Friday, July 1, 2011

प्रेम और संस्कृति



पात्र परिचय :
 
राजन        
बानी       
रवि        
क्षिप्रा
मदन          :         सेंट पीटर्स कॉलेज के द्वितीय एवम् तृतीय वर्ष के विद्यार्थी
रोशनी    
अक़ील         
हिना        
जॉर्ज     
मैरी      

रंजन       
पाप्या
मिर्चू          :          राजन के कॉलेज से बाहर वाले साथी
बीनू      
जयसिंह

विनोद          :          मनोविज्ञान में शोध कर रहा वरिष्ठ विद्यार्थी

सूदजी    
शर्माजी         :           प्रान्तीय राजनीति से जुड़े हुए लोग          
   
मिश्रा सर        :          विद्यार्थियों के लिए सम्माननीय प्राध्यापक

राजन की माँ     :           कम पढ़ी-लिखी सरल स्वभाव की गृहिणी

नेपथ्य से आवाज़ आती है - प्रेम मानव या यूँ कहें कि प्राणिमात्र को ईश्वर की ऐसी अनुपम देन है जिसके कारण यह संसार सुन्दर है, यह जीवन जीने योग्य है । नर-नारी का प्रेम भी तभी से विद्यमान है जबसे यह सृष्टि है । यह प्रेम और यह सृष्टि एक-दूसरे से यूँ जुड़े हैं कि कौन कारण है और कौन परिणाम, कहना कठिन है । कहा जाता है कि वैदिक भारतीय सभ्यता में प्रेम की अभिव्यक्ति तथा विवाह में उसकी तार्किक परिणति पर कोई प्रतिबंध नहीं था पर मानव-जाति के इतिहास का कटु सत्य तो यही रहा है कि लगभग हर देश, हर काल और हर समाज में प्रेम करने वाले स्त्री-पुरूष नितांत एकाकी ही रहे । उनके प्रेम और मिलन को सामाजिक स्वीकृति तथा समर्थन मिल पाना असंभव की सीमा तक कठिन ही रहा । सामंतवादी व्यवस्थाओं और समाजों में शक्तिशाली एवम् सामर्थ्यवान पुरुष भले ही अपने प्रेम को पाने में सफल रहे हों, सामान्य पुरूषों तथा स्त्रियों के लिए तो अपने प्रेम को पाना सदा गूलर का फूल ही बना रहा । आज चाहे विश्व इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुका है लेकिन हमारे देश में प्रेमी जोड़ों को ठुकराने ही नहीं वरन् प्रताड़ित करने, अपमानित करने और यहाँ तक कि मार डालने वालों की अनियंत्रित भीड़ जगह-जगह उपस्थित है । लड़के-लड़कियों का प्रेम ही नहीं, मैत्री तक भारतीय परिवेश में एक सामाजिक निषेध समझा जाता है । प्रेमी प्रेम करना तो छोड़ नहीं सकते, तो फिर वे अपने प्रेम को बचाने तथा उसे उसके मिलन-गंतव्य तक पहुँचाने के लिए क्या करें ? कैसे वे अपने प्रेम के समक्ष उपस्थित कठिन चुनौतियों का सामना करें ? क्या भारतीय संस्कृति तथा परंपराओं की रक्षा के नाम पर कुछ लोग नैतिक पुलिस बनकर निर्दोष जोड़ों को सताने तथा भयाक्रांत करने का अधिकार स्वयं ले सकते हैं ? क्या प्रेम को अपराध बताकर मासूमों पर ज़ुल्म ढाना अपने आप में एक अपराध नहीं ? कहीं संस्कृति-रक्षा के नाम पर यह सदियों से दबी-कुचली नारी को और अधिक लंबे समय तक पराधीन बनाए रखने का कोई नया पैंतरा तो नहीं ? क्या बाज़ारवाद के चलते आज इस सहज मानवीय व्यवहार का व्यवसायीकरण नहीं हो गया है ? एक प्रश्न यह भी है कि प्रेम के सार्वजनिक प्रदर्शन की सीमा-रेखा क्या हो ? क्या लोक-व्यवहार की मर्यादा को बनाए रखना प्रेमियों का कर्तव्य नहीं ? क्या उन्हें यह बात नहीं समझनी चाहिए कि भारतीय समाज प्रेमियों से प्रेम-प्रदर्शन में शालीनता की अपेक्षा करता है ? प्रश्न अनेक हैं । उत्तर प्रेमियों को ही ढूंढने हैं । अंतत: पीड़ित भी तो वही हैं ।

(परदा उठता है)

दृश्य एक
स्थान : सेंट पीटर्स कॉलेज के बाहर स्थित क्वालिटी रेस्तरां
समय : दोपहर एक बजे के करीब

(पेमेंट काउंटर के निकट रवि, क्षिप्रा, मदन, रोशनी, अक़ील, हिना, जॉर्ज और मैरी खड़े हैं । रोशनी अपना हैंडबैग खोलकर पैसे निकालती है लेकिन मदन उसके हाथ पर अपना हाथ रखकर उसे पैसे देने से रोक देता है)

मदन  : जब जेंट्स मौजूद हों तो लेडीज़ का पेमेंट करना एटीकेट के खिलाफ़ है । पैसे मैं देता हूँ । 
रोशनी : लेकिन शर्त तो मैंने लगाई थी न ? हारने के बाद सबको ट्रीट मुझे ही देनी थी ।
मैरी    : ठीक ही तो है । ट्रीट वही दे जो हारा है । मदन, तुम पैसे क्यों दे रहे हो ?
मदन  : अरे भई, ट्रीट रोशनी ने ही दी है । हम दोनों कोई अलग हैं ? समझ लो कि रोशनी  के लिए इस ट्रीट को मैंने स्पॉन्सर किया ।
मैरी    : यह भी कोई बात हुई ?
जॉर्ज   : हुई । हमें तो ट्रीट से मतलब था । पैसे चाहे रोशनी दे या उसका बो (beau)
रोशनी : (इठलाकर मदन की ओर देखती हुई) बो ! मेरी जूती न बनाए इसे अपना बो !
अक़ील : पैसे तुम ही दो मदन । पेइंग इज़ ए मैन्स जॉब ।
रवि    : (झल्लाकर) क्या यार ! हद है तुम लोगों की भी । साले पैसे देने की बहस में पाँच मिनट ख़राब कर   
        दिए तुम लोगों ने । अरे डेढ़ सौ साल पहले वाले लखनऊ से सीधे उठकर आ रहे हो क्या ? मदन ! अरेलड़कियों की सोहबत में रहकर तू भी इन्हीं के रंग में रंग गया क्या जो छोटी-सी बात को टी.वी. सीरियल की तरह घसीट रहा है ? पैसे कौन दे, यह फ़ैसला अगर इतना ही मुश्किल है तुम लोगों के लिए तो मैं दे देता हूँ ताकि किस्सा खतम हो साला ।
क्षिप्रा  : (गुस्से से रवि से कहती है) तुम नहीं सुधरोगे रवि । कितना बार कहा है कि अपनी भाषा और
व्यवहार को शालीन रखो ! ये कोई तरीका है बोलने का ? सभ्य लोगों की भाषा है यह ? तुम्हें कितनी बार समझाया है मैंने ! और कुछ नहीं तो फ़ीमेल कम्पनी का ही लिहाज कर लो । मगर तुम तो आदी हो गए हो इस तरह बोलने के ।
रवि   : (नाटकीय ढंग से क्षिप्रा के आगे हाथ जोड़ते हुए) अच्छा, अब माफ़ करो बाबा । आदतें सुधारुंगा         
         अपनी । वैसे तो मुझे तुम्हारी इस डांट की भी आदत पड़ गई है । इसे भी सुधार लूँ ?
               
                 (लड़के मुसकराते हैं जबकि लड़कियाँ रवि की इस अदा को देखकर हँस पड़ती हैं)

क्षिप्रा  : (अपनी हँसी दबाती हुई) अब छोड़ो भी ये चोंचलेबाज़ी । मेरी बातों को सीरियसली तो लेते नहीं
         कभी तुम ।
मदन  : पेमेंट हो गया है भई । अब हिलो सब ।
               
(सब लोग बाहर निकलते हैं लेकिन बाहर निकलते ही चौंक जाते हैं क्योंकि रेस्तरां के बाहर उन्हें अपने कॉलेज का साथी राजन अपने कॉलेज से बाहर के साथियों -  रंजन, पाप्या, मिर्चू, बीनू और जयसिंह के साथ खड़ा मिलता है । राजन के ये साथी कॉलेज के इन विद्यार्थियों के लिए सर्वथा अपरिचित हैं । किसी के हाथ में हॉकी है तो किसी के हाथ में साइकिल चैन । पाप्या के हाथ में एक कैंची और कालिख का डिब्बा भी है)

हिना  : राजन तुम ? ये कैसे तेवर हैं आज तुम्हारे ? और ये लोग कौन हैं ?
राजन : हाँ मैं ! ये लोग मेरे वो साथी हैं जो भारतीय समाज को उस सांस्कृतिक प्रदूषण से बचाने के काम में
         मेरे सहयोगी हैं जिसे तुम जैसे लोग फैला रहे हैं ।
जॉर्ज  : क्या मतलब हुआ इस बात का राजन ? कौन-सा सांस्कृतिक प्रदूषण फैल गया हमारे रेस्तरां में आकर
         कुछ खा पी लेने से ? ज़रा समझाओ तो सही ।
राजन : (दाँत पीसकर) तुम्हें और तुम्हारी इस ईसाइन सहेली को तो खास तौर से समझाएंगे । अंगरेज़   चले     
          गए । औलाद छोड़ गए । अपने समाज की गंदगी को तुम हिंदू समाज में भी फैला रहे हो ! तुम    
          फिरंगियों का वैलेंटाइन डे कल है । एक दिन एडवांस में ही मनाने आ गए ! अभी हाल ही में मंगलौर
          के एक पब में बेशरमी फैला रहे लोगों को  जो सबक सिखाया गया है, उसका छोटा-मोटा नमूना तो   
          हम तुम लोगों को भी दे ही दें । बताओ, तुम्हारे और तुम्हारी इन सहेलियों के हाथ-पाँव तोड़ दें           
          या अभी बाल काटकर और मुँह काला करके ही छोड़ दें ?
मैरी  : यह तुम क्या कह रहे हो राजन भैया ? तुम हमारे सहपाठी हो, दोस्त हो । हमारे साथ ऐसा सलूक
          करोगे ? और हम भी तुम्हारे देश के ही हैं, कोई फिरंगी नहीं हैं भैया ।
राजन : (क्रोधित स्वर में) ख़बरदार, जो अपनी गंदी जुबान से मुझे भैया कहा ! तुम्हारे जैसी बेशरम
           लड़कियों को मैं अपनी बहन का दरज़ा नहीं दे सकता । लड़कों की बाहों में बाहें डालकर घूमना- 
           फिरना संस्कार वाली भारतीय लड़कियों का काम नहीं है । भारतीय नारियों का गहना लज्जा है । वे   
           फिरंगियों का त्योहार वैलेंटाइन डे नहीं मनाती फिरतीं ।
अक़ील : राजन, वक्त के बहते दरिया को न रोका जा सकता है, न ही उल्टा घुमाया जा सकता है । अब जो
           चीज़ें हमारे यहाँ आ गईं, सो आ गईं । जिस तरह आधुनिक युग की तमाम चीज़ों को  तुम बेहिचक     
           काम में लेते हो, उसी तरह से इन चीज़ों को भी क़ुबूल करना होगा । तुम आज़ाद हो; जिसे चाहो
           अपनाओ, जिसे न चाहो, न अपनाओ । दूसरों पर अपनी मरज़ी थोपने वाले तुम कौन होते हो ?
राजन : (व्यंग से) हिन्दुस्तान में रह रहे हो, इसीलिए बातें आ रही हैं तुम्हें । पढ़ते नहीं हो अखबारों में कि
           इस्लामिक कंट्रीज़ में कैसी-कैसी पाबंदियाँ हैं ? तालिबान आए दिन जो औरतों के लिए फ़रमान  
           जारी करता है, मालूम नहीं है क्या ?
हिना  : तो क्या तुम हिन्दुस्तान को इस्लामिक कंट्रीज़ की तर्ज़ पर चलाना चाहते हो ? तालिबानी सोच को
           हिन्दुस्तानी औरतों पर थोपना चाहते हो ? रोल मॉडल बना रहे हो तालिबान को अपना ?
           इक्कीसवीं सदी में जा पहुँचे मुल्क को अट्ठारहवीं सदी में ले जाना चाहते हो ? मुझे तो फ़ख़्र है कि मैं
           हिन्दुस्तान जैसे प्रोग्रेसिव देश में रहती हूँ, किसी कट्टरपंथी इस्लामिक कंट्री में नहीं । तुम दूसरों को
           ही देख रहे हो, अपना ख़याल नहीं ?  सारा कॉलेज जानता है कि तुम बानी को चाहते हो । क्या
           तुम्हारा मन नहीं करता कि बानी को साथ लेकर कहीं जाओ, उसके साथ इस तरह से वक़्त            
           बिताओ ?
राजन :  अं...(कुछ कहते-कहते अटक जाता है और उसके कुछ बोलने से पहले ही मिर्चू बोल पड़ता है)
मिर्चू  : (ऊबने का भाव दर्शाते हुए राजन से कहता है) भाई राजन, तू यहाँ हमें कुछ करने के लिए लाया है  
         या अपने इन दोस्तों की डॉयलॉगबाज़ी सुनाने लाया है ? अगर तेरा इंटरेस्ट इसी बहसबाज़ी में है तो  
         तू कर । हम लोग नमस्ते मारें और चलें यहाँ से ।
बीनू  : (राजन को उकसाने के लिए उसे सुनाते हुए) अरे, ये लोग इसके पक्के दोस्त हैं । इसलिए सोच रहा है
          कि कुछ करे या न करे । अपन लोग तो आगे बढ़ो । क्या कहा था सूदजी ने ? सोचो मत, फोकट की         बातें मत करो, सीधे एक्शन लो
राजन : अब एक्शन ही होगा । तुम लोग अपने हाथों में कालिख मल लो और पोत दो इन बेशरम लड़कियों
           के चेहरों पर ।     

                (रवि जो इतनी देर से चुपचाप सारी बातें सुन रहा है, अचानक कड़ककर बोलता है)

रवि  : यह क्या हो रहा है राजन ? पढ़ाई छोड़कर गुण्डागर्दी शुरु कर दी है क्या तुमने ? इतनी देर से मैं यह       समझ रहा था कि तुम अपने दोस्तों के साथ कोई प्रैक्टिकल जोक कर रहो हो । लेकिन तुम तो इन्हें   धमका रहे हो । क्या समझते हो तुम कि अपने इन आवारा मवाली दोस्तों के साथ मिलकर हम लोगों के चेहरों पर कालिख पोत दोगे, बाल काट दोगे, पिटाई कर दोगे ? तुम्हारा हमारा इतने सालों का   दोस्ताना है, इसलिए इतनी देर से मैं हालात को समझ नहीं पा रहा था । लेकिन अब तुम्हारा यह      नया किरदार अच्छी तरह से समझ आ गया है मुझे । ये लड़कियाँ हमारी दोस्त हैं और इस समय हमारे साथ हैं, इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी हैं । अगर तुमने या तुम्हारे किसी जोड़ीदार ने इन लड़कियों की ओर एक कदम भी आगे बढ़ाया तो माँ कसम वो हाल करूँगा कि तुम लोगों का   वैलेंटाइन डे तो हस्पताल में ही गुज़रेगा ।

        (क्षिप्रा जो कि रवि को चाहती है, उसकी ओर प्रशंसात्मक दृष्टि से देखती है)

राजन : (रंजन, मिर्चू, पाप्या, बीनू और जयसिंह से) आगे बढ़ो । पहले इन्हीं लोगों को मारो ।

(राजन के पाँचों साथी हाथों में कालिख मले लपककर आगे बढ़ते हैं और लड़कियों पर झपटना ही चाहते हैं कि रवि, मदन, अक़ील और जॉर्ज उनके रास्ते में आ जाते हैं । हाथापाई शुरू हो जाती है । कुछ पलों की लड़ाई के बाद राजन के साथी अपने साथ लाए हुए हॉकी, साइकिल चैन आदि उठा लेते हैं और रवि आदि पर उनसे वार करने के लिए उद्यत होते हैं । तभी वातावरण में एक तीखी आवाज़ गूँजती है)

मिश्रा सर : (तीखे स्वर में) क्या हो रहा है यहाँ ? बंद करो फ़ौरन । मैंने पुलिस को फोन कर दिया है ।
रंजन : पुलिस की भभकी हमें मत दो साहब । पुलिस तो हमारी तरफ है । पता नहीं है आपको कि हम लोग          
         किनके आदमी हैं ?
मिश्रा सर : तुम्हारी यह बात सुनकर ही मैं समझ गया कि तुम लोग किसके आदमी हो ? लेकिन शहर की
               सारी पुलिस सूदजी की जरख़रीद ग़ुलाम नहीं है । चांस ले लो । दो मिनट हैं तुम्हारे पास ।  
               गिरफ़्तार हो जाओ तो सूदजी को बुला लेना ख़ुद को छुड़वाने के लिए ।
पाप्या : (बाकी लोगों से) आज क्यों पंगे लें यार ? वैलेंटाइन डे तो कल है । अभी निकलते हैं ।
राजन : ठीक है । तुम लोग जाओ । जो करना है, कल करेंगे ।

(रंजन, पाप्या, मिर्चू, बीनू और जयसिंह जल्दी से वहाँ से निकल जाते हैं । रवि उनके पीछे जाना चाहता है पर फिर मिश्रा सर की ओर देखकर ठहर जाता है । राजन भी जाने के लिए मुड़ता है पर मिश्रा सर उसे रोक लेते हैं)

मिश्रा सर : राजन, तुम कहाँ चले ? हमेशा मुझे नमस्कार करके हालचाल पूछने वाले तुम आज मुझसे मुँह
             फेरकर जा रहे हो ?
राजन : सर, मैं जानता हूँ कि आप क्या कहेंगे ? लेकिन मैं जो कुछ कर रहा हूँ, अपने महान देश की संस्कृति
         को बाहरी प्रदूषण से बचाने के लिए कर रहा हूँ । मुझे अपने देश की संस्कृति से प्यार है और मैं उसे  
         यूँ क्लबों, पबों, रेस्तरांओं में मटियामेट होते हुए नहीं देख सकता । मुझे अपनी किसी भी एक्टिविटी
         का अफ़सोस नहीं है । मैं जानता हूँ कि मैं सही हूँ ।
मिश्रा सर : तुम जानते हो कि तुम सही हो ! बड़ी अच्छी बात है । राजन, तुम तो गाँधीजी के विचारों से
               प्रेरित रहे हो । तुम्हारे सभी साथी अपने आपको प्रैक्टिकल मानते और कहते हैं लेकिन मेरे   दिल   
               के सबसे करीब अगर कोई रहा है तो वो तुम हो; एक आदर्शवादी युवक जो आज के ज़माने में भी
               ख़ुदगर्ज़ी की नहीं, देशप्रेम और जनहित की राह पर चलना चाहता है । मैं यकीन नहीं कर पा   
               रहा हूँ कि गाँधीजी का सच्चा अनुयायी बेमानी हिंसा के मार्ग पर चल पड़ा है, महिलाओं का   आदर
               करने वाला महिलाओं को अपमानित करना सही समझ रहा है । अगर तुम्हारे विचार सही भी
               हों तो उन्हें दूसरों से मनवाने के लिए क्या तुम अनैतिक तरीकों का प्रयोग करोगे ?
राजन : गाँधीजी ने भी हिंसा और कायरता में से एक को चुनने की स्थिति में हिंसा को चुनने की सलाह दी
           थी सर । मैंने कई बार लड़कियों के मान-सम्मान की रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लिया है ।
रोशनी : राजन भैया ठीक कह रहे हैं सर । आपको याद होगा, करीब छ:-सात महीने पहले जब शाम के वक़्त   
           मैं लाइब्रेरी से अपने घर जा रही थी तो कुछ लड़के मेरे साथ बदतमीजी करने लगे थे । मैं तो एकदम  
           घबरा गई थी क्योंकि उस समय गली एकदम सुनसान पड़ी थी और मेरा मददगार कोई नहीं था ।
           तब राजन भैया ने ही वहाँ पहुँचकर उन बदमाशों का मुक़ाबला किया था और उन्हें खदेड़कर मुझे     
           मेरे घर छोड़कर आए थे । मुझे तो उस समय इनका आना ऐसा लगा था मानो द्रौपदी की रक्षा के
           लिए भगवान कृष्ण दौड़े चले आए हों ।
मिश्रा सर : (मंदहास के साथ) तो फिर आज भगवान कृष्ण स्वयं चीरहरण करने वालों की ओर कैसे हो गए ?   
             नारी का सम्मान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह न करने वाला आज स्वयं ही अपमान  
              करने वालों की श्रेणी में कैसे जा पहुँचा ?
राजन : नारी स्वयं अपने सम्मान का मूल्य समझेगी, तभी उसका सम्मान बचेगा । मेरे पास बहस के लिए
           समय नहीं है सर । लेकिन कल चाहे कॉलेज हो या कोई बाहर की जगह, पश्चिमी संस्कृति फैलाने   
           वाला वैलेंटाइन डे का त्यौहार मनाने वाले लोग मेरे निशाने पर होंगे ।
क्षिप्रा : वैलेंटाइन डे केवल लड़के-लड़कियों द्वारा एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने या डेटिंग
          करने का दिन नहीं है राजन । इस दिन माता-पिता और संतान भी एक-दूसरे के प्रति अपना प्रेम जता   
          सकते हैं, एक-दूसरे को अपने प्रेम के प्रतीक स्वरूप उपहार दे सकते हैं । प्रेम चाहे किसी भी रुप में
          किया जाए, वैलेंटाइन डे में सम्मिलित है ।
राजन : (विद्रूपयुक्त स्वर में) और यह बात भारतीयों को हज़ारों साल से समझ नहीं आई है ! अपने ग्रीटिंग
           कार्ड और शो पीस बेचने के लिए इस दिन को पॉपुलराइज़ करने वाले विदेशियों के समझाने से ही  
           समझ में आएगी हमें ! है ना ? महंगा फूल, कार्ड या तोहफ़ा ख़रीदो और बताओ कि प्यार कितना
           गहरा है ! भावनाओं को खर्च हो रहे पैसों के तराज़ू में तौलकर देखो कि वे कितनी वज़नदार हैं या
           कितनी हलकी हैं !
मिश्रा सर : जवाब दो क्षिप्रा । क्या तुम लोगों में से कोई भी राजन की इस बात का जवाब दे सकता है ?
               सचमुच है कोई जवाब ?  
क्षिप्रा : शायद नहीं सर । पर राजन की दलील अभी-अभी इसने अपने कुछ आवारा साथियों के साथ मिलकर
          जो कुछ भी किया है, उसे जस्टीफ़ाई नहीं कर सकती । ठीक उसी तरह, जिस तरह मंगलौर के पब में    
          लेडीज़ पर जो हमला हुआ है, उसे भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी हमले के किसी भी तर्क से जायज़
          नहीं ठहराया जा सकता ।
राजन : मंगलौर में जो कुछ भी हुआ, ठीक हुआ । भारतीय नारियाँ अगर पुरुषों के साथ जाकर पब में
           खुलेआम शराब पियेंगी तो उन्हें उनकी भूल का एहसास कराने के लिए ऐसा ही कुछ करना होगा ।
मदन : पब में लोग केवल सोशलाइज़ करने के लिए जाते हैं राजन । वो कोई मयख़ाना नहीं है । विद्यार्थियों  
          के जाने के लिए तो वो है भी नहीं । वो केवल वर्किंग क्लास के लिए है । और जहाँ तक नशाख़ोरी का
          सवाल है, वो अगर महिलाओं के लिए बुरी है तो पुरुषों के लिए भी बुरी है । क्या यह कोई तर्क हुआ
          कि महिलाएँ शराब पियें तो वो बुरीं और पुरुष शराब पियें तो वो भले ? पुरुषो को तो तुम शराब
         पीने के लिए बढ़ावा दो और महिलाएँ पियें तो उन पर हमला कर दो क्योंकि उनका शराब पीना
          भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है !
मिश्रा सर : राजन, अपने ख़यालात दूसरों पर थोपे नहीं जाते । यह बात भारतीय संस्क़ति में कहीं पर भी
          मौजूद नहीं है । तुम दूसरों को अपने ख़यालात लॉजिकली बताओ और उन्हें कन्विंस करने की      कोशिश करो । यह तुम्हारा संवैधानिक अधिकार भी है । लेकिन गुण्डागर्दी की इजाज़त तो न          भारतीय संस्कृति में है, न सामाजिक व्यवहार में और न ही संविधान में । तुम एक ग़ैरकानूनी काम      कर रहे हो जिसके लिए तुम पर मुकदमा चल सकता है, तुम्हें जेल हो सकती है ।
राजन : मुझे न मुकदमे की परवाह है, न जेल की । डरकर पीछे हटना मैंने नहीं सीखा सर ।
अक़ील : (मिश्रा सर से) ज़रा इससे पूछिए सर कि जब यह दुहाई भारतीय संस्कृति की दे रहा है तो हमारे   
            साथ इंगलिश मीडियम में क्यों पढ़ रहा है ?
राजन : अंतर्राष्ट्रीय भाषा में शिक्षा लेने और विदेशियों द्वारा अर्जित ज्ञान प्राप्त करने में कोई बुराई नहीं है  
           अक़ील । लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम अपनी संस्कृति को बिसरा कर विदेशी संस्कृति का
           चोला ओढ़ लें ।
रवि  : (बातचीत में दख़ल देते हुए) ये बहस तो हनुमान की पूँछ की तरह लंबी होती जा रही है । मैं तुम्हें
         आख़िरी चेतावनी देता हूँ राजन ! अगर कल तुमने या तुम्हारे उन मवाली यारों ने कोई भी गड़बड़ की
         तो अपने बचाव के लिए हम जो ठीक समझेंगे, करेंगे । बरसों पुरानी दोस्ती को तो तुमने ख़ुद ही ताक
         पर रख दिया है । अब दोस्ती का कोई लिहाज नहीं है हमें ।
राजन : मैं वैलेंटाइन डे के विरोध के लिए कटिबद्ध हूँ । कल न ही मनाओ तो अच्छा है । फिर न कहना कि
           मैंने एडवांस में नहीं चेताया था ।
               
                   (कहते-कहते ही राजन घूमकर तेज़-तेज़ कदमों से चल देता है)
                  
मदन  : (चिल्लाकर) अबे जा जा ! हम तो मनाएंगे । तेरे से जो भुट्टे भूने जा सकते हों, भून लेना ।
रोशनी : (मानो स्वत: भाषण करती हुई) मुझे अच्छा नहीं लग रहा । आज भी रह-रहकर मुझे वो शाम याद
           आ जाती है जब राजन ने मुझे बचाया था । उसकी बातें पूरी तरह से ग़लत भी नहीं लगतीं ।
मदन  : (खीझकर) वो तो तुम लोगों को बुर्क़ा पहनाकर छोड़ेगा । बोलो, पहनना है क्या ?
हिना  : (मिश्रा सर से) सर, क्या यह मुमकिन नहीं कि राजन को अपनी भूल समझ में आ जाए ?
मिश्रा सर : उसे अपनी भूल ज़रूर समझ में आएगी हिना । (एक गहरी श्वास लेकर) वो ज़रूर संभलेगा   
               (ठहरकर) मगर ठोकर लगने के बाद ।

                                          (दृश्य परिवर्तन)                

दृश्य दो
स्थान : राजनीतिक दल का कार्यालय
समय : शाम के लगभग पाँच बजे

(सूदजी और शर्माजी कार्यालय में एक मेज़ के इर्दगिर्द कुर्सियाँ लगाकर बैठे धीमे स्वरों में कुछ मंत्रणा कर रहे हैं । तभी राजन और उसके साथी भीतर प्रवेश करते हैं)
               
सूदजी : अरे राजन बेटे ! आओ, आओ ! बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी । अभी मैं शर्माजी से तुम्हारी ही तारीफ़
           कर रहा था । बाकी सब कार्यकर्ता तो आकर जा चुके । मैं दरअसल तुम्हारे ही इंतज़ार में यहाँ बैठा
           हुआ हूँ ।
राजन : प्रणाम भाईजी । वैसे तो वैलेंटाइन डे कल है और कल उसके ज़ोरदार विरोध के लिए हम पूरी तरह
           से तैयार हैं । लेकिन आज भी हमने कई रेस्तरांओं, गिफ़्ट की दुकानों और लड़के-लड़कियों के मिलने
          की जगहों पर अपना विरोध-प्रदर्शन किया है ।
सूदजी : (हँसकर) ठीक ही तो है । मैच से पहले वार्म-अप भी ज़रूरी है । (शर्माजी से) क्यों शर्माजी ?
शर्माजी : (हँसी में साथ देते हुए) बिल्कुल ! बिल्कुल !
राजन : बस आपको रिपोर्ट करने और यह पूछने के लिए आए हैं कि कल के लिए कोई एक्स्ट्रा गाइडलाइन तो
          नहीं है ।
सूदजी : कोई और गाइडलाइन नहीं है बेटे । जो थीं, सब तुम्हें बता दीं । और तुम बहुत अच्छा काम कर रहे
            हो । पार्टी तुमसे बहुत ख़ुश है । कीप इट अप । पुलिस की तुम बिल्कुल फ़िक्र न करना । पुलिस को     
            मालूम है कि तुम लोगों को अपना काम पूरा करने से पहले नहीं रोकना है तुम्हारे काम में कोई
            अड़ंगा पेश नहीं आएगा । बाद में पुलिस फ़ॉरमेलिटी के लिए आ सकती है पर तुम लोगों पर कोई
            आँच नहीं आएगी । कई जगह तो पुलिस तुम्हारे साथ ही टूट पड़ेगी भारतीय संस्कृति के विरूद्ध
            जाने वालों पर, देख लेना ।
पाप्या : भाईजी, ज़ेबें एकदम ख़ाली हैं । कुछ पैसे मिल जाते तो . . .।  
सूदजी : आज तो तुम लोग लेट हो गए । कार्यकर्ताओं को पैसे बांटने में यहाँ हमारी ज़ेबें ही ख़ाली हो गईं ।
           अब तो कल ही हो सकता है । मैं पैसे राजन को दूँगा । राजन, तुम अपने लिए और इन लोगों के लिए
           जितने पैसे ठीक समझो, कल मेरे से ले लेना ।
राजन : भाईजी, मुझे कुछ नहीं चाहिए । मैं यह सब पैसों के लिए नहीं कर रहा । मैं यह इसलिए कर रहा हूँ
           क्योंकि मैं पश्चिमी हमले से भारतीय संस्कृति की रक्षा करना अपना नैतिक कर्तव्य समझता हूँ ।
रंजन : (बुदबुदाकर) साला क्रैक !
सूदजी : तुम्हारी इसी भावना की तो हम तारीफ़ करते हैं कि तुम निस्वार्थ भाव से देश-सेवा का व्रत धारण
           किए हुए हो । फिर भी बेटे, दूसरे लोगों की तो ज़रुरत है ही । अपने लिए न सही, इन लोगों के लिए
           जितने पैसे ठीक समझो, कल मेरे से ले लेना । किसे कितने देने हैं, यह पूरी तरह से तुम्हारा फ़ैसला
           रहेगा ।
राजन : अच्छा भाईजी अब हम लोग चलते हैं ।

                (राजन और उसके साथी बाहर निकल जाते हैं)

शर्माजी : (राजन की ओर इंगित करते हुए) यह तो भावुक लड़का मालूम होता है । बीस-इक्कीस की उम्र में भी
             बचपना ही है इसमें । दुनियादारी की समझ अभी इसे आई मालूम नहीं होती ।
सूदजी : (मुसकराते हुए) जब तक यह समझ इसे आएगी, यह हमारा काफ़ी काम कर चुका होगा ।

(दृश्य परिवर्तन)
दृश्य तीन
स्थान : नगर पुस्तकालय के बाहर
समय : लगभग वही

(विनोद, बानी, क्षिप्रा और रवि पुस्तकालय के द्वार के बाहर खड़े होकर बातें कर रहे हैं । बानी मनोविज्ञान में शोध कर रहे विनोद से एक खास टॉपिक को समझने तथा कुछ नोट्स लेने के लिए वहाँ आई थी जहाँ रवि और क्षिप्रा उससे मिलने पहुँच गए । दिन में घटी घटना की बाबत वे उन्हें बता चुके हैं)

बानी  : सुनकर यकीन नहीं आता । मैं तो यह समझ बैठी थी कि  मैं राज (राजन) को इतना जान गई हूँ
           जितना उसे कोई नहीं जान पाया होगा । पर तुमने जो कुछ भी बताया, उसे सुनकर तो लगता है कि  
           मैं अब तक उसे ज़रा भी नहीं जान सकी हूँ ।  
क्षिप्रा : आज जो हुआ, सो हुआ । मुझे तो अब कल की फ़िक्र है । राजन ने धमकी दी है कि अगर हमने                 
          वैलेंटाइन डे मनाया तो हम लोगों के लिए बुरा होगा । मुझे तो उसके साथ वाले लड़कों को देखकर ही
          डर लग रहा था । एकदम सड़क-छाप गुंडे लग रहे थे वे ।
रवि  : उन गुंडों से डरना छोड़ो क्षिप्रा । हम लोग हाथों में चूड़ियाँ पहनकर नहीं बैठे हुए हैं जो वे लोग टहलते
          हुए आएं और हमें मार-पीट कर और अपमानित करके चलते बनें । लेकिन हमारी जवाबी कार्रवाई में  
          राजन को अगर कोई नुकसान पहुँचा तो बानी को दुख होगा । इसीलिए तो हम बानी से बात करने
          आए हैं ।
बानी  : मैं राज के यहाँ जाती हूँ और उसे समझाने की कोशिश करती हूँ ।
रवि  : मुझे उम्मीद नहीं कि आज वो तुम्हारी कोई बात सुनेगा । फिलहाल वो लोकल एम.पी. सूदजी के रंग
          में रंगा हुआ है । उसके साथ जो आवारा लड़के थे, वे भी सूदजी की पार्टी के थर्ड ग्रेड कार्यकर्ता ही हैं ।  
        उसके सर पर भारतीय संस्कृति की रक्षा का ऐसा भूत सवार है कि उसने मिश्रा सर की भी किसी बात
          को समझने की कोशिश नहीं की । अगर मिश्रा सर सही वक़्त पर न आ गए होते तो वहीं ऑन द
          स्पॉट ख़ूनख़राबा हो गया होता ।
बानी  : उफ़ ! आख़िर कुछ लोग यह मोरल पुलिस बनने का ठेका क्यों ले लेते हैं ? एक-दूसरे को पसंद करने       
           वाले लड़के-लड़कियों का थोड़ा-सा मिलना-जुलना, एक-दूसरे को तोहफ़ा देना, एक साथ खाना-पी
           ना या साथ में वक्त बिताना क्या कोई ऐसा गुनाह है कि उनके पीछे पड़ जाया जाए ?
क्षिप्रा : शायद विनोद भैया इस मुद्दे पर कोई रोशनी डाल सकें ।  
विनोद : वैसे तो आज के वक्त में शायद ही कोई ऐसी गतिविधि हो जिसके पीछे राजनीतिक लोग हों और वो  
            बिना किसी निहित स्वार्थ के चलाई जाए । चाहे किसी चीज़ का विरोध हो या किसी बात को लेकर    
            आंदोलन खड़ा किया जाए, उसके पीछे ख़ुदग़र्ज़ी ही होती है । हमारे देश में तो किसी भी बात का
            विरोध-प्रदर्शन एक धंधा बन गया है जिससे लोग अपना सिक्का चलाते हैं और एक्सटॉर्शन की
            ग़ैरकानूनी कमाई करते हैं । वैलेंटाइन डे का विरोध भी इससे इतर नहीं । (रूककर) लेकिन यह तो
            हुई व्यावहारिक बात । मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अगर ऐसे विरोध-प्रदर्शनों और निर्दोष लोगों को
            प्रताड़ित करने की गतिविधियों को समझा जाए तो आपको एक खास तरह के मनुष्यों के बारे में
            जानने को मिलेगा । ऐसे लोग अपनी पृष्ठभूमि, परवरिश अथवा  आनुवंशिक गुणों के चलते आंतरिक
            रूप से हिंसक होते हैं और उन्हें अपनी हिंसक प्रवृत्ति के प्रदर्शन का बहाना चाहिए होता है ।
            मनोविज्ञान की भाषा में उन्हें साइकोपैथ कहते हैं । अपनी हिंसक हरकतों को न्यायसंगत ठहराने के
            लिए वे उन्हें किसी विशिष्ट बात के विरोध के तर्क में लपेटकर प्रस्तुत करते हैं । ऐसे लोग न केवल
            अपने तथाकथित विरोध के लिए लक्ष्य ढूंढते हैं बल्कि समय-समय पर ऐसे लक्ष्यों का स्वयं ही सृजन
            भी करते हैं । अपने अंदर की हिंसा को बाहर निकालने के लिए उन्हें कोई निशाना तो चाहिए ।
            बाकी कानून आदि का कोई भय उन्हें इसलिए नहीं होता क्योंकि जो कुछ भी किया जाता है, भीड़
            के रुप में किया जाता है । भीड़ में व्यक्तिगत पहचान तो होती नहीं । अपने अंदर का हिंसक जानवर
            भी संतुष्ट और लूटपाट या चौथ-वसूली में कुछ मिल जाए, तो वो बोनस ।
बानी  : मेरे राज को ऐसे बुरे लोगों की श्रेणी में न डालो विनोद भैया । मैंने तो सदा उसके भीतर इंसानियत
           को ही हिलोरें लेते देखा है । उसके अंतर की इंसानियत, सादगी और आदर्शवादिता ने ही तो मेरा  
           मन मोह लिया था ।
रवि  : (बानी से) यह सब तो ठीक है । अब तुम क्लीयर बोलो । कल हमें राजन और उसके गुंडे साथियों से
         अपना बचाव करना है । लड़कियाँ भी हमारे साथ उनसे मोर्चा लेंगी अगर ज़रुरत पड़ी तो । तुम्हें   
        राजन से प्यार है । चाहो तो ख़ुद भी उसकी बातों को समझो और उसके विचारों का भी रुख़ मोड़ो
        मगर हमें ग़लत न समझना क्योंकि हम जो कुछ भी करेंगे, मजबूरी में करेंगे । अगर तुम उसे रोक पाओ    
        तो बेहतर, नहीं तो... (रवि अर्थपूर्ण ढंग से अपना वाक्य अधूरा छोड़ देता है) ।
क्षिप्रा : क्यों न हम लोग कल  कुछ भी न करें ? आख़िर राजन की बात पूरी तरह से ग़लत भी तो नहीं है ।
         यह वैलेंटाइन डे वग़ैरह बाज़ारवादी ताक़तें अपने बिजनेस के लिए ही तो प्रोपेगेट कर रही हैं ।
बानी : (चेहरे पर दृढ़ता के भाव लाकर) नही क्षिप्रा । दिन की घटना की डिटेल सुनकर और कल के उन लोगों   
          के इरादे जानकर मैं तुम्हारी इस बात का समर्थन नहीं कर सकती । अगर गुंडों की एक संगठित           
          जमात हमारे बुनियादी हक़ूक पर हमला कर दे तो हम उनकी फ़िलॉसॉफ़ी को समझें या अपनी
          हिफाज़त करें ? मैं राज को चाहती ज़रुर हूँ मगर ग़लत बात का विरोध करना और अपने सिद्धांतों    
          पर अटल रहना मैंने उसी से सीखा है । अब उससे जो भी बात होगी, वैलेंटाइन डे के बाद होगी ।
          पहले हमें उसे और उसके हिमायतियों को यह बता देना है कि हम बुज़दिल नहीं हैं ।
रवि  : (राहत की साँस लेकर) थैंक्यू बानी । थैंक्यू वैरी मच ।

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य चार
स्थान : सेंट पीटर्स कॉलेज के प्रवेश द्वार के निकट
समय : 14 फ़रवरी, वैलेंटाइन डे की सुबह के लगभग नौ बजे

(राजन अपने साथियों – रंजन, पाप्या, मिर्चू और बीनू के साथ कॉलेज के द्वार की ओर बढ़ रहा है । पिछले दिन की भाँति ही उनके हाथों में हॉकी, साइकिल चैन, कालिख का डिब्बा, कैंची आदि हैं)

राजन : ये जयसिंह कहाँ रह गया ? जब कल कह दिया था कि लेट नहीं होना है तो टाइम से आना चाहिए           
          था ।
पाप्या : जब उसे पता है कि यहीं आना है तो आ जाएगा । किसी वजह से लेट हुआ होगा ।

(कॉलेज के द्वार तक पहुँचते-पहुँचते ही राजन और उसके साथी ठिठक जाते हैं क्योंकि द्वार के ठीक सामने ही रवि, मदन, अक़ील और जॉर्ज अपने हाथों में उन्हीं के जैसे हथियार लिए मुस्तैद खड़े हैं)

रवि  : (हाथों में हॉकी थामे आगे बढ़ते हुए) आओ राजन । वैलकम ! तुम शायद यह सोचकर सुबह-सुबह
          आए हो कि हम लोगों के आने से पहले ही यहाँ मोर्चा जमा लोगे । मगर दोस्त, हम भी तुम्हारी रग-
          रग से वाकिफ़ हैं । इसलिए तुम्हारे आने से पहले ही हम यहाँ तुम्हारे और तुम्हारे इन भाड़े के टट्टुओं
          के स्वागत के लिए मौजूद हैं । पर हम तब तक वार नहीं करेंगे जब तक तुम कुछ नहीं करोगे । हम
          सिर्फ़ अपने बचाव में हाथ उठाएंगे ।
राजन : मैं भी यहाँ बेवजह का झगड़ा करने तो आया नहीं । मैं बस यही चाहता हूँ कि तुम विदेशियों का
           त्यौहार वैलेंटाइन डे न मनाओ ।
रवि  : हमें हुक्म दे रहे हो राजन ? स्टेट के गवर्नर मुक़र्रर हो गए हो क्या ?
बीनू  : थोड़ा वेट करते हैं राजन । वैलेंटाइन डे तो तभी मनेगा जब लड़कियाँ आएंगी ।
मदन : (भड़ककर) लड़कियों के आने के बाद क्या करेगा बे ? जो करना है अभी कर ।

(यह कहते-कहते ही मदन अपने हाथ में थामी हुई हॉकी को ख़तरनाक ढंग से घुमाते हुए बीनू की ओर बढ़ता है । बीनू सहमकर पीछे हटता है)

बीनू  : (घबराकर) आगे मत बढ़ना । अभी हम कुछ नहीं कर रहे ।
मदन : (व्यंग से) सरक गई फूँक ? इतना ही दम है भारतीय संस्कृति की रक्षा करने वालों में ? या तुम्हारा
        ज़ोर केवल निहत्थों और अबलाओं पर ही चलता है ?

                (तभी वातावरण में रोशनी की आवाज़ उभरती है)

रोशनी : (हाथों में हॉकी थामे आगे बढ़ती हुई) भारतीय नारियाँ अबला नहीं हैं मदन । हमें अबला कहकर
          हमारा अपमान करने का तुम्हें कोई हक़ नहीं है ।

(राजन और उसके साथी अब देखते हैं कि लड़कों के पीछे लड़कियाँ भी हाथों में हॉकियाँ लिए खड़ी हैं । रोशनी के साथ क्षिप्रा, मैरी और हिना हैं)

राजन : (रोशनी से) तुम हमें ग़लत समझ रही हो । हम तुम लोगों पर बेवजह हमला करने या तुम्हारी
इनसल्ट करने रहीं आए हैं । हम तो बस यह चाहते हैं कि तुम विदेशियों का त्यौहार वैलेंटाइन डे न मनाओ । तुम सब शांति से अपने-अपने घर चली जाओ तो हम तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे
क्षिप्रा : (आगे बढ़ती हुई राजन से संबोधित होती है) और अगर हम वैलेंटाइन डे मनाएं तो ? जिन्हें पसंद
         करते हैं, उन्हें फूल और तोहफ़े दें तो ?
राजन : तो तुम लोगों के मुँह काले किए जाएंगे, तुम्हारे बाल काट दिए जाएंगे और हो सकता है कि तुम्हारी
        पिटाई भी हो ।
क्षिप्रा : कोशिश करके देखो राजन । भारतीय संस्कृति की रक्षा के ठेकेदार बने बैठे तुम लोगों ने न तो हमारे
          देश के इतिहास को पढ़ा है, न हमारी संस्कृति को जाना है । भारतीय नारी कोमलता की प्रतीक
          ज़रूर है मगर वक्त और हालात के मुताबिक वह रणचंडी का रुप भी धारण कर लेती है । उसे अपने
          सम्मान की रक्षा के लिए पुरुषों के सहारे की ज़रूरत नहीं है । लेकिन फिर भी वो घृणा नहीं करती ।
          उसके मन में दया है, क्षमा है । तुम जैसे लोगों को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए आज देश भर में
          महिलाएं पिंक चड्डी अभियान चला रही हैं । हम भी तुम्हें और तुम्हारे इन सो काल्ड दोस्तों को पिंक
          चड्डियाँ भेंट कर सकते हैं । पर हम ऐसा न करके तुम्हारी इज़्जत रख रहे हैं । तुम हमारा अपमान
          करने आए हो मगर हम तुम्हारा अपमान नहीं करना चाहते । हमें आज भी तुम्हारी बरसों पुरानी
          दोस्ती का लिहाज है ।
राजन : फ़िलवक्त तो वो दोस्ती दुश्मनी बन चुकी है । फिर कैसा लिहाज ?
क्षिप्रा : याद रखो राजन – दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, कल अगर हम दोस्त बन जाएं तो
          शर्मिन्दा न हों ।
राजन : बहुत खूब ! बहुत खूब क्षिप्रा ! लीडर बनने जा रही हो । या बन ही चुकी हो शायद ।
रोशनी : क्षिप्रा हमारी लीडर नहीं है राजन भैया । हमारी लीडर से मिलना चाहोगे तुम ? मैरी ! हिना ! हटो
            तो एक तरफ़ । राजन भैया को हमारी लीडर को देखने दो ।

(मैरी और हिना के एक ओर हटते ही राजन को बानी बज़र आती है । उसके पास भी एक हॉकी है जिसे अपने हाथों में तोलती हुई वह राजन की ओर बढ़ती है । उसके चेहरे पर पत्थर की-सी सख़्ती है)

राजन : (हैरानी से) बानी तुम ! यूँ इन लोगों के साथ ? यकीन नहीं कर पा रहा हूँ ।
बानी : (एक-एक शब्द को चबाती हुई) यकीन तो मैं नहीं कर पा रही हूँ राज कि जिस आदर्शवादी और
          स्वप्नदर्शी लड़के से मैं प्यार कर बैठी, वो यूँ गुंडे-मवालियों के स्तर तक गिर गया है । ये हैं तुम्हारे  
          आदर्श ? ये हैं तुम्हारे विचार ? भारतीय संस्कृति की यही समझ है तुम्हें ?
राजन : हम लोग बाद में बात कर लेंगे बानी । अभी हमें अपना काम कर लेने दो ।
बानी :  तो करो न अपना काम ? मैं भी इन्हीं लोगों के साथ हूँ । कहो अपने गुंडे साथियों से कि मेरे मुँह पर
           कालिख पोतें । मेरे बाल काटें । मेरे साथ बदतमीजी और मारपीट करें । या ये सारे काम तुम ख़ुद
           करना चाहते हो !
राजन : कैसी बातें कर रही हो बानी ? मैं तो तुम्हें प्यार ... ।
बानी : (राजन की बात काटकर) प्यार ! कितना अजीब लग रहा है यह लफ़्ज़ इस वक्त तुम्हारे मुँह से ! प्यार
          का मतलब भी जानते हो राज तुम ?
राजन : प्यार तो मैंने तुमसे किया है बानी । पर मेरा प्यार कभी दिखावे और छिछोरेपन का नहीं रहा ... ।  
बानी : (बीच में ही बोल पड़ती है) हाँ राज, हम लोग दूसरे प्यार करने वालों की तरह हाथों में हाथ डालकर
          घूमते-फिरते नहीं, कहीं क्लब-रेस्तरांओं में नहीं जाते, सिनेमा नहीं देखते । मगर फिर भी सारे कॉलेज
          को हमारे प्यार के बारे में मालूम हो गया । कैसे ? ऐसे कि हमारे प्यार की गहराई सभी को नज़र आ
          गई । इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते राज और हमारे प्यार की मुश्क कुछ ऐसी थी कि हमारी
          मुहब्बत ख़ामोश रहकर भी बयां हो गई । क्यों ? क्योंकि उसकी सच्चाई हमारे चेहरों पे नुमायां होती
          थी । लड़के-लड़कियाँ मिसाल दिया करते हैं हमारे प्यार की । मगर आज मैं अपने आप से शर्मिंदा हूँ
          यह सोचकर कि मैंने तुममें ऐसा क्या पाया जो मैं तुम पर मर मिटी ? जो दूसरों के प्यार की कद्र नहीं
          कर सकता, जो प्यार करने वाले मासूम जोड़ों को ज़लील करने और उन पर ज़ुल्म ढाकर उनके प्यार
          को कुचलने पर आमादा है; वो किसी से क्या प्यार करेगा ? अरे मैं थूकती हूँ तुम्हारे प्यार पर राज !
        (बानी सचमुच हिकारत से राजन के सामने थूक देती है और क़हर भरे स्वर में कहती है) अगर थोड़ी-
          सी भी ग़ैरत बाकी है तुममें तो आज के बाद अपनी सूरत मुझे कभी मत दिखाना ।
               
(बानी का यह रौद्र रूप देखकर राजन ही नहीं, बानी के साथी लड़के-लड़कियाँ भी दंग रह जाते हैं । कुछ पलों के लिए ऐसी स्तब्धता छा जाती है कि सुई गिरने की आवाज़ भी सुनाई दे सके)

राजन : ब.बानी.. (कुछ कहना चाहता है लेकिन उसके मुँह से बोल नहीं फूटता)

                (राजन के साथी धीमे स्वरों में आपस में बातें करने लगते हैं)

रंजन : यार, इस राजन ने तो आज फिर अपना ये थियेटर शुरु कर दिया । ये सूदजी का कुछ काम होने देगा 
         नहीं ?
मिर्चू : ये साला सूदजी का क्या काम करेगा ? ये तो ख़ुद इस लौंडिया से लगा पड़ा मालूम होता है ।
पाप्या : तो हम तो करें । हल्ला बोलें इन लोगों पर ?
बीनू : पागल हुआ है ? ये लड़के-लड़कियाँ कुल मिलाकर हमसे दुगने हैं । लेने के देने पड़ जाएंगे ।
रंजन : ये जयसिंह भी पता नहीं कहाँ मर गया ? पाप्या, तेरे पास तो उसका मोबाइल नंबर है न ? उसे फ़ोन
        लगाकर बोल कि चार-पाँच लड़कों का जुगाड़ करके और उन्हें हथियारबंद करके यहाँ ले आए ।
पाप्या : ले, जयसिंह तो नाम लेते ही आ गया ।  

                (जयसिंह हाँफते हुए वहाँ पहुँचता है)

राजन : (जयसिंह से) अरे तू कहाँ रह गया था ? और हाँफ क्यों रहा है ?
जयसिंह : (झल्लाकर) तू अपना मोबाइल तो चालू रखता नहीं । सूदजी कब से तेरे से कॉन्टैक्ट करने की
         कोशिश कर रहे हैं पर तेरा मोबाइल तो स्विच ऑफ़ आ रहा है । उन्हें तेरा घर भी नहीं मालूम ।
             इसलिए उन्होंने मुझे बुलवाया और तुझे बुलाने के लिए दौड़ाया ।
राजन : (अपना मोबाइल निकालकर) बैटरी चार्ज करना भूल गया था । इसलिए ऑफ़ हो गया । मगर ऐसी
         क्या बात हो गई जो सूदजी सुबह-सुबह याद कर रहे हैं ?
जयसिंह : यह तू उन्हीं से पूछ लेना । वो अपने घर पर सब लोगों का इंतज़ार कर रहे हैं । अभी यहाँ का काम
           छोड़ो और सूदजी के घर चलो ।
      
(राजन और उसके साथी वहाँ से चल देते हैं । चलते-चलते राजन की निगाहें बानी की निगाहों से मिलती हैं । बानी की नज़रें क्षोभ और तिरस्कार से जल रही हैं । राजन उसकी नज़रों का सामना नहीं कर पाता और अपनी निगाहें झुकाकर मुड़ जाता है)

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य पाँच
स्थान : सूदजी का निवास
समय : सुबह के लगभग पौने दस बजे

(सूदजी अपने घर के ड्राइंगरूम में अपने हाथ अपनी पीठ के पीछे बाँधे बेचैनी से टहल रहे हैं जबकि राजन और बाकी लोग वहाँ प्रवेश करते हैं)

सूदजी : (शिकायत भरे स्वर में) क्या राजन बेटे ! अपना मोबाइल ऑफ़ रखते हो ! अर्ली मॉर्निंग से तुम्हें
कॉन्टैक्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ पर फ़ोन ही नहीं लग रहा । तुम्हारे घर का पता किसी को मालूम नहीं । इसलिए जयसिंह को बुलवाया और उसे कहा कि तुम्हें कहीं से भी ढूंढकर लाए ।
राजन : माफ़ी चाहता हूँ भाईजी । मोबाइल की बैटरी डाउन हो गई थी । लेकिन आप यह तो बताइए कि
         सुबह-सुबह ऐसी क्या बात हो गई ।  
सूदजी : वही बताने के लिए तो बुलाया है । देर रात तक हमारी पार्टी की इलैक्शन कमिटी की मीटिंग चली ।
           फ़ाइनली हाई कमांड ने फ़रमाया कि दो महीने बाद होने जा रहे जनरल इलैक्शंस के मद्देनज़र इस    
           बार वैलेंटाइन डे का खुलकर विरोध न किया जाए और वैलेंटाइन डे मनाने जा रहे युवाओं        को किसी
           भी बात से रोका न जाए । यही बात मैं तुम्हें और बाकी लोगों को जल्दी-से-जल्दी बता देना चाहता
           था ताकि तुम लोग अनजाने में कुछ कर न बैठो ।
मिर्चू  : यानी वैलेंटाइन डे का विरोध बंद ।
सूदजी : फ़िलहाल तो यही समझो ।

(सुनकर राजन मानो आसमान से गिरता है पर फिर वह ख़ुद को इस आघात से उबारने की कोशिश करते हुए सूदजी से कहता है)

राजन : लेकिन भाईजी, हमारा मिशन तो भारतीय संस्कृति पर हो रहे इस पश्चिमी हमले को रोकने का था ।
          वो तो कैंसिल हो गया ।
सूदजी : (मानो उसे पुचकारते हुए) कैंसिल नहीं बेटे, केवल पोस्टपोन हुआ है । बस ज़रा ये जनरल इलैक्शंस
            निपट जाएं । अब हाई कमांड का आदेश तो मानना ही पड़ेगा न ! उनकी बात ठीक भी है । इस
            विरोध से कहीं हम अपना वोट बैंक न गंवा बैठें ।
राजन :  यानी कि चुनावी नफ़े-नुकसान के आगे विचारधारा की बातें गौण हैं ।
सूदजी : (समझाने वाले अंदाज़ में) नहीं राजन बेटे, विचारधारा ही हमारे लिए सर्वोपरि है । लेकिन बेटे,
            विचारधारा को लागू तो सत्ता के ज़रिए ही किया सकता है न ! इसीलिए चुनावी राजनीति का  
            लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना होता है । सत्ता ही वो साधन बनती है जिसके द्वारा विचारधारा का साध्य     
            प्राप्त किया जाता है । इसलिए चुनाव जीतने के लिए कभी-कभी अस्थायी तौर पर ऐसे समझौते
            करने पड़ते हैं । जब तुम ख़ुद अपनी राजनीतिक पारी खेलोगे तो सब समझ जाओगे ।

(राजन के चेहरे पर आश्वस्ति के भाव नहीं आते । उसका दिलोदिमाग सांय-सांय कर रहा है । उसे अपने भीतर मानो एक अंधड़-सा चलता हुआ महसूस हो रहा है)

राजन : (मायूस स्वर में) तो मैं चलूं भाईजी ?
पाप्या : (जल्दी से) भाईजी, वो पैसे मिल जाते तो...।
सूदजी : हाँ-हाँ । (ज़ेब से नोटों की गड्डी निकालकर राजन की ओर बढ़ाते हुए) लो राजन बेटे और अपने
           हिसाब से सबमें बाँट दो ।
राजन : (थके और टूटे हुए स्वर में) आप डायरेक्ट दे दीजिए भाईजी । मेरा जी ठीक नहीं है ।
सूदजी : (टालने वाले स्वर में) चलो ठीक है बेटे । तुमने काम भी तो बहुत किया है । तुम घर जाकर अच्छी   
           तरह आराम करो ।
जयसिंह : भाईजी, पैसों का हिसाब मैं कर देता हूँ ।

(जयसिंह सूदजी के हाथ से नोटों की गड्डी लेता है जबकि राजन मुड़कर लड़खड़ाते हुए धीरे-धीरे बाहर निकल जाता है । सूदजी स्थिर नेत्रों से उसे जाता हुआ देखते रहते हैं)

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य छह
स्थान : शहर के भीड़ भरे इलाके में स्थित रेस्तरां
समय : दोपहर के लगभग डेढ़ बजे

(रेस्तरां में रवि, क्षिप्रा, मदन, रोशनी, अक़ील, हिना, जॉर्ज और मैरी एक बड़ी मेज़ के इर्द-गिर्द कुर्सियों पर बैठे कोल्ड ड्रिंक पी रहे हैं और खिलखिला रहे हैं जबकि विनोद वहाँ प्रवेश करता है और उनके पास पहुँचता है)

विनोद : हाय एवरीबॉडी ! हैप्पी वैलेंटाइन्स डे ।
रोशनी : हैप्पी वैलेंटाइन्स डे भैया । लेकिन यह क्या ? वैलेंटाइन डे भी कोई अकेले-अकेले मनाता है भला ?
           (शरारत से) सरला दीदी को कहाँ छोड़ आए आप ?
विनोद : (गंभीरता से) छोड़ो ये बातें । मैं दरअसल तुम लोगों को ढूंढते हुए ही यहाँ आया हूँ । मुझे तुमसे
           राजन के बारे में कुछ बात करनी है ।
मदन : (जोश से) अरे अब राजन के बारे में क्या बात करनी रह गई । राजन और उसके भाड़े के टट्टुओं की
         हवा तो हमने सुबह-सुबह ही निकाल दी । बेचारे कुछ किए बिना ही दुम दबाकर भाग निकले ।
विनोद : लगता है, तुम लोगों का ध्यान कतई इस तरफ़ नहीं गया है कि  वैलेंटाइन डे का विरोध करने वाले
           कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं और पार्कों, रेस्तरांओं, सिनेमाओं, गिफ़्ट शॉप्स वग़ैरह पर कोई गड़बड़ नहीं  
           हो रही है ।
हिना  : अरे हाँ भैया ! ये तो है । क्या बात है ? अचानक माहौल कैसे बदल गया ?
विनोद : सूदजी की पार्टी ने वैलेंटाइन के अपने घोषित विरोध को वापस ले लिया है । उन्होंने तो ऐसा अपने      वोट बैंक के मद्देनज़र किया है क्योंकि दो महीने बाद जनरल इलैक्शंस हैं मगर राजन तो उनके इस    अभियान से अपने विचारों और भावनाओं के कारण जुड़ा था । शायद इसी कारण इस बात से उसे         ऐसा मैंटल शॉक लगा है कि वो एकदम सकते की हालत में है । उसके घरवाले उसकी यह हालत   देखकर बहुत परेशान हैं । अभी थोड़ी देर पहले उसके पिताजी मुझे अचानक मिल गए थे । वे डॉक्टर          को लाने ही जा रहे थे । उन्होंने संक्षेप में मुझे उसकी हालत के बारे में बताया तो मुझे लगा कि हो न    हो, उसकी इस हालत का संबंध वैलेंटाइन डे का विरोध अचानक वापस ले लिए जाने से ही है । मन       की तक़लीफ़ ही गिल्ट बनकर उसके तन में जा लगी मालूम होती है । ऐसे में मुझे लगा कि उसे उसके दोस्त ही रिलीफ़ दे सकते हैं । इसीलिए तुम लोगों को तलाश करने निकला ।
मैरी  :  मेरे ख़याल से विनोद भैया एकदम ठीक कह रहे हैं । ऐसी हालत में इंसान को ये नहीं लगना चाहिए       कि वो अकेला है । हमें उसे संबल देने के लिए उसके यहाँ जाना चाहिए । चलो, चलते हैं ।
जॉर्ज  : अरे भई, अभी तो वैलेंटाइन डे का सैलीब्रेशन ठीक से शुरु भी नहीं हुआ और तुम चलने की कह रही       हो । वो भी राजन के यहाँ जिसने कि...।
मैरी  : शटअप जॉर्ज ! जो हुआ वो अब बीती बात है । रही वैलेंटाइन डे की बात तो क्या वैलेंटाइन डे     इंसानियत से बढ़कर है ?
जॉर्ज  : अरे अभी लंच भी तो नहीं किया !
मैरी  : (खीझकर) लंच बाद में अपने घर पर करना । (बाकी लोगों से) क्या कहते हो फ़्रेंड्स ? क्या हमें    राजन के हाल-चाल पूछने और उसे दिलासा देने के लिए उसके यहाँ नहीं चलना चाहिए ? खास तौर         पर तब जबकि विनोद भैया इसी काम के लिए हमें ढूंढते हुए यहाँ आए हैं ?
क्षिप्रा : आई थिंक मैरी इज़ राइट । (रवि की ओर घूमकर निर्णायक भाव से) रवि, तुम बिल चुकाओ । हम         लोग फ़ौरन चल रहे हैं ।  

                (क्षिप्रा के साथ ही सभी लड़के-लड़कियाँ उठ खड़े होते हैं)

(दृश्य परिवर्तन)
         
दृश्य सात
स्थान : राजन का घर
समय : दोपहर के लगभग दो बजे

(विनोद के साथ सभी लड़के-लड़कियाँ राजन के घर पर पहुँचते हैं । विनोद कॉलबैल बजाता है तो राजन की माँ द्वार खोलती हैं)

विनोद : (हाथ जोड़कर) नमस्ते माँ जी । हम लोग राजन के दोस्त हैं । अंकल से पता चला कि राजन की तबीयत ख़राब है तो हालचाल पूछने चले आए ।
राजन की माँ  : बहुत अच्छा किया बेटे । अंदर आओ । (सब अंदर आते हैं) । न जाने सुबह-सुबह ही राजू           बिना कुछ खाए-पिए कहाँ चला गया था ? जबसे लौटा है, न कुछ बोलता है, न किसी बात पर ध्यान         देता है । पानी की एक बूँद तक हलक से नीचे नहीं उतारी उसने । चेहरा एकदम पीला पड़ा हुआ है ।         आज उसके बाबूजी घर पर ही थे । वो तो एकदम घबरा गए और डॉक्टर को बुलाकर लाए । अभी-          अभी उसी के साथ बाहर निकले हैं । वो तो कह रहा था कि उसे किसी साई.. साई.. न जाने क्या ?
विनोद : साइकियाट्रिस्ट
राजन की माँ  : हाँ वही । कह रहा था कि उसे दिखाना होगा ।
विनोद : हम ज़रा राजन से मिल लें माँ जी ?                                                          
राजन की माँ  : अरे हाँ बेटा ! ज़रुर जाओ । अंदर अपने सोने वाले कमरे में है वो ।

(सब अंदर वाले कमरे में पहुँचते हैं और देखते हैं कि राजन पलंग पर लेटा हुआ है । उसने अपने दोनों हाथों से अपना माथा दबा रखा है । उसके चेहरे पर मुर्दनी छाई हुई है और उसकी आँखें बंद हैं । घर आकर उसने कपड़े तक नहीं बदले हैं)

विनोद :  हैलो राजन !
राजन : (आँखें खोलकर उठकर बैठते हुए) अरे विनोद भैया आप ! (बाकी लोगों की ओर  देखकर) और तुम
          सब भी ! अचानक मेरे घर !
विनोद : तुम्हारे बाबूजी से तुम्हारी तबीयत ख़राब होने का पता चला । (मुसकराकर) अपने अज़ीज़ दोस्त की      बीमारी की बात सुनकर रहा नहीं गया और हम लोग तुम्हारे हाल-चाल जानने चले आए । (थोड़ा    रुककर) क्या हुआ है तुम्हें ?
राजन : (हिचकिचाते हुए) आपको तो सब मालूम है भैया । मैं वैलेंटाइन डे के विरोध में शरीक़ था । यह विरोध वापस ले लिया गया तो मुझे धक्का-सा लगा । बस  !
रवि   : (राजन के चेहरे की ओर देखकर आगे बढ़ते हुए) तुम्हें धक्का लगा राजन । क्यों ? क्योंकि तुम समझ         गए कि तुम ठगे गए हो । तुम्हारी भावनाओं और आदर्शों का फ़ायदा उठाकर उन लोगों ने तुम्हें         इस्तेमाल कर लिया जिन्हें न भावनाओं से वास्ता है, न आदर्शों से । जबकि उनके चक्कर में आकर तुम अपने दोस्तों तक के ख़िलाफ़ हो गए और उन्हीं से बदसलूकी करने पर उतारु हो गए जिन पर जां   निसार करते थे । अब धोखा खाने के एहसास से तुम अपने आप से शर्मिंदा हो गए हो । यही बात       तुम्हें रह-रहकर कचोट रही है । तुम्हारे आत्म-सम्मान को इससे जो ठेस पहुँची है, वही तुम्हें जीने           नहीं दे रही है । है ना ?

                (राजन कुछ कहना चाहता है पर उसके मुँह से बोल नहीं फूटता)

क्षिप्रा  : (रवि को झिड़कती हुई) ये क्या बोले जा रहे हो रवि ? कुछ होश भी है तुम्हें कि कहाँ आए हो और         किसलिए आए हो ? हम आए हैं अपने दोस्त के हाल पूछने और उसे सपोर्ट देने । और तुमने         भाषणबाज़ी शुरु कर दी । अरे तुम राजन का मनोबल बढ़ाने आए हो या गिराने ? हमारा लक्ष्य      उसकी गिल्टी फ़ीलिंग को दूर करना है या उसे और बढ़ाना ?
राजन : (तैश में आकर) कोई गिल्टी फ़ीलिंग नहीं है मुझे । अपने विचारों पर मैं आज भी कायम हूँ । कोई          अफ़सोस नहीं है मुझे उनका ।
क्षिप्रा  : रवि की बातों का बुरा न मानो राजन । ख़ुद को अकेला न समझो । हम तुम्हारे साथ हैं ।

                (राजन अचानक हिस्टीरियाई अंदाज़ में चीखता हुआ खड़ा हो जाता है)

राजन : (उद्वेलित होकर चीखते हुए) किसी की ज़रुरत नहीं है मुझे ! तुम लोग मेरे ज़ख्मों पर नमक छिड़कने       आए हो । मुझे छोटेपन का एहसास कराना चाहते हो । चले जाओ । चले जाओ यहाँ से । मुझे मेरे   हाल पर छोड़ दो । (अचानक उसका स्वर मद्धम पड़ने लगता है और वो हाँफने लगता है) मुझे . मे .   रे. हा..ल. पर . छो..ड़ . दो ..

(उसकी आँखें बंद हो जाती हैं और उसके घुटने मुड़ने लगते हैं । फिर वह अपना माथा थामकर नीचे बैठ जाता है । रोशनी उसकी ओर बढ़ना चाहती है पर फिर सहमकर थम जाती है । राजन की यह हालत देखकर सबके चेहरों पर व्यग्रता छा जाती है)  

विनोद : (धीमे स्वर में) इसकी हालत तो मैनिक-डिप्रैसिव होती जा रही है । इसे तो तुरंत संभाला जाना ज़रूरी है ।
क्षिप्रा  : (हौले से) अब तो इसे एक ही शख़्स संभाल सकता है । हमें उसी को यहाँ लाना होगा ।

(दृश्य परिवर्तन)
         
दृश्य आठ
स्थान : बानी के घर के बाहर
समय : दोपहर के लगभग पौने तीन बजे

(बानी का फ़्लैट हाउसिंग सोसाइटी के ग्राउंड फ्लोर पर बाहर सड़क की ओर है । वह अपने फ़्लैट की बालकॉनी में खड़ी हुई शून्य में कहीं निहार रही है । उसके चेहरे पर गहन उदासी छाई हुई है और मन में भावनाओं का तूफ़ान-सा उमड़ रहा है । अचानक वह सोसाइटी के द्वार पर विनोद सहित सभी लड़के-लड़कियों को आते हुए देखती है तो हैरान होकर बाहर की ओर भागती है और उनके पास जा पहुँचती है)  

बानी  : (आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता से) क्या बात है ? वैलेंटाइन डे के दिन सभी ने मेरे यहाँ धावा कैसे बोल           दिया ? और वो भी विनोद भैया को साथ लेकर !
क्षिप्रा  : (बिना किसी भूमिका के सीधे मुद्दे पर आती हुई) बानी, राजन की तबीयत बहुत  ख़राब है । हम लोग तुम्हें उसके पास ले जाने के लिए आए हैं ।
बानी  : (अनमने भाव से) उसकी तबीयत ख़राब है तो मैं क्या करूँ ? अब मेरा उसका कोई वास्ता नहीं । अब     हमारे रास्ते अलग-अलग हैं ।
रोशनी : ऐसा तुम कह रही हो बानी ? तुम ! जिसके प्यार की मिसाल सारे कॉलेज के सारे  चाहने वाले देते       हैं । प्यार करने वालों के रास्ते अलग-अलग कब से होने लगे बानी ? बस, इतनी ही मजबूती थी    तुम्हारे प्यार के धागे में कि एक झटका लगा और टूट  गया ? ऐसे कच्चे निकले तुम्हारे प्यार के रंग कि     एक तूफ़ानी बारिश आई और धुलकर बह गए ?
बानी  : ऐसा क्या हो गया है उसे जो तुम इतना बढ़-चढ़कर बोल कही हो ?
विनोद : (वार्तालाप का सूत्र अपने हाथ में लेते हुए) बानी, सूदजी ने पहले तो अपने मतलब  के लिए राजन       को जोश दिलाकर वैलेंटाइन डे के विरोध का अगुआ बना दिया ।  लेकिन ऐन वक़्त पर अपने चुनावी        गणित के मद्देनज़र यह विरोध वापस लेकर उसे मानो बुग्गा बनाकर छोड़ दिया । इस तरह पहले         एक्सप्लॉइट करके फिर दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किया जाना राजन के सैल्फ़-रैस्पैक्ट पर ऐसा भारी गुज़रा है कि वो एकदम सकते की हालत में है । उसका व्यवहार मैनिक-डिप्रैसिव होता जा रहा है और हर बीतता हुआ पल उसके डिप्रैशन को और बढ़ाता जा रहा है । ऐसे में अगर उसे     फ़ौरन न संभाला गया तो गंभीर डिप्रैशन में जाकर वो ख़ुदकुशी कर सकता है । या टैंशन हद से   ज़्यादा बढ़ जाने से उसका नर्वस ब्रेकडाउन हो  सकता है, ब्रेन हैमरेज हो सकता है ।

(सुनते-सुनते बानी एकाएक अपने कानों पर हाथ रखकर और आँखें मूँदकर चिल्ला पड़ती है)

बानी  : (आँखें और कान बंद किए आंदोलित स्वर में) मेरे राज के लिए ऐसी अशुभ बातें न करो भैया । कुछ       नहीं होगा उसे । (अचानक बानी की आँखों से झर-झर आँसू बहने  लगते हैं और वह रोते-रोते बोलती         है) कुछ नहीं होने दूंगी मैं अपने राज को !
क्षिप्रा  : (हौले से) तो फिर चलो । उसे तुम्हारा ही इंतज़ार है ।

(दृश्य परिवर्तन)

दृश्य नौ
स्थान : राजन का घर
समय : दोपहर के लगभग साढ़े तीन बजे

(अक़ील के कॉलबैल बजाने पर राजन की माँ द्वार खोलती हैं और सभी को पुन: आया देखकर उनके म्लान मुख पर थोड़ा-सा उत्साह आ जाता है)

अक़ील : (मुसकराते हुए) मैंने कहा था न माँ जी कि हम बहुत जल्द लौटेंगे । देखिए अभी-अभी तो गए थे          और फिर आ गए ।
राजन की माँ  : (सभी को अंदर बुलाती हुईं) अरे तो क्या हुआ बेटे ? यह तुम्हारा ही तो घर  है । राजू के बाबूजी भी अभी-अभी ही बाहर गए हैं । उन्हें किसी साई.. साई.. क्या कहते हैं भला ?
विनोद : साइकियाट्रिस्ट
राजन की माँ  : हाँ वही । उससे राजू के लिए कल शाम का अपो.. अपो.. क्या कहते हैं उसे ?
अक़ील : अपॉइंटमेंट
राजन की माँ  : हाँ वही मिला है । राजू का हाल तो उसके बाबूजी से देखा नहीं जाता । दुखी मन से ज़रा यूँ        ही टहलने चले गए हैं ।
अक़ील : आप राजन की बिल्कुल भी फ़िक्र न करें माँ जी । वो बहुत जल्द अच्छा हो जाएगा । हम उसके पास      जाएं ?
राजन की माँ  : अरे यह भी कोई पूछने की बात है बेटे ! जाओ, अंदर जाओ । 

(सब लोग राजन के कमरे में पहुँचते हैं और देखते हैं कि उसकी हालत पहले से ज़्यादा ख़राब है । उसके बाल बुरी तरह से बिखरे हुए हैं जिनमें अपनी दोनों हथेलियाँ फँसाए वह घुटनों पर सिर दिए बैठा है और न जाने क्या बड़बड़ा रहा है । उसकी यह हालत देखकर बानी की आँखों से गंगा-जमुना बह निकलती हैं)

विनोद : राजन देखो, तुमसे मिलने कौन आया है ?
राजन : (सिर उठाकर) आप लोग ? दोबारा ? शायद आपको लग रहा है कि मैं पागल हो गया हूँ ।
बानी  : (धीरे-धीरे राजन की ओर बढ़ती हुई) यह तुमने अपना क्या हाल बना लिया राज ?
राजन : (फीकी मुसकान के साथ) तुम किसलिए आई हो बानी ? मेरे जले पर नमक छिड़कने ? या यह देखने
          कि तुम्हारे छोड़ देने के बाद तुम्हारा राज ज़िन्दा भी है या नहीं ? 

(बानी दौड़कर राजन के मुँह पर अपनी हथेली रख देती है और उसके पास बैठ जाती है)

बानी  : (भावुक स्वर में) ऐसा न कहो राज । सुबह मैंने ग़ुस्से में कुछ कह दिया तो तुम समझे कि तुम्हारी बानी तुम्हें छोड़ गई । बस भारतीय संस्कृति को ही समझने में  लगे रहे तुम । भारतीय लड़की के मन को नहीं समझ सके । हिंदुस्तानी लड़की जब  एक बार किसी को अपने मन में बसा लेती है तो वो       उसका साथ सृष्टि के अंतिम छोर तक नहीं छोड़ती क्योंकि वो प्यार के लिए जीती है, प्यार के लिए     मरती है । सच्चा प्यार तो ज़िन्दगी की धूप में ग़ुलमोहर की तरह छाया देता है । जब ख़यालात नहीं     मिलते और हालात बिगड़ जाते हैं, तभी तो सच्चे प्यार की परख होती है । तुम चाहे जिस राह चलो,       अच्छी या बुरी, सही या ग़लत; मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूंगी । तुम्हारा साया बनकर सदा      तुम्हारे साथ रहूंगी ।
राजन : (उसके चेहरे की ओर देखकर) सच बानी ?
बानी  : (उसी तरह भावुक स्वर में) हाँ । और ग़ुस्से में कही गई मेरी कड़वी बातों के लिए चाहो तो मुझे माफ़      कर दो, चाहो तो सज़ा दे दो ।

                (राजन की आँखों से आँसू टपकने लगते हैं । भावावेश में वह बानी को ख़ुद से लिपटा लेता है)

राजन : (आँसू पोंछते हुए भर्राए स्वर में) माफ़ी तो मुझे माँगनी है अपने दोस्तों और हमदर्दों से जिनके साथ        अनजाने में मैं बदसलूकी कुछ तो कर बैठा और कुछ और भी करने जा रहा था । अपने महान देश की           संस्कृति पर हो रहे पश्चिमी हमले को रोकने के जुनून ने मुझे अंधा कर दिया था । भले-बुरे का विवेक           खो बैठा था मैं । अब मैं नहीं समझ पा रहा कि क्या सही है, क्या ग़लत । मैं कनफ़्यूज हो गया हूँ      बानी । तुम ही मुझे राह दिखाओ ।
बानी  : ज़रुर दिखाऊंगी । और सिर्फ़ दिखाऊंगी ही नहीं, उस पर तुम्हारे साथ कदम-से-कदम मिलाकर    चलूंगी भी । मेरे होते हुए ख़ुद को कभी अकेला न समझना राज । अगर कभी हमारे सारे रास्ते बंद          भी हो गए तो हम दोनों मिलकर अपनी राह ख़ुद बना  लेंगे । 

(राजन अपना सिर बानी के कंधे पर रख देता है और आँखें मूँदकर अपने आपको ढीला छोड़ देता है । बानी भी अपनी आँखें मूँद लेती है और राजन के सिर पर अपना हाथ रख देती है)

रवि  : (धीमे स्वर में) ये दोनों ही साले एक जैसे इमोशनल हैं । 
रोशनी : (वैसे ही धीमे स्वर में) तो हम कबाब में हड्डी बनकर यहाँ क्यूँ खड़े हैं ? चलो न बाहर !
विनोद : हाँ, अब यहाँ हमारा कोई काम नहीं । चलो ।

(सब लड़के-लड़कियाँ बाहर निकलते हैं । बाहर निकलते-निकलते क्षिप्रा और रोशनी पीछे मुड़कर देखती हैं तो पाती हैं कि बानी राजन का सिर अपनी गोद में रखे पलंग पर बैठी है और हौले-हौले अपनी उंगलियाँ उसके बालों में फेर रही है । यह देखने के बाद दोनों की निगाहें चार होती हैं तो वे बरबस ही मुसकरा देती हैं और दूसरे लोगों के पीछे-पीछे बाहर निकल जाती हैं । बाहर ड्राइंगरुम में उन सबको राजन की माँ मिलती हैं)

राजन की माँ  : (व्यग्र भाव से) अब राजू कैसा है बेटा ?
विनोद : उसकी हालत सुधर रही है माँ जी । मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि अब न उसे  डॉक्टर की ज़रुरत       पड़ेगी, न ही साइकियाट्रिस्ट की । सुबह तक, बल्कि आज रात तक ही वो एकदम नॉर्मल हो जाएगा;    आपसे और बाबूजी से हँसेगा-बोलेगा, खाएगा-पिएगा और कल वक़्त से कॉलेज भी जाएगा ।

(राजन की माँ की आँखों में आँसू आ जाते हैं)

राजन की माँ : (भर्राई आवाज़ में)  जुग-जुग जियो बेटा । तुम्हारे मुँह में घी-शक्कर । भगवान हर माँ-बाप की      झोली में तुम्हारे जैसे अच्छे बच्चे डाले ।
विनोद : अच्छा माँ जी । अब हम चलते हैं ।
राजन की माँ : पहले भी ऐसे ही चले गए थे बेटा । अब एक माँ को इतनी बड़ी तसल्ली देकर भी यूँ ही जा         रहे हो । थोड़ा तो रूको । मैं चाय बनाती हूँ ।
क्षिप्रा  : चाय बानी के लिए बना लीजिए माँ जी । वो अभी राजन के पास ठहरेगी । 
राजन की माँ : तुम लोग भी कुछ तो लो बेटा । ज़्यादा टाइम नहीं है तो शरबत ही पी लो । जल्दी बन    जाएगा ।
विनोद : (मुसकराकर) अच्छा माँ जी । बना लीजिए ।
रोशनी : हम आपकी मदद करती हैं माँ जी । आ हिना । साथ चल ।

                (रोशनी और हिना राजन की माँ के साथ भीतर रसोईघर की ओर बढ़ जाती हैं)

जॉर्ज : (एक सोफ़े पर धम्म से ढेर होते हुए) रवि ! अक़ील ! मदन ! अरे क्यों खड़े हो खम्भों की तरह ? बैठ         जाओ यार । (विनोद से) आप भी बैठिए भैया ।
विनोद : (बैठते हुए) सब लोग बैठ जाओ भई । जहाँ इतना वक़्त लगाया है, वहाँ और पाँच मिनट में कोई          फ़र्क़ नहीं पड़ जाएगा । हमें माँ जी की भावनाओं का भी आदर करना चाहिए ।

        (बाकी लड़के-लड़कियाँ भी बैठ जाते हैं)

मैरी : (विनोद से) भैया, क्या सचमुच आज रात तक ही राजन एकदम ठीक हो जाएगा ?
विनोद : मैरी, तन के कष्ट के लिए दवाएँ होती हैं मगर मन के संताप के लिए सच्ची हमदर्दी से बड़ी कोई   औषधि नहीं और बीमार मन के लिए प्यार से बढ़कर कोई थैरेपी नहीं । राजन की पीड़ा जो उसके मन में घनीभूत होकर जम गई थी, बानी के प्यार की आँच पाकर पिघल रही है । जब उसके भीतर   का सारा दर्द बहकर बाहर निकल जाएगा तो यकीनन वो बिल्कुल सामान्य हो जाएगा ।
जॉर्ज :  दैट्स वैरी गुड । फिर तो असली वैलेंटाइन डे राजन ने ही मनाया ।

                (विनोद, रवि, अक़ील, मदन, क्षिप्रा और मैरी हँस पड़ते हैं)

विनोद : (हँसते हुए) एकदम सटीक बात कही जॉर्ज तुमने । बाद में यही कहकर तुम लोग उसे और बानी को       छेड़ना ।

(राजन की माँ रोशनी और हिना के साथ ड्राइंगरुम में लौटती हैं । रोशनी ओर हिना ने अपने हाथों में शरबत के गिलासों की एक-एक ट्रे थाम रखी है । वे सबको सर्व करती हैं और ख़ुद भी एक-एक गिलास लेकर बैठ जाती हैं)

क्षिप्रा  : (राजन की माँ से) आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं माँ जी ? बानी अभी राजन  के पास ही है ।         आप जानती हैं न कि वो राजन से...।
राजन की माँ  : जानती हूँ बेटी । वो तो यहाँ आती रहती है । और मैं यह भी जानती हूँ कि मेरा राजू भी उसे      बहुत चाहता है । माँ होकर क्या मैं अपने बेटे के मन की बात नहीं जानूंगी ?  
विनोद : आपको इससे कोई एतराज़ नहीं माँ जी ? परंपरावादी परिवारों में तो यूँ लड़के-लड़की का मिलना-       जुलना और एक-दूसरे को पसंद करना ठीक नहीं समझा जाता ।
राजन की माँ  : बेटा, मैं ज़्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं मगर लाख टके की एक बात जानती हूँ कि इंसान का मन      साफ़ तो सब कुछ ठीक ।  प्रेम तो भगवान का प्रसाद है बेटा । अगर दो बच्चों के मन में कोई कपट       नहीं, कोई ख़ुदगर्ज़ी नहीं तो उनका एक-दूसरे को पसंद करना कोई पाप तो नहीं ।  
विनोद : (शरबत का गिलास ख़ाली करके उठते हुए) सचमुच बहुत बड़ा दिल है माँ जी आपका । अगर ऐसी       समझ-बूझ समाज के सारे युवाओं और बुज़ुर्गों में पैदा हो जाए तो कोई पीढ़ियों का अंतर न रहे, कोई          टकराव न रहे । युवा बुज़ुर्गों को सम्मान दें और उनकी सरपरस्ती में अपने जीवन को दिशा दें जबकि बुज़ुर्ग युवाओं की भावनाओं को समझें, स्वीकार करें तथा उनकी आज्ञाकारिता और आदर-सम्मान     पाएं । (रुककर) वाकई बहुत अच्छा लगा माँ जी आज आपसे मिलकर । अब इजाज़त दीजिए ।

(सब लोग उठ खड़े होते हैं और मुख्य द्वार से बाहर निकलते हैं । राजन की माँ उन्हें बाहर तक छोड़ने आती हैं)

रवि   : अब क्या प्रोग्राम है ?
विनोद : मुझे तो यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी जाना है । तुम लोग अपना-अपना प्रोग्राम चैक कर लो ।
जॉर्ज : (बनावटी ढंग से कलपते हुए) हाय, वैलेंटाइन डे के दिन लंच भी नसीब नहीं हुआ । मैरी, तुम ही अपने    घर ले जाकर कुछ खिला दो ।
मैरी : तो चलो न ! कोई रोक रहा है तुम्हें ?
अक़ील : मुझे भी हिना के साथ उसके घर जाना है ।
रोशनी :  तो क्लीयर हो गया कि रवि और क्षिप्रा को छोड़कर सबको एक ही डायरेक्शन में जाना है । ये लोग      अपने हिसाब से चले जाएंगे । हम सब मिलकर ऑटो या टैक्सी हायर कर लेते हैं ।
विनोद : मेरे ख़याल से दो ऑटो में हम सब एडजस्ट हो जाएंगे । जिसे जहाँ उतरना है, उतर जाएगा । ऑटो       स्टैंड सामने ही तो है । चलो, बात करते हैं ।

(सभी लोग बाय रवि, बाय क्षिप्रा कहते हुए उन दोनों से विदा लेकर सामने की ओर बढ़ जाते हैं । रवि और क्षिप्रा पीछे अकेले रह जाते हैं) 

क्षिप्रा  : कुछ देर पैदल चलते-चलते बात करने का मन कर रहा है ।
रवि   : (क्षिप्रा की बांह में अपनी बांह पिरोकर) तो चलो ।
क्षिप्रा  : (तुनककर) यह क्या रवि ! अपनी बांह बाहर निकालो, फ़ौरन !
रवि   : (सकपकाकर अपनी बांह क्षिप्रा की बांह से बाहर खींचते हुए) क्या हो गया भई ?
क्षिप्रा  : अरे हद है तुम्हारी भी ! सामने लोग खड़े हैं । पीछे से माँ जी देख रही हैं । और तुम.. !
रवि   : (झुककर एक घुटने के बल पर नीचे बैठते हुए नाटकीय ढंग से) अरे जनाब ! प्यार किया तो डरना           क्या !
क्षिप्रा  : (रवि का हाथ पकड़कर उसे उठाती हुई गंभीर स्वर में) डरने की बात नहीं रवि,  भारतीय संस्कृति         में प्रेम के लिए जगह तो है मगर वह प्रेम करने वालों से शालीनता की भी अपेक्षा करती है । जो प्रेम         सार्वजनिक मर्यादा और बुज़ुर्गों का लिहाज बनाए रखते हुए किया जाए, वो ही स्वीकार्य होता है, उसी की प्रशंसा होती है ।
रवि   : (क्षिप्रा के चेहरे की ओर देखकर गंभीरता से) तुम ठीक कह रही हो । आओ चलें ।

(दोनों एक-दूसरे को स्पर्श किए बिना साथ-साथ चलते और बातें करते हुए नेपथ्य की ओर बढ़ जाते हैं)  

(परदा गिरता है)


नेपथ्य से आवाज़ आती है – प्रेम और संस्कृति दोनों ही अथाह महासागर हैं जिनमें गोते लगाने वालों को स्वयं ही परखना होता है कि उन्होंने क्या पाया । उनके हाथ रत्न लगे या केवल पत्थर ? प्रेम और संस्कृति से जुड़े सभी तर्क-वितर्कों का निचोड़ संभवत: यही है कि हर बात को विवेक की कसौटी पर कसो और फिर जो अच्छा लगे, उसे अपना लो; जो बुरा लगे, उसे जाने दो ।
 

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