Monday, September 28, 2015

निर्णय के औचित्य की कसौटी : उसका परिणाम या कुछ और ?




अभी-अभी फ़िल्म कैलेंडर गर्ल्स देखी । मन में कई सवाल उठे । फ़िल्म के अंत में कहानी की एक पात्र जो कि पहले कैलेंडर गर्ल थी और बाद में जीवन के विभिन्न परिवर्तनों से गुज़रते हुए और विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए एक सफल पत्रकार बन जाती है, अंत में अपने साथ ही कैलेंडर गर्ल रह चुकी एक लड़की की अवसादपूर्ण परिस्थितियों में हुई मृत्यु के उपरांत टी.वी. पर आयोजित एक परिचर्चा में कहती है – जीवन वस्तुतः उन चुनावों पर निर्भर करता है जो हम उपलब्ध विकल्पों में से करते हैं । फ़िल्म के समापन के उपरांत बहुत देर तक यह बात मेरे मन में गूंजती रही ।

फ़िल्म की उस पात्र ने ठीक ही कहा । जीवन निर्णयों से चलता है । और निर्णय क्या है ? उपलब्ध विकल्पों में से किसी का चयन ही तो । व्यक्ति द्वारा किए गए उस चयन अथवा लिए गए उस निर्णय से ही उसका जीवन या उसके जीवन का कोई एक पक्ष प्रभावित होता है ।  सही निर्णय लेना एक कला है जिसमें कुछ लोग निष्णात होते हैं और कुछ नहीं । मैं दूसरी श्रेणी में आता हूँ । लेकिन कोई भी निर्णय सही है या ग़लत, उचित है या अनुचित; इसकी कसौटी क्या है ?

वह कसौटी है परिणाम । जी हाँ, परिणाम ही वह कसौटी है जिस पर किसी भी निर्णय का औचित्य परखा जाता है । परिणाम सकारात्मक हो, आशानुकूल हो, वांछित प्रदान करने वाला हो तो जो निर्णय लिया गया था, वह उचित समझा जाता है और परिणाम नकारात्मक हो, प्रतिकूल हो, निराशाजनक हो तो जो निर्णय लिया गया था, वह अनुचित माना जाता है । परिणाम अच्छा मिला तो निर्णय सही रहा । परिणाम बुरा मिला तो निर्णय ग़लत साबित हुआ ।

लेकिन निर्णय तो पहले लेना पड़ता है । परिणाम चाहे निर्णय पर आधारित ही हो, उसका पता तो बाद में ही चलता है न ? अपवादों को छोड़कर कोई भी निर्णय लेते समय अर्थात् उपलब्ध विकल्पों में से अपने विवेक के अनुरूप चयन करते समय तो परिणाम की बाबत अनुमान ही लगाया जा सकता है, अपेक्षा ही की जा सकती है कि परिणाम  मनोनुकूल होगा । वस्तुतः ऐसा होगा या नहीं, यह कोई ज्योतिषी जान सके तो जाने; सामान्य व्यक्ति तो नहीं जान सकता । तो फिर सही निर्णय कैसे लिया जाए ?

ज़िंदगी को कई बार एक जुआ कहा जाता है । उसे जुआ इसलिए कहा जाता है क्योंकि जैसे जुए में दांव लगाने वाला खिलाड़ी जीत भी सकता है और हार भी सकता है, वैसे ही जीवन में लिया गया कोई भी निर्णय अभीष्ट दिला भी सकता है और कभी-कभी जो है, उसे गंवा देने की स्थिति में भी  पहुँचा सकता है । और मनुष्य का सक्रिय जीवन उसके द्वारा लिए गए विभिन्न निर्णयों का योग ही तो है । अब अगर यह जुआ भी है तो सांसारिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को यह जुआ दिन-प्रतिदिन खेलना तो पड़ता ही है, इससे भागा तो नहीं जा सकता । तो फिर इस जुए में पराजय से कैसे बचें ?

संभवतः श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीतोपदेश में दिया गया संदेश ही इस कठिन प्रश्न का सही उत्तर है : कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन अर्थात् अधिकार कर्म में ही हो, उसके फल में नहीं । अन्य शब्दों में कर्म करते समय उसके फल या परिणाम की एक परिकल्पना अवश्य करें किन्तु उसके मिलने या न मिलने संबंधी सोचविचार को त्याग दें और केवल यह देखें कि वह कर्म अपने आप में शुभ और सकारात्मक है या नहीं । फल कई कारकों पर निर्भर करता है जो कर्ता के नियंत्रण में नहीं होते । अब जैसा कि मैंने पहले कहा, फल या परिणाम यदि मनोनुकूल न हो तो समझा जाता है निर्णय ग़लत था लेकिन यह तो भौतिक सफलता को ही सब कुछ मानने वाले संसार की सोच है । कर्ता की सोच तो उसके संस्कारों से चलती है । उदात्त संस्कारों से युक्त व्यक्ति अनुचित निर्णय कैसे ले सकता है ? ऐसा व्यक्ति यदि अपने मन में पवित्र भावना रखते हुए किसी उत्तम उद्देश्य के निमित्त कोई निर्णय लेता है तो कालांतर में आने वाला अनपेक्षित विपरीत परिणाम उसके औचित्य पर उंगली कैसे उठा सकता है ?

फल संबंधी सोचविचार मस्तिष्क करता है जबकि कर्म संबंधी निर्णय का बीजारोपण हृदय में होता है । जब हृदय पर विश्वास करके कुछ किया जाए तो फल की प्राप्ति चिंता का विषय नहीं बननी चाहिए । एक बहुत पुराना हिन्दी गीत है – दिल जो कहेगा, मानेंगे, दुनिया में हमारा दिल ही तो है । यदि आपके संस्कार उत्तम हैं, जीवन के उच्च मूल्यों में आपका विश्वास है, आप अपना और साथ ही दूसरों का भी हित ही चाहते हैं तो अपने हृदय की पुकार सुनिए और तदनुरूप निर्णय लेकर आगे बढ़ जाइए । आपका दिल अगर साफ़ है तो वो आपको कभी धोखा नहीं देगा । हमेशा आपको सही राह ही दिखाएगा । दिल की सुनेंगे तो अफ़सोस करने की नौबत नहीं आएगी । ऐसे में निर्णय से होने वाले हानिलाभ की चिंता का भार भी अपने मन पर क्यों रखा जाए ? दिलों के सौदे नफ़े-नुकसान पर ग़ौर करके तो नहीं किए जाते । इसीलिए दिल से किए गए फ़ैसले ग़लत भी नहीं होते चाहे उनके नतीजे मनमाफ़िक न हों । और जब अपने फ़ैसले पर कोई पछतावा नहीं होता तो हार का अहसास भी नहीं सताता ।

सारांश यही कि निर्णय के औचित्य की कसौटी उसके परिणाम को नहीं वरन अपने विवेक को बनाइए जिसके अनुरूप  आप निर्णय ले रहे हैं । परिणाम आपके वश में नहीं लेकिन निर्णय लेते समय आपका विवेक तो आपके वश में होता है । सदविवेक से निर्णय लीजिए और उसके सही होने के विश्वास की ज्योति अपने मन में जलाकर रखिए, परिणाम फिर चाहे जो हो । 

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Wednesday, September 23, 2015

पति-पत्नी का आपसी विश्वास और शोबिज़ की चकाचौंध के पीछे का सच (पुस्तक-समीक्षा - साज़िश)

प्रसिद्ध हिन्दी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने ऐसे कई उपन्यास लिखे हैं जिनको उनकी बेहतरीन कहानी और प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण के बावजूद समुचित प्रशंसा नहीं मिली, वो तारीफ़ वो वाहवाही नहीं मिली जिसके वे हक़दार हैं । ऐसा ही एक उपन्यास है साज़िश जो उनके द्वारा रचित थ्रिलर उपन्यासों की श्रेणी में आता है । 

जिन दिनों 'साज़िश' प्रकाशित हुआ था, यानी दिसंबर 1999 में, उन्हीं दिनों मेरी नौकरी महाराष्ट्र में स्थित तारापुर परमाणु बिजलीघर में लग गई और मैं वहाँ जा पहुँचा जहाँ कॉलोनी से कुछ ही दूर चित्रालय नामक बाज़ार में एक पुस्तकें किराए पर देने वाला अपना कारोबार चलाता था । मैं उससे सुरेन्द्र मोहन पाठक के पुराने उपन्यास किराए पर ला-लाकर पढ़ने लगा । जनवरी 2000 में उसके पास जब मैंने नया उपन्यास साज़िश देखा तो उसे किराए पर लेने की जगह मैंने उस नई प्रति को उसकी पूरी कीमत देकर ख़रीद ही लिया और रात को हमेशा की भांति अपने क्वार्टर में उसे एक ही बैठक में पढ़कर समाप्त किया । वह प्रति एक दशक से भी ज़्यादा समय तक मेरे पास रही और मैं गाहे-बगाहे उसे बार-बार तब तक पढ़ता रहा जब तक कि मेरी नादानी से वह मेरे पास से चली नहीं गई । 
                                             

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने साज़िश के लेखकीय में लिखा था कि उन्होंने यह उपन्यास अपनी विभिन्न सीरीज़ अर्थात् सुनील, विमल, सुधीर और थ्रिलर के उपन्यासों की एक नियमित रोटेशन बनाने की कोशिश में लिखा था । बहरहाल चाहे कैसे भी लिखा हो, बिना किसी शोरगुल और पूर्वापेक्षा के एकाएक आया यह उपन्यास एक निहायत ही उम्दा थ्रिलर है जिसे अपनी मुनासिब तारीफ़ नसीब नहीं हुई । 

साज़िश एक बेदाग़ उपन्यास है जिसमें लाख ढूंढने पर भी कोई खामी निकालना मुमकिन नहीं लगता । जहाँ तक खूबियों का सवाल है, यह उपन्यास बेशुमार खूबियों का मालिक है । पाठक साहब ने ख़ुद एक बार फ़रमाया है कि उनके बहुत से उपन्यास केवल इसलिए जासूसी उपन्यास कहलाते हैं क्योंकि उन पर जासूसी उपन्यासकार का ठप्पा लगा हुआ है वरना उनके ऐसे कई उपन्यास हैं जिनको सहज ही सामाजिक उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है । साज़िश भी एक ऐसा ही उपन्यास है जिसे आप चाहें तो जासूसी उपन्यास मान लें और चाहें तो सामाजिक उपन्यास मान लें । 

साज़िश कहानी है अनिल पवार नाम के एक युवक की जो लोनावला स्थित एक कारखाने में इंडस्ट्रियल केमिस्ट की नौकरी करता है । उसका वर्तमान एम्पलॉयर अविनाश जोशी कुछ अरसा पहले उसे पूना से वहाँ लेकर आया था । आने के बाद उसकी मुलाक़ात बिना माँ-बाप की दो बेटियों – मुग्धा पाटिल और नोनिता पाटिल से हुई थी जिसमें से छोटी बहन मुग्धा से उसने विवाह कर लिया । इन दोनों बहनों का एक बुआ के अतिरिक्त कोई और रिश्तेदार नहीं है । मुग्धा को विवाह से पहले दौरे पड़ते बताए जाते थे । इस बात की रू में मुग्धा के साथ-साथ अनिल की साली नोनिता भी मानो मुग्धा के दहेज में उसके घर चली आई थी ताकि वो मुग्धा की देखभाल कर सके । शादी के बाद अब अनिल की समस्या यह हो गई कि उसकी आमदनी के मुक़ाबले उसकी बीवी और साली का रहन-सहन बहुत खर्चीला था । तेते पाँव पसारिए जेती लांबी सौर वाली कहावत में उन दोनों बहनों का कोई यकीन नहीं था और उनके पाँव सदा अनिल की आमदनी की चादर के बाहर ही पसरे रहते थे । 

साज़िश का श्रीगणेश एक तूफ़ानी रात को होता है जब अनिल एक जुए की फड़ में रमा हुआ है और पीछे से उसकी बीवी यानि मुग्धा और साली यानि नोनिता उसके घर से रहस्यमय ढंग से गायब हो जाती हैं । अब क्या अनिल का एम्पलॉयर अविनाश जोशी, क्या स्थानीय पुलिस चौकी का इंचार्ज मुंडे और क्या उसका पड़ोसी दशरथ राजे; सबकी एक ही राय है कि अनिल की मौजूदा पतली माली हालत के मद्देनज़र उसकी बीवी और साली उसे छोड़कर अपने यारों के साथ भाग गई हैं । लेकिन अनिल को सूरत-अ-हवाल की यह तर्जुमानी मंज़ूर नहीं क्योंकि उसे अपनी बीवी के प्यार पर अटूट विश्वास है और वह किसी सूरत में यह कबूल नहीं कर सकता कि उसकी बीवी उसे छोड़कर किसी ग़ैर के पास चली गई है । तड़पकर वह अपनी बीवी की तलाश में निकलता है । उसके पास पैसा नहीं है लेकिन वह कुछ उधार अपने मेहरबान पड़ोसी दशरथ राजे से लेता है और कुछ पैसा उसे छुट्टियों के साथ-साथ उसका एम्पलॉयर अविनाश जोशी देता है । उसे पता चलता है कि उसके उनकी ज़िंदगी में पैबस्त होने से पहले दोनों बहनें फ़िल्म अभिनेत्रियां बनने के लिए घर से भागकर मुंबई चली गई थीं । इसलिए वह अपनी तलाश मुंबई से ही शुरू करने का फ़ैसला करता है । दोनों बहनों के गायब होने के रहस्य की परत-दर-परत उधेड़ता हुआ अनिल आख़िर सच्चाई की तह तक कैसे पहुँचता है, यही साज़िश का मुख्य भाग है । अनिल की यह तलाश इतनी दिलचस्प और पाठकों को बांधकर रखने वाली है कि पढ़ने वाले के लिए इस उपन्यास को इसके आख़िरी सफ़े तक मुक़म्मल पढ़े बिना बीच में छोड़ना तक़रीबन नामुमकिन है । केवल छः दिनों के घटनाक्रम पर आधारित यह उपन्यास तेज़ रफ़्तार है और साहित्य के सभी रसों को अपने में समेटे हुए हैं । 

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने यह बात अपने कई उपन्यासों में रेखांकित की है कि पति-पत्नी का संबंध विश्वास पर आधारित होता है जिसमें कोई दुई का भेद नहीं होना चाहिए, कोई छुपाव नहीं होना चाहिए । अगर दोनों के बीच भरोसा ही नहीं  है तो इस नाजुक रिश्ते को नहीं निभाया जा सकता । उनके कई उपन्यास इसी थीम पर हैं । साज़िश भी इसी श्रेणी में आता है लेकिन कथावस्तु और परिवेश के हिसाब से यह अपने आप में एक बिलकुल अलग तरह का उपन्यास है जिसकी तुलना किसी और उपन्यास से नहीं की जा सकती ।

उपन्यास का नायक अनिल आधे-अधूरे तथ्यों और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर अपनी बीवी पर कोई तोहमत थोपने को तैयार नहीं । इसीलिए वह हक़ीक़त का पता ख़ुद लगाना चाहता है और जो कुछ हुआ है या हुआ था, उसकी बाबत अपनी बीवी का बयान उसकी जुबानी जानना चाहता है । वह ऐसा खाविंद है जो अपनी बीवी पर शक़ नहीं, एतबार करता है । मियां-बीवी का रिश्ता ऐसा ही होना चाहिए । साज़िश की कहानी प्रथम पुरुष में है और इसीलिए वह अनिल के साथ-साथ चलती है । उपन्यास पढ़ने वाला उतना ही जानता है जितना कि इस कहानी का नायक अनिल जानता है । अतः उपन्यास पढ़ते समय पाठक अनिल के साथ मानसिक रूप से जुड़ा रहता है । 

साज़िश में लेखक ने लगभग सभी किरदारों को अपने आप उभरने और अपनी छाप छोड़ने का पूरा मौका दिया है । कथानायक अनिल ही नहीं, अन्य किरदार जो कि सहायक चरित्र ही कहे जा सकते हैं, भी कथानक के फ़लक पर  अपना अलग वजूद बरकरार रखते हैं और पाठकों पर अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ते हैं । जो किरदार दिखाए भी नहीं गए हैं, जिनका महज़ ज़िक्र  किया गया है, वे भी अपनी अलग पहचान रखते हैं और पाठक उन्हें बड़ी आसानी से विज़ुअलाइज़ कर सकता है, उनके अक्स को अपने ज़हन पर उतार सकता है । 

लेखक ने अखिलेश भौमिक नाम के एक विलक्षण चरित्र के माध्यम से पाठकों को हास्य-रस की भरपूर ख़ुराक  दी है । अखिलेश भौमिक एक निर्देशक है जो मूल रूप से तो थिएटर में खेले जाने वाले नाटकों का निर्देशन करता है लेकिन अब वह कौन किसकी बांहों में नाम का टी॰वी॰ धारावाहिक बनाने की फ़िराक़ में है बशर्ते कि उसे कोई उसमें धन लगाने वाला मिल जाए । वह अल्कोहलिक है और अपने दफ़्तर में बैठे-बैठे भी पीता रहता है । उसकी और अनिल की मुलाक़ात पाठकों को हँसा-हँसा कर लोटपोट कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ती । इस किरदार और कुछ अन्य किरदारों के माध्यम से पाठक साहब ने शोबिज़  की चमक-दमक के पीछे की सच्चाईयों को उजागर किया है जो कि इस दुनिया में घुसने के ख़्वाहिशमंद नौजवानों के लिए एक सबक है । 

साज़िश में लेखक ने औरत-मर्द के प्यार के दो बिलकुल जुदा पहलू पेश किए हैं । एक पहलू यह है कि अगर मोहब्बत को उसका सिला न मिले, अगर उसे लगातार ठुकराया जाए और दूसरे द्वारा बार-बार अपमानित किया जाए तो वह नफ़रत में भी बदल सकती है । लेकिन दूसरी ओर मोहब्बत का एक पहलू यह भी है कि सच्चा आशिक़ अपने महबूब के लिए अपनी जान तक दे सकता है । लेखक ने प्रेम के इस दूसरे रूप को जो कि उदात्त है, पवित्र है, बलिदानी है; उपन्यास के अंत में प्रस्तुत किया है और साथ-साथ यह बात भी रेखांकित की है कि जुर्म में शरीक़ होने वाला भी बुनियादी तौर पर एक नेक इंसान हो सकता है । उपन्यास की अंतिम पंक्ति में इसके मुख्य किरदार भारी कदमों से बाहर निकलते हैं और इसे पढ़ने वाला भी अंतिम पंक्ति पढ़कर भारी मन से ही पुस्तक को बंद करता है ।

साज़िश पाठकों को कैसा लगा, इस बात का ज़िक्र कभी कहीं नहीं आया और यह हर नुक़्तानिगाह से इस असाधारण ख्याति प्राप्त लेखक का एक लो-प्रोफ़ाइल उपन्यास ही साबित हुआ । लेकिन चर्चित हिंदी उपन्यासकार की इस कम चर्चित कृति की गुणवत्ता बहुत ऊंची है और मैं इसे लेखक के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में शुमार करता हूँ । 

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Thursday, September 17, 2015

उदारीकरण : अंधी दौड़



वर्ष 1991 भारतीय अर्थनीति के लिए इस रूप में क्रांतिकारी सिद्ध हुआ कि भारत की नई केंद्रीय सरकार जिसने कि मई 1991 में कार्यभार संभाला, ने कथित समाजवाद की दशकों से घोषित नीति से किनारा करते हुए उदारीकरण की नीति को अपनाने का निर्णय लिया जिसका कार्यान्वयन जुलाई 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत उनके प्रथम केंद्रीय बजट में परिलक्षित हुआ । अपने सम्पूर्ण कार्यकाल के दौरान अर्थात् मई 1996 तक तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं उनके वित्त मंत्री इस तथाकथित उदारीकरण के पथ पर चलते रहे । आठ वर्षों के अंतराल के बाद ये ही वित्त मंत्री भारत के प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित हुए एवं लगातार दस वर्षों तक इस पद पर बने रहते हुए उदारीकरण की प्रक्रिया को आगे और आगे बढ़ाते रहे । लेकिन ख़ास बात यह है कि जिन आठ वर्षों में वे सत्ता से बाहर रहे, उनमें भी केंद्र में बनने वाली सभी सरकारें उनके द्वारा अपनाई गई नीतियों से हटी नहीं एवं उदारीकरण की जो प्रक्रिया उन्होंने आरंभ की थी, उसे रोकने या उसमें कोई परिवर्तन करने का कोई भी प्रयास किसी भी अन्य सरकार ने नहीं किया । 2014 में सत्ता परिवर्तन हो जाने के उपरांत नई सरकार ने भी विगत ढाई दशकों से चली आ रही इस अर्थनीति में संशोधन का कोई संकेत नहीं दिया है । संभवतः इस राह पर हम इतनी दूर निकल आए हैं कि लौटने का साहस अब किसी भी सरकार में नहीं है ।

उदारीकरण के गुण-दोषों की चर्चा से पूर्व मैं इस बात को रेखांकित करना चाहता हूँ कि यह उदारीकरण जिसमें सरकार बाज़ार की गतिविधियों में यथासंभव हस्तक्षेप नहीं करती एवं व्यापार तथा उद्योग-धंधों पर नियंत्रण न्यून कर दिए जाते हैं, हमारे द्वारा सामान्य स्थितियों में नहीं अपनाया गया था । 1991 में हमारी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट से गुज़र रही थी । हमारा विदेशी मुद्रा भंडार ख़ाली होने जैसी अवस्था में था जिसमें मुश्किल से तीन सप्ताह के आयात के भुगतान हेतु विदेशी मुद्रा उपलब्ध थी । स्पष्टतः विदेशी व्यापार में हमारे लिए भुगतान संतुलन की स्थिति पूरी तरह प्रतिकूल थी । देश का सोना बैंक ऑव इंग्लैंड तथा यूनियन बैंक ऑव स्विट्जरलैंड के पास गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा प्राप्त करने के बावजूद हाल ऐसा था जिसे वित्तीय आपातकाल की संज्ञा दी जा सकती है । कटु सत्य तो यह है कि विदेशी व्यापार में हमारे दिवालिया घोषित होने में थोड़ी ही कसर बाकी रह गई थी । ऐसी विकट परिस्थिति में उदारीकरण का जो कदम उठाया गया, वह मर्ज़ी का न होकर मजबूरी का था ।

तत्कालीन सरकार की विवशता स्पष्ट थी । हमें विदेशी वित्तीय संस्थाओं एवं धनी देशों के समक्ष विदेशी मुद्रा के लिए हाथ फैलाना था । जैसा कि कहा जाता है – बैगर्स आर नॉट चूज़र्स अर्थात् भिक्षुकों के लिए कोई चयन की सुविधा नहीं होती । भिक्षा जो मिले, जैसे मिले, जहाँ से मिले; उसे लेने के अतिरिक्त उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता । और तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं उनके वित्त मंत्री के प्रति अपना पूर्ण आदर प्रदर्शित करते हुए अग्रिम क्षमा-प्रार्थना सहित मैं यह कहना चाहता हूँ कि उस समय उनकी स्थिति किसी भिक्षुक जैसी ही थी । मानो हाथ में भिक्षापात्र लेकर वे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों तथा आर्थिक दृष्टि से सशक्त देशों के समक्ष विदेशी मुद्रा के लिए भिक्षाटन कर रहे थे । उन्होंने इस अपमानजनक स्थिति की पीड़ा को राष्ट्रहित में भोगा और जो भी शर्तें भिक्षा देने वालों ने उन पर थोपीं, उन्हें शीश नवाकर स्वीकार किया । आधुनिक युग में जब कुछ भी निःशुल्क नहीं मिलता तो यह भिक्षा भी बिना शर्त हमें कैसे मिलती ? दाताओं ने हमें भिक्षा नहीं दी वरन हमारी विवशता का सौदा किया और यह कथित उदारीकरण इसी प्रक्रिया में वस्तुतः हम पर आरोपित ही किया गया । हमें आर्थिक सहायता देने वाले इस सहायता के बदले में हमारे देश में अपने लिए खुला बाज़ार चाहते थे जिसमें घुसकर वे व्यापार तथा उद्योग-धंधों में लिप्त भारतीयों को प्रतिस्पर्द्धा में हराकर हमारे अर्थतन्त्र पर सम्पूर्ण अधिकार कर सकते । हमने उस मुश्किल घड़ी की मजबूरी से समझौता करते हुए इसे माना । इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए 1994 में हमने गैट समझौते पर भी हस्ताक्षर किए । परिणाम यह रहा कि बाज़ार पर सरकारी नियंत्रण का युग समाप्त हुआ और भारतीय अर्थव्यवस्था में पहली बार मांग एवं पूर्ति की शक्तियों को खुलकर खेलने का अवसर मिला । घरेलू उत्पादों को सरकारी संरक्षण मिलना लगभग बंद हुआ तथा आयात सुगम हो जाने के कारण भारतीयों के उपभोग के लिए नाना प्रकार के विदेशी उत्पादों के आगमन का मार्ग खुल गया ।

अब ढाई दशक बाद क्या यह उचित नहीं कि इस नीति का पुनर्मूल्यांकन किया जाए और देखा जाए कि यह किस सीमा तक राष्ट्र के हित में रही ? इस नीति को आर्थिक सुधारों का नाम भी दिया जाता है । पर इन सुधारों से आम भारतीयों के जीवन में कितना सुधार हो पाया, यह पड़ताल का विषय है । भुगतान संतुलन का गंभीर संकट तत्कालीन समस्या थी जिससे निपटने के लिए अल्पकालीन विकल्प के रूप में इस नीति को अपनाया जाना सर्वथा उचित था । लेकिन इसे दीर्घकालीन नीति के रूप में स्थायी रूप से अपना लिया जाना क्या समग्र राष्ट्र एवं रोटी, कपड़ा और मकान की आधारभूत आवश्यकताओं से दैनंदिन जूझने वाले आमजन के हित में है ? इस नीति को अपनाए जाने के उपरांत उद्योग-धंधों पर अनावश्यक सरकारी नियंत्रण की एक भ्रष्ट व्यवस्था जो कि लाइसेन्स-कोटा-परमिट राज के नाम से बदनाम थी, पूर्णतः समाप्त नहीं हुई तो कम-से-कम सुधरी तो अवश्य लेकिन अंततोगत्वा इससे लाभ या तो विदेशी कंपनियों को हुआ और या फिर बड़े भारतीय उद्योगपतियों को । यह कथित उदारीकरण हमारे देश के छोटे व्यापारियों एवं उद्यमियों के लिए तो अनुदार ही सिद्ध हुआ । आज दानवाकार विदेशी कंपनियों को जिस तरह से देश में आकर व्यवसाय करने की निर्बाध अनुमति दी जा रही है, उससे तो छोटे पैमाने पर व्यवसाय करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले स्वनियोक्त भारतीयों के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है । बाज़ार रूपी समुद्र में ये छोटी मछलियां अति-शक्तिशाली बड़ी मछलियों के सामने कहाँ टिक सकती हैं जो प्रति-क्षण इन्हें निगल जाने के लिए तत्पर हों ? आयातों को खुली छूट मिलने पर भी हमारे देश में महंगाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । बल्कि 1996-98 तथा 2007-09 में हमें भीषण मंदी का सामना भी करना पड़ा जिससे मध्यम तथा निम्नवर्गीय लोगों पर महंगाई और मंदी की दोहरी मार पड़ी ।

इस उदारीकरण से पूर्व भारत में केंद्रीय सरकारों द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर निरंतर लागू की गई  आर्थिक नीति बोलचाल की भाषा में घाटे की अर्थव्यवस्था के नाम से जानी जाती थी । सरकार का व्यय सदा उसकी आय से अधिक रहता था और घाटे की पूर्ति अतिरिक्त करेंसी नोट छापकर की जाती थी । चूंकि अतिरिक्त मुद्रा छापने के पीछे उत्पादन या परिसंपत्तियों का कोई आधार नहीं होता था, स्वभावतः यह नीति मुद्रा-स्फीति अथवा महंगाई को बढ़ावा ही देती थी । लेकिन इस नीति के दोषपूर्ण होने के बावजूद इसमें मंदी के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी एवं सरकारी नियंत्रणों की भरमार के कारण भारतीय बाज़ार वैश्विक अर्थव्यवस्था के उच्चावचनों से भी लगभग पूरी तरह सुरक्षित रहते थे । तथाकथित समाजवाद के नारे को बनाए रखने के लिए ही सही, सरकारें सार्वजनिक निर्माण के कार्यों एवं सार्वजनिक सुविधाओं पर व्यय करती थीं जिससे रोज़गारों का सृजन होता था । उस दौर में वास्तविक उत्पादक क्षेत्र ही प्रधान थे । उदारीकरण के इस युग में सेवा क्षेत्र प्रधान बन बैठे हैं जिनमें से अधिकतर परजीवी हैं और उत्पादन एवं आय के वितरण को प्रभावित करने के अतिरिक्त उसमें अपना कोई सकारात्मक योगदान नहीं देते हैं । ऐसे अनेक क्षेत्रों में जुए सरीखी सट्टेबाज़ी वैधानिक  नामों से होती है जिसमें आर्थिक रूप से सशक्त व्यक्ति एवं अभिकरण ही सफल रहते हैं क्योंकि वे अपनी सुदृढ़ स्थिति के बल पर इस खेल के दुर्बल खिलाड़ियों की गतिविधियों का अपने हक़ में बड़ी आसानी से इस्तेमाल कर लेते हैं । इस व्यवस्था में परजीवी और बिचौलिये उत्तरोत्तर धनार्जन करते हैं जबकि वास्तविक उत्पादकों का केवल शोषण होता है । परिणामतः जो पहले से ही अमीर हैं, उनके लिए और अमीर होते जाना सुगम है लेकिन जो हाशिये पर हैं और रोज़ कुआँ खोदकर रोज़ पानी पीते हैं, उनके लिए तो जीना कठिन से कठिनतर होता जा रहा है ।

ऐसे में यदि यह उदारीकरण दरिद्रनारायण की अवस्था में कोई गुणात्मक सुधार नहीं कर सकता है तो मूल रूप से गले में फंदे की तरह आ पड़े इस उदारीकरण को गले का हार बनाकर घूमना कहाँ तक उचित है ? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उदारीकरण के पैरोकार विकसित देश भी अपने घरेलू उद्योग-धंधों को उचित संरक्षण देते हैं तथा विदेशी निवेश एवं विदेशी माल को अपने यहाँ उस तरह से खुली छूट नहीं देते हैं जिस तरह से उदारीकरण एवं आर्थिक सुधारों के नाम पर हमने दे रखी है । क्या सारी उदारता विदेशी निवेशकों एवं उद्यमियों के लिए ही होनी चाहिए, कर्मशील भारतीयों के लिए नहीं ? उदारीकरण के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था उपभोक्ता की अर्थव्यवस्था बनकर रह गई है, उत्पादक की नहीं । भारतीय नागरिकों को विदेशी उत्पादों के उपभोग की जो स्वतंत्रता उदारीकरण ने प्रदान की है उससे उपभोग की संस्कृति को ही बढ़ावा मिला है, उत्पादन की संस्कृति को नहीं । लाइसेन्स-कोटा-परमिट राज की वापसी का तो कोई भी विवेकशील व्यक्ति समर्थन नहीं करेगा किन्तु विदेशी तो उत्पादन करें एवं हम उपभोक्ता बनने में ही अपनी प्रसन्नता एवं शान समझते रहें, यह भी तो वांछनीय नहीं ।

आज एक छोटे भारतीय उद्यमी के लिए किसी भी बैंक या वित्तीय संस्था से ऋण लेना हिमालय पर चढ़ने जैसा कठिन कार्य है जबकि विदेशी उद्यमियों के लिए हमारा हृदय और संसाधन दोनों खुले पड़े हैं । यह उदारीकरण हमें क्रेता ही बना रहा है - ऐसा क्रेता जिसकी क्रय-शक्ति उत्तरोत्तर घट रही है, विक्रेता नहीं जो अपने उत्पादित माल का विक्रय करके अपनी पूंजी को बढ़ा रहा हो । नब्बे के दशक में जब हम याचक थे तो हमारे धूर्त दाताओं ने हमें सशर्त भिक्षा इसीलिए दी थी ताकि हम उन्हें हमारे ही संसाधनों के उपयोग से माल बनाकर हमें ही बेचने और हमारे धनधान्य को लूट लेने की सुविधा देते । कभी ईस्ट इंडिया कंपनी ने ऐसा ही करके हमें आर्थिक दासता से राजनीतिक दासता की ओर धकेल दिया था । अब तो दर्ज़नों ईस्ट इंडिया कंपनियां उपस्थित हैं हमें लूटने के लिए । लेकिन अब हम ढाई दशक पहले वाले याचक नहीं हैं । हमारे विदेशी मुद्रा भंडार परिपूर्ण हैं और भुगतान संतुलन का कोई संकट आसन्न नहीं है । तो फिर क्यों हम उदारीकरण के पथ पर लगातार दौड़ते ही जा रहे हैं बिना आगे देखे और परखे कि यह दौड़ हमें कहाँ लिए जा रही है ? इस अंधी दौड़ को रोकना और राष्ट्र तथा जनता के हिताहित पर समुचित विचार करके आर्थिक नीतियों में यथोचित सुधार करना करना अत्यंत आवश्यक है । यदि इन आर्थिक सुधारों को अब पलटा या रोका नहीं जा सकता तो कम-से-कम इन्हें संशोधित करके देश एवं देशवासियों के दीर्घकालीन हितों के अनुरूप ढाला तो जा सकता है । जिस नीति में राष्ट्र के निर्धनतम नागरिक के कल्याण की भावना निहित नहीं, उसे राष्ट्र के हित में कैसे माना जा सकता है ? हमने इस तथाकथित उदारीकरण को एक भिक्षुक की विवशता के रूप में अनिच्छापूर्वक स्वीकार किया था किन्तु एक भिक्षुक के जीवन-दर्शन को एक सामान्य व्यक्ति द्वारा अपनाया जाना तो उचित नहीं ठहराया जा सकता । एक सामान्य व्यक्ति का जीवन-दर्शन तो स्वावलंबन-केन्द्रित ही होना चाहिए । अतः इस अंधी दौड़ को विराम देकर इस नीति का पुनर्मूल्यांकन किया जाए जिसकी कसौटी यही हो कि इस उदारीकरण में हमारे देशवासियों के लिए उदारता कितनी है ।



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