Saturday, December 26, 2015

साधना और उनका प्रभामंडल

साधना नहीं रहीं लेकिन उनका प्रभामंडल सदा रहेगा । कभी कम न होगी आभा उनके नाम, काम और व्यक्तित्व की जिसने जितेन्द्र माथुर सहित करोड़ों सिनेमा-प्रेमियों के हृदय सदा के लिए जीत लिए । एक पुरुष के रूप में मेरे मन को यदि रूपहले परदे की किसी अभिनेत्री ने लुभाया तो केवल साधना ने । किशोरावस्था में फ़िल्म जगत में पदार्पण करने वाली वह सीधी-सादी सिंधी युवती साठ के दशक में स्टाइल और फ़ैशन की प्रतिरूप बन बैठी जिसकी एक झलक मात्र से लाखों दिल धड़क उठते थे । साधना का दौर श्वेत-श्याम सिनेमा से रंगीन सिनेमा में संक्रमण का दौर था । इसलिए उनकी यादगार फ़िल्मों में जहाँ 'परख' (१९६०), 'हम दोनों' (१९६१), 'प्रेम-पत्र' (१९६२), 'असली-नक़ली (१९६२), 'एक मुसाफ़िर एक हसीना' (१९६२) और 'वह कौन थी' (१९६४) जैसी श्वेत-श्याम फ़िल्में सम्मिलित हैं वहीं 'मेरे महबूब' (१९६३), 'आरज़ू' (१९६५), 'वक़्त' (१९६५), 'मेरा साया' (१९६६), 'अनीता' (१९६७) और 'एक फूल दो माली' (१९६९) जैसी रंगीन फ़िल्में भी हैं । वे चौड़े माथे वाली एक सादगी-युक्त नायिका से विलक्षण केशसज्जा, रहस्यमयी मुस्कान और सम्पूर्ण देश को मंत्र-मुग्ध कर देने वाले नए चलन के परिधानों में सजी-धजी रमणी में कैसे और कब परिवर्तित हो गईं, संभवतः वे स्वयं भी नहीं जान पाईं । उनके , चूड़ीदार पायजामे, सिल्क के कुरते, कानों में बड़ी-बड़ी बालियाँ और साधना कट के नाम से सदा-सदा के लिए मशहूर हो जाने वाले केशविन्यास ने सारे देश में धूम मचा दी थी । लेकिन वह दौर आने से पहले भी साधना ने बिमल राय की 'परख' और 'प्रेम-पत्र' जैसी फ़िल्मों में अपने सादगी से ओतप्रोत व्यक्तित्व से भारतीय दर्शकों पर अपनी गहरी छाप छोड़ दी थी । देव आनंद की क्लासिक फ़िल्म 'हम दोनों' की साधना को भी कौन भुला सकता है ?
साधना के व्यक्तित्व में एक अनजाना-सा रहस्य का तत्व था जिसको आधार बनाकर निष्णात फ़िल्म दिग्दर्शक राज खोसला ने 'वह कौन थी' , 'मेरा साया' और 'अनीता' नामक रहस्यकथाओं की त्रयी रची । जहाँ 'वह कौन थी' का पहला ही दृश्य जिसमें भीषण बरसात की रात को कार चला रहे मनोज कुमार को सड़क पर बारिश में भीगतीं, अकेली खड़ीं साधना दिखाई देती हैं और फिर वे उन्हें रहस्य में डूबे वार्तालाप के उपरांत अपनी कार में एक कब्रिस्तान तक लिफ़्ट देते हैं, बॉलीवुड में बनने वाली रहस्यपूर्ण फ़िल्मों का सर्वश्रेष्ठ प्रारम्भिक दृश्य माना जा सकता है, वहीं 'वह कौन थी' की तर्ज़ पर ही बनी 'अनीता' में नायक के समक्ष कभी प्रेमिका तो कभी संसार-त्याग चुकी साध्वी के रूप में प्रकट होने वाली और फिर लुप्त हो जाने वाली रमणी भी अविस्मरणीय ही है । लेकिन साधना के रहस्यमय रूप का सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतीकरण फ़िल्म 'मेरा साया' में हुआ जिसमें कहीं वे 'झुमका गिरा रे' वाले अवतार में दर्शकों को लुभा गईं तो कहीं 'नैनों में बदरा छाए' वाले रूप में हृदयों पर राज कर गईं । उस दौर में ऐसे धूसर रंगों से युक्त भूमिकाओं को स्वीकार करना ही किसी भी नायिका के लिए एक बड़ी चुनौती था क्योंकि पारंपरिक भारतीय दर्शक नायिका के ऐसे रूप को देखने के अभ्यस्त नहीं थे । लेकिन साधना ने इस चुनौती को पूरे आत्मविश्वास के साथ स्वीकार किया और साधा ।
स्वयं सिंधी होकर भी साधना ने एक मुस्लिम युवती की भूमिका में लखनऊ की तहज़ीब को जिस बेमिसाल अंदाज़ से 'मेरे महबूब' में परदे पर प्रस्तुत किया है,उस पर देखने वालों के दिलों से 'वाह' के अतिरिक्त कुछ निकल ही नहीं सकता । हिज़ाब में छुपा उनका दिलकश हुस्न ही था जिसके लिए फ़िल्म के नायक (राजेन्द्रकुमार) उन्हें अपनी मुहब्बत की कसम देते हुए ख़ुद को अपना दीदार कराने के लिए पुकारते रहे । राजेन्द्रकुमार के साथ साधना ने कश्मीर की पृष्ठभूमि में बनी यादगार प्रेमकथा 'आरज़ू' में भी अत्यंत सुंदर अभिनय किया । चिनारों से गिरते पत्तों को देखते हुए उन्होंने लता मंगेशकर की आवाज़ में अपने बेदर्दी बालमा को कुछ ऐसी तड़प के साथ याद किया कि देखने वालों के दिल लरज़ गए । कुछ वर्षों बाद उन्होंने 'एक फूल दो माली' (१९६९) में दो पुरुषों के बीच बंटी एक विवाहिता एवं एक माँ की और 'आप आये बहार आई' (१९७१)में दुराचार की शिकार होने के उपरांत अपने प्रेमी से विवाह करने और दुराचारी की संतान को जन्म देने वाली स्त्री की अत्यंत कठिन भूमिकाएं भी कुशलतापूर्वक कीं । उन्होंने 'गबन' (१९६६) जैसी लीक से हटकर बनी फ़िल्म में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी और 'वक़्त' जैसी भव्य और बहुसितारा फ़िल्म में भी अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व और पहचान पर आँच नहीं आने दी । 'इंतकाम' (१९६९) में प्रतिशोध की अग्नि में झुलसती युवती की भूमिका में उन्होंने अभिनय के नए आयाम छुए ।
प्रेम-दृश्य करने में साधना अत्यंत निपुण थीं । परदे पर अपने नायक के साथ उनका व्यवहार किसी भी कोण से फ़िल्मी या बनावटी नहीं लगता था । चाहे कोई भी फ़िल्म रही हो और उनके समक्ष कोई भी नायक रहा हो, साधना एक सम्पूर्ण समर्पिता प्रेयसी के रूप में ही हँसतीं-बोलतीं-नाचतीं-गातीं दिखाई दीं । यद्यपि सुनील दत्त के साथ परदे पर उनका रसायन सर्वश्रेष्ठ कहा जा सकता है लेकिन अन्य नायकों के साथ काम करते हुए भी उन्होंने सदा ऐसी स्त्री को परदे पर जीवंत किया जिसे प्रत्येक भारतीय पुरुष अपनी प्रेयसी और पत्नी के रूप में पाना चाहता है । उनकी तुलना हॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री ऑद्रे हेपबर्न से की जाती है किन्तु वे अपने सर्वांग रूप में भारतीय ही थीं । 
नायिका के रूप में अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म 'लव इन शिमला' (१९६०) के निर्देशक आर.के. नैयर से उन्होंने हृदय की गहराई से प्रेम किया और इसे उनका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि नैयर के साथ अपने वैवाहिक जीवन में उन्हें संतान-सुख नहीं मिला । दैहिक समस्याओं के कारण उनका करियर वस्तुतः 'गीता मेरा नाम' (१९७४) के साथ ही समाप्त हो गया था जिसका निर्देशन भी उन्होंने ही किया था लेकिन उनकी कुछ विलंबित फ़िल्में बाद के वर्षों में भी प्रदर्शित हुईं । भारतीय दर्शकों के दिलों में बनी हुई अपनी छवि को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उन्होंने एक बार अवकाश लेने के बाद कभी भी फ़िल्मों में काम नहीं किया और सार्वजनिक जीवन से भी अपने आपको दूर कर लिया । इसीलिए साठ के दशक में उद्भूत उनका प्रभामंडल तथा उनके व्यक्तित्व पर पड़ा रहस्य का आवरण सदा जस-का-तस ही रहा । १९९५ में आर.के. नैयर के निधन के उपरांत वैधव्य के दो दशक उन्होंने बड़ी आर्थिक और व्यावहारिक कठिनाइयों के साथ बिताए । अपने कोई पास थे नहीं और बेगाने उन्हें कष्ट देने और प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे । ग्लैमर की चमक-दमक समाप्त हो जाने के पश्चात् किसी कलाकार का जीवन कैसा एकाकी और कठिन हो सकता है,यह कोई जानना चाहे तो साधना को उनके जीवन के अंतिम वर्षों में हुए कटु अनुभवों से जान सकता है ।
साधना अपनी नश्वर देह को छोड़कर जा चुकी हैं लेकिन अपनी फ़िल्मों के माध्यम से वे सदा जीवित रहेंगी । साधना को उनकी कला-साधना ने अमरत्व प्रदान कर दिया है । अब वे स्मृति-शेष हैं लेकिन उनका प्रभामंडल कभी धूमिल नहीं पड़ेगा । भारतीय रजतपट के इतिहास में वे अद्वितीय हैं और सदा रहेंगी । ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे । इस असाधारण कलाकार को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि ।

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Tuesday, December 15, 2015

मैं शाकाहारी क्यों हूँ ?



मैं शाकाहारी हूँ । कभी-कभी फ़ार्मी अंडों का सेवन कर लेने के कारण मुझे अंडाहारी भी कहा जा सकता है । लेकिन अपने मूल स्वभाव के अनुरूप मैं सुनिश्चित रूप से शाकाहारी कहलाया जाने का अधिकारी हूँ । मेरा जन्म एक मांसाहारी परिवार में हुआ । लेकिन अपनी माता के शाकाहारी होने के कारण मैं मांसाहार से दूर रह पाया (परिवार के अन्य सदस्य मांसाहारी ही रहे) । वयस्क होने पर मैंने एक मांसाहारी परिवार की कन्या से विवाह किया और विवाह के उपरांत स्थिति यह रही कि यद्यपि मेरी पत्नी मांसाहारी रही लेकिन मेरे और मेरी माता के शाकाहारी होने के कारण परिवार में सामिष भोजन कभी बनता नहीं था । विवाहोपरांत कभी-कभी हमने बाहर जाकर भोजन किया और मेरे लिए निरामिष आहार तथा मेरी पत्नी के लिए सामिष आहार मंगवाया । इस तरह हम पति-पत्नी ने भिन्न-भिन्न प्रकार का आहार एक साथ एक ही मेज़ पर बैठकर किया । हमारे विवाह के लगभग पाँच वर्षों के उपरांत जब मैं तारापुर परमाणु बिजलीघर में सेवारत था, मेरी पत्नी ने सदा के लिए मांसाहार का त्याग कर दिया । यहाँ तक कि जब मेरा स्थानांतरण हो जाने के कारण हम लोग वहाँ अपने पड़ोसियों से विदा ले रहे थे और उन्होंने हमारे लिए निरामिष और सामिष दोनों ही प्रकार के व्यंजनों से युक्त भोजन का प्रबंध किया था (वे हम दोनों की आहार संबंधी आदतों से परिचित थे), उनके आग्रह करने पर भी मेरी पत्नी ने मांसाहार को स्पर्श तक नहीं किया । अब हमारे बच्चे (एक पुत्र एवं एक पुत्री) भी अपने माता-पिता के अनुरूप ही शाकाहारी हैं । 

प्रश्न यह है कि मैं शाकाहारी क्यों हूँ ? क्या इसलिए कि मेरी माता ने मुझे शाकाहार में ही ढाला और सामिष भोजन से मुझे दूर रखा ? यह मेरे मांसाहार से दूर रहने का एक कारण है, लेकिन एकमात्र कारण नहीं है । मेरे शाकाहार के प्रति समर्पित होने का मुख्य कारण कुछ और है । इसका मुख्य कारण है मेरा संवेदनशील स्वभाव । मांसाहार कैसे बनता है ? किसी प्राणी के मांस से । और वह मांस कैसे प्राप्त होता है ? उस प्राणी को जीवन से वंचित कर के । मेरा स्वभाव तो ऐसा है कि मैं किसी के पैर में काँटा चुभने से भी अपने हृदय में पीड़ा का अनुभव करता हूँ । ऐसे में मैं उस आहार को ग्रहण कैसे कर सकता हूँ जो किसी जीते-जागते, हँसते-खेलते प्राणी का जीवन लेकर बनाया गया है मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यदि मेरे परिवार ने बाल्यकाल में मुझे मांसाहारी भी बनाया होता तो भी होश संभालने के तुरंत बाद मैं मांसाहार का परित्याग कर देता ।

मैंने तो हिन्दी के महान कवि दुष्यंत कुमार जी की इन पंक्तियों को सदा अपने मन में बसाकर रखा है - 'तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी, किसी के पैर से काँटा निकालकर देखो' । मुझे रामचरितमानस पूरी कंठस्थ नहीं लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी की इन पंक्तियों को मैं कभी एक पल के लिए भी विस्मृत नहीं करता हूँ - 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई' । ऐसे में  किसी निर्दोष प्राणी को असीम पीड़ा पहुँचाकर उसका प्राणान्त कर दिया जाए - केवल उसका मांस एवं देह के अन्य अंग प्राप्त करने के लिए - यह मेरे जैसे संवेदनशील व्यक्ति को कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता । जब हम किसी को जीवन दे नहीं सकते, लेने के उपरांत लिए हुए जीवन को लौटा नहीं सकते तो जीवन लेने वाले भी हम कौन होते हैं ? किसने यह अधिकार दिया है हमें ? क्या उस बुद्धि ने जिस पर हम इतराते हैं कि यह हम मनुष्यों के पास है, अन्य प्राणियों के पास नहीं ? हमारी देह में कंपाउंडर या नर्स इंजेक्शन लगाते हैं तो कितना कष्ट होता है ! देह के किसी भाग में कोई सुई या आलपिन या काँटा चुभ जाता है तो कितना कष्ट होता है ! ज़रा सोचिए कि उस निर्दोष असहाय  जीव ने कितना कष्ट सहा होगा जब मांस के लिए उसे मारा गया होगा !

प्रकृति ने पर्यावरण में अद्भुत संतुलन रखते हुए शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों ही प्रकार के जीवों का सृजन किया है । इसीलिए कहा जाता है कि जीव जीव का भोजन है (जीव जीवस्य भोजनम)। जो जीव प्रकृति ने मांसाहारी बनाए हैं, उनके दाँतों की बनावट और शक्ति उसी प्रकार की है । मनुष्यों के दाँत उस प्रकार के नहीं होते जिस प्रकार के शेर या बाघ या तेंदुए के होते हैं । स्पष्ट है कि प्रकृति ने मनुष्य को मांसाहारी श्रेणी में नहीं सिरजा है । अतएव मांसाहार का सेवन करके हम न केवल अपने आपको अनावश्यक रूप से हिंसक जीवों की श्रेणी में ले आते हैं वरन यह भी सिद्ध कर देते हैं कि हम अत्यंत लालची और लालच के हवाले होकर परपीड़क भी बन गए हैं । पशुओं के मांस तथा अन्य अंगों का कारोबार मनुष्य के लालच के कारण ही तो चलता और फलता-फूलता है । क्यों मांसाहार के लिए दूसरों को उकसाया जाता है ? क्यों मांस से बने पदार्थों का विज्ञापन होता है ? इसीलिए न कि इस व्यापार में लगे लोगों की तिज़ोरियां भरती रहें ? हमारी इन दुष्प्रवृत्तियों के लिए हमारा लालच, अज्ञान और संवेदनहीनता ही दोषी हैं, प्रकृति नहीं । प्रकृति ने तो सदा ही ममतामयी माता बनाकर अपनी सभी संतानों को सम्पूर्ण निष्पक्षता के साथ समान रूप से पाला है, यह तो मनुष्य है जो बारंबार स्वयं को दोषी और अनुपयुक्त संतान सिद्ध करने में लगा रहता है । प्रकृति तो सुमाता ही है और रहेगी, कुपुत्र तो हम हैं । स्वार्थी और हृदयहीन कुपुत्र !

साढ़े तीन दशक पूर्व 1979 में पिक्स इंटरनेशनल द्वारा एक अच्छी हिन्दी फ़िल्म बनाई गई थी - 'हबारी' जिसमें एक मनोरंजक एवं संवेदनाओं से ओतप्रोत कथा के द्वारा प्रकृति तथा वन्यजीवन के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक एवं प्रेरित किया गया था । दो दशक के उपरांत 1999 में ऐसी ही संवेदनशील, ज्ञानदायक एवं प्रेरक हिन्दी फ़िल्म 'सफ़ारी' भी बनाई गई थी । अब हालत यह है कि पेटा जैसे अधिनियमों एवं तथाकथित पशु-अधिकार-संरक्षकों के कारण वास्तविक पशुओं को लेकर कोई फ़िल्म नहीं बनाई जा सकती । ये पशु-अधिकारों के स्वयंभू ठेकेदार मदारियों एवं सर्कस-संचालकों जैसे पशुओं की सहायता से रोज़ी-रोटी कमाने वाले मेहनतकश और ईमानदार लोगों पर पिल पड़ने को सदा तत्पर रहते हैं (क्योंकि ये बेचारे कोई वोट बैंक नहीं होने के कारण इनके लिए आसान शिकार सिद्ध होते हैं) लेकिन देश-भर में धड़ल्ले से चल रहे क़त्लख़ानों पर इनका बस नहीं चलता जो रोज़ हज़ारों निरीह जानवरों को मौत के घाट उतार देते हैं (क्योंकि इनसे जुड़े लोग एक बहुत बड़े वोट बैंक की ताक़त रखते हैं) । सर्कस बंद हो गए हैं और उनमें काम करने वाले आ अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं लेकिन निर्दोष प्राणियों पर बर्बर अत्याचार के माध्यम वधिक-गृह विना किसी विघ्न-बाधा के चल रहे हैं और हमारे देश की वोट बैंक राजनीति के चलते संभवतः सदा चलते रहेंगे । मांसाहार को त्याग कर तथा पशुओं के चमड़े और अन्य अंगों से बनी वस्तुओं का मोह त्याग कर उपभोक्ता ही इस स्थिति में सुधार कर सकते हैं क्योंकि जब पशु उत्पादों का बाज़ार बंद हो जाएगा तो उनके प्राणों की रक्षा का मार्ग भी स्वतः ही खुल जाएगा ।  

गोरक्षा आंदोलन हमारे देश में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है और विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने वोट बैंकों के अनुरूप बयानबाज़ी करते हुए इसकी आँच में अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं । मेरा कहना यह है कि केवल गाय ही क्यों, सभी मासूम जानवरों की जानें कीमती है और बचाई जानी चाहिए । संविधान ने नागरिकों को जीवन का अधिकार दिया है किन्तु जब सभी प्राणी उसी परमपिता की ही संतान हैं तो जीवन का जितना अधिकार मनुष्यों को है, अन्य प्राणियों को किसी भी प्रकार उससे कम नहीं है । क्या वे केवल इसलिए जीवन के अधिकारी नहीं समझे जाएं क्योंकि वे चुनाव में वोट नहीं डालते ? ईश्वर ने मनुष्य को मस्तिष्क इसलिए नहीं दिया है कि वह उसके द्वारा सृजित अन्य प्राणियों का हंता बने । मनुष्य स्वयं के सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने की डींग हाँकता है लेकिन उसकी श्रेष्ठता अन्य प्राणियों को प्रताड़ित करने में कैसे हो सकती है ? बेबस मासूमों को मारने में क्या बहादुरी है जब मनुष्य स्वयं मरने से डरता है तो उसे यह भी समझना चाहिए कि जिस तरह उसे अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी प्राणियों को अपनी जान प्यारी है । उसे कोई हक़ नहीं है अपनी ख़ुदगर्ज़ी के लिए किसी की जान लेने का । मैं अपने मांसाहारी मित्रों से यही कहना चाहता हूँ कि भगवान से डरो दोस्तों, किसी मासूम की बेवजह हत्या न करो, न उसके लिए निमित्त बनो, यह पाप अपने ऊपर मत चढ़ाओ ।

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Saturday, December 12, 2015

नक़लचियों का बोलबाला

सारी दुनिया में आज नक़लचियों का बोलबाला है । नक़लची हर जगह घुस जाते हैं और दूसरों के सृजन को कॉपी-पेस्ट करके या फिर चंद अल्फ़ाज़ की हेरा-फेरी करके वाह-वाही (और भौतिक लाभ भी) लूटते हैं जबकि वास्तविक सर्जक कई बार अपनी सृजन की इस चोरी से अनभिज्ञ रहता है । साहित्य और कला के क्षेत्र में यह आम बात है । कभी-कभी नक़ल करने वाले लोग मूल सृजनकर्ता को (प्रेरणा देने का) श्रेय भी दे देते हैं जबकि बाज़ मर्तबा ऐसा भी होता है कि जिसे श्रेय दिया जा रहा है, उसने भी किसी और की नक़ल ही की थी ।  

कृतिस्वाम्य या कॉपीराइट का विधान इस संदर्भ में केवल समर्थ लोगों के लिए ही प्रभावी होता है (वैसे भारत की तो सम्पूर्ण वैधानिक व्यवस्था ही समर्थों के लिए हैं जो न्याय को मुँहमांगे दाम चुकाकर क्रय कर सकते हैं, साधारण व्यक्ति के लिए न्याय है कहाँ ?) । आर्थिक और व्यावहारिक रूप से अपेक्षाकृत दुर्बल सृजनकर्ताओं को इससे कोई विशेष लाभ नहीं मिलता है । प्रत्यक्षतः कॉपीराइट द्वारा सुरक्षित बौद्धिक सम्पदा की चोरी को भी रोक पाने में भी भारतीय विधि-व्यवस्था प्रायः प्रभावहीन ही सिद्ध होती है ।  

कुछ वर्ष पूर्व आई हिन्दी फ़िल्म 'दबंग' का एक गीत 'मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए' बहुत लोकप्रिय हुआ तथा यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है । यह गीत 1995 में आई हिन्दी फ़िल्म 'रॉक डांसर' के गीत 'लौंडा बदनाम हुआ लौंडिया तेरे लिए' की नक़ल है जिसे माया गोविंद ने लिखा था और बप्पी लहरी ने संगीतबद्ध किया था । लेकिन वस्तुतः वह गीत भी मशहूर भोजपुरी लोकगीत 'लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए' की ही नक़ल था जिसे ताराबानो फैज़ाबादी के स्वर में उत्तर-मध्य भारत की कई पीढ़ियों ने सुना और उसका आनंद उठाया । चूंकि यह लोकगीत है, इसलिए अधिकतर लोकगीतों की तरह इसके मूल लेखक का भी कोई पता नहीं । लेकिन पहले 'रॉक डांसर' में और डेढ़ दशक बाद 'दबंग' में इस गीत को थोड़े हेर-फेर के साथ उठा लिया जाना निर्लज्ज साहित्यिक और सांगीतिक चोरी का ही नमूना कहा जा सकता है । और यह कोई एक ही उदाहरण नहीं, ऐसे ढेरों उदाहरण हैं । 

कई वर्ष पूर्व चर्चित फ़िल्मकार श्याम बेनेगल द्वारा अपनी फ़िल्म 'वेल डन अब्बा' की कहानी के लिए जीलानी बानो को उनकी कहानी - 'नरसईंया की बावड़ी' और संजीव कदम को उनकी कहानी 'फुलवा का पुल' के लिए श्रेय दिया था क्योंकि बेनेगल ने अपनी फ़िल्म की कहानी इन कहानियों से प्रेरणा लेकर लिखी थी । लेकिन जब मैंने रमेश गुप्त जी द्वारा दशकों पूर्व रचित व्यंग्य 'चोरी नए मकान की' पढ़ा तो मैं दंग रह गया क्योंकि फ़िल्म की कहानी उस अत्यंत पुराने भूले-बिसरे व्यंग्य से बहुत मिलती-जुलती थी । इसका आशय यह हुआ कि बेनेगल ने जिन कथाओं को पढ़कर अपनी फ़िल्म की कथा रची थी, वस्तुतः उन कथाओं के लेखकों ने अपनी रचनाओं की विषय-वस्तु गुप्त जी के व्यंग्य से ही चुराई थी ।

भारत में हिन्दी के असंख्य उपन्यास विदेशी उपन्यासों की नक़ल मारकर धड़ल्ले से लिखे गए हैं और अब भी लिखे जाते हैं । लुगदी साहित्य के नाम से रचे गए उपन्यासों के लेखकों ने पहले तो यह सोचकर विदेशी उपन्यासों की नक़ल मारी कि हिन्दी के पाठक वर्ग को विदेशी भाषाओं के साहित्य का क्या पता ।  लेकिन अपनी इस चोरी के पकड़े जाने के बाद भी वे खम ठोककर यही करते रहे क्योंकि उन्हें कॉपीराइट संबंधी कानून का कभी कोई खौफ़ नहीं रहा ।

कई भाषाओं में बनाई गई चर्चित फ़िल्म 'दृश्यम' के लेखक ने निर्लज्ज होकर उसे अपनी 'मौलिक कहानी' के नाम से प्रचारित किया जबकि यह सर्वविदित था कि 'दृश्यम' की कहानी स्पष्टतः जापानी उपन्यास 'द डिवोशन ऑव सस्पैक्ट एक्स' से प्रेरित थी जिस पर जापानी भाषा में फ़िल्म भी बनी थी । लेकिन श्रेय और लाभ के बुभुक्षित लोगों को लज्जा कहाँ आती है । वे नक़ल को भी एक बहुत बड़ी कला समझते और मानते हैं और अपनी इस निपुणता पर गर्वित भी होते हैं ।

चर्चित अभिनेता और फ़िल्मकार आमिर ख़ान और उनके निर्देशक आशुतोष गोवारीकर ने अपनी फ़िल्म लगान की कहानी के मौलिक होने का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ी । लेकिन सच्चाई यह है कि लगान का मूल विचार बी॰आर॰ चोपड़ा द्वारा निर्मित-निर्देशित अपने समय की अत्यंत सफल फ़िल्म नया दौर से उठाया गया है जिसमें दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं । स्वयं आमिर ख़ान ने लगान के अनेक दृश्यों में नया दौर के दिलीप कुमार की भाव-भंगिमाओं की हूबहू नक़ल की है । फिर भी मौलिकता का दावा ? ऐसे निष्णात नक़लची संभवतः स्वयं को महाज्ञानी और शेष संसार को निपट मूर्ख समझते हैं ।

सारांश यह कि साहित्य और कला की चोरी एक लाइलाज़ बीमारी है । चूंकि यह चोरी सरलता से की जा सकती है, इसीलिए चोर निर्भय रहते हैं । अकसर तो चुराए गए संगीत या साहित्य के वास्तविक सर्जक अपने सृजन की इस चोरी से अनभिज्ञ ही रहते हैं और यदि वे जान भी जाएं तो चोर के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई करने में स्वयं को अक्षम ही पाते हैं । संगीत और साहित्य के कद्रदानों को भी इत्तफ़ाक़ से ही पता लगता है कि जिस सृजन को वे सराह रहे हैं, वह वस्तुतः किसी और की प्रतिभा और परिश्रम का सुफल है ।

अत्यंत खेद एवं क्षोभ का विषय है यह ।

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