Tuesday, October 22, 2013

भूमि-पुत्र



पात्र-परिचय :

गिरीश देवसरे : पटना में स्थापित मुंबइकर बिल्डर
कैलाश प्रसाद : मुंबई में स्थापित बिहारी युवा फैशन डिज़ाइनर
मोहिनी : गिरीश देवसरे की पत्नी
मुरारी : स्थानीय छुटभैया नेता
नारायण : एक मराठा श्रमिक
साधु : एक बिहारी श्रमिक
डॉक्टर खरे, डॉक्टर लाल : नर्सिंग होम में कार्यरत चिकित्सक
सुनील चक्रवर्ती : बंगाली युवा पत्रकार
अर्जुन : सुनील का कनिष्ठ युवा पत्रकार
प्रभुदयाल : पुलिस इंस्पेक्टर
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नेपथ्य से आवाज़ आती है – हमारे यहाँ सदियों से कहा जाता रहा है : सबै भूमि गोपाल की अर्थात् समस्त भूमि ईश्वर की है । यदि ऐसा है तो फिर भूमि के सभी निवासी भूमि-पुत्र हैं क्योंकि सभी उस परमपिता की ही तो संतान हैं । ऐसे में क्यों हम लोग कुछ निहित स्वार्थ वाले व्यक्तियों के बहकावे में आकर बार-बार देवताओं के निवास वाली इस पावन-धरा को क्षेत्र, भाषा, स्थानीय संस्कृति तथा धर्म जैसे आधारों पर बांटकर देखते हैं एवं इन संकुचित आधारों पर तय करते हैं कि वह भूमि-पुत्र है तथा वह नहीं है ? भूमि का काल्पनिक बंटवारा भूमि-पुत्रों का बंटवारा बन जाता है; उनके दिलोदिमाग, उनके विचारों, उनकी भावनाओं का बंटवारा बन जाता है । क्या हम स्वयं को केवल भारतीय के रूप में नहीं देख सकते ? केवल मनुष्य के रूप में नहीं देख सकते ? क्या क्षेत्र, भाषा, मजहब और संस्कृति पर आधारित संकुचित विचारधारा की विषबेल को पनपने से रोका नहीं जा सकता ? क्या निहित स्वार्थों के हाथों की कठपुतली बनना, उनके हाथों में खेलते हुए निरंतर अधोपतन की ओर बढ़ते चले जाना और अंततोगत्वा अपना सर्वनाश कर बैठना ही भारतवासियों की नियति है ? क्या इस दुष्चक्र को कहीं तोड़ा नहीं जा सकता ?

(पर्दा उठता है)

दृश्य एक
स्थान : पटना में गिरीश देवसरे का घर
समय : सायं साढ़े आठ बजे के करीब 

     (गिरीश देवसरे अपने घर की बैठक में बैठा टी.वी. देख रहा है, उसकी पत्नी मोहिनी रसोईघर में है,        टी.वी. पर शूल नामक हिन्दी फ़िल्म चल रही है । तभी कॉलबेल बजती है । देवसरे दरवाजा खोलता है ।   द्वार पर कैलाश प्रसाद और सुनील चक्रवर्ती खड़े हैं)
           
देवसरे : (द्वार से हटते हुए) अरे कैलाश ! आओ भई आओ । पिछले तीन-चार दिन से तो नज़र ही नहीं आए तुम ।           अपने दोस्त का भी परिचय करवाओ हमसे ।

(कैलाश और सुनील प्रवेश करते हैं और सोफ़ों पर बैठते हैं)
         
कैलाश : दादा, ये हैं मेरे दोस्त सुनील चक्रवर्ती । हिन्दी और अंगरेज़ी में निकलने वाले मशहूर अखबार ब्लास्ट के           रिपोर्टर हैं ।
सुनील : नमस्ते जनाब ।
देवसरे : मैं आपके नाम से वाकिफ हूँ सुनील साहब । आपके अखबार की कई रिपोर्ट्स की बाइलाइन में मैंने आपका         नाम पढ़ा है । आपकी रिपोर्टिंग ही नहीं, हालात को एकदम न्यूट्रल होकर देखने के आपके नज़रिये और आपकी पॉज़िटिव सोच का भी मैं कायल हूँ ।
सुनील : आपकी ज़र्रानवाज़ी है साहब । रीयल एस्टेट की दुनिया में आपका भी काफी बड़ा नाम है और कैलाश भी           आपके विचारों और स्वभाव की तारीफ़ गाहेबगाहे करता ही रहता है । इसलिए आज मेरा भी मन हुआ कि          मैं आपसे भेंट कर लूं ।

(तभी मोहिनी रसोईघर से निकालकर बैठक में प्रवेश करती है)

मोहिनी : क्यूँ कैलाश ! रास्ता भूल ही गए आज । इतने बिज़ी रहते हो क्या ? कितने लंबे समय बाद थोड़े दिनों के
          लिए तो अपने फैशन डिज़ाइनिंग के काम से फुरसत लेकर आए हो अपने घर ! उस पर भी यह हाल है कि           हमसे मिलने का भी वक़्त नहीं । दादा और वहिनी की भी सुध ले लिया करो भई ।
कैलाश : अरे कितनी बार कहा आपको कि आप मेरे लिए वहिनी नहीं बल्कि ताई हैं ! बड़ी बहन समझता हूँ मैं      आपको ।
देवसरे : कैलाश, अगर मुझे दादा कहना है तो मोहिनी को वहिनी ही बनी रहने दो, ताई मत बनाओ । या फिर     मुझे दादा की जगह पाहुना कहा करो । मेरा और मोहिनी का रिश्ता चेंज कराओगे क्या ?

                                                (सभी हँसते हैं)

देवसरे : (सुनील की ओर इंगित करते हुए) मोहिनी, ये हैं कैलाश के दोस्त, ब्लास्ट अखबार के रिपोर्टर मिस्टर    सुनील ।

(सुनील मोहिनी को हाथ जोड़कर नमस्ते करता है)

मोहिनी : अच्छा, आप लोग बातें करें । मेरे ख़याल से सब लोग चाय तो पिएंगे ही ।
कैलाश : अब ले ही आओ ताई, सॉरी वहिनी । आज चौथा दिन है आपके हाथ की चाय पिए हुए ।

(मोहिनी भीतर जाती है)

कैलाश : (देवसरे से) शूल देख रहे हो दादा । दीवाने हो मनोज बाजपेयी की एक्टिंग के !
देवसरे : हाँ कैलाश । मैं तो यंग एज में भी एक बिहारी बाबू का ही दीवाना था – अपने शत्रु भैया का । अब मनोज           बाजपेयी का हूँ । कमाल की एक्टिंग करता है ।

(तभी टी.वी. पर चल रही फ़िल्म में दृश्य परिवर्तन होता है और परदे पर अभिनेत्री
शिल्पा शेट्टी नाचती-गाती सामने आती है । गीत के स्वर बैठक में गूंजने लगते हैं)

दिलवालों के दिल का क़रार लूटने
मैं आई हूँ यू. पी. बिहार लूटने

                     (कैलाश ठहाका मार कर हँस पड़ता है)

देवसरे : क्या बात है कैलाश ? क्यूँ हँस रहे हो ?
कैलाश : (हँसते-हँसते कहता है) दादा, एक ओर तो एक मराठी नेता यू.पी.-बिहार वालों को महाराष्ट्र से खदेड़ने    पर तुले हुए हैं । उस पर यह मराठी मुलगी यू. पी. –बिहार को ही लूटने आई है । बेचारे यू. पी.-बिहार        वालों का होगा क्या ?

(देवसरे और सुनील भी हँसने लगते हैं । तभी मोहिनी चाय की ट्रे लिए हुए आती है ।
कैलाश उसके हाथ से ट्रे ले लेता है)

कैलाश : लाओ ताई मुझे दो । तुम बैठो ।

देवसरे : (धीमे स्वर में असहाय भाव से मगर विनोदपूर्वक) यह नहीं सुधरेगा । मुझे और मोहिनी को भाईबहन     बनाकर ही छोड़ेगा । 

(सब फिर हँसते हैं । मोहिनी भी वहीं बैठ जाती है । कैलाश सबको चाय के कप थमाता है
और ट्रे को सोफ़ों के बीच में स्थित मेज़ पर रख देता है)

मोहिनी : कैलाश, ये अभी तुम क्या कह रहे थे शिल्पा शेट्टी के लिए ? मराठी मुलगी के लिए कुछ ग़लतसलत मत           कहना, नहीं तो किसी मराठी मुलगी से ही रिश्ता फ़िट करा दूंगी तुम्हारा ।

कैलाश : शिल्पा का तो मैं भी प्रशंसक हूँ । उसने इंग्लैंड में बिग ब्रदर मुक़ाबला जीतकर भारत का मान बढ़ाया है ।
सुनील : कैलाश, क्या तुम जानते हो कि शिल्पा ने वह मुक़ाबला अपने किस गुण से जीता ?
कैलाश : अ . . . कह नहीं सकता । तुम बताओ ।

(देवसरे और मोहिनी भी सुनील की ओर उत्सुकता से देखने और उसकी बात सुनने लगते हैं )

सुनील : शिल्पा शेट्टी को बिग ब्रदर के घर में उसके साथ रह रही अंगरेज़ औरत – जेड गूडी ने जातीय आधार पर           व्यक्तिगत फ़ब्तियां कसकर अपमानित किया था । वह रोई तो ज़रूर पर उसने अपमान का उत्तर अपमान           से और हमले का जवाब हमले से नहीं दिया । उसके आँसुओं के साथ-साथ उसका धैर्य और सहनशीलता ही   आख़िर उसके काम आए । उसकी बहुत अच्छी छवि बनी और दूसरे लोग उसके प्रशंसक और हमदर्द बन       गए जिन्होंने उसे अपमानित करने वाली औरत को सबक सिखाने के लिए शिल्पा को ही अंततः उस शो का   विजेता बना दिया । यह सहनशीलता और धैर्य हमारी हज़ारों साल पुरानी संस्कृति की पहचान हैं और   इन्हीं गुणों के कारण बाहर से आने वाली न जाने कितनी ही संस्कृतियां इसके भीतर घुलमिल गईं पर इसे     न मिटा सकीं, न ही इसके बुनियादी स्वरूप को बिगाड़ सकीं । (थोड़ा रूककर) हमारी यह वृहत् संस्कृति         अपने भीतर अनेक छोटी-छोटी स्थानीय संस्कृतियों को छुपाए हुए है । ये सभी लघु संस्कृतियां परस्पर           घुलमिलकर वृहत् भारतीय संस्कृति को आकार प्रदान करती हैं । एक छोटा-सा उदाहरण देखिए । (देवसरे           को संबोधित करते हुए) कैलाश आपको दादा कहता है क्योंकि मराठी संस्कृति में बड़े भाई को दादा कहा   जाता है । पर मैं बंगाली होकर भी आपको दादा ही कहूंगा क्योंकि बंगाली संस्कृति में भी बड़े भाई को        दादा ही कहते हैं । और देखिए मैं हिन्दी में रिपोर्टिंग करता हूँ । पर मराठी में भी मुझे रिपोर्ट लिखने में    कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि मराठी भाषा भी देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है ।
मोहिनी : वाह ! क्या खूब बात कही आपने ! भई कैलाश, तुम्हारे पत्रकार दोस्त तो उम्र में छोटे होकर भी इतनी   गहरी बात कहते हैं । लेकिन भैया, सब लोग तो आपकी तरह नहीं सोचते । आजकल जो कुछ मुंबई में और    उसके आसपास चल रहा है, उससे मुझे बहुत दुख पहुँचता है । अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए लोकल         लोगों को गुमराह किया जा रहा है, उन्हें घृणा और हिंसा के पथ पर धकेला जा रहा है । शिवाजी महाराज       के नाम का कैसा दुरुपयोग कर रहे हैं ख़ुदगर्ज़ लोग ! शिवाजी महाराज तो सांस्कृतिक एकता और       सहिष्णुता के अग्रदूत थे । जिस तरह की संकीर्णता उनके नाम पर फैलाई जा रही है, उससे तो वे कोसों दूर    थे ।
कैलाश : लेकिन लोकल लोग गुमराह हो क्यों रहे हैं ? क्या वजह है इसकी ?
सुनील : कैलाश, वास्तव में लोकल लोगों के मन में बरसों से दबे हुए रोष को एक व्यक्ति ने बड़ी सरलता से अपनी           राजनीतिक गोटी लाल करने के लिए भुना लिया है । दरअसल बरसों से मुंबई और उसके आसपास के क्षेत्रों         में लोगों ने अपने लिए तो बहुत कुछ किया, बहुत-से लोगों ने करियर बना लिया तो बहुत-से लोगों ने         व्यापार में धन कमा लिया । मुंबई तो सपनों की नगरी के नाम से मशहूर है ही । पर इस सब के बीच किसी ने भी वहाँ इनफ़्रास्ट्रक्चर डेवलप करने की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जिससे स्थानीय लोगों को         रोज़गार मिलता और उनके भी जीवन-स्तर में सुधार होता । नतीज़ा यह निकला कि बाहर से आए    महत्वाकांक्षी लोग तो आगे बढ़ते गए जबकि वहाँ पीढ़ियों से बसे हुए स्थानीय लोग बहुत पीछे रह गए ।     उनके लिए नौकरियां कम पड़ गईं, रोज़गार के अवसर कम पड़ गए । इसी बात का रोष लंबे समय से           उनके भीतर दबा था जिसे जुबान नहीं मिल रही थी और जिसे मौका देखकर एक व्यक्ति ने आसानी से     अपने हक़ में भुना लिया । हमारी युवा-शक्ति की असली समस्या तो बेकारी ही है जिसके कारण उसकी          असीम ऊर्जा का सदुपयोग नहीं हो पाता । इसीलिए दुरुपयोग होता है । युवा पीढ़ी की ऊर्जा को जब कोई    सही दिशा न मिले तो क्षुद्र राजनीतिज्ञों और अपराधियों को मौका मिल जाता है उसे ग़लत दिशा में ले         जाने का । यह आज़ाद भारत में कोई नई बात तो है नहीं ।  
देवसरे : बिलकुल ठीक कहा सुनील बाबू आपने । अभी-अभी आप सहनशीलता की जो बात कह रहे थे, दरअसल यही वो पाठ है जो कि अपनी कुंठाओं के चलते हमारी युवा पीढ़ी पढ़ नहीं पा रही । किसी एक क्षेत्र में बहुसंख्यक समुदाय के लोग गुमराह होकर बेगुनाह अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ढाते हैं तो उन पीड़ित लोगों के     मूल क्षेत्र में वहाँ के बहुसंख्यक लोग ज़ुल्म करने वालों के ग़लत काम का प्रतिशोध दूसरे निर्दोष लोगों से         लेते हैं जो कि वहाँ पर अल्पसंख्यक हैं और अपना बचाव नहीं कर सकते । व्यक्ति की प्रादेशिक या सांस्कृतिक पहचान के आधार पर उसे शत्रु मान लिया जाता है, अपने समुदाय के लोगों पर हुए अत्याचार   का उत्तरदायी मानकर प्रतिशोध लेने के लिए टारगेट बना लिया जाता है . . .
सुनील : (बीच में ही) और अपना तथाकथित विरोध दर्ज़ करने के लिए जमकर तोड़फोड़ और हिंसा की जाती है   चाहे उससे उन लोगों पर कोई असर पड़े या नहीं जिनके प्रति विरोध व्यक्त किया जा रहा है । हक़ीक़त में     जो ग़लत काम कथित रूप से वे कर रहे हैं, वही ये भी करने लगते हैं यह कहकर कि हम तो उनके ग़लत         काम के विरोध में यह सब कर रहे हैं ।
मोहिनी : क्यों न करें ? तोड़फोड़, आगज़नी और हिंसा तो विरोध करने का आसान तरीका है । इसकी आड़ में      अपराध करने का लाइसेन्स भी मिल जाता है । निर्माण कठिन है, विध्वंस सरल । लोगों को तो आसान     रास्ता ही चाहिए न ! मुश्किल काम कौन करे ?
देवसरे : (अपनी अधूरी बात का सिरा पकड़कर) इस तरह हमारी इनटॉलरेंस का नतीज़ा यह निकलता है कि एक ग़लत वारदात से कई ग़लत वारदातों की पूरी चेन ट्रिगर हो जाती है । अब उत्तर-भारतीय कामगारों पर         महाराष्ट्र में हुए ज़ुल्म का बदला यहाँ के स्थानीय लोग हम जैसे मराठियों से लेने पर तुले हैं । मुंबई में   मराठी मानूसों के हितों के झंडाबरदार बने बैठे एक नेता और उसके पिछलग्गुओं के काले कारनामों का        ज़िम्मेदार आम मराठियों को ठहराया जा रहा है । इस तरह से तो यह आग कभी बुझेगी ही नहीं । देश के     अलग-अलग भागों के लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे । धर्म और जाति आधारित अलगाववाद की        जड़ें तो पहले ही बहुत गहरी जम चुकी हैं । उस पर यह कोढ़ में खाज । देश तो टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा ।
सुनील : दरअसल अपनी राजनीति चमकाने और मराठी वोट बैंक को बनाए रखने के लिए दूसरे दलों के नेता भी उन्हीं महाशय के सुर में सुर मिला रहे हैं । लेकिन खास बात यह है दादा कि आम मराठियों की कोई     आवाज़ इसके विरोध में सुनाई नहीं दे रही जबकि सब जानते हैं कि आम मध्यवर्गीय भारतीयों के सपनों   की नगरी मुंबई अपने कॉस्मोपॉलिटन नेचर के कारण ही आज सारी दुनिया में भारत की आर्थिक      राजधानी का दर्ज़ा पाती है । अगर केवल मराठी ही वहाँ रहें और पनपें तो देखते-ही-देखते उसकी आर्थिक समृद्धि को ग्रहण लग जाएगा । यह बात अगर आम मराठी लोग समझें और बाहरी लोगों की खिलाफ़त की बेजा मुहिम के प्रति अपनी असहमति दर्ज़ कराएं तो उत्तर-भारतीयों के बीच उनकी छवि न बिगड़े ।
देवसरे : आम मराठी भी आम हिंदुस्तानी की तरह ऐसे दंगाई नेताओं और उनके भीड़तंत्र के उत्पात से डरता है     सुनील । जान सबको प्यारी है । पर तुम्हारी बात भी सच ही है कि अगर उनके बीच से ऐसी आवाज़ न     उठी तो वे उत्तर-भारतीयों के बीच ग़लत ही समझे जाने लगेंगे । प्रभावशाली लोगों को सच बोलने और         सच की हिमायत करने का जोखिम लेना ही चाहिए । वरना हाल यही है और रहेगा कि जैसे महाराष्ट्र में       उत्तर-भारतीयों का जीना मुश्किल होता जा रहा है, वैसे ही उत्तर-भारत के प्रभावित क्षेत्रों में मराठियों के    प्रति वैमनस्य बढ़ता जाएगा हालांकि इन निर्दोष लोगों का मुंबई में बैठे उस शख़्स या उसके कलुषित          दर्शन से कोई लेना-देना नहीं है ।
कैलाश : देश की आज़ादी के आने की आहट सुनाई देने के साथ ही भी तो यही हुआ था दादा । तब भी तो दो       मजहबी समुदायों के लोग एकदूसरे के जान-माल-आबरू के प्यासे हो उठे थे । एक तरफ ज़ुल्म होता था तो          उसका बदला दूसरी तरफ़ भी ज़ुल्म से ही लिया जाता था । यानि कि बदला लेने वालों के लिए निहत्थे         और मासूम लोग सॉफ़्ट टारगेट बन जाते हैं और वास्तविक अपराधी हमेशा छुट्टे घूमते रहते हैं, इधर भी       और उधर भी । तब तो आग को बुझाने के लिए एक गाँधी मौजूद था जो अपना तन-मन-जीवन सब वारकर निहत्था ही निकल पड़ा था शोलों के बीच । अब तो वोटों के सौदागर रह गए हैं हर जगह जिनका      उल्लू आग को और ज़्यादा भड़काने से सीधा होता है, बुझाने से नहीं । 
मोहिनी : यूँ मायूस होकर बात न करो कैलाश । आज गाँधी नहीं तो क्या हुआ, तुम्हारे और सुनील जैसे सही सोच           वाले युवा तो हैं । ऐसे हर युवा में एक गाँधी छुपा है ।
सुनील : मुंबई की हिंसा और उसके जवाब में यहाँ फैल रही हिंसा के पैरोकार भूमि-पुत्र की कॉन्सेप्ट को हवा दे रहे          हैं । जो जहाँ जन्म है, वो उनके हिसाब से वहाँ का भूमि-पुत्र है । उसे वहीं उसका हक़ दिया जाए और बाहरी लोगों को रोका जाए । इस हिसाब से तो ग्लोबलाइज़ेशन तो दूर की बात है, स्पैशलाइज़ेशन और         मूवेबिलिटी ऑफ़ लेबर जैसी बेसिक इकॉनॉमिक कॉन्सेप्ट्स ही बेमानी हो जाती हैं । हमारे यहाँ तो न जाने    कब से कहा जाता रहा है – सबै भूमि गोपाल की । जब समूची भूमि गोपाल की ही है तो सभी भूमि-पुत्र हैं । फिर यह संकुचित अर्थ वाली भूमि-पुत्र की अवधारणा तो हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर के ही     विरुद्ध है । पर बेकारी से जूझते और हिंसा से गरमाए लोगों को यह बात कैसे समझ आए ?
कैलाश : दादा, ज़रा न्यूज़ लगाकर देखो, कुछ नया हुआ है क्या ?

(देवसरे न्यूज़ चैनल लगाता है, कैलाश स्क्रीन पर नवीनतम समाचारों की सुर्खियां पढ़ने लगता है)

कैलाश : (पढ़ते हुए) मुंबई में उत्तर-भारतीयों के खिलाफ़ व्यापक हिंसा । दो मरे । तेरह घायल । सरकार द्वारा     मृतकों को पचास-पचास हज़ार रुपये तथा घायलों को बीस-बीस हज़ार रुपये का मुआवज़ा देने की घोषणा   । (वितृष्णापूर्वक) मुआवज़ा ! ज़िन्दगी का मुआवज़ा ! हुंह !
मोहिनी : (व्यथित भाव से) भैया, यही तो होता है हमारे देश में । मज़लूम को इंसाफ़ नहीं मुआवज़ा दिया जाता है         । देह के अंग का मुआवज़ा ! इंसान की जान का मुआवज़ा ! औरत की आबरू का मुआवज़ा ! मज़लूम को      इंसाफ़ दिलाने की कोई ज़रूरत नहीं समझता ।
सुनील : (व्यंग्य से) इंसाफ़ कैसे दिलाया जाए ? इंसाफ़ दिलाने से वोट थोड़े ही मिलते हैं बऊदी । अमरीका में नौ ग्यारह की घटना के पीड़ितों के परिवारों के लिए कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया मगर सुरक्षा-तंत्र को ऐसा    चौकस किया गया कि फिर कोई ऐसी वारदात न हो । हमारे यहाँ बस मुआवज़े दिए जाते हैं । फिर कोई       दुर्घटना । फिर मुआवज़ा । हादसों का होना रोकने से तो वोट-बैंक मजबूत नहीं बनता न ? लोगों की           भावनाएं भड़काने के लिए बुरी घटनाएं ही तो आधार बनती हैं । उन्हें वोटों के तलबगार भला क्यों रोकने     लगे ?

(अचानक स्क्रीन देखकर कैलाश बुरी तरह चौंक उठता है)

कैलाश : (उद्वेलित होकर) ये क्या ? यह इलाका तो मेरा जाना-पहचाना है । अरे, वो मेरा बुटीक ! हे भगवान !    आग लगा दी उसे लोगों ने ! मेरे असिस्टेंट्स को पीटा जा रहा है !

(तभी उसका मोबाइल बजता है)

कैलाश : (मोबाइल पर कॉल रिसीव करके कहता है) हाँ नार्वेकर ! हाँ, मैं टी. वी. पर देख रहा हूँ । तुम तो ठीक हो          ना ? मैं जल्दी ही पहुँचता हूँ । (मोबाइल ऑफ़ करके विषादपूर्ण स्वर में देवसरे से संबोधित होते हुए) मैं       लुट गया दादा ! मेरा बुटीक तो इंश्योर्ड भी नहीं था । मैंने बैंक से लोन ले रखा है । पार्टियों से एडवांस ले        रखे हैं । अपना फैशन शो तक प्लान कर रखा था । सब खतम हो गया । कैसे चुकाऊंगा लोगों के पैसे ? क्या    करूंगा अब ?

          (उसका स्वर रूआँसा हो उठता है और अपनी बात पूरी होते-होते वह रो पड़ता है । मोहिनी लपककर उसे           संभालती है । वह ज़मीन पर बैठ जाता है और रोते-रोते मोहिनी की गोद में अपना सर टिका देता है)

मोहिनी : (द्रवित होकर उसके सर पर हाथ फेरते हुए) कैलाश ! कैलाश मेरे भैया ! यूँ जी छोटा न करो । अभी     तुम्हारे साथ हम हैं न ? तुम्हारे       दादा हैं न सब संभालने के लिए ? बच्चे की तरह न रोओ । मजबूत बनो ।
देवसरे : कैलाश ! बहादुर बनो । सामना करो हालात का । अरे फाइनांशल इश्यू की फ़िक्र न करो । मैं संभालूंगा   उन मामलों को ।
कैलाश : (सर उठाकर मायूसी से) क्या-क्या संभालेंगे दादा ? अपने करियर में क्या सदा आपके अहसान ही लेता रहूं ?
देवसरे : (कैलाश के कंधे पर हाथ रखकर) धत् पगले ! दादा भी कहता है और अहसान की बात भी करता है
          ! बड़े भाई का कहीं छोटे भाई पर अहसान होता है ? पंदरह साल हो गए मुझे पटना आए हुए । तेरे        स्वर्गवासी बाबूजी का हाथ मेरी पीठ पर न रहा होता तो मैं क्या कर पाता इस परदेस में ? आज मैं जो भी हूँ, उन्हीं की बदौलत हूँ । हम लोगों के परिवारों में कोई फ़र्क है भला ?
मोहिनी : (स्नेहपूर्वक) कैलाश, मेरे और तुम्हारे दादा के लिए जैसे हमारा संजय है, वैसे ही तुम हो । जितना प्यार हम अपने बेटे को करते हैं, उससे कम तुम्हें नहीं करते । इसलिए ख़ुद को अकेला या बेसहारा कभी महसूस   न करना । घर जाकर पहले अपनी माँ को ढाढ़स बंधाना । उन्हें भी तो यह जानकर धक्का लगेगा ।

(सुनील यह देखकर भावुक हो जाता है । वह कुछ कहने जा रहा होता है कि
 तभी उसके मोबाइल की घंटी बजती है । वह कॉल पिक करता है)

सुनील : (मोबाइल पर) हाँ अर्जुन । बोलो । क्या ? अरे ! अच्छा तुम कैमरे के साथ वहीं पर हो  ! मैं आ रहा हूँ ।
सुनील : (मोबाइल ऑफ़ करके प्रश्नसूचक दृष्टि से उसे देख रहे बाकी लोगों से) क्षमा कीजिए । मुझे तुरंत निकलना होगा । कलेक्टरेट रोड पर हिंसक भीड़ ने कई बसों और अन्य वाहनों को आग लगा दी है और ज़बरदस्त   तोड़फोड़ चल रही है । मेरा कुलीग अर्जुन वहाँ पहुँच गया है । मुझे भी वहीं पहुँचना है । 
कैलाश : यह क्या हो रहा है सुनील ? क्या सार्वजनिक संपत्ति और अन्य लोगों के जानोमाल को नुकसान पहुँचाने से मुंबई के पीड़ित उत्तर-भारतीयों के ज़ख़्मों पर मरहम लग जाएगा ? क्या यह अंधी, विवेकहीन हरकतें      समस्या को सुलझाने की जगह और नहीं उलझा देंगी ?
सुनील : तुम ठीक कह रहे हो । यह बात लोगों को समझानी होगी । पर अभी बातें करने का वक़्त नहीं है । सॉरी कैलाश ! मैं तुम्हें अपनी बाइक पर बैठाकर लाया था मगर अभी मैं तुम्हें वापस तुम्हारे घर तक नहीं छोड़      पाऊंगा । तुम दादा की मदद से वापस चले जाना ।
कैलाश : मैं तुम्हारे साथ चलूंगा सुनील । तुम अपना कवरेज करना । मैं जुनून में अंधे हो चुके लोगों को और ज़्यादा           पागलपन करने से रोकने का प्रयास करूंगा ।
मोहिनी : पागल हुए हो कैलाश ? अरे जुनून में अपने होशोहवास खो चुकी भीड़ किसकी सुनती है ? ऐसा ख़तरा न           उठाओ भैया ।
कैलाश : ताई, थोड़ी देर पहले ही तो तुमने कहा था कि आज गाँधी नहीं तो क्या हुआ ? मुझ जैसे सही सोच वाले युवा तो हैं । आज जब मैं ख़ुद इस जुनून का शिकार बन चुका हूँ तो मुझसे ज़्यादा इस विनाश के दर्द को         कौन समझ सकता है ? मैं जाऊंगा ताई । सर पे कफ़न बांधकर जाऊंगा । मुझे कुछ हो जाए तो माँ का        ख़याल रखना । मुझे आशीर्वाद दो । 
देवसरे : जाओ कैलाश । गणपति बप्पा तुम्हारी रक्षा करें ।
सुनील : जल्दी करो कैलाश ! अभी वक़्त नहीं है ।

(कैलाश भावुक होकर गिरीश देवसरे और मोहिनी के चरण छूता है । मोहिनी कुछ नहीं कह पाती ।
उसका गला रूंध जाता है । कैलाश और सुनील तेज़ी से निकलते हैं)

सुनील : (निकलते-निकलते) घर को बंद करके सावधानी से बैठिए दादा । भीड़ का आक्रोश कहीं मराठी समुदाय   की ओर न घूम जाए । प्लीज़ ! टेक केअर ।

(गिरीश देवसरे की मुखमुद्रा गंभीर हो उठती है । वह चेहरे पर दृढ़ निश्चय के भाव लिए द्वार बंद करता है)

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य दो
स्थान : कलेक्टरेट रोड, पटना
समय : रात साढ़े नौ बजे के करीब 

     (सुनील और कैलाश बाइक पर वहाँ पहुँचते हैं । भीड़ तोड़फोड़ में लगी है । विरोध करने वालों पर उन्मादी           लाठियां, हॉकियां, साइकल चेन आदि लेकर पिले पड़े हैं । कुछ पुलिस वाले एक ओर खड़े होकर   तमाशाइयों की तरह देख रहे हैं । एक ओर सुनील का कनिष्ठ पत्रकार अर्जुन एक ऑटोरिक्शा की ओट में          खड़ा होकर प्रैस रिपोर्टरों के विशेष कैमरे से भीड़ की हरकतों की तस्वीरें खींच रहा है )

अर्जुन : (सुनील को आया देखकर तीव्र स्वर में) गुरुजी इधर ! मैं इधर हूँ ।

(सुनील और कैलाश अर्जुन के पास पहुँचते हैं । सुनील बाइक को वहीं एक आड़ में खड़ी कर देता है)

अर्जुन : अब आपके यहाँ पहुँचने से कोई फ़ायदा नहीं हुआ गुरुजी । अब तो ये लोग रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ेंगे उसे           फूंकने के लिए । अभी-अभी भीड़ के नेता ने यह ऐलान किया है ।
कैलाश : (भीड़ के नेता को देखकर) अरे यह तो मुरारी है ! मेरा कॉलेज का साथी । दादागिरी से नेतागिरी में शिफ़्ट         कर रहा है ?
मुरारी : (ओजपूर्ण स्वर में भीड़ से संबोधित होते हुए) चलो भाइयों रेलवे स्टेशन की तरफ़ । मुंबई जाने वाली कोई           गाड़ी रवाना नहीं होगी । हुई तो स्टेशन को फूंक देंगे ।

(हॉकियों और लाठियों को हाथों में ऊपर उठाकर भीड़ हुंकारती है – चलो स्टेशन !')

कैलाश : (झपटकर भीड़ के आगे आते हुए) नहीं कोई आगे नहीं बढ़ेगा । भाइयों, अक्ल करो । अपने ही देश की     संपत्ति को नष्ट करके हम किसका बुरा करेंगे ? अपना ही न ? गाड़ियों को रोककर हम न जाने कितने ही      भाईबहनों को तकलीफ़ देंगे जिनमें क्या केवल मुंबई वाले या मराठी ही होंगे ? हम जैसे हिन्दी-पट्टी वाले      नहीं होंगे ? यह वक़्त होश करने का है, होश खोने का नहीं ।
मुरारी : अरे कैलाश तू ! पढ़-लिखकर और फैशन डिज़ाइनर बनाकर मुंबई में पैसा पीटने लगा तो भाषण देना आ           गया तुझे ! लगता है, बिहारी भाइयों पर जो गुज़र रही है वहाँ, तू उससे अछूता ही है । तभी ज्ञान बांट          रहा है ।
कैलाश : नहीं मुरारी । मैंने थोड़ी देर पहले ही न्यूज़ में देखा है कि मुंबई में भीड़ ने मेरा बुटीक जला दिया । मैं खड़े         पैर तबाह हो गया हूँ मुरारी । मगर फिर भी मैं बुराई के बदले बुराई करने का समर्थक नहीं बन सकता ।       बुराई चाहे यहाँ हो या वहाँ, ग़लत ही है ।
मुरारी : (उपहासपूर्ण स्वर में भीड़ से कहता है) देखो भाइयों देखो ! ऐसे-ऐसे पढ़े-लिखे पागल हैं हमारे यहाँ !      इसका अपना बुटीक जला दिया मुंबई में वहाँ के लोकल लोगों ने । ख़ुद बरबाद हो गया है । मगर फिर भी        धर्मात्मा बनकर भाषण दे रहा है । हमें सिखा रहा है कि हम कायरों की तरह वहाँ अपने भाइयों पर हो    रहे ज़ुल्म का तमाशा देखें । वहाँ मराठी मानूस का नारा लगाकर हमें निकाल बाहर किया जा रहा है तो    हम भी दिखा देंगे कि अभी हमारा खून सफेद नहीं हुआ है जो चुपचाप सहते चले जाएं ।
कैलाश : महाराष्ट्र में बदअमनी और नफ़रत फैला रहे असली अपराधियों तक पहुँचने की हममें कूव्वत नहीं तो क्या         हम बहके हुए ज़िद्दी बच्चे की तरह अपना गुस्सा पब्लिक प्रॉपर्टी और बेगुनाह लोगों पर निकालें ? ऐसा          करके क्या हम भी उन ग़लत काम कर रहे लोगों जैसे ही नहीं बन रहे ? ऐसे में क्या फ़र्क रह जाता है उनमें और हममें ? दोनों ही तो एक जैसे गुनाहगार बन जाते हैं फिर । (एक गहरी सांस लेकर) भाइयों, हम         तमाशाई बनकर नहीं रहेंगे । मैं मुंबई जाऊंगा । सियासी शतरंज का मोहरा बनकर गुमराह हो रहे मराठी          भाइयों को समझाऊंगा । उन्हें भी ऐसे ही रोकूंगा । पर आप लोग अभी मेरी बात मानिए । प्लीज़, मारपीट   और तोड़फोड़ छोड़कर पहले घायल लोगों को हस्पताल पहुँचाइए ।
मुरारी : (भीड़ से) लो भाइयों ! और सुनो ! हम चले थे अपने भाइयों की दुरगत का बदला लेने और अपनी आवाज़           सरकार तक पहुँचाने । और यह बुड़बक आ गया हमें नर्स और अरदली बनाने । मारो साले को !

(उन्मादित भीड़ कैलाश पर टूट पड़ती है)

सुनील : अर्जुन, तुम कैमरे के साथ फूटो और अपनी रिपोर्ट दाख़िल करो । सवारी है न तुम्हारे पास ?
अर्जुन : मैं स्कूटर पर आया हूँ । निकलता हूँ । मेरे ख़याल से पुलिस भी आती ही होगी गुरुजी । एक्टिव पुलिस ! जो        इन तमाशाई पुलिस वालों से अलग रैंक की होगी और एक्शन लेगी ।
सुनील : ठीक है । तुम जाओ । मैं कैलाश को बचाता हूँ ।

(सुनील भीड़ के हाथों पिट रहे कैलाश की ओर भागता है)

कैलाश : (अपने आपको बचाते हुए) रुको भाइयों रुको ! मत मारो मुझे । नहीं तो मुझे भी अपने बचाव में हाथ    उठाना होगा ।
भीड़ में से कोई : (देशी कट्टा निकालकर) तू क्या हाथ उठाएगा बे ? ले, तेरी अकल अभी ठिकाने लगाए देते हैं ।

(देशी कट्टे से कैलाश की ओर फ़ायर करता है । फ़ायर करते समय ही तब तक वहाँ पहुँच चुका सुनील
उससे टकरा जाता है । निशाना चूकने पर भी गोली कैलाश की टांग में लगती है । वह चीख
मारकर गिरता है । तभी पुलिस के सायरन की आवाज़ गूँजती है और हवाई फ़ायर होते हैं ।
भीड़ तितर-बितर होकर भागने लगती है । पुलिस की जीप आकर रूकती है और
सुनील का परिचित पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर प्रभुदयाल जीप से उतरता है)

सुनील : (प्रभुदयाल के पास जाकर शिकायत भरे स्वर में) प्रभु, कितना कुछ हो गया, तब आए हो ! ये पहले से    मौजूद पुलिस वाले महज तमाशाई बनकर खड़े हैं ।
प्रभुदयाल : (व्यंग्य से) भई, पुलिस वाले को भी अपनी जान प्यारी होती है । उसके भी बीवीबच्चे होते हैं । भीड़             कोई पुलिस की वर्दी देखकर बख़्श थोड़े ही देती है । भीड़ तो थाने-के-थाने जला डालती है । (घायल   कैलाश को देखकर) इन्हें तो गोली लगी मालूम होती है ।
सुनील : प्रभु, ये मेरे दोस्त कैलाश प्रसाद हैं । भीड़ को शांत करने की कोशिश में गोली खा बैठे । इन्हें तुरंत         हस्पताल पहुँचाना है ।
प्रभुदयाल : एंबुलेंस आ रही है ।

(तभी वहाँ एक मारूति वैन आकर रूकती है और उसमें से गिरीश देवसरे और मोहिनी बाहर निकलते हैं)

देवसरे : कैलाश ! मेरे भाई ! अरे ये क्या हो गया तुम्हें ?
कैलाश : (कराहते हुए) दादा, आप क्यों आ गए यहाँ ?
मोहिनी : छोटा भाई ख़तरे के मुँह में चला जाए और बड़े भाई-भाभी घर में मुँह छुपकर बैठे रहें, ऐसा नहीं होता कैलाश । तुम्हारे दादा तुम्हारी मदद के लिए तुम्हारे पीछे जाने का फ़ैसला पहले ही कर चुके थे । सो         तुम्हारे जाने के बाद कुछ ही मिनटों में हम भी निकल पड़े ।
कैलाश : (क्षीण स्वर में) इतनी फ़िक्र है मेरी ?
मोहिनी : (आर्द्र स्वर में) नहीं होगी क्या ?
देवसरे : (प्रभुदयाल से) इंस्पेक्टर, मैं गिरीश देवसरे । देवसरे रीयल एस्टेट लिमिटेड का सी.एम.डी. हूँ ।
प्रभुदयाल : मैं परिचित हूँ आपसे । पटना की जानी-मानी हस्ती हैं आप । कौन नहीं जानता इस शहर में आपको ?
देवसरे : इंस्पेक्टर, कैलाश मेरे भाई जैसा है । अगर आपकी इजाज़त हो तो मैं इसे अपनी जान-पहचान के एक    प्राइवेट नर्सिंग होम में ले जाऊं ?
प्रभुदयाल : ठीक है । कहाँ ले जाना चाह रहे हैं आप इन्हें ?
देवसरे : खरे हीलिंग होम जो कि . . .
प्रभुदयाल : मैं जानता हूँ । ऑल राइट । आप इन्हें वहाँ ले जाइए । अगर एफ़.आई.आर. के लिए कहा जाए तो मेरा           हवाला दे दीजिए । ज़रूरत पड़े तो मुझसे 9490441562 पर बात करवा दीजिए ।

(देवसरे, मोहिनी और सुनील घायल कैलाश को सहारा देकर वैन में बैठाते हैं)

एक स्वर : हम ग़रीबों की भी कोई सुध ले लो भाई । हम भी बुरे हाल में हैं ।

(सभी चौंककर आवाज़ की दिशा में देखते हैं जहां दो आकृतियां भूमि पर गिरी पड़ी हैं)

प्रभुदयाल : कौन हो तुम लोग ?

(उन दो व्यक्तियों में से एक कराहते हुए हौले से उठता है और क्षीण स्वर में बोलता है)

साधु : मैं साधु हूँ और यह है मेरा साथी नारायण । हम दोनों पास ही कंस्ट्रक्शन साइट पर मज़दूरी करते हैं ।      मजदूरी के बाद एक ढाबे पर चाय-नाश्ता करने में टाइम लग गया और फिर यहाँ भीड़ में फँस गए । हम      दोनों की किसी ने नहीं सुनी और हम बचकर निकल भी नहीं सके । नारायण को तो इतना पीटा गया है        कि यह पिछले आधे घंटे से बेहोश है । न हमें पुलिस ने बचाया, न इस हाल में पड़े रहने पर भी किसी ने        मदद की ।
प्रभुदयाल : तुम थोड़ा ठहरो । अभी सरकारी एंबुलेंस आ रही है । उसमें तुम लोगों को हस्पताल पहुँचाते हैं ।
देवसरे : इंस्पेक्टर, वैन में काफ़ी स्कोप है । ये बेचारे बहुत देर से घायल अवस्था में हैं । मैं इन्हें कैलाश के साथ ही           हस्पताल ले जाता हूँ ।
प्रभुदयाल : इनके इलाज का बिल भी क्या फिर आप भरेंगे ?
देवसरे : हाँ इंस्पेक्टर । ईश्वर ने बहुत दिया है । जितना मानवता के काम में लग जाए, उतने को ही मैं सार्थक      समझता हूँ ।
प्रभुदयाल : ठीक है फिर ।

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य तीन
स्थान : खरे हीलिंग होम के भीतर
समय : रात ग्यारह बजे के करीब 

(कैलाश पलंग पर पड़ा है । डॉक्टर खरे, देवसरे, मोहिनी और सुनील उसके नज़दीक खड़े हैं)

डॉक्टर खरे : गनीमत यह रही कि गोली हड्डी से नहीं टकराई और मोटे माँस को फाड़ती हुई बाहर निकल गई ।    इसीलिए डैमेज ज़्यादा नहीं हुआ । स्टिचेज़ दे ही दिए हैं । अब इन्हें चाहिए बस प्रॉपर न्यूट्रीशन और फ़ुल   रैस्ट । जल्दी ही ठीक हो जाएंगे ।

(तभी डॉक्टर लाल उत्तेजित अवस्था में भीतर प्रवेश करता है)

डॉक्टर लाल : डॉक्टर खरे, मैं उस घायल मज़दूर का इलाज नहीं करूंगा जो बेहोश पड़ा है । और मेरी आपसे यह           गुज़ारिश है कि उसे नर्सिंग होम में भर्ती मत कीजिए । उसे जहाँ जाना है, जाकर अपना इलाज करवाए ।
डॉक्टर खरे : क्या बात है डॉक्टर लाल ? आप उस मज़दूर का इलाज क्यों नहीं करना चाहते और उसके नर्सिंग    होम में भर्ती होने में आपको क्या समस्या है ?
डॉक्टर लाल : अभी पेपर वर्क के चलते मुझे उसके साथी मज़दूर से उसका पूरा नाम पता चला । वो मराठी है । मैं           किसी मराठी आदमी का इलाज नहीं करूंगा । ऐसा कोई आदमी खरे हीलिंग होम में भर्ती नहीं होगा । ये   लोग मराठी मानूस हैं, जाएँ अपने महाराष्ट्र में ।
डॉक्टर खरे : डॉक्टर लाल, आप होश में तो हैं ? जानते भी हैं, क्या कह रहे हैं ? पटना का सबसे प्रतिष्ठित नर्सिंग           होम क्या अब इस लेवल पर आ गया है कि मरीज़ की जातपांत, धर्म और प्रदेश के आधार पर उसका   इलाज करने या न करने का निर्णय करे ?
डॉक्टर लाल : यह लेवल इन मराठियों के अपने रवैये के चलते ही आया है डॉक्टर खरे । आप भूल गए कि पिछले          हफ़्ते ही मेरा छोटा भाई रेलवे की परीक्षा देने के लिए मुंबई गया और इन्हीं लोगों के हाथों पिटकर,     अपमानित होकर और अपने पैर में फ्रैक्चर करवाकर वापस आया । यह तो लेने का देना है । जैसा ये लोग      अपने राज्य में हम लोगों के साथ कर रहे हैं, वैसा ही तो ख़ुद भुगतेंगे ।
डॉक्टर खरे : डॉक्टर लाल ! शेम ऑन यू ! अगर हम पढ़े-लिखे लोग भी ऐसी संकीर्ण मानसिकता के साथ चलेंगे तो           अंधेरे में भटक रहे गुमराह लोगों को कौन रोशनी दिखाएगा ? क्या आप हिप्पोक्रेटस ओथ को भूल गए ? क्या हमारे नोबल प्रोफ़ेशन को जॉइन करते समय आपने यही सीखा कि हम अपने मरीज़ों में जाति, धर्म,     प्रदेश, कल्चर वग़ैरह के आधार पर भेदभाव करेंगे ?
डॉक्टर लाल : लैक्चर झाड़ने की ज़रूरत नहीं है डॉक्टर खरे ! जब ख़ुद पर गुज़रती है न तो सारे लैक्चर बेमानी लगने लगते हैं । अगर आप चाहें तो मैं अभी खरे हीलिंग होम से रिज़ाइन कर सकता हूँ । मगर मैं अपने        नज़रिये पर फ़र्म हूँ । जैसे को तैसा ही होगा ।
डॉक्टर खरे : आप जो आपके जी में आए, करें डॉक्टर लाल । अगर आप उस पेशेंट को अटेण्ड नहीं कर रहे हैं तो मैं         उसे देखता हूँ । तब तक आप मिस्टर देवसरे से बात कीजिए । ये भी मराठी हैं मगर इनके दिल में कितनी       इंसानियत है, ज़रा झांककर देखिए । बिना किसी भेदभाव के इन मजदूरों के इलाज का खर्चा भी ये ही         उठा रहे हैं । नाऊ एक्स्क्यूज़ मी प्लीज़ ।

(लंबे-लंबे कदमों के साथ बाहर निकल जाता है)

देवसरे : (आत्मीयतापूर्वक डॉक्टर लाल से) आपके भाई के साथ जो कुछ हुआ, बहुत बुरा हुआ डॉक्टर साहब ।     अगर उसी का दर्द आपको सोच को यूँ मोल्ड कर रहा है तो आपका गुनाहगार मैं हूँ, मुझ जैसा हर मराठी है   जो या तो ख़ुद इस पागलपन में शरीक है या चाहकर भी इसे रोक नहीं पा रहा । मैं शर्मिंदा हूँ कि हमारे         यहाँ ऐसी दूषित मानसिकता वाले स्वार्थी नेता हैं जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए लोगों को   गायभेड़ों की तरह अंधी गली में हाँक रहे हैं ।
डॉक्टर लाल : आप शायद देवसरे रीयल एस्टेट वाले मिस्टर देवसरे हैं । है न ?
देवसरे : जी डॉक्टर साहब ।
डॉक्टर लाल : आपने तो वहाँ से यहाँ आकर इतना बड़ा एम्पायर खड़ा कर लिया । दोनों हाथों से कमाया । आज करोड़ों में खेलते हैं । इसीलिए आपको इतनी बड़ी-बड़ी बातें आ रही हैं । उनका दर्द आप क्या जानें जिनको वहाँ जाकर दो जून की रोटी कमाने से भी रोका जा रहा है ? करोड़ों कमकर थोड़ा-बहुत घायलों के इलाज     पर खर्च कर दिया तो आप धर्मात्मा नहीं बन गए ।
देवसरे : मैं ऐसा कोई दावा कर भी नहीं रहा डॉक्टर साहब । ईश्वर मुझे अहंकार से बचाए रखे, मैं यही प्रार्थना    करता हूँ । पर मुंबई के गुनाहगारों को आप आम मराठियों का प्रतिनिधि न मानिए प्लीज़ ।
कैलाश : डॉक्टर साहब । वहाँ कष्ट उठाने वाला अकेला आपका भाई ही नहीं । मैं भी बहुत बड़ा नुकसान सह चुका          हूँ । मगर फिर भी . . .  
डॉक्टर लाल : मगर फिर भी क्या ?
सुनील : मगर फिर भी यह डॉक्टर लाल कि कैलाश गुमराह लोगों की भेड़चाल के साथ नहीं जुड़ा । इसने अपने   विवेक और इंसानियत के दामन को नहीं छोड़ा । मुंबई में इसका बुटीक जला दिया गया है । यह आर्थिक       रूप से तबाह हो गया है । मगर फिर भी अभी इसने जुनूनी भीड़ का सीना तानकर निहत्थे ही सामना        किया जो बेगुनाहों पर ज़ुल्म और उनकी संपत्ति की तबाही में लगी थी तथा रेलवे स्टेशन जैसी अरबों की जनसंपत्ति को खाक कर डालने पर आमादा थी । यह कैलाश के विवेक और साहस का ही परिणाम है जो       स्टेशन अभी तक सलामत है और हताहतों की संख्या इतनी कम है । अपना निजी ग़म भूलकर दूसरों को     तक़लीफ़ से बचाने निकला था यह । और देवसरे साहब भी इसी मक़सद से इसके पीछे-पीछे गए थे ।

(डॉक्टर लाल सुनील की बातें सुनकर चुप रह जाता है । उसे जवाब नहीं सूझता)

डॉक्टर खरे : (प्रवेश करके) आप लोग जाइए देवसरे साहब । सुबह मिस्टर कैलाश को देखने के लिए आ जाइएगा ।         रात को किसी के यहाँ रहने की भी ज़रूरत नहीं है । यहाँ रेज़ीडेंट डॉक्टर हैं ।
कैलाश : डॉक्टर साहब, आपसे मेरी गुज़ारिश है कि मुझे घर जाने दिया जाए । मैं पूरा आराम करूंगा और सुबह   ही वापस यहाँ चेक-अप के लिए आ जाऊंगा । मुझे मानसिक धक्का भी लगा है । यहाँ की जगह दादा के घर पर मैं बेहतर महसूस करूंगा और ख़ुद को मानसिक रूप से भी संभालूंगा ।
डॉक्टर खरे : तो आप अपने घर की जगह देवसरे साहब के यहाँ जाना चाहते हैं ।
देवसरे : यही ठीक रहेगा । मैं इसकी माँ को ख़बर कर देता हूँ कि आज रात यह मेरे यहाँ है । कल उन्हें सच्चाई बता          देंगे ।
डॉक्टर खरे : यूँ इन्हें जाने तो नहीं देना चाहिए मगर आपके स्टेटस के मद्देनज़र मैं इन्हें अपनी पर्सनल ज़िम्मेदारी पर अलाऊ करता हूँ । कल इन्हें वापस लाना आपकी ज़िम्मेदारी रहेगी क्योंकि यह सारा मामला मेडिको-     लीगल है । पुलिस भी पूछताछ के लिए आएगी ।
देवसरे : आप फ़िक्र न करें डॉक्टर साहब । मुझ पर भरोसा रखें ।
डॉक्टर खरे : तो फिर डिस्चार्ज फॉर्मेलिटी के लिए आइए मेरे साथ ।

                   (देवसरे और डॉक्टर खरे बाहर निकलते हैं । डॉक्टर लाल एक ओर बुत बना खड़ा है ।
                   तभी उसका मोबाइल बजता है)

डॉक्टर लाल : (मोबाइल पर) हाँ कला, बोलो । क्या ? नहीं ! हाँ तुम उसे संभाली रहो । मैं आता हूँ ।
सुनील : (डॉक्टर लाल के आंदोलित चेहरे को देखकर) क्या हुआ डॉक्टर साहब ? सब कुशल तो है न ?
डॉक्टर लाल : हँ . हाँ  ! क . कोई खास बात नहीं ।

                   (सुनील उसे संदिग्ध भाव से घूरता रहता है । कुछ पल शांति रहती है ।
फिर डॉक्टर खरे और देवसरे भीतर प्रवेश करते हैं)

देवसरे : मोहिनी ! सुनील ! चलो कैलाश को बाहर वैन तक ले जाने के लिए स्ट्रेचर पर शिफ़्ट करवाओ । हमें      चलना है ।

(देवसरे, मोहिनी और सुनील कैलाश को स्ट्रेचर पर लेकर बाहर निकलते हैं)

डॉक्टर खरे : हाँ डॉक्टर लाल । अब आप बोलिए । आपकी तो आज रात को यहीं पर ड्यूटी है । पर अब आपका   फ़ैसला क्या है ? आप रुके हैं या मैं जाने से पहले कोई आल्टरनेट अरेंजमेंट करूं ?
डॉक्टर लाल : मैं ड्यूटी करूंगा मगर थोड़ी देर के लिए मुझे अपने घर जाना होगा । मैं एक घंटे में वापस आ       जाऊंगा ।
डॉक्टर खरे : ठीक है ।

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य चार
स्थान : डॉक्टर लाल के घर के बाहर
समय : अर्द्धरात्रि 

(डॉक्टर लाल निढाल-सा अपने घर से निकलता है और अपनी कार की तरफ़ बढ़ता है
कि तभी ओट से निकलकर सुनील प्रेत की तरह उसके सामने प्रकट हो जाता है)

डॉक्टर लाल : यह क्या ? तुम इस तरह से मेरे घर के बाहर क्या कर रहे हो ? किसी शरीफ़ आदमी के घर के      बाहर आधी रात को इस तरह से घात लगाए बैठने का क्या मतलब है ?
सुनील : डॉक्टर लाल, मैं एक खोजी पत्रकार हूँ और न्यूज़ की ही सूंघ में आपके पीछे-पीछे चला आया था । मुझे   मालूम था कि आप अपनी ड्यूटी फिर से रिज़्यूम करने के लिए थोड़ी ही देर में घर से निकलेंगे । इसलिए मैं आपका इंतज़ार कर रहा था । आप मुझे ग़लत मत समझिए । बताइए, आप अचानक इस तरह घर क्यूँ         आए ? शायद मैं आपकी कुछ मदद कर सकूं ।
डॉक्टर लाल : (खेदपूर्ण स्वर में) मदद वाली कोई बात नहीं मेरे दोस्त । अपने भाई के साथ मुंबई में हुए दुर्व्यवहार         ने मेरा भेजा घुमा दिया था । मैं भी प्रांतीय और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त सोच का शिकार होकर तथाकथित बदले की आरज़ू लिए घूम रहे लोगों की जमात में शामिल हो गया था । मगर यह अंधा जुनून      तो ऐसे अपराधों का जन्मदाता है जिसके शिकार ख़ुद पीड़ित वर्ग के लोग ही हो रहे हैं । मेरी बीवी ने मुझे फ़ोन पर बताया था कि कॉल सेंटर से कैब द्वारा लौट रही मेरी बहन को हिंसक और अपराधी भीड़ के अंधे जुनून का सामना करना पड़ा । गुंडाई लोगों ने कैब तोड़ डाली और मेरी बहन और उसके साथ आ रही कुछ     लड़कियों के साथ ऐसी बेहूदगी पर उतारू हो गए कि उन्हें बड़ी मुश्किल से अपनी इज्ज़त बचाकर भागना          पड़ा । मेरी बहन जैसे-तैसे अस्त-व्यस्त कपड़ों में घर पहुँच पाई । वह आतंक के मारे जड़ हो गई है । बड़ी     मुश्किल से हम लोग उसे कुछ हद तक नॉर्मल कर पाए हैं । उसके इस अनुभव को देखकर तो मेरा भाई भी           अपनी पीड़ा को भूलकर अलग ढंग से सोचने लगा है । समस्या का हल तो सकारात्मक होना चाहिए ।     विध्वंस और हिंसा तो कोई हल ही नहीं । ऐसे कामों से तो पीड़ित वर्ग को ही सज़ा मिल रही है, महाराष्ट्र       में इस आग को भड़काने वाले शख्स और उसके इशारे पर वहाँ उत्पात मचाने वालों का तो कुछ नहीं बिगड़      रहा । पर यहाँ लोग अर्जुन बनने की जगह अपना ही सर्वनाश करने वाले दुर्योधन और दुःशासन बनने पर   उतारू हैं ।
सुनील : डॉक्टर साहब, इसीलिए तो कहते हैं कि आग लगाने का काम बुरा होता है क्योंकि आग लगाने वाले के    कभी-कभी अपने हाथ भी जल जाते हैं । भीड़ का हिस्सा बनकर इंसान अच्छे-बुरे का विवेक खो बैठता है ।    दूसरों का भी अहित करता है और अपना भी । भीड़ की जुनूनी गतिविधियां सैलाब की तरह होती हैं । सैलाब तो जिधर से भी गुज़रे, विनाश ही करेगा । अपने-पराए या सही-ग़लत का भेद थोड़े ही करेगा । इस           देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ राजनेता तो सारे ग़लत काम करने के बाद भी सुर्खरू होकर बच निकलते हैं           जबकि उनके बहकावे में आकर आमजन अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार बैठते हैं । इस सिचुएशन का            फ़ायदा उठाकर समाजकंटक भी भीड़ में घुस जाते हैं क्योंकि भीड़ में उनकी पहचान लुप्त हो जाती है और    वे निर्भय होकर अपराध कर सकते हैं ।
डॉक्टर लाल : तुम एक नेक और समझदार युवक लगते हो । मैं तुम्हें एक राज़ की बात बता रहा हूँ । तुम चाहो तो         एक हादसे को होने से रोक सकते हो । 
सुनील : (सस्पेन्स के आलम में) क्या डॉक्टर साहब ? जल्दी बोलिए ।
डॉक्टर लाल : दुर्भाग्य से मैं भी गुमराह होकर उन्मादी भीड़ का हिस्सा बन गया था । इसलिए मुझे मालूम है कि आज रात से ही इधर बसे हुए मराठियों के विरुद्ध हिंसक अभियान शुरू किया जा रहा है ताकि वे लोग           बिहार छोड़कर चले जाएं । जो मराठी बिल्डर मिस्टर देवसरे तुम्हारे साथ थे, उनकी एक अंडर-कंस्ट्रक्शन     इमारत संजय टॉवर को रात एक बजे बारूद से उड़ा दिया जाएगा । तुम हो सके तो इस हादसे को रोको ।
सुनील : ओह नो ! डॉक्टर साहब, आप नर्सिंग होम जाइए । मैं कुछ करता हूँ ।
डॉक्टर लाल : आई. एम. सॉरी ब्रदर जो मैंने . . .
सुनील : जब आँख खुले तभी सवेरा समझिए डॉक्टर साहब । यह हादसा अगर टल गया तो इस नेक काम का      सेहरा भी आप ही के सर बंधेगा । नाऊ लैट मी हरी अप ।

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य पाँच
स्थान : देवसरे का घर
समय : रात साढ़े बारह बजे के करीब

(देवसरे के घर पर ज़ोर से कॉलबेल बजती है । वह द्वार खोलता है)

देवसरे : (चौंककर) अरे सुनील तुम ! क्या हो गया ?
सुनील : (हाँफते हुए) दादा, बातों के लिए समय नहीं है । आप जल्दी चलिए वरना ग़ज़ब हो जाएगा ।
मोहिनी : (भीतर से आती हुई) क्या बात है सुनील भैया ? बोलो तो ।
सुनील : (मोहिनी से) बऊदी, रात एक बजे संजय टॉवर को बारूद से उड़ा दिए जाने के षड्यंत्र का पता चला है   मुझे । मैंने इंस्पेक्टर प्रभुदयाल को फ़ोन कर दिया है । वो तो जो करना है, करेगा । हमें भी वहाँ पहुँचना     चाहिए ।
मोहिनी : (आँखें बंद करके गहरी सांस लेकर) हे माँ तुलजा भवानी ! आमची रक्षा करा ।
देवसरे : (पैरों में पंप शू पहनते हुए) मोहिनी, कैलाशचा ध्यान थेवजा । मी सुनीलचा संगे जातो ।
कैलाश : (दीवार को पकड़कर चलते हुए धीरे-धीरे भीतर से बाहर आते हुए) मैंने सुन लिया है दादा । मैं भी आपके         साथ चल रहा हूँ ।
मोहिनी : (कैलाश से) कैलाश ! पलंग से क्यों उठे भैया ? चलो वापस भीतर । जो सह लिया है, वो क्या कम है जो           अभी और अपनी ज़िंदगी से खिलवाड़ करने पर तुले हो ?
कैलाश : ताई, आपको मेरे सर की कसम जो मुझे रोका । मुझे जाने दो । प्लीज़ मुझे जाने दो ।
देवसरे : (कैलाश से) तो फिर चलो । मगर तुम दूर गाड़ी में बैठे रहोगे । बाहर नहीं निकलोगे ।
कैलाश : हूँ . (कुछ कहते-कहते रूक जाता है)
मोहिनी : (घबराए स्वर में कैलाश से) मुझे तुम्हारा चेहरा देखकर डर लग रहा है भैया । न जाने तुम्हारे मन में    क्या है ? मैं भी चलती हूँ । (देवसरे से) मी संगे चलती ।

(देवसरे प्रश्नसूचक दृष्टि से कैलाश और सुनील की ओर देखता है)

सुनील : (देवसरे से) दादा, जो भी फ़ैसला करना है, करके तुरंत निकलो । वक़्त नहीं है हमारे पास ।
कैलाश : इन्हें घर पर ही रहने दो दादा । न जाने वहाँ क्या हालात पेश आएं ? (मोहिनी से) मैं अपना ख़याल      रखूंगा । आप चिंता न करें । (होठों में बुदबुदाते हुए अपने आप से) शायद यह सफ़र मुझे अकेले ही तय करना होगा ।  

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य छः  
स्थान : निर्माणाधीन संजय टॉवर के सामने  
समय : रात एक बजे के करीब

(देवसरे की मारूति वैन आकर रूकती है जिसमें से देवसरे बाहर निकलता है । नीम-अंधेरे
वातावरण में वहाँ दस-बारह आदमी पहले से ही जमा हैं जिनका नेतृत्व मुरारी कर रहा है)

मुरारी : (अपने साथियों से) जल्दी करो यार । लो, इस टॉवर का मालिक यह मराठी बिल्डर भी आ गया । अब    बारूद बिछाने का टाइम नहीं है । वो मेरी गाड़ी में एक झोले में हैंडग्रेनेड पड़े हैं । जल्दी निकालो ।
देवसरे : रूक जाओ । मैं कहता हूँ, रूक जाओ । देखो, पुलिस आने वाली है । तुम लोग ग़ैरक़ानूनी काम करके बच नहीं पाओगे ।
मुरारी : (देशी कट्टा निकालकर) तू रूक जा भैया । पुलिस का लफड़ा हमारा हैडेक है । अब यह टॉवर तो गिरेगी ही           गिरेगी । तू पैसे वाला आदमी है, तुझे क्या फरक पड़ता है ? बाकी अब तेरी समझदारी इसी में है कि तू              बिहार से अपना बोरिया-बिस्तर उठा ले और मुंबई सरक ले जहाँ से वो तुम लोगों का नेता हम यू.पी. –   बिहार वालों को निकाल बाहर कर रहा है ।

(सुनील का कनिष्ठ पत्रकार अर्जुन भी चुपचाप वहाँ पहुँच चुका है और उसे एक गुप्त इशारा
करता है । सुनील धीरे-धीरे पीछे की ओर खिसककर बिना किसी की नज़र में आए उसके पास
पहुँचता है । रोशनी बहुत कम है । कैलाश की ओर किसी का ध्यान नहीं है । वह हौले-से वैन से
निकलकर पहले वैन के पीछे की ओर सरकता है और फिर धीरे-धीरे लड़खड़ाते हुए अधूरी बनी
इमारत के अग्रभाग की ओर बढ़ता है । उसके चेहरे पर गहन शारीरिक पीड़ा के भाव हैं लेकिन
                   आँखों में दृढ़-संकल्प है)

देवसरे : देखो भाई । यह टॉवर बनने में केवल मेरा ही फ़ायदा नहीं है । इस कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स में जो ढेर सारे           दफ़्तर खुलेंगे, उनमें यहाँ के लोगों को ही रोज़गार मिलेगा । मेरी कंपनी में भी ढेर सारे लोकल लोग काम           करते हैं । मैं ख़ुद महाराष्ट्र में चल रही इस ग़लत मुहिम के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करूंगा । इस मामले में मैं         पूरी तरह उत्तर-भारतीयों के साथ हूँ । पर इस टॉवर के ढाँचे को मत ढहाओ । ग़लत काम का जवाब दूसरा     ग़लत काम करके मत दो दोस्त ।
मुरारी : बेटा, अभी तू फँसा हुआ है और फँसा हुआ आदमी हर तरह के पैंतरे आज़माता है । सो तू भी भाषण दे रहा         है । पर तेरे भाषण का हम पर कोई असर नहीं होने वाला । ना. ना. । हिल मत बेटा । नहीं तो यह    पिस्तौल देख रहा है न मेरे हाथ में ? यह खाँसने लगेगा । (ऊंची आवाज़ में अपने साथियों से) अबे ग्रेनेड      नहीं मिले क्या अभी तक तुम लोगों को ?
एक साथी : मिल गए हैं भैया पर . . .
मुरारी : मिल गए हैं तो क्या धार दे रहा है उनको ? पिन निकाल और खींचकर मार सामने । हरी झंडी दिखाऊंगा          तब कुछ करेगा क्या ?
दूसरा साथी : भैया, सामने टॉवर के ढाँचे के गेट पर कोई खड़ा है ।
मुरारी : कौन है वहाँ ? टॉर्च जलाकर रोशनी फेंक उसके मुँह पर । 

(रोशनी का शक्तिशाली झमाका नीम-अंधेरे में खड़े साये के मुँह पर
पड़ता है तो सबको कैलाश का चेहरा नज़र आता है)

मुरारी : (हैरानी से) कैलाश तू यहाँ भी ! दो घंटे पहले गोली खाकर चैन नहीं पड़ा तुझे जो फिर आ गया मरने के लिए । लगता है, तेरे बुटीक की तबाही ने तेरा दिमाग हिला दिया है । परे हट, नहीं तो टॉवर तो गिरेगी ही, तू भी जाएगा साथ में ।
कैलाश : (अपनी कांपती आवाज़ में भरसक शक्ति का संचार करके) मैं नहीं हटूंगा मुरारी । तुम्हें जो करना है, करो          । शायद मेरे भाग्य में ऐसी मौत मरना ही लिखा है ।
देवसरे : (ऊंची आवाज़ में) कैलाश, यह क्या दीवानगी है मेरे भाई ? अरे तुझे कुछ हो गया तो मैं तेरी माँ को क्या           जवाब दूंगा ? स्वर्गवासी बाबूजी को क्या मुँह दिखाऊंगा ?  मेरे नुकसान की परवाह न कर । यह सब      इंश्योर्ड है ।
कैलाश : (कमज़ोरी से थरथराती आवाज़ में) दादा, अपने लाडले के नाम पर जो टॉवर आप बना रहे हैं, वो आपका           सपना है । इंश्योरेंस वाले नुकसान की भरपाई तो कर देंगे पर इस सपने के टूटने की भरपाई कौन कर     सकेगा ? सपने के टूटने का दर्द क्या होता है, यह कोई मेरे दिल से पूछे ।  जो मेरे साथ हुआ है, मैं आपके    साथ नहीं होने दूंगा । शायद मेरा बलिदान ही यहाँ या वहाँ किसी की आँखें खोल दे ।
मुरारी : (अट्टहास करते हुए) वाह रे बुड़बक ! किताबों वाले ढंग से सोचता है रे तू तो ! अरे, अब वो गांधी जी का टाइम नहीं रहा जब बलिदानों से लोगों की आँखें खुलती थीं । जब पॉलिटिक्स करनी हो, वोट लेने हों,         सीटें जीतनी हों तो दूसरे के बलिदान से आँखें नहीं खोली जातीं, उसे अपने हक़ में भुनाया जाता है । तू मर    । बलिदान दे अपना । परलोक जाकर ऊपर से देखना कि तेरे बलिदान को बेस बनाकर मैं अपने अभियान     को कैसे धार देता हूँ और कैसे अपनी पॉलिटिक्स चमकाता हूँ । शहीद तू होगा लेकिन तेरी शहादत को          भुनाकर एम.एल.ए. का इलैक्शन मैं जीतूंगा ।
कैलाश : (टूटे हुए स्वर में) यानी कि मेरा जान दे देना भी किसी काम नहीं आएगा ?
मुरारी : (कुटिल स्वर में) आएगा न ! मेरे काम आएगा । अब बोल, हट रहा है या तेरे खड़े रहते हुए ही हम इस    ढाँचे पर ग्रेनेड फेंक दें ?
देवसरे : (घबराकर मुरारी से) नहीं भाई ठहरो । मैं उस नादान को वहाँ से हटाता हूँ । तब तक ऐसा कुछ मत       करना । मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ ।

(वह कैलाश की ओर दौड़ता है और उसे अपनी भुजाओं में भर लेता है)

मुरारी (उच्च स्वर में अपने साथियों से) : फेंको ग्रेनेड और ढहा दो इस टॉवर को । मरने दो साले इन दोनों को ही ।

(तभी वातवरण इंस्पेक्टर प्रभुदयाल की आवाज़ से गूँजता है)

प्रभुदयाल : (लाउडस्पीकर पर) कोई ऐसी ग़लती न करे । नहीं तो मर्डर चार्ज में लपेटा जाएगा । पुलिस ने चुपचाप       तुम सबको चारों ओर से घेर लिया है । सब लोग सरेंडर कर दें । मुक़ाबले की कोई गुंजाइश नहीं है तुम्हारे      लिए ।

(चारों ओर से पुलिसिए मुरारी और उसके साथियों की ओर लपकते हैं । एक ओर से सुनील और अर्जुन
तथा दूसरी ओर से कैलाश को सहारा दिए हुए देवसरे प्रभुदयाल के निकट आते हैं)

सुनील : (कृतज्ञतापूर्ण स्वर में प्रभुदयाल से) : थैंक्यू प्रभु । यह तुम्हारी दूरदर्शिता ही है जो तुमने गुपचुप घेरा डाला           वरना ये हथियारबंद लोग पुलिस पर ही हमला कर देते ।
प्रभुदयाल : अपनी कर्तव्यनिष्ठा के चलते ही मैं चला आया हूँ वरना मुझे तो चलते-चलते ही मेरे आला अफ़सर से फ़ोन पर हुक्म मिल गया था कि मैं  न तो इस तरह की गतिविधियों को रोकूं और न ही किसी को   गिरफ़्तार करूं ।
कैलाश : (क्षीण स्वर में प्रभुदयाल से) : ऐसा क्यों इंस्पेक्टर साहब ?
प्रभुदयाल : क्योंकि ऊपर से पॉलिटिकल प्रैशर है । इन लोगों के तार वहीं से तो जुड़े हैं । मराठी बनाम उत्तर-     भारतीय का झगड़ा जितना बढ़ेगा, राजनीति को गरमाने और वोट खींचने की गुंजाइश भी उतनी ही   बढ़ेगी । नेताओं के लिए तो जितनी लाशें गिरें, उतना ही अच्छा क्योंकि यह आग उतनी ही भड़केगी और      वोट डालते वक़्त लोग भावुक होकर इसी संदर्भ में वोट डालेंगे । आम जनता के घरों में      आग लगती है   तभी तो उसकी आंच राजनीति की रोटियां सेकने के काम आती है । महाराष्ट्र हो या यू.पी.-बिहार,   पॉलिटिकल कैरेक्टर तो एक ही है न भाई ? इसलिए जब तक चलेगा, यह सिलसिला दोनों ही तरफ़ यूँ ही      चलेगा । (एक उसांस भरकर) मेरे अफ़सर को भी अपनी कुर्सी प्यारी है और मुझे भी अपनी रोज़ी-रोटी    इसी नौकरी से चलानी है । इन लोगों को केवल यहाँ से हटाने के लिए गिरफ़्तार कर रहा हूँ । मुश्किल से        एक घंटे में ये सब रिहा हो जाएंगे । ये तो कल भी यही सब करेंगे । हाँ, आज इनको रोकने का इनाम मुझे    अपने ट्रांसफ़र के रूप में मिल सकता है ।
देवसरे : (भावुक स्वर में कैलाश से) इस टॉवर को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी पगले तूने ! काश        मैं भी तेरे बुटीक की तबाही के वक़्त मुंबई में वहीं पर होता और तेरे सपने की हिफ़ाज़त कर पाता !
कैलाश : (मायूसी से) कुछ नहीं होता दादा । मुरारी की बातें सुनकर मैं समझ गया हूँ कि हमारे देश के लोग        भड़काऊ लोगों के हाथों की कठपुतली सदा से बने रहे हैं और सदा बने रहेंगे । इन्हें बदलने की कोशिश में   कोई मर भी जाए तो भी ये नहीं बदलने वाले । मैं मुंबई छोड़ दूंगा दादा । नॉर्थ इंडिया में ही अपना काम     नए सिरे से शुरू करूंगा या फिर कोई नौकरी पकडूंगा । आप भी यहाँ से अपना सब कुछ समेट लीजिए          दादा । जहाँ से आए हैं, वहीं चले जाइए । वहाँ वाले सदा यहाँ पराए बने रहेंगे और यहाँ वाले वहाँ ।
देवसरे : पलायन से क्या होगा पगले ? इंसान में हैवान यहाँ भी है, वहाँ भी । अल्लाह निगाहबान यहाँ भी है, वहाँ         भी । सिरफिरे तो सभी जगह हैं और सही सोच वाले लोग भी सभी जगह हैं, चाहे गिनती के ही क्यों न हों       ? हमारे घर में आग लगी हो तो हम उसे छोड़कर भाग जाएं या आग पर पानी डालें और उसे बुझाने में         लगें ? हम ग़लत सोच वालों के आगे घुटने टेक दें या उन्हें अपनी सोच को बदलने के लिए प्रेरित करें ? हम    उनकी जमात में शामिल नहीं होंगे कैलाश । लेकिन उनके बीच से हटेंगे भी नहीं । हम मैदान छोड़कर नहीं   भागेंगे मेरे अज़ीज़ । उनके बीच रहकर उनकी ग़लत सोच से जूझेंगे । और उनकी सोच बदलेगी कैलाश । वे    भड़काऊ लोगों का असली चेहरा पहचानेंगे और अपनी ग़लतियों पर पछताएंगे । इसमें वक़्त लग सकता है         लेकिन यह कोई नामुमकिन बात नहीं ।
सुनील : दादा ठीक कह रहे हैं कैलाश । क्या तुम जानते हो कि इस हादसे को टालने में मुख्य योगदान डॉक्टर लाल         का है जो अपने भाई के साथ मुंबई में हुए दुर्व्यवहार के कारण अपने मन में मराठियों के प्रति ज़हर भरे बैठे   थे ? वे अगर मुझे वक़्त पर सूचना नहीं देते तो जो होना था, हो गया होता ।
देवसरे : सही सोच लोग वाले विवेकशील लोग हर जगह मौजूद हैं कैलाश पर वे उन्मादियों के क़हर से डरते हैं ।
तुम्हारा साहस मुंबई और बाकी महाराष्ट्र में रहने वाले उन मराठियों के सोए हुए विवेक को जगाएगा जो आज गुमराह होकर उत्तर-भारतीयों के विरोधी बन गए हैं । तुम्हारे स्वस्थ होते ही हम दोनों मुंबई जाएंगे कैलाश । तुम्हारा बुटीक फिर से वहीं बनेगा । मैं मराठी लोगों को मराठी मानूस की संकीर्ण सोच से बाहर निकालने के लिए एक मुहिम शुरू करूंगा । जो नेता अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए वहाँ लोगों को उकसा रहे हैं, उनके जाल से उन्हें मुक्त कराने के लिए मैं अपना सब कुछ दांव पर लगा दूंगा । अब यही मेरी ज़िंदगी का मक़सद होगा । सच्चे भूमि-पुत्र तो हम हैं कैलाश । भारत भूमि के सच्चे सपूत ! मानवता के पुजारी ! यह बात हम भूमि-पुत्र का खोखला नारा लगाने वालों को साबित कर दिखाएंगे । हम जीतेंगे कैलाश ! हमारी भारतीयता जीतेगी । हमारी मानवता जीतेगी ।
कैलाश : सच दादा ?
देवसरे : बिलकुल सच । आओ, अपने मन में एक सच्चा संकल्प लेकर इस अभियान पर निकलें ।         


(पर्दा गिरता है)

नेपथ्य से आवाज़ आती है – आइए साथ दें इन सच्चे  भूमि-पुत्रों का ताकि क्षेत्रीयता के संकीर्ण दायरे में क़ैद भारतीयता मुक्त हो सके, ताकि ये सच्चे भारतीय यह कह सकें कि हम अकेले ही चले थे जानिबे मंज़िल; लोग आते गए, कारवां बनता गया । 

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