Thursday, September 19, 2013

दोस्ती




पात्र परिचय :

शंकर                         : एक अध्यापक
ज़ाहिद                      : एक ऑटोमोबाइल वर्कशॉप चलाने वाला और शंकर का मित्र
सलमा                     : ज़ाहिद की पत्नी
कपिल                     : शंकर का पुत्र  
शाहिद                    : ज़ाहिद का पुत्र  
विनय                     : अतिवादी हिन्दू संगठन का नेता  
मौलाना जब्बार अली : कट्टरपंथी मुस्लिम नेता
डॉक्टर भट्ट               : क्लीनिक चलाने वाला सहृदय चिकित्सक


 
रामलाल      
अब्दुल                    : मज़दूर
  
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नेपथ्य से आवाज़ उभरती है – इस देश में सदियों से विभिन्न क़ौमों के लोग परस्पर भाईचारे और प्रेम के साथ मित्र और पड़ोसी का धर्म निभाते हुए रह रहे हैं ।  क़ौम और मजहब के नाम पर उन्हें बांटने की तमाम कोशिशें बहुत कुछ बरबाद तो कर गईं पर नफ़रत की कोई भी लपट प्रेम और विश्वास की अजस्र धारा के आगे अधिक देर तक ठहर नहीं सकी । यही बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ।
(पर्दा उठता है)

दृश्य एक
स्थान : ज़ाहिद का घर
समय : सुबह के लगभग साढ़े सात बजे

(दरवाज़े की घंटी बजती है और आवाज़ आती है-ज़ाहिद, ओ ज़ाहिद । क्या कर रहा है भाई ?)
(ज़ाहिद दरवाज़ा खोलता है और शंकर प्रवेश करता है )

ज़ाहिद : इसे कहते हैं-शैतान को याद करो और शैतान हाज़िर । अभी मैं तुझे ही याद कर रहा था । सलमा, ज़रा चाय तो
            बनाना शंकर भाई के लिए ।
शंकर : क्यूँ यार ? मैंने कौन से गन्ने उखाड़ लिए तेरे खेत के जो तू सुबह-सुबह अपने अल्लाह की जगह मुझे याद कर रहा
            था ?
ज़ाहिद : देख शंकर । मेरा अल्लाह, तेरा अल्लाह मत कर । अल्लाह तो सबका है । वैसे ही जैसे तेरा भगवान सबका है ।
शंकर : एक हज़ार, एक सौ ग्यारहवीं बार तू यह बात कह रहा है मुझसे । मगर यार, मुझे समझाने से क्या होगा ? बाकी
            लोग भी तो समझें । (तभी सलमा चाय कि ट्रे लेकर आती है) । थैंक्यू भाभी (चाय का कप लेते हुए कहता है) । अब             पहले भाभी के हाथ की गरमागरम चाय पी लूं, फिर जवाब देता हूँ तेरी बकवास का ।
ज़ाहिद : पी ले, पी ले बेटा । फ़्री की चाय पीने के लिए वैसे भी तुझे मेरा ही घर मिलता है ।
शंकर : अब तू तेरा-मेरा कर रहा है । अबे तेरे घर को मैं अपना ही समझता हूँ और तू क्या मेरे घर को अपना घर नहीं
            समझता । जब जी चाहे, मुँह उठाए चला आता है । पार्वती जब कपिल को पैदा करते समय चल बसी तब से          सलमा भाभी ने ही उसे माँ बनकर पाला है । बचपन में चाकलेट दे-देकर उसे तूने ही तो बिगाड़ा । और तू भूल गया – मेरे एक्सीडेंट के बाद मुझे खून की ज़रूरत पड़ने पर तूने अपने शरीर का कितना खून मुझे दे दिया था । ...       बात करता है तेरे मेरे की । अरे जितनी मेरी मर्ज़ी होगी, उतनी चाय पिऊंगा । तू रोकने वाला कौन होता है ?
ज़ाहिद : (हँसते हुए) अच्छा लफड़ा है भाई तेरे साथ भी । कुछ भी बोलो तो सेंटीमेंटल हो जाता है । सेंटी भाई,
            सुन तो ले कि किसलिए याद कर रहा था । आज का अखबार पढ़ा तूने ? नहीं पढ़ा तो अब पढ़ । कल गुजरात में     फिर दंगे हो गए । कई लोग मारे गए ।
शंकर : देख ज़ाहिद, वैसे तो सारा झमेला सियासतदानों का है । उन्हे  वोट चाइए, इसलिए वे आम लोगों को आपस में
            लड़ाते रहते हैं ताकि उनकी दुकान चलती रहे । मगर यार, तेरी कौम के लोग भी चैन से कहाँ चैन से रहते हैं ?      वक़्त-बेवक्त कोई-न-कोई झमेला खड़ा करते रहते हैं । पाकिस्तान बन गया लेकिन तुम लोगों को शांति नहीं   मिली । अगर अमन से नहीं रह सकते तो सबके सब पाकिस्तान क्यूँ नहीं चले गए सन सैंतालीस में ?
ज़ाहिद : (नाराज़गी से) शंकर, तू तो ऐसे कह रहा है जैसे सारा कसूर हमारी क़ौम के लोगों का ही हो । अरे टीचर है तू ।
            थोड़ा तो निष्पक्ष रह । तेरी क़ौम के लोग कितने बरसों से एक गड़े मुर्दे को उखाड़ने में जुटे हुए हैं – राम मंदिर ।     राम मंदिर । जब देखो राम मंदिर । रथ यात्रा निकाल ली । हम लोगों की नमाज वाला मस्जिद का ढांचा तोड़            दिया । दंगों में सैंकड़ों बेकसूर मर गए मगर फिर भी राम-मंदिर नहीं बन सका तुम लोगों का । फिर गुजरात को         सुलगा दिया तुम लोगों ने । जब भी इलैक्शन आते हैं, तुम लोगों का मंदिर-राग फिर से शुरू हो जाता है ।
शंकर : (आवेश में आकर) ज़ाहिद, मेरी क़ौम पर उंगली उठाने से पहले अपने गरेबान में झाँककर देखना सीख । गुजरात के
            दंगों  की दुहाई दे रहा है तो याद रख कि गोधरा में जिस तरह से अट्ठावन लोगों को ज़िंदा भून दिया गया था,
            उसके बाद यही होना था । जब वहशीपन किया है तो वहशीपन भुगतना भी पड़ेगा ।
ज़ाहिद : (उत्तेजित होकर) बस, शंकर ! बहुत हो गया । मेरे घर की छत के नीचे तू मेरी क़ौम को गाली दे रहा है ! क्या
            माइनॉरिटी होने का मतलब यह होता है कि मैजॉरिटी वाले जब चाहें हमें मार डालें, हमारे घर जला दें और        हमारी माँ-बहनों को बेइज़्ज़त करें ? बहाना कोई भी हो, गुजरात में जो दो हज़ार बेगुनाह मारे गए और बेशुमार      औरतें बेइज़्ज़त हुईं, वे तो गोधरा कांड के लिए ज़िम्मेदार नहीं थे !
शंकर : (भड़ककर) तो क्या मेरे पुरखे विभाजन के लिए ज़िम्मेदार थे ? तुम लोगों ने अपने पाकिस्तान की ख़ातिर लाखों
            निर्दोषों की जान ली । अनगिनत अबलाओं का शील लूटा । हज़ारों घर उजाड़ दिए । भाई बहनों से, माँ-बाप बच्चों से और पति-पत्नी एक दूसरे से बिछुड़ गए । परिवार के परिवार, मौहल्ले के मौहल्ले और कस्बे के कस्बे वीरान हो       गए । फिर भी देखता हूँ कि क़ौम के नाम का जुनून खतम नहीं हुआ तुम लोगों का !
ज़ाहिद : शंकर, वो सब कुछ जो तू याद दिला रहा है, मेरी क़ौम ने भी भुगता है । मेरे पुरखे भी अपने ही मुल्क में रिफ़्यूजी
            हो गए थे । पर देख रहा हूँ कि अपनी क़ौम की हिमायत में तू ऐसा बह गया है, ऐसा पक्षपाती चश्मा तेरी आँखों    पर चढ़ गया है कि तेरी सोच पूरी तरह इकतरफ़ा हो गई है ।
शंकर : ठीक है ज़ाहिद, तू अपनी क़ौम का ही सगा बनकर रह । छोड़ मुझ जैसों का साथ जिन्हें तू और तेरी क़ौम के लोग
            काफ़िर कहकर ज़लील करते हैं । जा रहा हूँ मैं । अब नहीं आया करूंगा तेरे यहाँ । बरसों तक चाय पिलाई है तूने, सारा हिसाब कर दूंगा उसका ।
(गुस्से में भरा निकल जाता है । सलमा वहाँ कदम रखती है और ज़ाहिद से कहती है)
सलमा : ये आपने क्या किया ? बरसों के भाईचारे पर चंद मिनटों में पानी फेर दिया !
ज़ाहिद : (गुस्से से) तो और क्या करता ? तलवे चाटता उसके ?
सलमा : अल्लाह ! अब क्या होगा ?
ज़ाहिद : होगा क्या ? मैं क्या उसकी दोस्ती के बिना जी नहीं सकता ?
(तभी मौलाना जब्बार अली प्रवेश करता है)
जब्बार अली : बहुत खूब । बहुत खूब, ज़ाहिद भाई । बजा फरमाया आपने । काफिरों की दोस्ती बहुत कर ली आपने । अब
                        क़ौम की खिदमत कीजिए । आपने जान ही लिया होगा कि गुजरात में कल क्या हुआ ? दो हज़ार बेगुनाह                        मुसलमानों का क़त्लेआम करके भी कलेजा ठंडा नहीं हुआ इन लोगों का । अब आप जैसे लोग आगे आएं                            और क़ौम को बचाएं ।
ज़ाहिद : मैं समझा नहीं ।
जब्बार अली : मैं समझाता हूँ । पहली बात तो यह समझिए कि यह क़ौमी एकता, भाईचारा वग़ैरह सब वो फिज़ूल बातें हैं
                        जिनसे मुसलमानों को न जाने कब से भरमाया जा रहा है । अब वक़्त आ गया है कि हम इन खोखली                               बातों से बाहर निकलें और अपने दुश्मनों को पहचानें । दुश्मन की शिनाख़्त से आधा क़िला फ़तह हो जाता                        है ।
ज़ाहिद : कैसा क़िला ? कैसी फ़तह ? मौलाना साहब, ये सब आप क्या कह रहे हैं ?
(तभी सलमा पानी का गिलास लेकर आती है और गिलास सामने रखकर आदाब करती है)
ज़ाहिद : सलमा, मौलाना साहब के लिए कॉफ़ी लाओ ।
जब्बार अली : शुक्रिया जनाब । लेकिन बीबी को बार-बार पर्दे से बाहर आने की तक़लीफ़ मत दीजिए । आप तो बस मेरी    बात सुनिए । हम लोगों ने एक क़ौमी-हिफ़ाज़त मोर्चा बनाया है । आप उसमें शिरकत करें और क़ौम के         लोगों के मुहाफ़िज़ बनें ।
ज़ाहिद : लेकिन जनाब, मुकम्मल हिफ़ाज़त तो आपसी समझ-बूझ और दोनों क़ौमों के बीच भाईचारे से ही मुमकिन है । 
           बाकी तो अवाम की हिफ़ाज़त पुलिस और हुकूमत का काम है ।
जब्बार अली : ज़ाहिद भाई, किस दुनिया में रहते हैं आप ? पुलिस, सरकारी अमला और सरकार के नुमाइंदे भी जब
                        फ़िरकापरस्त होकर मुसलमानों के पीछे पड़े हों तो किसकी कैसी ज़िम्मेदारी और किसका कैसा ऐतबार ?                         आपको क्या मालूम नहीं कि ख़ुद पुलिस और लीडरान हमारी क़ौम के क़त्लेआम, प्रॉपर्टी की तबाही और ख़्वातीन की इस्मतदरी में शामिल रहे हैं । अब आप आज शाम को मुग़ल बाग़ के मकान नंबर बाईस में        आइए ठीक सात बजे जहां हम आपको क़ौम के लिए आवाज़ उठाना भी सिखाएंगे और हथियार चलाना                                         भी । अच्छा अब इजाज़त ।
(निकल जाता है । सलमा भीतर आती है)
सलमा : कैसी भयानक बातें कर रहे हे ! कहीं हमारा शहर भी नफ़रत की आग में न झुलसने लगे !
(ज़ाहिद कोई जवाब नहीं देता । उसकी तमतमाई सूरत देखकर सलमा सहम जाती है)

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य दो
स्थान : शंकर का घर  
समय : सुबह के लगभग आठ बजे

(शंकर तमतमाए चेहरे के साथ अपने घर में घुसता है और देखता है कि ड्राइंगरूम में उग्र हिन्दू संगठन का नेता विनय बैठा है और उसका पुत्र कपिल विनय से बातें कर रहा है)

विनय : आइए गुरुजी । आपकी ही राह देख रहा हूँ पिछले दस मिनट से । क्या बात है, चेहरा तमतमाया हुआ क्यूँ है          आपका ?
शंकर : कपिल, तू अंदर जा । भैया को पानी पिलाया कि नहीं ?
विनय : अजी आपके बेटे ने मेरा पूरा खयाल रखा है । आप तो बताइए कि सुबह-सुबह आपका मूड क्यूँ ऑफ है ?
शंकर :  विनय, बरसों से पढ़ाता आ रहा हूँ – मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना । हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई,        आपस में हैं भाई-भाई वग़ैरह । पर लगता है, ये सब बेकार की बातें हैं । अभी-अभी गुजरात के दंगों के मुद्दे    पर ज़ाहिद से तकरार हो गई । बरसों से जानता हूँ इसे पर अभी-अभी ऐसा लगा जैसे अपनी क़ौम के आगे कुछ है          ही नहीं इसके लिए । अपनी क़ौम के लोगों का कट्टरपन दिखाई नहीं देता इसे । उल्टे हिंदुओं को ही दोषी ठहरा         रहा था ।
विनय : यही तो । यही तो हम लोग आप जैसे तथाकथित सेक्यूलर माइंड के लोगों को समझाना चाहते हैं । इन लोगों के
            साथ कितना ही भाईचारा और प्रेम दिखाओ, ये रहेंगे अपनी क़ौम के ही सगे । कितना सह लिया हिन्दू समाज ने   इन विधर्मियों के हाथों ! देश का बंटवारा तक भोग लिया । पर इन्हें अब भी चैन नहीं । मैं तो कहता हूँ – जब तक          ये लोग नहीं सुधरते, तब तक ऐसी घटनाएं तो अब होती ही रहेंगी । इन्हें इनकी औक़ात दिखाने का काम तो अब       शुरू हुआ है । आप तो गुरु हैं । आगे आइए और रास्ता दिखाये समाज को । और जोश भर दीजिए युवाओं में अपने     धर्म और समाज की रक्षा करने का ।
शंकर : रक्षा किनसे विनय ? क्या बात कर रहे हो ?
विनय : अजी इन्हीं लोगों से जो खाते हमारी हैं और बजाते पाकिस्तान की हैं । खूब है इनकी । पाकिस्तान बनवा लिया,
            फिर भी हिंदुस्तान में दादागिरी से रहते हैं । यानी कि हमारा माल तो हमारा है ही, तुम्हारे माल में भी हमारा     हिस्सा है । अब हमें खड़े होना है सीना तान के और बता देना है इन लोगों को कि अगर शांति से जीना है इस मुल्क    में तो दबकर रहो वरना पाकिस्तान जाओ ।
शंकर : लेकिन विनय । मैंने तो नफ़रत को हमेशा ग़लत माना है क्योंकि नफ़रत से नफ़रत पैदा होती है और खूनखराबे का   खेल तो विनाश की ओर ही ले जाता है । ऐसे किसी भी कदम का मैं समर्थन कैसे कर सकता हूँ ?
विनय : फिर तो जाने दीजिए गुरुजी । सुनकर आए हैं न अभी-अभी अपने मुसलमान दोस्त के ख़यालात ? ठीक है, मत
            निकलिए अपनी सेक्यूलर केंचुल से बाहर और कटने दीजिए अपने हिन्दू भाइयों को । फिर भी इरादा बादल        जाए तो आ जाइएगा शाम को सात बजे मुग़ल बाग में स्थित हिन्दू सभागार में जहाँ से आज हम अपने शहर के          हिन्दू समाज का पुनर्जागरण कर रहे हैं ।
(बाहर निकल जाता है । शंकर सोच में पड़ जाता है)

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य तीन
स्थान : शंकर और ज़ाहिद के घरों की तरफ़ जाने वाली सड़क
समय : शाम के लगभग आठ बजे

(कपिल और शाहिद सड़क पर बातें करते हुए चल रहे हैं)

कपिल : शाहिद, जो बातें तू अपने घर में हुई बता रहा है, वैसी ही बातें मेरे घर में भी हुई थीं । क्या बताऊं यार, मुझे कुछ
            अच्छा नहीं लग रहा है । हम दोनों के पिता बरसों के दोस्त हैं और यूँ एक मामूली-से पॉलिटिकल टाइप के           डिस्कशन में दोनों में झगड़ा हो गया । इसका फ़ायदा उठाया तेरे घर में मौलाना जब्बार अली ने और मेरे घर में          विनय अंकल ने । ऐसे लोग ही छोटी-छोटी चिंगारियों को हवा देते हैं और नतीज़ा यह होता है कि दंगों की लपटें         सारे शहर को घेर लेती हैं ।
शाहिद : तू ठीक कह रहा है यार । जिस दंगे की खबर ने इन दोनों के बीच झगड़ा पैदा किया वो भी तो एक बच्चों के क्रिकेट
            मैच से जुड़ी मामूली-सी बात को बढ़ा देने के बाद ही हुआ था । कोई यह नहीं सोचता कि छोटी-छोटी बातों को      तूल देने से कितना अनर्थ हो सकता है । अब तेरे और मेरे, दोनों के ही पिता अपने-अपने मजहब के लोगों की            मीटिंगों में गए हैं और खतरनाक बात यह है कि दोनों ही मीटिंगें मुग़ल बाग़ में हैं ।
(तभी मारो-मारो की आवाज़ें आती हैं । दोनों चौंककर देखते हैं तो दो आदमी बदहवास-से भागते हुए नज़र आते हैं । उनमें से एक की पीठ से खून बह रहा है । दोनों कपिल और शाहिद के पास आकर लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बचते हैं । मारो-मारो की आवाज़ें सड़क के मोड़ से पास आती जा रही हैं )
अब्दुल : (ज़ख़्मी हालत में हांफते हुए अटक-अटककर बोलता है) हमें बचा लो भाई । हमें बचा लो । हमने किसी का कुछ     नहीं बिगाड़ा । हमें लोग क्यों मार डालना चाहते हैं । 
कपिल : लेकिन हुआ क्या ? क्यूँ कोई तुम्हें मार डालना चाहता है ?
रामलाल : बेटा, शहर में दंगा हो गया है । मुग़ल बाग़ में हिन्दू और मुसलमान दोनों तरफ़ के नेताओं ने पास-पास की          जगहों पर ही अपनी-अपनी मीटिंगें रखी थीं । वहीं कुछ तकरार हो गई और दोनों की तरफ़ के लोग मार-काट पर         उतर आए । हम दोनों तो मजदूर आदमी हैं । पास ही की बस्ती में रहते हैं और दिनभर मेहनत करके अपना पेट   पालते हैं । अब्दुल की दाढ़ी देखकर हिन्दू दल के लोग इसके खून के प्यासे हो गए । इसे चाकू मार दिया । इधर            मुसलमानों के दल में जो लोग मुझे जानते थे, वे मुझे मारने के लिए मेरे पीछे पड़ गए । हम दोनों जैसे-तैसे जान बचाकर भाग रहे हैं ।
शाहिद : चाचा, बातें छोड़ो । दंगाई करीब आ रहे हैं । पहले भीतर चलो । मेरा घर आ गया है ।
(दरवाजे की घंटी बजाते हुए आवाज़ लगता है)
            अम्मी ! जल्दी दरवाजा खोलो अम्मी !
सलमा : (दरवाजा खोलकर) क्या हुआ बेटा ?
शाहिद : (भीतर आते हुए) जल्दी करो अम्मी । वक़्त बहुत कम है हम लोगों के पास ।
(शाहिद, कपिल और रामलाल अब्दुल को सहारा देकर भीतर लाते हैं और द्वार बंद करते हैं)
शाहिद : अम्मी, जल्दी से ड्रैसिंग का सामान लाओ । बहुत खून बह रहा है ।
रामलाल : बेटा, न जाने कौन लोग ये नफ़रत की आग भड़काते हैं और न जाने वे इससे क्या हासिल करते हैं ? हम जैसे       लोग ही बेगुनाह पिसते हैं जिनके लिए अपने परिवार का पेट पालने के लिए रोज़ी कमाने के अलावा दूसरा कोई   धर्म नहीं है । हम तो सिर्फ़ इंसान हैं और इंसानियत की ही बात समझते हैं । फिर हमें ही क्यों निशाना बनाया       जाता है सिर्फ़ ये देखकर कि हम हिन्दू हैं या मुसलमान ? आख़िर हम क्या करें ? क्या दंगा करने वाली भीड़ के धर्म            को देखकर उसके हिसाब से अपना धर्म बदल लें ?
कपिल : चाचा, ये ही बात तो मेरे और शाहिद जैसे नौजवान मजहबी जुनून में अंधे हो जाने वालों को समझाना चाहते हैं । पर आज हालत यह है कि हमारे ही पिता इस बात को नहीं समझ रहे हैं । मुझे तो पापा और ज़ाहिद चाचा, दोनों की बहुत फ़िक्र हो रही है ।
(इस बीच सलमा डिटॉल, पट्टी, रुई और पानी ले आती है और वे सब मिलकर अब्दुल की ड्रैसिंग करते हैं )
कपिल : खून तो रुक नहीं रहा । लगता है, डॉक्टर को बुलाना ही पड़ेगा ।
शाहिद : यार, बुलाने से अच्छा है कि हम इन्हें भट्ट चाचा के यहाँ ले चलें । जो ज़रूरी ट्रीटमेंट होगा, चाचा हाथ-के-हाथ     अपने क्लीनिक में कर देंगे ।
कपिल : लेकिन यार, यह पुलिस केस है । क्या भट्ट चाचा बिना एफ़.आई.आर. के हैंडल करेंगे ?
शाहिद : यार, तू ऐसा कर कि फोन करके उनसे रिक्वेस्ट कर और बोल कि हम इन्हें लेकर आ रहे हैं ।
(कपिल फोन के पास जाता है और रिसीवर उठाकर बात करता है । उसकी आवाज़ बाहर से आ रहे मारो-मारो के शोर में दब जाती है । दरवाज़े पर ज़ोरदार दस्तक पड़ती है और शंकर की आवाज़ आती है - 'शाहिद ! भाभी ! जल्दी दरवाज़ा खोलो ।' शाहिद कपिल को फोन पर बात करता छोड़कर दरवाज़े की ओर भागता है और दरवाज़ा खोलता है । दरवाज़ा खोलते ही ज़ाहिद को आगे धकेलकर शंकर जल्दी से अंदर घुसता है और दरवाज़ा बंद कर लेता है)
शंकर : शाहिद, भाभी । आप सब लोग पीछे के दरवाज़े से निकल लो और ये लो चाबी (चाबी उनकी ओर उछालता है) ।     मेरे घर में घुसकर चुपचाप बैठो जब तक पुलिस न आ जाए और सिचुएशन काबू में न आ जाए ।
कपिल : (फोन से मुक्त होकर) पापा, हुआ क्या ?
(तभी दरवाज़े पर ज़ोरदार प्रहार होते हैं और भीड़ का शोर सुनाई देता है । दरवाज़ा टूट जाता है और उस पर विनय का चेहरा दिखाई देता है । विनय चेहरे पर नफ़रत और हाथ में पिस्तौल लिए भीतर घुस आता है और बाहर की ओर मुँह करके जुनूनी भीड़ से कहता है)
विनय : कोई भीतर न आए । ये मेरे शिकार हैं और इनके सगे हिन्दू धर्म के गद्दार से भी मैं अकेले ही निपटूंगा ।
शंकर : ख़बरदार विनय ! अगर ज़ाहिद को मारना चाहते हो तो पहले अपने हिन्दू भाई का खून बहा लो । ज़ाहिद और       उसके परिवार को हाथ भी लगाने से पहले मेरी और मेरे बेटे की लाश पर से गुजरना होगा तुम्हें । आगे आ जा    कपिल । आज तेरे लिए सलमा चाची के दूध का कर्ज़ चुकाने का समय आ गया है ।
विनय : स्साले ! फ़र्ज़ी हिन्दू ! हट जा सामने से, नहीं तो एक गद्दार को मारने में मेरे हाथ ज़रा भी नहीं कांपेंगे । सुबह तो     इस विधर्मी के खिलाफ़ बोल रहा था और शाम को यारी दिखा रहा है !
(कपिल आगे बढ़ता है तो ज़ाहिद उसे पीछे धकेलकर आगे आ जाता है और विनय से कहता है)
ज़ाहिद: तुम लोग मुझे मारना चाहते हो तो जरूर मार डालो पर मेरे परिवार को और शंकर और कपिल को बख़्श दो ।
(विनय अपना पिस्तौल वाला हाथ ऊंचा करता है पर तभी एक गोली उसे लगती है और धुआँ उगलती पिस्तौल के साथ मौलाना जब्बार अली अंदर कदम रखता है)
जब्बार अली : घबराना नहीं ज़ाहिद भाई । बाहर हमारे आदमियों ने इनके आदमियों से ज़बरदस्त मोर्चा ले लिया है ।                              जितना हमारा खून बहेगा, उससे ज़्यादा इन लोगों का बहेगा । लेकिन आपने इन काफ़िरों को घर में क्यों              घुसा रखा है ? बाहर निकालिए इन लोगों को । देख लेंगे हमारे आदमी इन्हें । और इस काफ़िरों के लीडर                  का काम मैं पूरी तरह तमाम कर देता हूँ ।
(जैसे ही जब्बार अली विनय की ओर पिस्तौल तानकर फ़ायर करता है, घायल अब्दुल बीच में आ जाता है और गोली उसके सीने में लगती है । अब्दुल धराशायी हो जाता है और मरते-मरते बोलता है)
अब्दुल : (टूटते स्वर में) बस कीजिए ! कब तक भाइयों को लड़ाते रहेंगे आप जैसे लोग । क़ौम की भलाई की आड़ में पूरी     क़ौम को बदनाम कर चुके हैं आप । बहुत खून बह चुका । अब तो . . . अब तो . . .
(मर जाता है । जब्बार अली बाहर की ओर भागता है)
विनय : (कराहते हुए शंकर से संबोधित होता है) गुरुजी, मुझे बचा लीजिए । मैं दर्द से बेहाल हो रहा हूँ ।
शंकर : (नफ़रत से) क्यूँ विनय, अब पता चला कि दर्द क्या होता है और मौत का खौफ़ क्या होता है ? तुम जैसे नफ़रत और             खून का खेल खेलने वाले लोगों का मर जाना ही बेहतर है ।
ज़ाहिद : नहीं शंकर, इन्हें फ़ौरन भट्ट बाबू के क्लीनिक ले चलते हैं । शायद इन्हें बचा पाएं ।
भट्ट : भट्ट हाजिर है बाबू मोशाय । सलमा भाभी ने मेरी हलकी-सी एक ही दस्तक में दरवाज़ा खोल दिया वरना बाहर फ्रंट             साइड में माहौल बहुत खराब है । बाहर हिन्दू और मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ एक-दूसरे से और पुलिस से भी        उलझी पड़ी है । तुम लोगों को फ़ायरिंग की आवाज़ें नहीं आ रहीं ? मेरे दो आदमी एंबुलेंस और स्ट्रेचर के साथ बाहर मौजूद हैं । तुम लोग जल्दी से इन्हें बाहर लाओ । कर्फ़्यू डिक्लेयर होने से पहले ही हमें क्लीनिक पहुँच जाना चाहिए ।
शंकर : लेकिन आप अचानक यहाँ पहुँचे कैसे ?
भट्ट : यह सवाल तुम अपने सपूत से पूछना जिसने थोड़ी देर पहले मुझे फोन किया था कि वो और शाहिद किसी घायल       आदमी के साथ पहुँचने वाले हैं पर शायद यह पुलिस केस है । मुझसे रिक्वेस्ट कर रहा था कि मैं एफ़.आई.आर. की    ज़िद किए बिना सहयोग करूं । पर तब तक मुझे दंगे की खबर मिल गई थी और यह भी पता चल गया था कि एक        हिन्दू और एक मुसलमान दंगाइयों की भीड़ से बचकर इसी कॉलोनी में आए हैं । मेरा माथा ठनका और मैं समझ       गया कि प्रॉब्लम यहीं है । इसलिए फ़ौरन बंदोबस्त के साथ निकला ।
विनय : (कराहते हुए) किसलिए ? विधर्मियों के हाथों मरने के लिए ?
भट्ट : डॉक्टर का और मेरे ख़याल से हर सच्चे इंसान का धर्म सबसे पहले इंसानियत होता है और मैं इंसानियत को बचाने के             काम में हाथ बंटाने के लिए ही निकला हूँ ।
शंकर : तुम भूल रहे हो विनय कि अभी-अभी एक विधर्मी तुम्हारी जान बचाते हुए मारा गया है जिसकी मौत की बेचारे     ज़ाहिद और उसके परिवार को न जाने क्या-क्या सफ़ाइयां देनी पड़ेंगी ।
(विनय का सिर झुक जाता है और वे सभी उसे उठाकर बाहर निकलते हैं)

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य चार  
स्थान : डॉक्टर भट्ट का क्लीनिक
समय : रात के लगभग दस बजे

(शंकर, ज़ाहिद, कपिल, शाहिद, रामलाल और सलमा ऑपरेशन थियेटर के बाहर खड़े हैं)

भट्ट : (ऑपरेशन थियेटर से बाहर आकर) गोली निकाल दी है पर ब्लीडिंग काफी हो चुकी है । एबी पॉज़िटिव ग्रुप का खून चाहिए । मेरे यहाँ इस ग्रुप का खून तो नहीं है पर टैस्टिंग फ़ैसिलिटी है । तुम लोग अगर खून देना चाहो तो      फ़ौरन टैस्टिंग करवाओ ।
कपिल : डॉक्टर अंकल, यहाँ मौजूद लोगों में से शायद ही कोई होगा जो खून न देना चाहे । आप बेझिझक हम सब का खून             टैस्ट करें । पहले मैं जाता हूँ ।

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य पाँच   
स्थान : डॉक्टर भट्ट के क्लीनिक का भीतरी वार्ड
समय : रात के लगभग बारह बजे

(पलंग पर विनय पड़ा है और पास में डॉक्टर भट्ट के साथ बाकी सब लोग खड़े हैं । पास के एक पलंग पर रामलाल और दूसरे पलंग पर सलमा लेटे हैं)

भट्ट : होश में आने के लिए बधाई । काश आप विचारों से भी होश में आ जाएं । मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि आपके    ग्रुप एबी पॉज़िटिव का खून सलमा भाभी और रामलालजी के शरीरों में मिला और आपकी ब्लीडिंग इतनी हो       चुकी थी मुझे दोनों का खून लेना पड़ा ।
शंकर : देख विनय देख । जिस भगवान के नाम पर तुम जैसे लोग नफ़रत फैलाते हैं, उसी का इंसाफ देख । तेरे शरीर में        गया हुआ आधा खून हिन्दू का और आधा मुसलमान का है । क्या इसे अलग किया जा सकता है ? क्या तू अब मरते दम तक अपने जिस्म से मुसलमान के खून को पहचान कर बाहर निकाल सकता है ?
विनय : मुझे आप सब माफ़ कर दो । ज़ाहिद भाई । मैं खून का इल्ज़ाम अपने सर पर ले लूंगा और आपको पुलिस की कोई   परेशानी नहीं होने दूंगा ।
भट्ट : अब इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी । अभी इन्स्पैक्टर साहब आए थे । उन्होंने मुझे बताया कि मौलाना जब्बार अली के      घर को             दंगाइयों ने घेर लिया था और नजदीक रहने वाले हिन्दू परिवारों ने उनके परिवार को बचाया । इससे     उनका ऐसा हृदय-परिवर्तन हो गया कि उन्होंने न केवल दंगे की लगभग सारी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली           बल्कि अब्दुल के खून का जुर्म भी कबूल कर लिया । ऐसी ही चीज़ होती है इंसानियत जो मजहब के नाम पर   पागल लोगों के दिल बदल देती है ।
विनय : मेरी आँखें खुल गई हैं डॉक्टर साहब । अब मैं नफ़रत के लिए नहीं, भाईचारे और इंसानियत के लिए काम करूंगा ।
ज़ाहिद : (शंकर से) तू तो सुबह झगड़ा करके गया था । फिर मेरी जान बचाने के लिए मुग़ल बाग़ में कैसे टपक पड़ा ?
शंकर : अबे सुबह थोड़ा सा ताव आ गया तो क्या तू मुझे रिलीजस फ़ैनेटिक समझने लगा ? मैं सुबह विनय की बातें सुनकर ही समझ गया था कि दंगे की ज़मीन तैयार हो रही है । तेरे घर से जाने के बाद सलमा भाभी ने मुझे बताया कि तू   भी जब्बार अली के कहने पर सभा में भाग लेने के लिए चला गया है और वो सभा भी हिन्दू संगठन के सभा-स्थल      के पास ही है । बस मैं समझ गया कि गड़बड़ के चांस हैं और हो सकता है कि मुझे बरसों से चाय पिलाने वाले यार      को मेरी मदद की ज़रूरत पड़े । इसलिए मन न होते हुए भी मैं उधर पहुँचा और देख ले, यारी निभाकर दिखाई !
ज़ाहिद : (भाव-विह्वल होकर) हमारी दोस्ती मजहब से ऊपर है दोस्त । गले लग जा ।

(दोनों गले मिल जाते हैं)

(पर्दा गिरता है)

नेपथ्य से आवाज़ आती है - आओ हम सब ऐसी दोस्ती को बचाकर रखें वरना नफ़रत की आग में कहीं हमारा देश न जल जाए ।
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