Wednesday, February 24, 2016

राष्ट्रपति या राष्ट्राध्यक्ष ?

जब से भारतीय गणतन्त्र का संविधान लागू हुआ है, हमारे संवैधानिक प्रमुख को हिन्दी भाषा में 'राष्ट्रपति' के नाम से ही संबोधित किया जाता रहा है । समाचार-पत्र हों या साप्ताहिक अथवा पाक्षिक अथवा मासिक पत्रिकाएं, सभी में 'राष्ट्रपति' शब्द ही छपा हुआ मिलता है । समाचार-वादक चाहे आकाशवाणी के हों या दूरदर्शन अथवा अन्य चैनलों के, वे भारत के संवैधानिक-प्रमुख का उल्लेख 'राष्ट्रपति' कहकर ही करते हैं (क्योंकि उन्हें जो सामग्री पढ़ने के लिए दी जाती है, उसमें 'राष्ट्रपति' शब्द ही लिखा होता है) । २६ जनवरी, १९५० से लेकर जब डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने भारत के पहले संवैधानिक-प्रमुख के रूप में शपथ ली थी, आज तक 'राष्ट्रपति' शब्द ही प्रयुक्त होता आ रहा है । संभवतः इतने वर्षों में किसी ने भी कभी यह विचार करने का कष्ट नहीं उठाया है कि इस शब्द का प्रयोग उचित एवं सार्थक है भी या नहीं ।


राष्ट्रपति शब्द 'राष्ट्र' शब्द में 'पति' प्रत्यय लगाकर सृजित किया गया है । जिस अतिज्ञानी ने मूल रूप से यह किया था, ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे । 'पति' संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ होता है स्वामी । सैकड़ों वर्षों से यह शब्द विवाहिता के संदर्भ में उसके जीवन-साथी पुरुष को इंगित करते हुए प्रयोग में इसलिए लाया जाता रहा है क्योंकि जिस युग में ऐसा प्रयोग आरंभ किया गया था, उस युग में स्त्री को अपने साथ विवाह करने वाले पुरुष की संपत्ति ही माना जाता था । जैसे घर के स्वामी को गृहपति, भूमि के स्वामी को भूपति तथा धन के स्वामी को धनपति कहा जाता है, वैसे ही स्त्री के संदर्भ में भी उससे विवाह द्वारा जुड़ने वाले पुरुष को उसका पति कहा जाता था । 'पत्नी' शब्द का सृजन 'पति' शब्द का स्त्रीलिंग बनाने के लिए  कालांतर में किया गया अन्यथा 'पत्नी' नाम का कोई शब्द नहीं हुआ करता था और 'पति' शब्द पुल्लिंग होते हुए भी लिंग-निरपेक्ष भाव इसलिए रखता था क्योंकि उस युग में स्त्रियों के पास किसी भी संपत्ति का स्वामित्व रहता ही नहीं था, वे तो स्वयं ही संबंधित पुरुषों की संपत्तियां मानी जाती थीं जो अन्य भौतिक सम्पत्तियों की भाँति ही उनके भी 'पति' कहलाते थे । संभवतः नारीवादी संगठनों का ध्यान अभी तक इस ओर नहीं गया है अन्यथा वे विवाहिता के जीवन-साथी के लिए 'पति' शब्द के प्रयोग पर अवश्य आपत्ति उठाते क्योंकि वर्तमान सामाजिक और वैधानिक व्यवस्था में अब विवाह के उपरांत पुरुष एवं स्त्री दोनों को ही समान स्तर प्रदान किया जाता है और पुरुष अपनी जीवन-संगिनी का साथी होता है, स्वामी नहीं ।


तो फिर ऐसे में 'राष्ट्रपति' शब्द का प्रयोग अनुचित ही नहीं, हास्यास्पद भी है जिसकी ओर  अब तक भारत सरकार के सफेद हाथी जैसे भारीभरकम राजभाषा विभाग का ध्यान आकर्षित नहीं हुआ है । जब 'पति' का शाब्दिक अर्थ स्वामी है तो सहज बुद्धि में आने वाला प्रश्न यही है कि कोई भी व्यक्ति सम्पूर्ण राष्ट्र का स्वामी कैसे हो सकता है ? स्पष्ट उत्तर है कि नहीं हो सकता । इसीलिए 'राष्ट्रपति' शब्द अशुद्ध और अप्रासंगिक है जिसका प्रयोग बंद किया जाना चाहिए । चूंकि भारतीय गणतन्त्र का संवैधानिक प्रमुख वस्तुतः व्यवस्था का अध्यक्ष होता है, अतः उसके लिए राष्ट्राध्यक्ष शब्द का प्रयोग होना चाहिए । वैसे भी अंग्रेज़ी भाषा में उसे 'प्रेसीडेंट' कहकर ही संबोधित किया जाता है जिसका निर्विवाद अर्थ है - 'अध्यक्ष' । अतः भारतीय गणतन्त्र का संवैधानिक प्रमुख 'भारत का राष्ट्राध्यक्ष' कहलाया जाना चाहिए, न कि 'भारत का राष्ट्रपति'

संवैधानिक प्रमुख को 'राष्ट्रपति' कहने से स्थिति तब अत्यंत हास्यास्पद लगने लगती है जब इस पद पर कोई महिला आसीन हो जाए । जब में श्रीमती प्रतिभा पाटिल शेखावत हमारे देश की संवैधानिक प्रमुख चुनी गई थीं, तब मेरे कतिपय मित्रगणों ने मुझसे पूछा था कि पुरुष को तो राष्ट्रपति कहते हैं तो महिला को क्या राष्ट्रपत्नी कहें ? यह सुनकर मेरा हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया था और तब मैंने उन्हें समझाया था कि भई यह पद लिंग-भेद से निरपेक्ष है अतः किसी महिला के इस पद पर आसीन हो जाने पर 'पति' शब्द को स्त्रीलिंग में परिवर्तित करना अनावश्यक और निरर्थक है । इसीलिए 'राष्ट्राध्यक्ष' शब्द का प्रयोग ही उचित है क्योंकि किसी महिला के इस पद को ग्रहण करने पर उसे 'राष्ट्राध्यक्षा' कहा जा सकता है और यही तर्कसम्मत भी है क्योंकि अंग्रेज़ी में तो 'प्रेसीडेंट' शब्द ज्यों-का-त्यों ही उपयोग में लाया जाता है चाहे उस पद पर पुरुष बैठे या महिला । लेकिन हमारे यहाँ हाल यह है कि किसी दूसरे देश के संवैधानिक प्रमुख का भी उल्लेख किया जाता है तो उसे उस देश का (या की) 'राष्ट्रपति' कहकर ही संबोधित किया जाता है जो कि परोक्ष रूप से उस व्यक्ति तथा उस देश का अपमान ही होता है ।


अतएव हमारी महान भाषा के उपहास को रोकने के लिए भारत सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा सभी राजकीय एवं अ-राजकीय कार्यकलापों में 'राष्ट्रपति' शब्द के प्रयोग को तुरंत प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए तथा उसे 'राष्ट्राध्यक्ष' शब्द से प्रतिस्थापित कर दिया जाना चाहिए ।

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Monday, February 22, 2016

सुब्रत रॉय : सुख के सब साथी, दुख में न कोय

दिलीप कुमार और सायरा बानू अभिनीत पुरानी हिन्दी फ़िल्म 'गोपी' (1970) का एक अमर भक्ति गीत है - 'सुख के सब साथी, दुख में न कोय' जिसे राजेन्द्र कृष्ण ने लिखा था, कल्याणजी आनंदजी ने संगीतबद्ध किया था और मोहम्मद रफ़ी ने गाया था । आज भी इस गीत को चाहे सुना जाए या फ़िल्म के दृश्य में देखा जाए, यह मन को वीतराग और ईश्वर-भक्ति की भावनाओं से भर देता है । इस भक्ति-गीत पर रफ़ी साहब का स्वर और दिलीप साहब का अभिनय सुनने और देखने वालों के दिल जीतने में आज भी उतना ही सक्षम है जितना कि साढ़े चार दशक पहले था ।

यह गीत इस शाश्वत तथ्य को रेखांकित करता है कि संसार में कोई अपना नहीं है, केवल प्रभु का नाम ही अपना है, उसकी कृपा ही अपनी है । बाकी सब रिश्ते-नाते केवल स्वार्थ पर आधारित हैं । अपनेपन का दावा करने वाले सभी लोग केवल सुख के ही साथी होते हैं, दुख में सब दूर हो जाते हैं और उस समय मनुष्य स्वयं आपको नितांत एकाकी पाता है । इसलिए ऐसे स्वार्थाधारित सम्बन्धों के जाल में न फंसकर मनुष्य को ईश्वरोपासना तथा सत्कर्मों में ही मन लगाना चाहिए ।

सहारा उद्योग समूह के मुखिया सुब्रत रॉय ने यह गीत अवश्य सुना होगा क्योंकि उनकी धर्मपत्नी स्वप्ना रॉय स्वयं गायिका हैं, अतः उनके कारण उनके पतिदेव यानी कि सुब्रत रॉय ने भी संगीत में सदा ही रुचि रखी होगी । बहरहाल सुब्रत रॉय के मन में शाश्वत जीवन दर्शन को सरल शब्दों में बताने वाला यह गीत पिछले दो वर्षों में अनगिनत बार गूंजा होगा, ऐसा मेरा अनुमान है । 28 फ़रवरी, 2016  को उनकी गिरफ़्तारी को पूरे दो साल हो जाएंगे और 04 मार्च, 2016 को उनकी तिहाड़ जेल की रिहाइश के दो साल पूरे हो चुके होंगे । राजसी ठाठ से जीने वाले, सार्वजनिक जीवन में अपनी लार्जर दैन लाइफ़ छवि गढ़ने वाले, ऊंचे और असरदार लोगों की सोहबत का लुत्फ़ उठाने वाले या यूँ कहिए कि उन्हें अपनी सोहबत का लुत्फ़ उठाने का मौका देने वाले और अपने आपको निर्धनों की सहायता करने हेतु धरती पर आई किसी पुण्यात्मा के रूप में देखने वाले सुब्रत रॉय ने 28 फ़रवरी, 2014 से पहले कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी ज़िन्दगी में ऐसा वक़्त भी आएगा ।

कुछ वर्ष पूर्व सुब्रत रॉय के फ़र्श से अर्श पर जा पहुँचने की गाथा जितनी रोमांचक लगती थी, अब उनके अर्श से फ़र्श पर धड़ाम से आ गिरने की गाथा उससे भी कहीं अधिक रोमांचक लगती है । उनका पतन उनके उत्थान से भी अधिक अविश्वसनीय है । किसी परीकथा की भांति व्यवसाय जगत में दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति करते-करते वे देखते-ही-देखते पृथ्वी से आकाश पर जा पहुँचे लेकिन भाग्य के एक ही थपेड़े ने उन्हें आकाश से सीधा रसातल में धकेल दिया - उस रसातल में जिससे निकलने की उनकी कोई जुगत कारगर नहीं हो रही है । कैसे हुआ ऐसा ?

सुब्रत रॉय का जन्म बिहार के अररिया ज़िले में निवास करने वाले एक सामान्य बंगाली परिवार में हुआ । गोरखपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के उपरांत अति-महत्वाकांक्षी सुब्रत रॉय ने 1978 में केवल तीस वर्ष की आयु में अपना व्यवसाय आरंभ किया और एक लेम्ब्रेटा स्कूटर लेकर लोगों को नमकीन बेचते हुए गलियों और सड़कों की ख़ाक छानने निकल पड़े । शीघ्र ही गोरखपुर में 'सहारा इंडिया परिवार' नाम से एक व्यापारिक संस्था की स्थापना करके उन्होंने मुख्यतः विनियोग तथा वित्त-पोषण का क्षेत्र अपने व्यापार के लिए चुना । जैसे-जैसे उनकी संस्था पैसा कमाती गई, वे रीयल एस्टेट, विमानन, आतिथ्य (होटल), चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी, पर्यटन, जीवन बीमा, मनोरंजन, मीडिया और खेल जैसे क्षेत्रों में भी अपने पैर फैलाते चले गए । सुब्रत रॉय ने अपने व्यवसाय के लिए घोषित रूप से 'सामूहिक भौतिकवाद' का दर्शन अपनाया जिसका उनके शब्दों में अर्थ है - 'सामूहिक देखरेख में सामूहिक उन्नति' । उनके व्यवसायों के लिए पूँजी का मुख्य स्रोत था - आम जनता से आने वाली बेहद छोटी-छोटी जमाएं । सुब्रत रॉय के सहारा परिवार ने चाय की थड़ी लगाने वाले और रिक्शा चलाने वाले जैसे समाज के अत्यंत निर्धन वर्ग के लाखों लोगों की नगण्य राशियों वाली बचतें जमा के रूप में लेकर उनका विनियोग करने तथा प्राप्त आय से उन जमाकर्ताओं को ब्याज़ अथवा लाभांश देने का काम आरंभ किया जो ख़ूब फला-फूला । प्रत्यक्षतः उनकी पूँजी का यह मूल स्रोत ही अंत में उनका वाटरलू सिद्ध हुआ ।

नब्बे का दशक आते-आते 'सहारा इंडिया परिवार' के नाम से जाना जाने वाला उनका व्यवसाय समूह देश के चोटी के व्यापार-गृहों में गिना जाने लगा । बीसवीं सदी लगते-लगते वे बिड़ला और अंबानी जैसों की श्रेणी में जा पहुँचे । जहाँ गुड़ होता है, वहाँ मक्खियाँ तो आती ही हैं । जब सुब्रत रॉय पेज थ्री वाली हस्ती बन गए तो क्या राजनेता, क्या फ़िल्मी सितारे और क्या खेलों एवं ग्लैमर की दुनिया के कामयाब लोग, सभी उनसे चिपकने लगे । भारत ही नहीं विश्व के प्रसिद्ध व्यक्ति भी उनके साथ चित्रों में दिखाई देने लगे । वे भारतीय क्रिकेट टीम के प्रायोजक बन गए । उन्हों 2003 में विश्व कप क्रिकेट के फ़ाइनल में पहुँचने वाली भारतीय टीम के सदस्यों को  लोनावला स्थित अंबी वैली में भव्य आवास प्रदान किए । अपनी धर्मपत्नी स्वप्ना रॉय के गीतों का एलबम निकालकर उनका गायिका बनने का स्वप्न भी पूरा किया । लखनऊ में अपना स्थायी ठिकाना बनाकर राजप्रासाद जैसे नयनाभिराम आवास में वे रहने लगे । 2004 में बेटों का विवाह-समारोह ऐसा भव्य आयोजित किया कि क्या राजकुमारों के विवाह होते होंगे । उस विवाह में तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी सम्मिलित हुए थे । अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्य राय, सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव जैसे लोग उनसे गलबहियां करने लगे । सहारा की वित्तीय कृपा से न जाने कितने ही फ़िल्म और धारावाहिक बनाने वाले तर गए । अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्य राय जैसे लोगों को तो उन्होंने अपनी कुछ कंपनियों में निदेशक ही बना डाला । क्रिकेट का आईपीएल शुरू हुआ तो कुछ अरसे बाद उन्होंने भी एक टीम ख़रीद ली । हॉकी तथा फॉर्मूला वन दौड़ जैसे खेलों में भी अपना दखल दे दिया ।

उन पर धन और यश की जैसे मूसलाधार बरसात हो रही थी, झड़ी लग गई थी नेमतों की । उनका और उनके सहारा परिवार का नाम जैसे दसों दिशाओं में गूंजने लगा था । प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधियां दी गईं । 2004 में वे टाइम पत्रिका द्वारा रेलवे के बाद भारत के दूसरे सबसे बड़े नियोक्ता के रूप में नामांकित किए गए । 2011 में वे 'द बिजनेस आइकॉन ऑव द ईयरघोषित किए गए । 2012 में इंडिया टुडे द्वारा उन्हें भारत के दस सबसे प्रभावशाली व्यवसायियों में से एक माना गया । और भी कई पुरस्कार एवं सम्मान समय-समय पर उन पर न्यौछावर किए गए ।

अपने आपको विश्व के सबसे बड़े परिवार का संरक्षक बताने वाले सुब्रत रॉय ने कुछ अच्छी परंपराएं भी डालीं जैसे सहारा इंडिया परिवार के सदस्यों द्वारा अतिथियों का स्वागत 'सहारा प्रणाम' करके किया जाना, कार्यस्थल पर महिलाओं की पूर्ण सुरक्षा तथा मालिक-मज़दूर के विवादों से रहित गरिमापूर्ण कार्य-संस्कृति एवं कार्य-वातावरण का विकास, आईपीएल में उनकी पुणे टीम में चीयरलीडर महिलाओं द्वारा गरिमापूर्ण पारंपरिक भारतीय पोशाक पहनकर खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन पर हर्षोल्लास भी पारंपरिक भारतीय नृत्य प्रस्तुत करके ही किया जाना आदि । उन्होंने 2013 में 1,20,000 लोगों को लखनऊ में एक स्थान पर इकट्ठा करके उनसे राष्ट्रगान गवाकर प्रतीकात्मक रूप से अपना राष्ट्र-प्रेम भी दर्शाया । उन पर लिखे गए एक लेख से मैंने यह भी जाना कि सुब्रत रॉय प्रति वर्ष एक सौ एक निर्धन कन्याओं का कन्यादान करते थे तथा उनके विवाह सम्पन्न करवाकर अपनी उन्हें अपनी पुत्रियों की भांति ही विदा करते थे । यदि यह सच है तो निश्चय ही वे एवं उनकी धर्मपत्नी अत्यंत परोपकारी एवं संवेदनशील स्वभाव के हैं ।

लेकिन इतनी सारी ख़ुशनुमा बातों के संगम बने सहारा को तब किसी की बुरी नज़र लग गई जब भारत में पूँजी बाज़ार के नियामक प्राधिकरण का कार्य करने वाले भारतीय प्रतिभूति तथा विनिमय मण्डल यानी कि सेबी ने किसी रोशन लाल की शिकायत को आधार बनाते हुए सहारा समूह की पूंजी एवं उसमें धन की आवक-जावक की जाँच आरंभ कर दी । अपने आपको सहाराश्री कहने और कहलवाने वाले सुब्रत रॉय ने भारतीय नियम-क़ानूनों की परवाह नहीं की और सेबी की जाँच को गंभीरता से नहीं लिया । उन्होंने न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने वाले न्यायिक आदेशों की भी अवहेलना कर डाली (यद्यपि इसके लिए उन्होंने अपनी माता के अस्वस्थ होने का तर्क दिया) । संभवतः सहारा परिवार के प्रमुख का यह अहंकार ही उन्हें ले डूबा । ऐसा कहा जाता है कि अपनी गोष्ठियों तथा कार्यक्रमों में विलंब से आने वालों को सुब्रत रॉय बुरी तरह अपमानित किया करते थे । उनके सनकीपन के भी कई किस्से प्रसिद्ध रहे हैं । लेकिन तथाकथित सहाराश्री यह भूल बैठे कि घमंडी का सर नीचा होकर ही रहता है । ऊंट आपने आपको चाहे कितना ही ऊंचा समझे, जब वह पहाड़ के नीचे आता है तो उसे अपनी असली औक़ात पता चलती है और उसकी समझ में आता है कि वह दुनिया में सबसे ऊंचा नहीं है । सुब्रत रॉय का ऊंट जब भारतीय न्यायपालिका रूपी पहाड़ के नीचे आया तो उन्हें अपनी उन सीमाओं का भान हुआ जिन्हें वे बिसरा बैठे थे । लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।

सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें उठाकर सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया जहाँ वे पिछले दो साल से एड़ियां घिस रहे हैं । न्यायालय ने सहारा समूह को जमाकर्ताओं की 20000 करोड़ रुपये की निवेशित राशि पंद्रह प्रतिशत ब्याज़ सहित उन्हें लौटाने के लिए सेबी के पास जमा करने का निर्देश दिया था जबकि सुब्रत रॉय को ज़मानत पर छोड़ने के लिए 10000 करोड़ रुपये की राशि तय की थी जो कि 5000 करोड़ रुपये नकद तथा 5000 करोड़ रुपये बैंक गारंटी के रूप में देनी थी । संसार के न्यायिक इतिहास में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण उपलब्ध नहीं है जिसमें ज़मानत की राशि इतनी विशाल तय की गई हो । सहारा समूह के पास सेबी को देने के लिए 23000 करोड़ रुपये तो दूर अपने सर्वेसर्वा सुब्रत रॉय को कारागृह से मुक्त करवाने के लिए 10000 करोड़ रुपये भी नहीं हैं । सहारा का कहना है कि 95 प्रतिशत निवेशकों को उनकी जमा राशियां पहले ही लौटाई जा चुकी हैं । तो फिर सेबी कौनसी जमाओं का धन माँग रहा है ? सुब्रत रॉय ने अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को भारतीय कंपनी अधिनियम के अंतर्गत आने से भरसक बचाए रखा था ताकि वे सेबी की जाँच-पड़ताल के क्षेत्र से बाहर रहें  लेकिन अंततः वे सेबी के चक्रव्यूह में फंसकर ही रहे । उनकी संदिग्ध गतिविधियां मुख्यतः दो कंपनियों के माध्यम से वैकल्पिक परिवर्तनीय बॉण्ड निर्गमित करके धन उगाहने से जुड़ी रही हैं । उनके बहुत-से निवेशक फ़र्जी बताए जाते हैं जिनके अस्तित्व को सत्यापित कर पाना संभव ही नहीं है । ऐसा कहा जाता है कि सहारा की पूँजी वस्तुतः जनता की जमाएं नहीं बल्कि उससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े लोगों का काला धन है । यदि ऐसा है तो सहारा को हज़ारों करोड़ रुपये अपनी ज़ेब से निकालकर देने होंगे जिसका नतीज़ा यह निकलेगा कि यह समूह दिवालिया हो जाएगा । जनसामान्य ने सुब्रत रॉय को शानोशौकत की ज़िन्दगी से निकलकर तिहाड़ जेल की कालकोठरी में जाते हुए तो देखा है लेकिन परदे के पीछे छुपा रहस्य क्या है, यह तो सुब्रत रॉय और उनके करीबी ही बेहतर जानते हैं ।

इस सारे प्रकरण का सूक्ष्मता से अध्ययन करने के उपरांत जो बुद्धि में आया है, वह यही है कि सुब्रत रॉय किसी गहन षड्यंत्र का शिकार हुए हैं । अपने आप को रॉबिनहुड और लघु निवेशकों का भगवान समझकर मुगालतों में जीते हुए सुब्रत रॉय यह भूल बैठे कि व्यवसाय जगत में आपकी सफलता से ईर्ष्या करने वाले, आपको नीचा दिखाने में रुचि लेने वाले और आपको हानि पहुँचाने हेतु आपके विरुद्ध षड्यंत्र रचने वाले शत्रुओं का कोई अभाव नहीं होता है । आपके घर में अपने भेदी घुसा दिए जाते हैं, झूठे-सच्चे आधारों पर आपके विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए सरकारी तंत्र को ख़रीद लिया जाता है और जनता में आपकी छवि बिगाड़ने के लिए झूठी-सच्ची अफ़वाहें उड़ाई जाती हैं । जहाँ तक भारतीय न्यायपालिका का प्रश्न है, उसकी निष्पक्षता और तार्किकता केवल एक मिथक है जो जनता में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए उसने स्वयं घड़ा है । वह अपने तथाकथित मान के प्रति इतनी सजग रहती है कि उसे आपका धुर-विरोधी बना देने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि आपको उसकी अवमानना के दोषी के रूप में चित्रित कर दिया जाए । सुब्रत रॉय के साथ यही हुआ लगता है और ज़मानत की राशि असाधारण रूप से इतनी अधिक संभवतः इसीलिए है ताकि सुब्रत रॉय को सींखचों के पीछे ही रखा जाए और उनके बाहर आने को कठिन-से-कठिनतर बना दिया जाए । अगर सुब्रत रॉय ने अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के संचालन में भारतीय विधि-विधान तथा विभिन्न राजकीय विनियमों का उल्लंघन किया है तो क्या ऐसा करने वाले वे अकेले व्यवसायी हैं ? क्या करोड़ों-अरबों में खेलने वाले बाकी सभी भारतीय व्यवसायी दूध के धुले हैं ? लेकिन सेबी और सर्वोच्च न्यायालय की गाज़ केवल सुब्रत रॉय पर ही इस तरह गिरी है मानो व्यापार और कॉर्पोरेट जगत के सभी घोटाले सहारा ने ही किए हैं और किसी ने नहीं । सुब्रत रॉय को जीवन भर के लिए कारागृह में सड़ा देने से सहारा के निवेशकों और आम जनता का हित-साधन कैसे हो सकता है, क्या न्याय के रक्षक इसे स्पष्ट करेंगे ?

जब किसी का नुकसान होता है तो उस नुकसान से किसी दूसरे का फ़ायदा होता ही है । सहारा की बरबादी से भी किसी को तो फ़ायदा होगा ही । किसे होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है । लेकिन सुब्रत रॉय के शत्रुओं की रणनीति स्पष्ट है - उन्हें जीवनपर्यंत कारागृह से बाहर न आने दिया जाए । सहारा-प्रमुख को अपनी ज़मानत हेतु धन के प्रबंध के लिए अपनी परिसंपत्तियां बेचने हेतु अस्थायी रूप से भी बाहर नहीं आने दिया जा रहा है । कुछ समय के लिए उन्हें कारावास में रहते हुए ही अपनी परिसंपत्तियों के विक्रय हेतु कुछ कार्यालयीन सुविधाएं अवश्य प्रदान की गई थीं लेकिन वह सब भी न्यायालय की दयालुता का ढकोसला ही था और कुछ नहीं क्योंकि हज़ारों करोड़ के सौदे इस तरह हो ही नहीं सकते । उनके लिए तो सहारा-प्रमुख जैसे दक्ष व्यवसायी का दूसरे पक्ष के लोगों से व्यक्तिगत रूप से भेंट करके विचार-विमर्श करना अपरिहार्य होता है । वैसे भी सहारा-प्रमुख की बदहाली का सारी दुनिया में ढोल पिट चुकने के बाद अब सहारा समूह की जायदाद बिकेगी भी तो औने-पौने में ही बिक सकेगी और उस बिक्री में सहारा समूह को निस्संदेह भारी घाटा उठाना पड़ेगा ।

अब सूरत-ए-हाल यह है कि ढेरों मुसीबतज़दा लोगों के बुरे वक़्त में उनका सहारा बनने वाले सहारा का उसके बुरे वक़्त में सहारा बनने वाला कोई नहीं है और कुछ अरसा पहले तक सहाराश्री बनकर ऐंठने वाले सुब्रत रॉय का साथ वे सब लोग छोड़ चुके हैं जो कि केवल अपने मतलब के लिए उनसे चिपकते थे । मतलबी यार किसके, खाया-पिया खिसके । चुनावी राजनीति के लिए व्यापार-जगत के माध्यम से पैसों का जुगाड़ करने वाले और बहुत-से लोगों के बड़े भाई और छोटे भाई बन बैठने वाले अमर सिंह और उनके पुराने आका यानी कि घाघ राजनीतिज्ञ मुलायम सिंह यादव तक सुब्रत रॉय से कन्नी काट चुके हैं । तथाकथित सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के आर्थिक संकट के समय जब सुब्रत रॉय ने उनकी मदद की थी तो अमिताभ बच्चन ने यहाँ तक कह दिया था कि अगर सहाराश्री के घर में मुझे झाड़ू-पोंछा लगाना पड़े तो वह भी मैं करूंगा क्योंकि मैं जानता हूं कि उन्होंने मेरे लिए क्या किया । अब वही अवसरवादी अमिताभ बच्चन जो राजनीति छोड़ चुके हैं लेकिन सदा पॉलिटिकली करेक्ट रहते हैं और उनकी तिकड़मी बहू ऐश्वर्य राय, दोनों ही केवल सुख के साथियों की भांति दुख के समय सुब्रत रॉय से मुँह मोड़ चुके हैं । सुब्रत रॉय के अच्छे वक़्त में उनके नाम की माला जपने वाले और अब उनको पीठ दिखाकर भाग जाने वाले ऐसे और भी बहुत-से लोग हैं । किसी समय टोनी ब्लेयर तक के निकट जा पहुँचने वाले सुब्रत रॉय आज अकेले और बेयारोमददगार हैं ।

मुझे स्वर्गीय गुरुदत्त की कालजयी फ़िल्म 'काग़ज़ के फूल' बहुत पसंद है जिसका गीत 'देखी ज़माने की यारी, बिछुड़े सभी बारी-बारी' न केवल जीवन की सच्चाई का वर्णन करता है बल्कि वह सुब्रत रॉय की वर्तमान अवस्था पर भी शब्दशः लागू है । सफलता और असफलता के बीच के इस अंतर को सुब्रत रॉय अब भलीभांति समझ गए होंगे । मैं नहीं जानता कि सुब्रत रॉय जीते जी कारागार से बाहर आ सकेंगे या नहीं लेकिन आशा है कि अब उनके भीतर अपनी शक्ति का ही नहीं वरन अपने कथित पुण्यों और सद्गुणों का भी अहंकार समाप्त हो चुका होगा । अब वे समझ गए होंगे कि वक़्त से बड़ा कोई नहीं । वक़्त जब अपनी पर आता है तो इंसान की हेकड़ी को एक झटके में चूर-चूर कर देता है । साहिर लुधियानवी साहब का लिखा यह नग़मा हर दौर में मौजूं है - 'वक़्त से दिन और रात, वक़्त से कल और आज, वक़्त की हर शै ग़ुलाम, वक़्त का हर शै पे राज' । इसी नग़मे की यह सतर जो आज सुब्रत रॉय पर लागू है, कल किसी और पर भी हो सकती है - 'आदमी को चाहिए, वक़्त से डरकर रहे; कौन जाने किस घड़ी वक़्त का बदले मिज़ाज'


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Monday, February 15, 2016

प्रणब दा की यादें या अपनी सियासी ग़लतियों की लीपापोती ?

प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक 'मेमोअर्स' (संस्मरण) को कई खंडों में लिखा है जिसकी विषय-वस्तु को वे अपने राजनीतिक जीवन की स्मृतियां बता रहे हैं । अब भारतीय गणतन्त्र का प्रमुख कोई पुस्तक लिखेगा तो उसमें उद्धृत प्रत्येक बात को वेदवाक्य ही समझा जाएगा । स्वाभाविक है कि ऐसी पुस्तक हाथोंहाथ ली जाएगी, ख़ूब बिकेगी, ख़ूब पढ़ी जाएगी, ख़ूब चर्चित होगी और महामहिम की ख़ूब वाहवाही होगी । लेकिन अपनी स्मृतियों के नाम से ऐसी पुस्तकें लिखते समय भारतीय राजनेता (और नौकरशाह भी) यह विस्मृत कर जाते हैं कि जनता-जनार्दन की स्मृति इतनी दुर्बल भी नहीं होती जितनी कि वे समझ लेते हैं । वे यह भूल जाते हैं कि झूठ के पाँव नहीं होते और उसका पकड़ा जाना सुनिश्चित होता है विशेष रूप से तब जब उसका साक्षात्कार किसी ऐसे व्यक्ति से हो जिसने भारतीय राजनीति के किसी कालखंड के विभिन्न उतार-चढ़ावों को निकटता से देखा हो । प्रणब दा यदि यह समझते हैं कि अपने कथित संस्मरणों में उन्होंने असत्य की जो चतुराईपूर्ण मिलावट की है, वह पकड़ी नहीं जाएगी तो यह उनका भ्रम ही है ।
प्रणब मुखर्जी ने अपनी तथाकथित स्मृतियों में जो दावा किया है कि उनकी महत्वाकांक्षा कभी भारत का प्रधानमंत्री बनने की नहीं थी, उससे बड़ा असत्य और कुछ नहीं । दादा धरती और जनसामान्य से जुड़े हुए नेता चाहे कभी नहीं रहे लेकिन अपनी प्रशासनिक दक्षता, कार्यकुशलता और मृदु व्यवहार के चलते वे शीघ्र ही श्रीमती इन्दिरा गांधी के विश्वासपात्र बन बैठे थे जिससे अल्पायु में ही न केवल उनको वित्त और रक्षा जैसे अतिमहत्वपूर्ण मंत्रालयों के प्रमुख बनने का अवसर मिल गया था  बल्कि संजय गांधी के असामयिक देहावसान के उपरांत उनका राजनीतिक कद इतनी शीघ्रता से बढ़ा था कि वे केंद्रीय मंत्रिपरिषद में दूसरे नंबर पर समझे जाने लगे थे । इस आनन-फानन तरक्की ने ही दादा की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पर लगा दिए और ३१ अक्तूबर, १९८४ को इन्दिरा जी के स्तब्धकारी निधन के साथ ही उन्हें प्रधानमंत्री का पद अपनी ओर आता दिखाई देने लगा । अपनी इस अधीरता में दादा भूल बैठे कि चाय की प्याली और पीने वाले के होठों के मध्य का अंतर लगता छोटा है लेकिन होता बहुत बड़ा है ।

तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष ज्ञानी ज़ैलसिंह ने दिवंगत इन्दिरा जी के लिए अपनी निष्ठा को सर्वोपरि रखते हुए उनके पुत्र राजीव गांधी को उसी दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी । दादा को बुरा तो बहुत लगा लेकिन चूंकि अनुभवहीन और शोकमग्न राजीव गांधी ने इन्दिरा जी की मंत्रिपरिषद को ज्यों-का-त्यों रखा, अतः दादा वित्त मंत्री के पद पर बने रहे । शायद इसीलिए उस समय उन्होंने अपना विरोध दबे-छुपे रूप में ही ज़ाहिर किया और आम चुनावों के होने की प्रतीक्षा करने लगे जिनकी घोषणा बहुत जल्दी कर दी गई थी । अगर चुनावों में कांग्रेस दल को मामूली बहुमत ही मिलता तो दादा की गोट शायद चल जाती लेकिन इन्दिरा जी के निधन से उमड़ी सहानुभूति लहर पर सवार होकर कांग्रेस दल ने चार सौ से अधिक सीटें जीतकर ऐतिहासिक रूप से प्रचंड बहुमत प्राप्त कर लिया तो सरकार और दल में राजीव गांधी का नेतृत्व निर्विवाद हो गया । यहीं दादा ने वह भूल कर डाली जो उन्हें नहीं करनी चाहिए थी ।

उन्होंने राजीव गांधी के कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुने जाने और तदनुरूप प्रधानमंत्री बनने में अड़चन डालने की कोशिश की और इस तरह उनकी महत्वाकांक्षा जो छुपी ही रहती तो बेहतर होता, राजीव गांधी और उनके समर्थकों पर अच्छी तरह उजागर हो गई । दादा यह भूल गए कि कांग्रेसी उसी नेता का नेतृत्व स्वीकार करते हैं जिस पर उन्हें चुनाव जिता सकने का विश्वास हो । दादा का हाल तो यह था कि वे किसी और को तो क्या जिताते, स्वयं अपना चुनाव जीतने की कूव्वत नहीं रखते थे । इसीलिए वे सदा राज्य सभा के माध्यम से संसद में पहुँचते थे । ऐसे में तीन चौथाई बहुमत के साथ कांग्रेस को लोक सभा चुनाव जिताकर लाने  वाले और इन्दिरा जी के पुत्र का दर्ज़ा रखने वाले राजीव गांधी के सामने उनकी कौन सुनता ? उनका विरोध नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ ही साबित हुआ लेकिन इस विरोध ने उन पर राजीव विरोधी होने की मोहर लगा दी जो उनके लिए घातक साबित हुई ।

राजीव गांधी पहले से ही बंगाल से आने वाले और एक दूसरे के कट्टर विरोधी दो दिग्गज नेताओं - प्रणब मुखर्जी और ए.बी.ए. गनी खां चौधरी को पसंद नहीं करते थे । अतः चुनाव के उपरांत नई सरकार का गठन करते समय उन्होंने इन दोनों को ही मंत्रिमंडल से निकाल बाहर किया । प्रणब दा की तुलना में गनी खां चौधरी की स्थिति बेहतर रही क्योंकि न केवल वे एक धरातल से जुड़े हुए नेता थे, बल्कि वे प्रणब दा से अधिक परिपक्व भी सिद्ध हुए और चुप्पी साधकर अपने समय के परिवर्तित होने की प्रतीक्षा करने लगे जो अपनी अधीरता में दादा नहीं कर सके । वैसे भी इस चुनाव में मार्क्सवादियों के गढ़ बन चुके बंगाल में भावी राजनीतिक परिवर्तन का एक छोटा-सा अंकुर फूट चुका था जो समय आने पर एक ऊंचा और शक्तिशाली वृक्ष बना । वह अंकुर था एक विद्रोही तेवरों वाली उनतीस वर्षीया युवती ममता बनर्जी जिसने सोमनाथ चटर्जी जैसे मार्क्सवादी दिग्गज को पटखनी देकर अपने राजनीतिक करियर का वैभवशाली आरंभ किया था और इस तरह पूत के पाँव पालने में ही दिखा दिए थे । लेकिन अपनी निजी महत्वाकांक्षा के आगे कुछ भी देख पाने में असमर्थ दादा परिवर्तन की बयारों को पहचान नहीं सके । गनी खां चौधरी तो कुछ समय बाद राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में आ भी गए लेकिन प्रणब मुखर्जी ने सावधानी बरतना तो दूर, राजीव गांधी का सीधे-सीधे विरोध करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली । अपनी तथाकथित यादों में वे यह सरासर झूठ कहते हैं कि राजीव गांधी ने उन्हें ग़लत समझा । सच तो यही है कि उनके मुखर राजीव विरोध के चलते उस समय उन्हें कोई भी ग़लत नहीं समझ रहा था । शायद वे ख़ुद ही अपने आप को ठीक से नहीं समझ पा रहे थे । उनकी तब की कारगुज़ारियों का कच्चा चिट्ठा आर.के. करंजिया ने 'ब्लिट्ज़' समाचार-पत्र में छापा था और बाद में लोकप्रिय राजनीतिक पत्रिका 'माया' ने भी इस बाबत बहुत कुछ जनता के सामने रखा था ।

जब प्रणब मुखर्जी का खुला विरोध राजीव गांधी के लिए असहनीय हो गया तो मई १९८६ में उन्होंने अपनी ताक़त दिखाते हुए एक झटके से दादा को पार्टी से निष्कासित कर दिया । अपनी तथाकथित स्मृतियों में न जाने किसे मूर्ख समझते हुए दादा फ़रमा रहे हैं कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी जबकि सच्चाई यह है कि उन्हें अपमानित करके निकाल बाहर किया गया था । उनके निष्कासन के साथ ही अन्य राजीव विरोधियों के लिए चेतावनी स्वरूप तीन अन्य वरिष्ठ नेताओं की सदस्यता भी निलंबित कर दी गई थी । ये नेता थे - श्रीपति मिश्र (उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री), अनंत प्रसाद शर्मा और प्रकाश मेहरोत्रा । कुछ समय पहले ही गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री आर. गुंडूराव की भी इसी तरह पार्टी से छुट्टी कर दी गई थे लेकिन मुखर्जी न जाने कैसे स्वयं को निरापद माने हुए थे और अपने वक्तव्यों से राजीव गांधी को कड़ी कार्रवाई के लिए उकसा रहे थे । श्रीपति मिश्र और अनंत प्रसाद शर्मा ने माफ़ीनामा देकर कुछ वक़्त बीतने के बाद अपने निलंबन रद्द करवा लिए । लेकिन प्रणब दा ख़याली पुलाव पकाते हुए अपने आपको धोखा देने में लगे रहे । उन्हें यह भी नज़र नहीं आया कि उनके निष्कासन से पार्टी की चाय के प्याले में कोई तूफ़ान नहीं आया था और सब कुछ वैसे ही चलता रहा था, जैसे कुछ भी न हुआ हो ।

अपनी ज़मीनी हक़ीक़त से बेख़बर प्रणब मुखर्जी ने शीघ्र ही 'राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस' नामक एक तथाकथित राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल की घोषणा कर दी जिसके अध्यक्ष वे स्वयं बन बैठे, उपाध्यक्ष गूंडूराव को बना दिया और कुछ अन्य पिटे-पिटाए भूतपूर्व कांग्रेसियों को लेकर उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी भी बना डाली । कार्यकारिणी की पहली बैठक में उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी को सौ सांसदों का समर्थन प्राप्त था लेकिन उस खोखले दावे की सच्चाई किसी से भी छुपी नहीं थी । बहुत जल्द ही दादा अर्श से फ़र्श पर आ गए जब उनकी आँखें खुलीं और उन्हें दिखाई दिया कि कांग्रेस पार्टी से बाहर उनकी सियासी हस्ती सिफ़र थी । उनके हवाई राजनीतिक दल के पास न कोई कार्यक्रम था, न जनाधार और न उसे चलाने के लिए आवश्यक संसाधन । तब तक की अपनी ज़िंदगी में एक भी लोक सभा या विधान सभा चुनाव न जीतने वाले दादा को अब आटे-दाल का भाव पता चल गया और उन्हें सूझ गया कि राजनीतिक दल को बनाना और चलाना कोई बाएं हाथ का खेल नहीं है । अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल देर से ही सही, उनकी समझ में आई और उन्होंने आईना देखकर अपनी असलियत को पहचाना ।

अब थूककर चाटने की नौबत आ गई क्योंकि राजनीति करनी थी और अपना अस्तित्व बचाकर रखना था तो वापस कांग्रेस में घुसने के अलावा कोई चारा नहीं था । अपने कागज़ी राजनीतिक दल को औपचारिक रूप से भंग करने की घोषणा करके दादा आख़िर जैसे-तैसे (संभवतः कांग्रेस आलाकमान उर्फ़ राजीव गांधी से अनुनय-विनय करके) 'लौट के बुद्धू घर को आए' के अंदाज़ में कांग्रेस में वापस आ ही गए । जब दादा को निकाला गया था, तब कांग्रेस दल और केंद्रीय सरकार दोनों में ही माखनलाल फ़ोतेदार, कैप्टन सतीश शर्मा, अरुण सिंह, अरुण नेहरू, बघेल ठाकुर यानी अर्जुन सिंह और राजा मांडा यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसों का बोलबाला था लेकिन उनके लौटने तक दिल्ली की यमुना में बहुत पानी बह चुका था । विश्वनाथ प्रताप सिंह और अरुण नेहरू जैसे लोग बाहर हो चुके थे और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी सरकार बदनाम हो रही थी । लेकिन दादा कांग्रेस दल में वापस ही आ सके, उन्हें सरकार या संगठन में कोई स्थान नहीं दिया गया क्योंकि राजीव गांधी अब सरलता से उन पर विश्वास नहीं कर सकते थे । आने वाले वक़्त में दादा को बहुत जल्दी पता चल गया कि उनकी अधीरता उन्हें कितनी महंगी पड़ी थी जब १९९१ में लोक सभा चुनाव के दौरान ही राजीव गांधी का आकस्मिक निधन हो गया और कांग्रेस पार्टी के चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री की ख़ाली कुर्सी के कई दावेदार सामने आ गए । इस कुर्सी के तगड़े दावेदार नारायण दत्त तिवारी को करारा झटका अपनी लोक सभा सीट हारने से लग गया था और ऐसे में दादा का नंबर लग सकता था अगरचे उन्होंने कुछ साल धैर्य रखा होता । लेकिन चूंकि उनका पार्टी विरोधी इतिहास अधिक पुराना नहीं था, इसीलिए वे उस सुनहरे मौके को चूक गए और राजनीति से लगभग संन्यास ले चुके पी.वी. नरसिंह राव के भाग्य से जैसे छींका टूटा ।

लेकिन अब प्रणब दा ने ज़िंदगी का वो बेशकीमती सबक मानो रट-रटकर अपने ज़हन में बैठाया जिसे वे गुज़रे हुए कल में बिसरा बैठे थे । आलोक श्रीवास्तव जी की एक ग़ज़ल के बोल हैं - 'ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है, न जाने सब्र का धागा कहाँ पर टूट जाता है' । प्रणब मुखर्जी ने अतीत में अपने सब्र के धागे के टूट जाने से बहुत कुछ खो दिया था लेकिन अब उन्होंने अपने सब्र के धागे को टूटने नहीं दिया । जो भी ज़िम्मेदारी मिली, उसे उन्होंने पूरी ईमानदारी और ख़ामोशी से बिना कुछ पाने की आस किए निभाया और जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझकर राज़ी रहे । वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष बने और फिर मंत्री । नरसिंह राव के विरोध में होने वाली किसी भी गतिविधि का वे अंग नहीं बने और दल के नेतृत्व के प्रति अपनी अटूट निष्ठा का सतत प्रदर्शन करते रहे । १९९६ में लोक सभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पार्टी आठ साल तक सत्ता से बाहर रही जो दादा के लिए भी फिर से राजनीतिक बनवास ही था । लेकिन जब कांग्रेस दल को २००४ में पुनः सरकार बनाने का अवसर मिला और सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकराने का निश्चय किया तो उन्होंने दादा के अतीत को ध्यान में रखते हुए उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त नहीं माना । पुराने पाप सरलता से पीछा नहीं छोड़ते ।

इस तरह प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब मुखर्जी की बस एक बार फिर छूट गई और समय का फेर देखिए कि उन्हें उन्हीं मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में मंत्री बनकर रहना पड़ा जिन्हें उन्होने ही १९८२ में भारतीय रिज़र्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया था और जिनके कि वे भारत के वित्त मंत्री के रूप में बॉस हुआ करते थे । यानी बॉस अब मातहत बन गया था और मातहत बॉस । प्रणब मुखर्जी ने यह कड़वा घूंट भी ख़ामोशी से पिया क्योंकि अब वे धैर्य धारण करना सीख चुके थे । वैसे अपने जीवन में पहले कभी नगरपालिका तक का चुनाव न जीतने वाले दादा के लिए २००४ में लोक सभा का चुनाव जीतना ही एक बहुत बड़ी सांत्वना थी ।

बहरहाल दादा पूरी निष्ठा, लगन और सबसे बढ़कर धैर्य के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करते रहे और अंततः उनका धैर्य रंग लाया जब वे भारत के राष्ट्राध्यक्ष पद के लिए चुन लिए गए और इस तरह एक बार पुनः वे प्रोटोकॉल में मनमोहन सिंह से आगे निकल गए । प्रधानमंत्री का शक्तिशाली पद तो उनके भाग्य में नहीं था लेकिन वे राष्ट्र के प्रथम नागरिक, संवैधानिक प्रमुख और सर्वोच्च सेनापति तो बने । उनकी यह उपलब्धि प्रधानमंत्री बनने की उपलब्धि से किसी भी तरह कम नहीं आँकी जा सकती लेकिन इसके लिए उन्हें दो दशक से भी अधिक दीर्घावधि तक धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा करनी पड़ी । मैं तो  राष्ट्राध्यक्ष बनने से भी बड़ी उनकी उपलब्धि उनके द्वारा इस गुण को अपने भीतर विकसित कर लिए जाने को ही मानता हूँ । गोस्वामी तुलसीदास तो सैकड़ों वर्ष पूर्व ही रामचरितमानस में कह गए हैं - 'धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपद काल परखिअहिं चारी' । ज्ञातव्य है कि तुलसीदास जी ने जिन चार बातों को विपत्ति के समय परखने के लिए कहा है, उन चारों में सर्वप्रथम स्थान धीरज का ही आता है । अतः धीरज ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है जिसे किसी भी स्थिति में साथ नहीं छोड़ने देना चाहिए । प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक यात्रा रूपी कथा से यही सीख मिलती है ।

अब अपनी किताब में यादों के बहाने प्रणब मुखर्जी अपनी सियासी ग़लतियों की लीपापोती कर रहे हैं तो इससे यही सिद्ध होता है कि अपनी भूलों को सार्वजनिक रूप से स्वीकारना सहज नहीं है । अपने गरेबान में झाँकने से हर किसी को परहेज होता है फिर चाहे वह कोई भी हो । आज राष्ट्र प्रमुख के रूप में लिखी गई उनकी किताब निश्चय ही बेस्टसेलर हो जाएगी जिसे कि पंद्रह साल पहले आने पर शायद कोई हाथ भी नहीं लगाता । राष्ट्र के प्रथम नागरिक द्वारा कही गई किसी भी बात पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाकर विवाद उत्पन्न करने का जोखिम भी फ़िलहाल कोई नहीं लेगा । लेकिन इतना दीर्घ और विविधतापूर्ण अनुभव मिल जाने के उपरांत अपने (राजनीतिक और वास्तविक) जीवन की साँझ में प्रणब दा को इतना तो समझ ही लेना चाहिए कि सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से और खुशबू आ नहीं सकती कभी काग़ज़ के फूलों से ।


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