Monday, January 25, 2016

आँखों वाला न्याय चाहिए, अंधा प्रतिशोध नहीं



दिसंबर 2012 में सम्पूर्ण राष्ट्र की चेतना को झकझोर देने वाले निर्भया कांड के एक अभियुक्त को अपनी आयु के आधार पर विधि-व्यवस्था के अंतर्गत अवयस्क की श्रेणी प्राप्त होने के कारण कारागृह से छोड़ क्या दिया गया कि देश में चहुँओर कोहराम मच गया । भावुकता में डूबे निर्भया के माता-पिता को साथ लेकर उन्मादी भीड़ सड़कों पर उतर आई और दंडनीय अपराधों हेतु वयस्कता की वैधानिक आयु घटाने वाला विधेयक तथाकथित लोकतन्त्र के मंदिर अर्थात संसद में बिना किसी विचार-विमर्श के पारित कर दिया गया । तो क्या निर्भया के साथ न्याय हो गया ? या इससे देश में अन्याय की पीड़ा झेलती असंख्य निर्भयाओं को न्याय मिल गया ? या उस एक अभियुक्त का छूट जाना ही ऐसे समस्त अन्यायों का प्रतीक है ? विभिन्न मंचों पर मैंने इस संदर्भ में अनेक विचार पढ़े और यह पाया कि उनमें से अधिकांश और कुछ नहीं वरन भीड़ की उन्मादी मानसिकता के ही उत्पाद थे । लेकिन जो प्रश्न मैंने ऊपर उठाए हैं, वे सर्वत्र अनुत्तरित हैं ।  संभवतः इसलिए कि उनके उत्तरों का आकांक्षी कोई है ही नहीं । निर्भया जैसी पीड़िताएं भी नहीं ।

निर्भया किसी की पुत्री थी । प्रत्येक पीड़िता किसी न किसी की पुत्री होती है । प्रत्येक पुत्री की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि सभी माता-पिता प्रत्येक पीड़िता को अपनी पुत्री की भांति समझें, उसकी व्यथा को अनुभूत करें और किसी भी अन्य पुत्री के पीड़िता बनने की संभावना को रोकने के लिए प्राणपण से प्रयासरत रहें । निर्भया का मामला बहुचर्चित बन गया जिसके शोर में न केवल देश के विभिन्न भागों में आए दिन ऐसी पीड़ा को भोगने के लिए अभिशप्त असंख्य निर्भयाओं की आहें गुम हो गईं वरन अनेक ऐसे ज्वलंत प्रश्न भी अनदेखे कर दिए गए जिनके उत्तर उतने ही प्रासंगिक हैं जितनी कि निर्भया की पीड़ा । निर्भया के साथ दुराचार के अवयस्क आरोपी को जीवन भर के लिए कारागृह में बंद कर देने या मृत्युदंड दे देने से उन सहस्रों पीड़िताओं को न्याय नहीं मिल सकता जिनकी पीड़ा को सुनने, देखने और अनुभूत करने वाला कोई नहीं ।

क्या अपने बहुमूल्य जीवन का अधिकांश भाग मरणासन्न अवस्था (कोमा) में रहकर बिताने वाली अरुणा शानबाग की पीड़ा (जिसका अपराधी सस्ते में इसलिए छूट गया क्योंकि उस पर वास्तविक अपराध के आरोप लगाए ही नहीं गए और हलके आरोपों को लगाकर हलकी सज़ा सुना दी गई) या हरियाणा में डीजीपी कार्यालय के सामने अपनी जान दे देने वाली सरिता की पीड़ा (जिसके अपराधी पुलिस वाले ही थे) किसी भी रूप में निर्भया की पीड़ा से कम थी ? उन्हें तो मरने के बाद भी न्याय नहीं मिला । बिहार के जसीडीह थाना-क्षेत्र के पड़रिया गाँव की पीड़ा तो तीन दशक से अधिक पुरानी हो चुकी है लेकिन मरहम से वंचित घाव आज भी हरे हैं । पुलिस वालों ने उस  गाँव की बहू-बेटियों को सामूहिक रूप से पाशविकता का शिकार बनाया था और उनके परिवार के पुरुषों पर वहशियाना अत्याचार किए थे । उसका दूरगामी परिणाम यह निकला कि पड़रिया के लड़कों के विवाह-संबंध होने में ही रुकावट आ गई क्योंकि लोगों ने उस गाँव में बेटी देना ही बंद कर दिया । जिस आदिवासी किशोरी मथुरा के दुराचार का मामला सत्तर के दशक में देश भर में चर्चा का विषय बन गया था और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय ने देश भर में संबंधित विधान में सुधार के लिए एक लहर उत्पन्न कर दी थी, उसके अपराधी भी पुलिस वाले ही थे । क्या दुराचारियों को गोली मारने की बात करने वाले दिल्ली पुलिस के बड़बोले महानिदेशक भीम से बस्सी अपने ही विभाग के ऐसे दरिंदों को गोली मारने का नैतिक साहस रखते हैं ? निर्भया कांड के समय दिल्ली पुलिस के महानिदेशक के पद पर चौकड़ी जमाकर बैठे नीरज कुमार ने अपनी दिल्ली में महिलाओं को सुरक्षा देने में विफलता पर परदा डालने के लिए शीघ्र ही क्रिकेट मैच फ़िक्सिंग के नाम पर कुछ बलि के बकरे पकड़ लिए और अब सेवानिवृत्ति के उपरांत वे निर्भया कांड की चर्चा से बहुत दूर रहते हुए भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के सलाहकार बनकर उससे मोटा पारिश्रमिक झटक रहे हैं ।

बाल विवाह के विरुद्ध समाज को जागरूक बनाने में लगी साथिन भंवरी देवी की पीड़ा को क्या निर्भया के नाम पर सुर्खियाँ बटोरने वाले अनुभूत कर पा रहे हैं जिसे अपने सत्कर्म का पुरस्कार अपनी देह के साथ जघन्य दुष्कर्म के रूप में मिला ? पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में पंचायत के आदेश पर सार्वजनिक रूप से सामूहिक दुराचार की शिकार आदिवासी युवती की पीड़ा क्या निर्भया की पीड़ा से हलकी है ?  ऐसे आदेश हमारे देश की विवेकहीन और संवेदनहीन पंचायतें आए दिन देती ही रहती हैं जिनकी भुक्तभोगी बनती हैं निर्दोष बालाएं । निर्भया के बलिदान की आँच पर अपने निहित स्वार्थ की रोटियाँ सेकने और बढ़-चढ़कर बोलने वालों के कानों तक क्या ऐसी अभागियों की सिसकियाँ पहुँच पाती हैं ? क्या हमारे वोटों के भिक्षुक राजनेता ऐसी मध्ययुगीन परपीड़क मानसिकता वाली पंचायतों को समाप्त करना तो दूर उन पर कठोर कार्रवाई करने का विचार भी कर सकते हैं ?

भारतीय दंड विधान और दंड संबंधी अवधारणाओं की विडम्बना यह है कि वे प्रतिशोध की भावना पर आधारित हैं - अपराधी व्यक्ति से समाज का सामूहिक प्रतिशोध । लेकिन प्रतिशोध प्रायः अंधा होता है । देश में एक सदी से हो रहे क़ौमी दंगे इस बा का ठोस सबूत हैं जिनमें दोनों ही तरफ़ के लोग अपनी तरफ़ के बेगुनाह शिकारों का बदला दूसरी तरफ़ के बेगुनाहों से लेते हैं और असली मुजरिम साफ़ बच निकलते हैं । और अत्यंत कटु तथा पीड़ादायी सत्य यह भी है कि ऐसी कार्रवाइयों में दोनों ही पक्षों की पूर्णतया निर्दोष अबलाओं को  निर्भया के साथ हुए अनाचार की ही भांति आततायी पुरुषों के हाथों घृणित अत्याचार झेलने पड़ते हैं । क्या ऐसा अंधा प्रतिशोध एक अन्याय की प्रतिक्रिया में किया गया दूसरा अन्याय नहीं होता है ? एक अन्याय की क्षतिपूर्ति दूसरा अन्याय कैसे कर सकता है ? इसीलिए क़ौमी नफ़रतों की आग कभी बुझती नहीं, और भड़कती ही है । अतः न्याय के मूल में प्रतिशोध नहीं होना चाहिए क्योंकि प्रतिशोध की आँखें या तो होती नहीं या होती भी हैं तो वास्तविकता को देखने के लिए खुलती नहीं ।

भारत में कारागृहों तथा बाल (एवं नारी) सुधार-गृहों की हालत अत्यंत दयनीय है जिनमें अपराधियों का सुधारना असंभव के तुल्य कठिन होता है । उनमें कानून के रक्षकों द्वारा कथित अपराधियों के साथ ऐसे-ऐसे अन्याय एवं घृणित अत्याचार किए जाते हैं कि उनके व्यक्तित्व में अगर थोड़ा-बहुत सत्व का तत्व रह गया हो तो वह भी समाप्त हो जाए । ज़मीं पर दोज़ख का दर्ज़ा रखने वाली ऐसी जगहों में कुर्सियों पर बैठे कानून के रखवाले इन मुजरिमों से भी बड़े मुजरिम होते हैं लेकिन किसी भी सज़ा के मुश्तहक़ नहीं समझे जाते क्योंकि उनके ज़ुल्म-ओ-सितम और ज़रायम की कहानियाँ कभी बाहर ही नहीं आतीं । ऐसी जगहों के बाशिंदे किस्मत से कभी बाहर निकल भी पाते हैं तो तब तक उनमें अच्छाई का नाम-ओ-निशान तक बाकी नहीं रहता और वे पहले नहीं भी रहे हों तो अब समाज के कट्टर दुश्मन बन चुके होते हैं । निर्भया कांड के अवयस्क अपराधी की उस कांड में भूमिका कितनी थी, यह तो स्वर्गीया निर्भया को ही सही-सही मालूम था लेकिन उसके छूट जाने से कोई कयामत नहीं आने वाली । सच तो यह है कि उसके छूट जाने के बाद समाज को उससे कोई खतरा हो न हो, उसे समाज में घूम रही अंधी, अविवेकी, उन्मादी भीड़ से पूरा-पूरा खतरा है । तिहाड़ जेल में निर्भया कांड के सज़ायाफ़्ता मुजरिम राम सिंह ने ख़ुदकुशी कर ली तो क्या निर्भया की रूह को चैन मिल गया, इंसाफ़ हो गया निर्भया का ? राम सिंह को जेल के भीतर ही अप्राकृतिक दुष्कर्म का शिकार बनाया गया था । क्या वह इसलिए न्याय पाने का अधिकारी नहीं क्योंकि वह निर्भया का दोषी था ?

दंड के निमित्त वयस्कता की आयु कम करना देश के विधि-विधान में उपस्थित ऐसी विसंगतियों को बढ़ाने का ही काम करेगा, घटाने का नहीं । हमारे यहाँ पुलिस से अधिक भ्रष्ट और विकृत विभाग कोई नहीं जिनमें उन्हीं अपराधों को करने का वर्दीरूपी अनुज्ञापत्र लिए घूमते लोग भरे पड़े हैं जिन अपराधों की रोकथाम का नैतिक और विधिक दायित्व उन पर डाला गया है । इसीलिए भारतीय जनमानस में पुलिसियों की छवि वर्दी वाले गुंडों सरीखी ही है जिनके लिए प्रत्येक नया कानून अपनी ज़ेबें भरने और अपनी पाशविक प्रवृतियों को तुष्ट करने के लिए बलि के बकरे पकड़ने के साधन से इतर कुछ नहीं होता । किसी किशोर ने जाने-अनजाने या कुसंगति के परिणामस्वरूप एक अपराध कर दिया तो क्या उसे सुधरने का एक भी मौका दिए बिना इन भेड़ियों के हवाले कर दिया जाए ? क्या यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के अनुकूल होगा ? क्या ऐसा करके भावी पीढ़ियों के लिए एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है ? क्या एक निर्भया को तथाकथित न्याय दिलाने के नाम पर बनाए गए  इस कानून के माध्यम से हज़ारों निर्दोष किशोरों के लिए संकट खड़ा नहीं किया गया है ? साधन-सम्पन्न और दबंग परिवारों के किशोरों के लिए तो कानून के हत्थे चढ़ने के बाद भी बच पाने की गुंजाइश रहती है क्योंकि उनके माता-पिता वकीलों की कतार खड़ी कर देते हैं न्यायालयों में लेकिन दुर्बल पृष्ठभूमियों से आने वाले अभागे किशोरों को कौन बचा सकता है पुलिस की हिरासत, जेल और कथित सुधार-गृहों में किए जाने वाले रोंगटे खड़े कर देने वाले भयानक अत्याचारों से जिन्हें करने वाले सरकार के ही कर्मचारी होते हैं जिनके वेतन-भत्तों और सुविधाओं का भार जनता वहन करती है ? हमारी जेलों में हज़ारों विचाराधीन अपराधी दोष-सिद्धि तो दूर, सुनवाई तक के बिना सालों से सड़ रहे हैं । उनकी बेबसी का फ़ायदा उठाने के लिए कानून के नुमाइंदे तो खम ठोककर खड़े हैं लेकिन कानून के पास उनके लिए इंसाफ़ तो दूर दो बूंद आँसू भी नहीं हैं । क्या देश के भावी कर्णधारों पर अत्याचार करने के लिए हमारी हृदयहीन पुलिस को एक और शक्तिशाली अस्त्र नहीं दे दिया गया है ? पुलिस तो जिसे पकड़ ले, वही अपराधी । पकड़ा गया निर्दोष किशोर यदि साधनहीन है तो उसे कौन बचाएगा ?

अपराध दंड की कठोरता से नहीं रुकते, वरन उसकी सुनिश्चितता से रुकते हैं । हमारे दंड-विधान की मूल दुर्बलता यही है कि साधन-सम्पन्न और चतुर अपराधी दंड से बच निकलने में स्वयं को सक्षम पाते हैं और किसी मामले में पीड़ित के साथ न्याय हो भी पाता है तो इतने विलंब से कि वह न्याय अपना अर्थ ही खो चुका होता है । साधन-सम्पन्न वादी अपने वकीलों के माध्यम से मुकदमे को इसीलिए लंबा खिंचवाते हैं ताकि इंसाफ़ हो भी तो बेमानी बनकर हो क्योंकि देर ही अंधेर है । न्याय में विलंब तो न्याय से वंचित करने की सबसे सुगम रीति है । भारतीय व्यवस्थाओं में अन्याय करना सरल इसीलिए होता है क्योंकि अन्याय को तुरंत कार्यान्वित किया जा सकता है जबकि न्याय पाने में पीड़ित का सम्पूर्ण जीवन व्यतीत हो सकता है और उसके उपरांत भी न्याय मिलने का कोई ठोस आश्वासन नहीं होता । न्याय पाने की यह कठिनाई ही अन्यायियों को अन्याय करने की सुविधा प्रदान करती है । अतः शीघ्र, अल्पमूल्य तथा शुद्ध-सच्चा न्याय ही भावी अन्यायों को रोक सकता है, नए विधि-विधान या वर्तमान विधि-विधानों में बिना सोचे-विचारे किए गए तर्कहीन संशोधन नहीं ।

भारतीय संसद ने बाल न्याय (बाल संरक्षण एवं सुरक्षा) अधिनियम में दंड हेतु आयु घटाने वाला संशोधन बिना किसी चर्चा के ही पारित कर दिया, इसमें आश्चर्य क्या ? हमारे निकम्मे एवं अनुत्तरदायी सांसद बिना चर्चा के एकमत होकर या तो अपने वेतन-भत्ते बढ़ाने के विधेयक पारित करते हैं या फिर ऐसे विधेयक जिनके पीछे वोट डालने वाली भीड़ का दबाव हो क्योंकि वे तो देश के नागरिकों को वोट बैंकों के रूप में ही देखते हैं । वो समय तो कभी का जा चुका जब संसद में जवाहरलाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया, मधु लिमये और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रबुद्ध लोग विभिन्न विधेयकों पर गहन अध्ययन करके उनके गुण-दोषों पर सार्थक विचार-विमर्श किया करते थे । अब तो संसद में या तो निरर्थक होहल्ला होता है या फिर विधेयकों का बिना सोचे-विचारे पारण । उन्हें ठीक से पढ़ने का श्रम क्यों किया जाए और उनके विभिन्न पक्षों तथा दूरगामी परिणामों को सूक्ष्मता से समझने के लिए मस्तिष्क पर ज़ोर क्यों डाला जाए जब उद्देश्य केवल सड़कों पर उतरी भीड़ को संतुष्ट करके वापस भेजना हो  ? अपना वक़्ती सरदर्द टलना चाहिए, देश और समाज आगे चलकर भुगते तो भुगते, हमें क्या ?

क्या अपराध के दंड की आयुसीमा को घटाने जैसा महत्वपूर्ण निर्णय किसी एक मामले की बिना पर लिया जाना चाहिए ? यदि ऐसा कोई और मामला फिर हो गया जिसमें किसी अपराधी की आयु इस नई आयुसीमा से भी कम हुई तो क्या इस विधान में पुनः संशोधन करके इस आयु को और भी घटाया जाएगा ? राष्ट्र की न्याय-व्यवस्था प्राकृतिक न्याय के सनातन सिद्धांतों के आधार पर चलनी चाहिए, भीड़ की इच्छाओं के अनुरूप नहीं । हमारे देश में वातावरण उत्तरोत्तर ऐसा होता जाता रहा है कि न्यायालय भी अब भीड़ की इच्छाओं के अनुरूप लोकलुभावन निर्णय देने (और संदर्भहीन किन्तु लोकरुचि को भाने वाली टिप्पणियाँ करने) में ही अधिक रुचि लेने लगे हैं । देश के भविष्य के लिए यह कोई शुभ संकेत नहीं ।

यदि अल्प आयु के बालक अपराध कर रहे हैं तो इसका कारण है उनके चरित्र-निर्माण का अभाव । आजकल बालकों को कमाऊ बनने की सीख सभी देते हैं, चरित्रवान बनने की कोई नहीं देता । अब चरित्र-निर्माण के संस्कार न उन्हें घर से मिल रहे हैं, न शिक्षण-संस्थानों से । नशे के साधन और चरित्र को पतित करने वाली अश्लील सामग्रियां सर्वत्र धड़ल्ले से उपलब्ध हैं । ऐसे में अपराध कैसे रुकेंगे जब बालकों की मानसिकता ही भ्रष्ट हो गई हो ? हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि धन गया तो समझो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो समझो कुछ गया और चरित्र गया तो समझो सब कुछ चला गया । इसलिए मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भारत की विभिन्न समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान बालकों और बालिकाओं का चरित्र-निर्माण ही है । क्या निर्भया के नाम पर होहल्ला मचाकर और बाह्य दबाव बनाकर संसद को उतावली में विधेयक पारित करने पर विवश करने वाले कथित जागरूक नागरिक इस बात को समझते हैं ? क्या वे अपने परिवार के बालकों को अच्छे संस्कार देने में रुचि लेते हैं ताकि वे किसी बाला के निर्भया बनने का कारण न बनें ? निर्भया और उस जैसी हज़ारोंलाखों पीड़िताओं का अभीष्ट वस्तुतः तर्क एवं विवेक सम्मत आँखों वाला न्याय है, न कि अंधा प्रतिशोध जिसकी उपलब्धि शून्य हो ।

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Monday, January 4, 2016

सुरेन्द्र मोहन पाठक का भूला-बिसरा मानस-पुत्र : प्रमोद


भारत के सबसे लोकप्रिय हिन्दी रहस्य कथाकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने बहुत से नायकों और उनकी सीरीज़ का सृजन किया है । उनकी कलम के शैदाई यानी कि हम सुनील, विमल, सुधीर और जीत सिंह की सीरीज़ नियमित रूप से पढ़ते रहते हैं । विवेक आगाशे, विकास गुप्ता और मुकेश माथुर भी अब थ्रिलर के पात्रों की श्रेणी से बाहर से निकलकर हमारे जाने-पहचाने किरदार बन चुके हैं । मुझसे पूछा जाए तो मैं तो सब-इंस्पेक्टर महेश्वरी को भी पाठक साहब का रचा हुआ नायक ही कहूंगा जिसने थ्रिलर श्रेणी के कई उपन्यासों में अपनी ज़ोरदार हाज़िरी लगाई है । लेकिन पाठक साहब के दो सीरीज़ नायक ऐसे भी हैं जिनकी सीरीज़ अरसा पहले बंद हो चुकी हैं । उनमें से एक है जेम्स बॉन्ड जिसके पाठक साहब ने हंगरी में हंगामा से लेकर जान्सी तक कुल दस उपन्यास लिखे हैं और दूसरा है प्रमोद जिसके पाठक साहब ने कुल जमा चार उपन्यास लिखे हैं । प्रमोद का पहला उपन्यास मौत का सफ़र 1966 में छ्पा था जबकि चौथा और आख़िरी उपन्यास एक रात एक लाश 1976 में प्रकाशित हुआ था । इस तरह पाठक साहब द्वारा रचित सीरीज़ के उपन्यासों में सबसे कम उपन्यास प्रमोद सीरीज़ के ही हैं । केवल चार उपन्यासों का यह नायक वर्तमान पीढ़ी के पाठकों के लिए अनजाना-सा ही है ।

प्रमोद का सृजन पाठक साहब ने तब किया था जब वे सुनील सीरीज़ ही लिखते थे और कुछ नहीं लिखते थे । इसलिए प्रमोद के किरदार पर ही सुनील की छाप नहीं बल्कि उसका शहर भी पाठक साहब ने वही रखा है जो कि सुनील का शहर है – यानी कि राजनगर – बैंक स्ट्रीट, मुग़ल बाग़, हर्नबी रोड, मेहता रोड, शंकर रोड, कूपर रोड, मैजेस्टिक सर्कल, जॉर्जटाउन, नेपियन हिल, शेख सराय, नॉर्थ शोर और धोबी नाका क्रीक वाला राजनगर जो कि कोई वास्तविक शहर न होकर पाठक साहब की परिकल्पना ही है । जहाँ सुनील बैंक स्ट्रीट की इमारत नंबर तीन के एक फ्लैट में रहता है, वहीं प्रमोद कमर्शियल स्ट्रीट में मार्शल हाउस नाम की इमारत के एक फ्लैट में रहता है । कत्ल के मामलों में सुनील का पाला इंस्पेक्टर प्रभुदयाल से पड़ता है तो प्रमोद का पाला इंस्पेक्टर आत्माराम से पड़ता है ।  आयु में प्रमोद सुनील से थोड़ा बड़ा है । सुनील की आयु स्थायी रूप से लगभग तीस वर्ष है जबकि प्रमोद की आयु उसके अंतिम उपन्यास के काल में लगभग पैंतीस वर्ष है ।

प्रमोद के पहले तीन उपन्यास जल्दी-जल्दी प्रकाशित हुए थे जबकि उसके तीसरे कारनामे जान की बाज़ी और चौथे – अंतिम – कारनामे  एक रात एक लाश में सात साल का अंतराल रहा । और फिर यह सीरीज़ बंद हो गई ।

प्रमोद सीरीज़ का पहला उपन्यास मौत का सफ़र और तीसरा उपन्यास जान की बाज़ी थ्रिलर कहे जा सकते हैं जबकि क्रम संख्या में दूसरा उपन्यास आधी रात के बाद और चौथा उपन्यास एक रात एक लाश निश्चित रूप से पारंपरिक रहस्यकथाएं या मर्डर मिस्ट्री ही हैं जिनमें प्रमोद क़त्ल या क़त्लों के रहस्य का पर्दाफ़ाश करता है ।

इस सीरीज़ के उपन्यासों को पढ़कर मैं यह नहीं समझ सका कि प्रमोद का कारोबार या शगल क्या है । बहरहाल इतना स्पष्ट है कि प्रमोद को रुपये-पैसे की कोई समस्या नहीं है । वह एक सम्पन्न व्यक्ति है ।

पाठक साहब द्वारा रचित इस विलक्षण सीरीज़ की मुख्य ख़ासियत इसके नायक यानी प्रमोद के दो युवतियों से निकट संबंध और उनके कारण उसका दो बार भारत छोड़कर विदेश चला जाना है । पहली बार प्रमोद सात साल के लिए मुल्कबदर होता है तो दूसरी बार तीन साल के लिए । पहली बार वह चीन चला जाता है तो दूसरी बार अमरीका ।

ये दो युवा लड़कियां जो कि प्रमोद की ज़िंदगी में पैबस्त हैं,  हैं – कविता ओबराय और सुषमा ओबराय । पाठक साहब ने बताया है कि प्रमोद जब केवल पच्चीस साल का था तो अपने दोस्त की बीवी कविता से दिल-ही-दिल में मुहब्बत कर बैठा था । कविता न केवल शादीशुदा थी बल्कि वह प्रमोद से तीन-चार साल बड़ी भी थी । लेकिन जैसा कि जगजीत सिंह साहब के गाए हुए और इंदीवर साहब के लिखे हुए अजर-अमर गीत होठों से छू लो तुम के एक अंतरे के बोल हैं – ना उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन’; प्रमोद के दिल में जाग उठी सच्ची मुहब्बत को न कविता की बड़ी उम्र से कोई सरोकार है और न ही उसकी शादीशुदा हैसियत से । लेकिन चूंकि वह उसके दोस्त की बीवी है, इसलिए कहीं उससे ऐसी कोई नादानी न हो जाए जो कि कविता के लिए समस्या बन जाए, वह हिंदुस्तान छोड़कर चीन चला जाता है । और चीन में ही घटित होता है उसका पहला कारनामा – मौत का सफ़र जो कि मेरी निगाह में इस सीरीज़ का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है । पृष्ठ संख्या में बेहद कम लेकिन बड़े कैनवास पर लिखा गया यह रोमांचक उपन्यास रोलरकोस्टर राइड की तरह जिस्म और दिल में सनसनी दौड़ा देता है ।

चीन में रहकर ही प्रमोद मन को एकाग्र करने की कला (कंसंट्रेशन आर्ट) सीखता है । बरसों के अभ्यास के बाद भी प्रमोद केवल चार सैकंड ही अपने आप को किसी बिन्दु पर स्थिर रख पाता है । पर यह चार सैकंड की एकाग्रता भी उसे किसी भी मामले की तह तक पहुँचने और किसी भी गुत्थी को सुलझाने में बड़ी मदद करती है । वह या तो किसी कागज पर कई दायरों में एक बिन्दु को बनाकर उस पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है या फिर माचिस की तीली जलाकर उसकी लौ पर अपनी मानसिक शक्तियों को स्थिर करता है, लेकिन अधिक-से-अधिक चार सैकंड के ही लिए, उससे अधिक नहीं ।

सात साल चीन में गुज़ार देने के बाद प्रमोद अपने वतन लौटता है और इस सीरीज़ का दूसरा उपन्यास आधी रात के बाद वजूद में आता  है जो कि एक हत्या के रहस्य पर आधारित है । राजनगर लौटने के बाद प्रमोद पाता है कि गुज़श्ता सात सालों में ज़िंदगी कई करवटें बदल चुकी है । उसकी महबूबा कविता अब सुहागिन नहीं रही । उसके दोस्त और अपने शौहर की मौत के बाद अब वह बेवा हो चुकी है । प्रमोद अपनी मुहब्बत का वास्ता देकर कविता से उसकी ज़िंदगी को खुशियों से भर देने की इजाज़त मांगता है मगर कविता उसकी मुहब्बत को तसलीम करने के बावजूद दो वजूहात का हवाला देकर उसकी बन जाने से इनकार करती है – एक तो वह तीस साल से ऊपर की अपनी उम्र और बेवा हो जाने के मद्देनज़र ख़ुद को प्रमोद के काबिल नहीं मानती, दूसरे उसे पता चल जाता है कि उसकी छोटी कुंवारी बहन सुषमा भी प्रमोद पर फ़िदा है । वह प्रमोद से इल्तज़ा करती है कि वो सुषमा से शादी कर ले । लेकिन प्रमोद ने सुषमा को हमेशा अपनी छोटी बहन की निगाह से देखा है और वह कविता की इस बात को मानने के लिए किसी भी हालत में तैयार नहीं हो सकता । फिर वह यह भी महसूस करता है कि सुषमा में अभी बचपना है और वह किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लेती ।

आधी रात के बाद की मर्डर मिस्ट्री में उलझने के साथ ही प्रमोद का साबिक पड़ता है पुलिस इंस्पेक्टर आत्माराम से जो कि उसके राजनगर के हवाई अड्डे पर कदम रखते ही उससे टकरा जाता है । यहाँ सुनील सीरीज़ और प्रमोद सीरीज़ की यह समानता सामने आती है कि जिस तरह सुनील सीरीज़ का इंस्पेक्टर प्रभुदयाल एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और कार्यकुशल पुलिस अधिकारी है, उसी तरह प्रमोद सीरीज़ का इंस्पेक्टर आत्माराम भी है । जिस तरह सुनील और प्रभुदयाल एक दूसरे के बरखिलाफ़ रहने के बावजूद एक दूसरे की खूबियों को महसूस करते हैं, उसी तरह प्रमोद और आत्माराम भी एक दूसरे की लाइन काटने और आपस में शह-मात का शतरंजी खेल खेलने के बावजूद एक दूसरे की खूबियों की इज़्ज़त ही करते हैं । जहाँ इंस्पेक्टर प्रभुदयाल का तकिया कलाम है – मुझे मेरा धंधा सिखाने की कोशिश मत करो’, वहीं इंस्पेक्टर आत्माराम का तकिया कलाम है – आपसे मिलने की बात उठते ही मेरे मन में जो पहला ख़याल आता है वो यह है कि एक पुलिस अधिकारी की ड्यूटी भी कितनी अप्रिय होती है, उसे कैसे-कैसे अप्रिय काम करने पड़ते हैं . . .

इसी उपन्यास में हमारा परिचय होता है दो और दिलचस्प किरदारों से । ये दो दिलचस्प किरदार हैं – एक चीनी वृद्ध चू की और उसकी नौजवान बेटी सो हा । ये लोग चायना टाउन में रहते हैं जो कि उसी तरह राजनगर में स्थित एक चीनियों की बस्ती है जिस तरह जार्जटाउन ईसाइयों की बस्ती है । चायना टाउन का हवाला सुनील सीरीज़ के उपन्यासों में कभी नहीं आता मगर प्रमोद सीरीज़ के तो दो स्टॉक कैरेक्टर यानी कि चू की और सो हा चायना टाउन में ही रहते हैं तो ऐसे में स्वाभाविक रूप से हम चायना टाउन का भी परिचय प्राप्त करते हैं । चायना टाउन से अपरिचित लोग केवल उसके प्रवेश द्वार तक ही पहुँच सकते हैं क्योंकि एक बार भीतर घुस जाने के बाद वह आगंतुकों के लिए किसी भूल-भुलैया से कम साबित नहीं होता । जहाँ चू की प्रमोद को बेहद पसंद करता है और सदा उसकी मदद करने के लिए तैयार रहता है, वहीं सो हा दिल-ही-दिल-में प्रमोद को चाहती है और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने को आमादा हो जाती है हालांकि उसे मालूम है कि प्रमोद कविता ओबराय से मुहब्बत करता है ।

चीन से अपने वतन लौटने पर प्रमोद के साथ उसका चीनी नौकर भी आता है जो इस सीरीज़ का स्टॉक कैरेक्टर है । इस नौकर का नाम है – याट टो । याट टो एक अत्यंत स्वामिभक्त सेवक है जो अपने मालिक के लिए कुछ भी करने को तत्पर रहता है । चूंकि कविता ओबराय एक चित्रकार है और अपनी चित्रकला के लिए ही बेहतर जानी जाती है, याट टो और प्रमोद की बातचीत में उसका ज़िक्र पेंटर महिला कहकर किया जाता है । वैसे कविता की छोटी बहन सुषमा भी एक चित्रकार ही है लेकिन उसकी चित्रकला अभी शुरुआती दौर में है ।

कविता के उससे शादी करने से इनकार कर देने से प्रमोद का दिल टूट जाता है । चूंकि वह उसकी यह ज़िद तो कुबूल कर नहीं सकता कि वह सुषमा से शादी कर ले, इसलिए आधी रात के बाद वाले केस के बाद प्रमोद एक बार फिर मुल्कबदर हो जाता है । इस बार वह याट टो को साथ लेकर अमरीका चला जाता है जहाँ उसकी ज़िंदगी में वो बातें घटित होती हैं जो इस सीरीज़ के तीसरे उपन्यास जान की बाज़ी की शक्ल अख़्तियार करती है । पाठक साहब बताते हैं कि आगे चलकर भारत लौटने से पहले प्रमोद अमरीका में तीन साल व्यतीत करता है ।

ओबराय बहनों का छोटा भाई युगल ओबराय अमरीका में रहता है । वह वहाँ इसलिए रहता है क्योंकि वह हिंदुस्तान की धीमी ज़िंदगी की जगह अमरीका की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी को पसंद करता है । वह प्रमोद को अपने पारिवारिक मित्र के रूप में जानता है । प्रमोद उसी राज्य और उसी शहर में रहता है जिसमें कि युगल रहता है । कविता प्रमोद को एक ख़त लिखकर उससे गुज़ारिश करती है कि वह युगल का  ख़याल रखे जो कि नादान है, नातजुर्बेकार है ।

अपनी नादानी की वजह से ही युगल अपनी अमरीकी प्रेमिका के अपहरण और क़त्ल के मामले में फँस जाता है । ऐसे में वह प्रमोद से मदद मांगता है । यहाँ पाठक साहब की यह विचारधारा एक बार फिर सामने आती है कि वे स्वामिभक्ति को बहुत बड़ा गुण मानते हैं । प्रमोद जब अपनी महबूबा के भाई को बचाने के लिए क़त्ल का इल्ज़ाम अपने सर पर लेने को तैयार हो जाता है तो वफ़ादार और नमकख़्वार ख़ादिम याट टो भी पीछे नहीं रहता । वह उस इल्ज़ाम को अपने सर पर लेने की पेशकश करता है । लेकिन प्रमोद उसे समझाता है कि वह ऐसी योजना के तहत काम कर रहा है जिसमें उसकी जान को कोई ख़तरा नहीं है । वह अपने लिए अत्यंत चिंतित याट टो को समझा-बुझाकर भारत भेज देता है और उसे हिदायत देता है कि वह उसके राजनगर स्थित फ़्लैट को ठीकठाक करके रिहाइश के काबिल बनाए क्योंकि थोड़े दिनों के बाद वह भी राजनगर आ आएगा ।

याट टो को भारत भेज देने के बाद प्रमोद एक बेहद पेचीदा योजना बनाकर अमरीका के दो अलग-अलग राज्यों की कानून-व्यवस्था को धोखा देता है और क़त्ल के जुर्म का (झूठा) इक़बाल करके भी अपने आप को सज़ा नहीं होने देता । वह उसी की सलाह पर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करके गिरफ़्तार हो चुके युगल को रिहा करवा देता है और वास्तविक षड्यंत्रकारियों को कानून के चक्रव्यूह में फँसा देता है । यहाँ पाठक साहब ने प्रमोद के माध्यम से अमरीका में लागू प्रत्यर्पण संबंधी विधि-विधान का बड़ा रोचक उपयोग किया है । मैं नहीं जानता कि पाठक साहब को ऐसी गहरी जानकारी कैसे हुई मगर दिमाग को घुमा देने वाली प्रमोद की योजना को अमली जामा पहनते देखना अत्यंत आनंददायी है । जिस तरह प्रमोद दो बैंकों में खाते खोलकर कार बेचने वाली कंपनी को अपने चैक के माध्यम से भ्रम में डालकर कायदे-कानून की मशीनरी को इस्तेमाल करता है, वह विकास गुप्ता के पहले उपन्यास धोखाधड़ी की याद दिला देता है । लेकिन इन दोनों उपन्यासों के संबंधित प्रसंगों की तुलना करते समय ध्यान रहे कि जान की बाज़ी धोखाधड़ी के दस वर्ष से भी अधिक समय पहले लिख दिया गया था ।

अब अपने चौथे और आख़िरी उपन्यास एक रात एक लाश में प्रमोद तीन साल के अंतराल के बाद फिर से अपने देश भारत लौट आता है जहाँ उसका इंतज़ार कर रहा है एक हत्या का मामला जिसमें सुषमा का वर्तमान प्रेमी जोगेन्द्रपाल फँसा हुआ है । उस पर अदालत में इल्ज़ाम साबित हो चुका है और सज़ा भी सुनाई जा चुकी है । पर कानून, इंसाफ़ और सच्चाई में ही नहीं बल्कि ज़िंदगी और सुषमा के प्यार में भी अपना ऐतबार खो चुका जोगेन्द्रपाल जेल से भाग चुका है और पुलिस उसकी तलाश में है । प्रमोद के राजनगर आते ही एक क़त्ल और हो जाता है । अब एक बार फिर इंस्पेक्टर आत्माराम के साथ लुका-छुपी का खेल खेलते हुए प्रमोद असली खूनी को बेनक़ाब करके जोगेन्द्रपाल की बेगुनाही साबित करता है । प्रमोद की गतिविधियों में चू की, सो हा और याट टो की भी पूरी-पूरी भागीदारी रहती है । इस उपन्यास के आख़िर में इंस्पेक्टर आत्माराम के मुँह से प्रमोद की ज़हनियत की तारीफ़ बेसाख़्ता निकल पड़ती है ।

क़त्ल का राज़ फ़ाश हो जाने और जोगेन्द्रपाल की रिहाई तय हो जाने के बाद प्रमोद सुषमा से कहता है कि वह जोगेन्द्रपाल को उसकी बेगुनाही साबित होने की ख़बर ख़ुद सुनाए ताकि उसका ज़िंदगी और मुहब्बत पर से उठ चुका भरोसा फिर से लौटे । इससे एक बार फिर पाठक साहब के नायकों के अत्यंत संवेदनशील होने की बात साबित हो जाती है । सुनील और प्रमोद जैसे नायक संवेदनशील इसलिए हैं क्योंकि उनके रचयिता सुरेन्द्र मोहन पाठक स्वयं एक संवेदनशील मनुष्य हैं जो कि मानवता को सर्वोपरि रखते हैं ।

प्रमोद के इन उपन्यासों में  औरत-मर्द की मुहब्बत और जज़्बात को बख़ूबी उकेरा गया है । एक रात एक लाश में पाठक साहब प्रमोद के मुँह से कविता के चित्रों में आई गहराई का ज़िक्र करवाते हैं और इस पर कविता के मुँह से कहलवाते हैं कि जब दिल में दर्द पैदा होता है तो कला में गहराई भी आ जाती है । कितनी बड़ी, कितनी सच्ची बात है यह ! दिल में लहर और टीस जगाने वाला यह सोज़ ही तो है जो फ़नकार के फ़न में जान डाल देता है, उसके शाहकार को मामूली से ग़ैर-मामूली बना देता है ।

मैंने बरसों पहले एक कहानी में पढ़ा था कि कोई नहीं समझ सकता कि औरत जब किसी से प्यार करती है तो वह उसमें क्या देखती है । ज़ाती तजुरबे से मैं जानता हूँ कि यह बात एकदम सच है । यह औरत पर ही नहीं मर्द पर भी लागू है । लोग किसी से प्यार हो जाने की चाहे जितनी वजहें बयां कर दें, किसी को किसी से प्यार क्यों होता है यह कोई नहीं जानता, कोई नहीं बता सकता । औरत की खूबसूरती भी मर्द के प्यार की बुनियाद नहीं होती है क्योंकि सही मायनों में खूबसूरती देखने वाले की आँखों में होती है । प्रमोद का उम्र में अपने से तीन-चार साल बड़ी और एक शादीशुदा औरत कविता को दिल दे बैठना पाठक साहब द्वारा बहुत बाद में लिखे गए यादगार उपन्यास कागज़ की नाव को भी ज़हन में ताज़ा कर देता है जिसमें उपन्यास का नायक लालचंद उर्फ़ लल्लू अपने से तीन साल बड़ी और जिस्मफ़रोशी के दलदल में धँसी खुर्शीद से मुहब्बत करने लगता है । 

कई बार लोग यह सवाल करते हैं कि किसी के शादीशुदा होने के बावजूद उससे मुहब्बत कैसे की जा सकती है । मेरा कहना है कि शादी एक समाजी रस्म है जिसके होने या न होने की बात दिमाग तो समझ सकता है, दिल नहीं । महबूब या महबूबा की शादी हो जाने या जगह की दूरी के कारण उससे रूबरू मुलाक़ात मुमकिन न हो पाने से सच्ची मुहब्बत पर कोई असर नहीं पड़ता है क्योंकि दिल में उसकी याद तो हमेशा ही रहती है और खलील जिब्रान ने कहा है – याद करना भी मिलन का ही स्वरूप है । प्रमोद के दिल में कविता के लिए परवान चढ़ चुकी मुहब्बत को इसी बुनियाद पर समझा जा सकता है । मैं तो समझता हूँ कि महबूब या महबूबा के इस दुनिया में न रहने पर भी उसके लिए मुहब्बत कायम रहती है क्योंकि दिलों की वाबस्तगी ज़िंदगी से भी परे जाती है ।

पाठक साहब इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि सच्चा प्रेम निस्वार्थ होता है जो केवल देना, समर्पित करना और त्याग करना जानता है, अपने लिए कुछ मांगना नहीं जानता । कविता के लिए प्रमोद के प्रेम के अतिरिक्त चीनी लड़की सो हा का प्रमोद के लिए प्रेम भी कुछ ऐसा ही है । वह प्रमोद की कविता के लिए भावनाएं जानने के उपरांत भी उससे प्रेम करती है और इस प्रेम के कारण प्रमोद के लिए कुछ भी करने को उद्यत हो जाती है । प्रमोद उसकी इन भावनाओं से परिचित है लेकिन वह उनका प्रत्युत्तर नहीं दे सकता क्योंकि उसे कविता से प्रेम है । दूसरी ओर प्रमोद सुषमा को छोटी, बचपने से ग्रस्त और खिलंदड़ी समझता है लेकिन वह यह नहीं जानता कि उसका प्रेम भी वास्तविक ही है । जोगेन्द्रपाल की प्रेमिका बनने के बाद भी उसका प्रथम प्रेम प्रमोद ही है जिसे वह भूल नहीं सकती । प्रमोद को खरगोश कहकर पुकारने वाली सुषमा जानती है कि प्रमोद उसकी बड़ी बहन कविता को चाहता है और इसीलिए वह उससे चुहलबाज़ी चाहे जितनी कर ले, उसके और अपनी बड़ी बहन के मिलन के रास्ते में रुकावट बनना कभी नहीं चाहेगी ।

पाठक साहब यह भी चिह्नित करते हैं कि सच्ची मुहब्बत अगर एकतरफ़ा भी हो तो भी कभी-न-कभी अपना असर ज़रूर दिखाती है । ग़ालिब ने कहा है – आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक । बिलकुल ठीक । लेकिन इसमें एक उम्र चाहे गुज़र जाए, आह का असर होता ज़रूर है । प्रमोद का एकतरफ़ा प्यार बरसों बाद ही सही, रंग लाता है और कविता भी उससे प्यार करने लगती है चाहे अपनी छोटी बहन सुषमा के जज़्बात का ख़याल करके वह उससे शादी करने में हिचक रही हो ।

इस सीरीज़ में पाठक साहब ने खच्चर पर पूंछ की ओर मुँह करके बैठे हुए चीनी दार्शनिक चाउ कोह कोह के हवाले से इस अनमोल जीवन-दर्शन को पाठकों के समक्ष रखा है कि अहमियत सफ़र की है, मंज़िल की नहीं । अगर ज़िंदगी का सफ़र सही ढंग से, सही दिशा में और हर पल का भरपूर लुत्फ़ लेते हुए तय किया जा रहा है तो फिर मंज़िल के बारे में सोचने या फ़िक्रमंद होने की ज़रूरत नहीं है ।

एक रात एक लाश वाले केस के हल हो जाने के बाद प्रमोद की ज़िंदगी में नया क्या हुआ ? वह हिंदुस्तान में ही रहा या एक बार फिर से मुल्कबदर हो गया ? क्या कविता प्रमोद की सच्ची मुहब्बत को कुबूल करके उसकी बन जाने को तैयार हुई ? जोगेन्द्रपाल के रिहा हो जाने के बाद सुषमा ने अपनी ज़िंदगी की बाबत क्या फ़ैसला लिया ? हमें इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे क्योंकि प्रमोद सीरीज़ बंद हो चुकी है । जनवरी 1998 में मुझे लिखे अपने पहले ही ख़त में पाठक साहब ने यह स्पष्ट कर दिया था कि प्रमोद सीरीज़ को आगे बढ़ाना संभव नहीं ।

आज सुनील, विमल, सुधीर और जीत सिंह की वाहवाही के दौर में पाठक साहब की इस भूली-बिसरी सीरीज़ और इसके भूले-बिसरे नायक का कहीं ज़िक्र तक नहीं होता है । लेकिन मैं प्रमोद से बहुत प्रभावित हूँ । पाठक साहब का यह भूला-बिसरा मानस-पुत्र मेरे हृदय के अत्यंत निकट है और सदा रहेगा ।  

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