो, जैसा तुम दूसरों से अपने लिए चाहते हो । लेकिन परपीड़ानन्द की विकृति से ग्रसित लोग इसका ठीक विपरीत करते हैं । उन्हें अपने लिए तो सद्व्यवहार चाहिए, आदर-मान चाहिए और अपने सारे अधिकार, लाभ व सुविधाएं चाहिए लेकिन दूसरों को वे इनमें से कुछ नहीं देना चाहते । दूसरों का दिल दुखाते समय उन्हें तनिक भी भान नहीं होता कि यदि कोई उनका दिल दुखाए तो उन्हें कैसा लगेगा । ऐसे लोग यदि औरों को उनका जायज़ हक़ या सहूलियत देते भी हैं तो कई-कई चक्कर कटवाकर और उन्हें बारंबार नीचा दिखाकर अपनी ऊंची हैसियत का अहसास करवाते हुए । कैसे गवारा करता है उनका ज़मीर ऐसा करने के लिए ? कैसे वे मनुष्य-देह लेकर भी यूँ मनुष्यता से पतित हो जाते हैं ? मेरे जैसे संवेदनशील व्यक्ति के लिए इस बात को समझ पाना लगभग असंभव ही है ।

कहते हैं तलवार का घाव भर जाता है लेकिन बात का घाव नहीं भरता है । लेकिन अपनी बातों से दूसरों को पीड़ा पहुँचाकर आनंदित होने वाले सैडिस्ट लगभग प्रत्येक स्थान पर और प्रत्येक परिवेश में मिल जाते हैं ।  पहले से ही दुखी या तनावग्रस्त व्यक्ति को सांत्वना देने वाली कोई बात कहने के बजाय उसके दुख या तनाव को और बढ़ाने वाली जले पर नमक छिड़कने जैसी बातें कहकर भी परपीड़क लोग प्रसन्न होते हैं । मैं स्वयं ऐसे अनेक लोगों के संपर्क में आया हूँ जिनको अपनी जली-कटी बातों से दूसरों के दुख और हृदय के बोझ को और बढ़ाने में एक विचित्र-सा, विद्रूप-सा आनंद आता है । न जाने किस प्रकार समाजीकरण हुआ होता है उनका, न जाने कैसे संस्कार मिले होते हैं उन्हें अपने परिवारों से ? ऐसे लोगों के लिए तो मैं हमेशा एक ही बात कहता हूँ – अरे अच्छे काम नहीं कर सकते तो अच्छी बात तो कहो और वो भी तुमसे न बन पड़े तो किसी के दर्द को बढ़ाने वाली बातें कहने से तो परहेज़ करो ! किसी के ज़ख़्म पर मरहम न लगा सको तो कम-से-कम नमक तो न छिड़को !

मैं निर्दोष पशुओं को असीम कष्ट पहुँचाकर अथवा उनका प्राणान्त करके उनके माँस अथवा अन्य अंगों के उपभोग को भी सैडिज़्म की ही श्रेणी में रखता हूँ । जैसा खाएं अन्न, वैसा बने मन । संभवतः तामसी आहार भी मनुष्य की संवेदनशीलता को घटाता है और उसके स्वभाव को परपीड़ा की ओर उन्मुख करता है । जब भी मैं किसी बालक अथवा वयस्क को किसी भी पशु अथवा पक्षी अथवा लघु प्राणी को को किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुँचाते देखता हूँ तो मेरे मन में हूक-सी उठती है और मुझे यही अनुभूति होती है कि इस बालक अथवा वयस्क को उचित संस्कार नहीं मिले । मनुष्यों में परपीड़ानन्द की नकारात्मक प्रवृत्ति के उभार का ही यह परिणाम है कि चाहे गोरैया विलुप्त हो जाए या बाघ, मनुष्यों को कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि उनकी मानसिकता यही हो गई है कि बस हमारी स्वार्थ-सिद्धि होती रहे, बाकी चाहे सभी प्राणी समाप्त हो जाएं ।
 
परपीड़ानन्द वस्तुतः मानवी नहीं दानवी प्रवृत्ति है । औरों को दारूण दुख पहुँचाकर कोई राक्षस ही आनंदित हो सकता है । लेकिन सांप्रदायिक दंगों और बड़े आंदोलनों के दौरान ऐसे राक्षस छुट्टे घूमते हैं और असहायों विशेषकर स्त्रियों पर ऐसे-ऐसे अत्याचार करते हैं कि जिन्हें देख-सुनकर परमपिता परमात्मा का हृदय भी कंपित हो जाए । भारतीय उपमहाद्वीप में तो निर्बलों और असहायों के रक्षक कहलाने वाले वर्दीधारी ही या तो स्वयं ही आततायी बन जाते हैं या फिर निर्दोषों पर अवर्णनीय अत्याचार कर रहे आततायियों के कृत्यों की ओर से नेत्र मूंदकर उन्हें अपना मौन समर्थन और अप्रत्यक्ष सहयोग देते हैं । ऐसा करते समय वे भूल जाते हैं कि उनके भी परिवार हैं, बालक हैं, माताएं-बहनें-पुत्रियां हैं । क्या उन्हें नहीं सूझता कि यदि उनके अपनों पर ऐसे अमानुषिक अत्याचार हों तो वे उसे कैसे सहन कर पाएंगे ?

बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती है कि परपीड़ानन्द की ऐसी प्रवृत्ति विकसित कैसे होती है ? कुछ लोगों में ऐसी प्रवृत्ति के विकास के लिए उनका कठिनाइयों, अन्यायों और अत्याचारों का शिकार बाल्यकाल उत्तरदायी होता है । लेकिन मेरे विचार में अधिसंख्य सैडिस्ट अथवा परपीड़क लोग ऐसे अपने नकारात्मक संस्कारों के कारण बनते  हैं जिसके लिए उनका दोषपूर्ण लालन-पालन या समाजीकरण उत्तरदायी होता है । जब बालक का सम्यक चरित्र-निर्माण नहीं होगा तो वह मनुष्यों को मनुष्यों की तरह कैसे देखेगा ? वास्तविक अर्थों में संवेदनशील व्यक्ति तो मनुष्यों के ही नहीं, प्राणिमात्र के प्रति इस प्रकार करुणा से भरा होता है कि वह किसी पशु को भी कष्ट नहीं पहुँचा सकता, किसी चींटी की भी मृत्यु का कारण बनना उसे स्वीकार्य नहीं हो सकता । क्या अब हम इस योग्य नहीं रहे कि समाज के लिए ऐसे संवेदनशील सदस्यों तथा राष्ट्र के लिए ऐसे संवेदनशील नागरिकों का निर्माण कर सकें

सैडिज़्म अथवा परपीड़ानन्द मानवता का कलंक है जिसे मिटना ही चाहिए । इसे मिटाने के लिए आइए, अपने बालगोपालों को चरित्रवान बनाएं, उनके व्यक्तित्व में संवेदना को भरें, उनके मन में परहिताभिलाषा के बीज बोएं, उन्हें ऐसे उत्तम संस्कार दें कि परपीड़ा से आनंदित होना तो दूर, वे किसी को भी हानि या दुख पहुँचाने का विचार तक न करें और वे दूसरों की पीड़ा को हरने में अपना आनंद पाएं, किसी को पीड़ा देने में नहीं । मुझे संतोष है कि मैं अपनी संतानों को ऐसे ही संस्कार दे सका हूँ । आज वे न केवल पशु-पक्षियों पर करुणा दर्शाते हैं वरन अन्य व्यक्तियों को भी अकारण कष्ट पहुँचाने से बचते ही हैं ।
 
मुझे गहन दुख होता है यह देखकर कि धार्मिकता का पाखंड करने वाले भी अनेक लोग सैडिस्ट अथवा परपीड़क स्वभाव के होते हैं जो लोकदिखावे के लिए रामायण (या अन्य धार्मिक ग्रंथ) का पाठ तो करते हैं लेकिन परोपकार के स्थान पर परपीड़ा में रुचि अधिक लेते हैं । ऐसे लोगों को मैं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का प्रिय भजन स्मरण कराना चाहता हूँ - 'वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीर पराई जाने रे' । पराई पीर को जान लेने, अनुभूत कर लेने में ही सच्ची धार्मिकता निहित है, ईश्वर के प्रति सच्ची आस्था और श्रद्धा निहित है । मैं सम्पूर्ण रामचरितमानस चाहे न पढ़ पाऊं लेकिन गोस्वामी तुलसीदास के इस सनातन और कालजयी संदेश को मैंने जीवनभर के लिए हृदयंगम कर लिया है -


परहित सरिस धर्म नहीं भाई
परपीड़ा सम नहीं अधमाई

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Tuesday, March 15, 2016

भारतीय पुलिस का बदसूरत चेहरा और मज़लूम का इंसाफ़ : (पुस्तक-समीक्षा – सिंह मर्डर केस)

आजकल हमारे देश में विदेशी लेखकों द्वारा लिखे गए थ्रिलर उपन्यासों का बाज़ार गर्म है । जो भारतीय लेखक भारतीय भाषाओं में ऐसे कथानक भारतीय पाठकों को परोस रहे हैं, उनका लेखन भी मुख्यतः विदेशी लेखन से ही प्रेरित लगता है । ऐसे में यदि कोई भारतीय लेखक केवल भारत में उपस्थित वास्तविकताओं के आधार पर पूर्णतः मौलिक कथानक रचता है तो वह निस्संदेह अभिनंदन का पात्र है । ऐसा ही एक विशुद्ध मौलिक एवं अत्यंत प्रभावशाली प्रयास नवोदित हिन्दी उपन्यासकार रमाकांत मिश्र ने किया है जो हिन्दी के पाठक वर्ग के लिए एक ताज़ा हवा के झोंके के सदृश है । उपन्यास का शीर्षक है – सिंह मर्डर केस । पाठक के हृदय के तल को स्पर्श कर लेने वाला यह उपन्यास सामाजिक कथानकों को पढ़ने में रुचि रखने वालों तथा रहस्य-रोमांच के शौकीनों, दोनों ही पाठक-वर्गों की पसंद की कसौटी पर खरा उतरता है ।
अपने शीर्षक से यह कोई हलका-फुलका और तात्कालिक मनोरंजन देने वाला उपन्यास लगता है लेकिन वस्तुतः यह उपन्यास भारतीय पुलिस और न्याय व्यवस्था की सूक्ष्मता और निष्पक्षता से पड़ताल करता है । उपन्यास का आरंभ लखनऊ में एक पुलिस उप अधीक्षक प्रशांत सिंह के पुत्र समर्थ सिंह की उसके विवाह समारोह के दौरान ही हुई हत्या से होता है जब एक पजेरो गाड़ी उसे कुचल डालती है । जब पुलिस विभाग अपने ही एक वरिष्ठ अधिकारी के पुत्र की हत्या के मामले को सुलझाने में विफल रहता है तो यह मामला केंद्रीय जाँच ब्यूरो के उच्चाधिकारी मदन मिश्र के सुपुर्द कर दिया जाता है । मदन मिश्र जो कि एक अत्यंत कार्यकुशल एवं सत्यनिष्ठ अधिकारी हैं, इस मामले की छानबीन करते हैं तो इस हत्या से पहले भी और इस हत्या के बाद भी हुई पुलिसियों की हत्याओं का एक ऐसा अजीब-ओ-ग़रीब सिलसिला उनके सामने आता है  कि हत्यारे तक पहुँचने में उन्हें ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ती है । और अंत में हत्यारे को गिरफ़्तार कर लेने के बाद भी वे समझ जाते हैं कि उन्होंने उसे गिरफ़्तार नहीं किया है जिसकी वे तलाश कर रहे थे ।

अपने उपन्यास को एक रहस्य-कथा का जामा पहना रहे रमाकांत मिश्र का यह प्रयास उनकी मौलिक सूझबूझ और प्रतिभा को ही रेखांकित नहीं करता बल्कि उत्तर भारत में चल रही पुलिस-व्यवस्था की विडंबनाओं के उनके गहन ज्ञान को भी प्रतिबिम्बित करता है । उपन्यास का शीर्षक सिंह मर्डर केसरखने का संभवतः यही कारण है कि कथानक का मूल बिन्दु समर्थ सिंह नामक व्यक्ति की हत्या है, अन्यथा यह एक रहस्य-कथा कम और एक सामाजिक उपन्यास अधिक है जो भारतीय पुलिस व्यवस्था की सड़ांध को उजागर करता है । भारतीय पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी चाहे जो कह लें और प्रैस के सामने चाहे जैसी डींगें हाँक लें, उनके अधीन चलने वाले थानों और चौकियों का पीड़ादायक और लज्जास्पद सत्य वही है जिसे रमाकांत मिश्र ने पूरी निर्भयता और वस्तुपरकता के साथ पाठक वर्ग के समक्ष रख दिया है । और सत्य सदा सत्य ही रहता है चाहे उसे कोई स्वीकार करे या देखकर भी अनदेखा करने का बहाना करे । आँखें मूंद लेने से सच्चाई लुप्त नहीं हो जाती ।
महिलाओं के प्रति यौन अपराध रोकने की बातें चाहे जितनी हों और होहल्ला चाहे जितना मचा लिया जाए, इस दिशा में सार्थक प्रयासों का प्रायः अभाव ही रहता है । लेकिन इस संदर्भ में जो सबसे भयावह वास्तविकता है, वह है कानून और व्यवस्था के रक्षक माने जाने वाले पुलिसियों द्वारा ही ऐसे अपराधों का किया जाना और उससे भी बड़ी बात यह कि थानों और चौकियों के भीतर किया जाना । खेद का विषय है कि भारतीय पुलिस भ्रष्ट और निकम्मे पुलिसियों से ही नहीं वरन लम्पट  और दुराचारी पुलिसियों से भी भरी पड़ी है । न जाने कितनी ही सती नारियों ने ऐसे वर्दी वाले गुंडों के हाथों अपना सतीत्व खोया है । न जाने ऐसी कितनी ही अबलाओं की आवाज़ें थानों और चौकियों की बेरहम चारदीवारियों में घुटकर रह गई हैं । भारतीय पुलिस के पास ऐसी अंधी ताक़त होती है कि ऐसे जघन्य अपराध करने के बाद भी अधिकतर मामलों में अपराधियों का कुछ नहीं बिगड़ता । बल्कि अपनी खाल बचाने के लिए वे निर्दोषों और यथासंभव ऐसी पीड़िताओं के परिवारों के पुरुषों को ही फ़र्ज़ी मामलों में फंसाकर अदालतों से सज़ा दिलवा देते हैं । भारतीय न्यायपालिका की निष्पक्षता और कार्यकुशलता केवल एक मिथक है जिसकी सच्चाई भुक्तभोगी ही बेहतर जानते हैं । तो ऐसे में कोई मज़लूम क्या करे जब इंसाफ़ की गुहार सुनने वाला कोई मौजूद न हो ? जहाँ हाकिम ही बेदर्द और ज़ालिमों की ओर हों, वहाँ ज़ुल्म के खिलाफ़ फ़रियाद किससे की जाए ? सदियों से ऐसे मज़लूम अंधे कानून को अपने हाथ में लेकर ख़ुद ही अपने ऊपर और अपनों के ऊपर हुए ज़ुल्म-ओ-सितम का हिसाब साफ़ करते आए हैं । न जाने ऐसी कितनी सच्ची दास्तानें कानून की मिसिलों में, किस्से-कहानियों में और लोगों की यादों में दफ़न हैं । 'सिंह मर्डर केस' भी ऐसी ही एक दास्तान सुनाता है । दास्तान ज़ालिमों के ज़ुल्म की ! दास्तान मज़लूम के इंसाफ़ की !


विषय-वस्तु पर एक सरसरी निगाह डालने पर 'सिंह मर्डर केस' एक रूटीन कथानक लगता है लेकिन ऐसा है नहीं । ऐसा प्रतीत होता है कि रमाकांत मिश्र ने भारतीय पुलिस के चरित्र और कार्यप्रणाली दोनों को ही निकट से देखा है और उनका गहन अध्ययन किया है । इसीलिए कथानक के पात्र और घटनाएं दोनों ही काल्पनिक होकर भी पाठक को वास्तविक लगते हैं । लेखक ने कथानक के परिवेश के छोटे-से-छोटे पक्ष पर पूरा ध्यान दिया है और कथानक को वास्तविक जैसा बनाकर प्रस्तुत करते हुए भी रोचकता के तत्व को आद्योपांत अक्षुण्ण बनाए रखा है जिससे पाठक कहीं पर भी ऊब का अनुभव नहीं करता । लेखक ने कहानी के रहस्यात्मक पक्ष को कम और भावनात्मक पक्ष को अधिक महत्व दिया है । पीड़ित पात्रों की व्यथा और उसकी अभिव्यक्ति अनेक स्थलों पर बरबस ही पाठक के दिल को छू लेती हैं । लेखक की लेखनी ने जादूभरे शब्दों का ऐसा तानाबाना बुना है कि पाठक का पीड़ित पात्रों से तादात्म्य स्वाभाविक रूप से स्थापित हो जाता है और वह उनकी पीड़ा को अपने भीतर अनुभव करते हुए अत्याचारियों के विनाश की कामना करने लगता है । लेखक ने पीड़ित द्वारा कानून को अपने हाथ में लिए जाने को इस प्रकार से रूपायित किया है कि वह न्याय ही दृष्टिगोचर होता है, प्रतिशोध नहीं । लेखक ने फ़्लैश-बैक और कट टू तकनीकों का उपयोग अत्यंत कौशलपूर्वक करते हुए उपन्यास को ऐसा शिल्प दिया है कि पढ़ने वाला शब्दों के साथ बंधकर रह जाता है और कहानी के पात्र मानो उसके समक्ष सजीव हो उठते हैं । राष्ट्रभाषा पर मज़बूत पकड़ रखने वाले लेखक द्वारा अपनी बात कहने के लिए किए गए शब्दों का ही नहीं, लोकोक्तियों का चयन भी सराहनीय है । उपन्यास को एक भावुक कर देने वाले दृश्य के साथ सकारात्मक बिंदु पर समाप्त किया गया है जो कि लेखक की सुलझी हुई मानसिकता का ही प्रमाण है ।


आज जब चेतन भगत जैसे लेखक अपनी साधारण अंग्रेज़ी छांटते हुए मामूली और बासी कथानकों को सुशिक्षित भारतीयों को परोसकर चाँदी काट रहे हैं तो रमाकांत मिश्र द्वारा अत्यंत परिश्रमपूर्वक लिखा गया यह हिन्दी उपन्यास अपनी अलग पहचान बनाते हुए राष्ट्रभाषा हिन्दी के सुधी पाठकों का ध्यानाकर्षण माँगता है । इसे पढ़ने के उपरांत मेरे हृदय के तल से लेखक के लिए यही सदिच्छा उभरी है कि यह सर्वथा मौलिक एवं अत्यंत प्रशंसनीय उपन्यास अधिकाधिक पाठकों तक पहुँचे तथा हिन्दी का पाठक आलोचक जगत यह देख सके कि भारतीय लेखन प्रतिभाएं विदेशी लेखकों से किसी भी तरह कम नहीं हैं, बस उन्हें प्रकाश में लाए जाने की आवश्यकता है ।
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