सोमवार, 10 मई 2021

ताराचंद बड़जात्या : सादगी एवं भारतीय जीवन मूल्यों के ध्वजवाहक

आज पारिवारिक हिन्दी फ़िल्में बनाने वाले सूरज बड़जात्या के नाम से सभी सिनेमा-प्रेमी परिचित हैं । उनका राजश्री बैनर भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित फ़िल्में बनाने के लिए पहचाना जाता है । लेकिन राजश्री बैनर और उसकी गौरवशाली परंपरा के संस्थापक सूरज के पितामह स्वर्गीय ताराचंद बड़जात्या के नाम से वर्तमान पीढ़ी के बहुत कम लोग परिचित हैं । ताराचंद बड़जात्या को दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित चाहे न किया गया हो, भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका योगदान बलदेव राज चोपड़ा, बी. नागी रेड्डी और सत्यजित रे सरीखे फ़िल्म निर्माताओं से किसी भी तरह कम नहीं है । १९६२ से १९८६ तक के लगभग लगभग ढाई दशक लंबे काल में उनके द्वारा निर्मित हिन्दी फ़िल्में भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय हैं । वह हिन्दी सिनेमा का एक युग था - सादगी और भारतीयता से ओतप्रोत युग जिसके प्रवर्तक और मार्गदर्शक ताराचंद जी थे ।

राजस्थान के कुचामन नामक छोटे शहर में १० मई, १९१४ को जन्मे  ताराचंद बड़जात्या ने अपनी किशोरावस्था में बंबई के फ़िल्मी संसार में अपना करियर एक अवैतनिक प्रशिक्षु के रूप में आरंभ किया तथा अपनी नियोक्ता कंपनी मोती महल थिएटर्स के लिए वर्षों तक लगन से कार्य करके फ़िल्म-निर्माण की बारीकियों को समझा । १९४७ में उन्होंने अपने नियोक्ताओं के सहयोग और प्रेरणा से राजश्री पिक्चर्स के नाम से हिन्दी फ़िल्मों के वितरण की संस्था आरंभ की । जिस दिन भारत की स्वाधीनता का सूर्योदय हुआ, उसी दिन अर्थात १५ अगस्त, १९४७ को ताराचंद जी की राजश्री संस्था का भी उदय हुआ । एक दशक से अधिक समय तक फ़िल्म वितरण के क्षेत्र में पर्याप्त अनुभव ले लेने के उपरांत उन्होंने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने का निश्चय किया और राजश्री के बैनर तले अपनी पहली फ़िल्म प्रस्तुत की - आरती' (१९६२) जिसमें प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं अशोक कुमार, प्रदीप कुमार एवं मीना कुमारी ने । इस पारिवारिक फ़िल्म को पर्याप्त सराहना और सफलता मिली । ताराचंद जी के नेतृत्व में राजश्री ने लंगड़े और अंधे बालकों की आदर्श मित्रता के विषय पर आधारित अपनी अगली ही फ़िल्म दोस्ती' (१९६४) से सफलता की ऊंचाइयाँ छू लीं । ‘दोस्ती' ने न केवल भारी व्यावसायिक सफलता अर्जित की वरन कई पुरस्कार भी जीते । फिर तो भारतीय जीवन मूल्यों एवं आदर्शों पर आधारित कथाओं वाली सादगीयुक्त फ़िल्मों का क्रम ऐसा चला कि दो दशक तक नहीं थमा ।

ताराचंद जी केवल फ़िल्म निर्माता थे । वे न तो फ़िल्मों के लेखक थे और न ही निर्देशक । लेकिन राजश्री द्वारा बनाई गई अधिकांश फ़िल्मों पर उनके जीवन-दर्शन तथा सादगी एवं भारतीयता में उनके अटूट विश्वास की स्पष्ट छाप है । यहाँ तक कि राजश्री की फ़िल्मों की नामावली भी हिन्दी में ही दी जाती थी जबकि परंपरा फ़िल्मों की नामावली अंग्रेज़ी में देने की ही थी (और आज तक है) । राजश्री के प्रतीक चिह्न में वीणावादिनी माँ सरस्वती का होना भी भारतीय संस्कृति में उनकी आस्था को ही दर्शाता है । भारतीय पारिवारिक मूल्यों तथा भारत-भूमि एवं भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित सनातन आदर्शों से किसी भी प्रकार का समझौता उन्हें स्वीकार्य नहीं था । उनका दृढ़ विश्वास था कि हिंसा, कामुकता तथा धन के अभद्र प्रदर्शन जैसे स्थापित फ़ॉर्मूलों से दूर रहकर सादगी तथा उत्तम भारतीय परम्पराओं को प्रोत्साहित करना ही भारतीय दर्शकों के हृदय को विजय करने की कुंजी है । अपनी इस आस्था को उन्होंने जीवनपर्यंत बनाए रखा और भारतीय सिनेमा-प्रेमियों से उन्हें इसका अपेक्षित प्रतिसाद भी मिला । उनके द्वारा निर्मित छोटे बजट की फ़िल्मों में से अधिकतर ने अपनी लागत और लाभ वसूल किया जबकि कई फ़िल्मों ने अखिल भारतीय स्तर पर भारी व्यावसायिक सफलता भी अर्जित की ।

ताराचंद जी ने कभी अपनी फ़िल्म निर्माण संस्था को बड़े बजट की भव्य फ़िल्में नहीं बनाने दीं जिनमें धन-वैभव का अभद्र प्रदर्शन हो । सादगी के जीवन-दर्शन में उनकी आस्था अटल थी जिससे वे कभी विचलित नहीं हुए । वैभव और विलास से रहित साधारण किन्तु सदाचार पर आधारित जीवन जीने की महान भारतीय परंपरा में उनकी अगाध श्रद्धा थी । उनके सक्रिय जीवन में राजश्री के लेखक भारतीय जनसामान्य के दिन-प्रतिदिन के जीवन से उभरने वाली साधारण व्यक्तियों की संवेदनशील कथाएं रचा करते थे । ऐसी बहुत-सी फ़िल्मों की पृष्ठभूमि एवं परिवेश ग्रामीण हुआ करते थे एवं उनमें भारतीय ग्राम्य जीवन की सादगी, परम्पराओं एवं आदर्शों को इतनी सुंदरता के साथ चित्रित किया जाता था कि दर्शक उन कथाओं के निश्छल पात्रों के प्रेम में पड़ जाते थे, उन्हें हृदय में बसा लेते थे ।

राजश्री की फ़िल्मों का एक बहुत बड़ा गुण उत्कृष्ट संगीत रहा । इन फ़िल्मों के संगीतकारों ने पश्चिमी संगीत के प्रभाव को पूर्णतः दूर रखते हुए भारतीय मिट्टी से जुड़े और भारतीय शास्त्रीय संगीत के मूल तत्वों से युक्त संगीत से ही गीतों हेतु धुनों की रचना की । रवीन्द्र जैन नामक अत्यंत प्रतिभाशाली किन्तु जन्मांध कलाकार को राजश्री ने सौदागर' (१९७३) में संगीत देने का अवसर दिया जिसके उपरांत वे राजश्री की फ़िल्मों के नियमित संगीतकार बन गए । वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जो न केवल मधुर संगीत रचते थे वरन हृदयस्पर्शी गीत भी लिखते थे । 'चितचोर' (१९७६) फ़िल्म के लिए अपने द्वारा लिखित एवं संगीतबद्ध गीतों को गाने के लिए उन्होंने हेमलता एवं येसुदास जैसी नवीन प्रतिभाओं को अवसर प्रदान किया और परिणाम यह निकला कि चितचोर' के मधुर गीतों ने देश भर में धूम मचा दी ।

नवीन अभिनेताओं एवं अभिनेत्रियों को अवसर देने में भी राजश्री बैनर सदा ही अग्रणी रहा । संजय ख़ान (दोस्ती - १९६४), राखी (जीवन-मृत्यु - १९७०), सचिन एवं सारिका (गीत गाता चल - १९७५), ज़रीना वहाब (चितचोर - १९७६), अरुण गोविल (पहेली - १९७७), रामेश्वरी (दुलहन वही जो पिया मन भाए - १९७७), माधुरी दीक्षित (अबोध - १९८४), अनुपम खेर (सारांश - १९८४) आदि अनेक कलाकारों को उनके अभिनय जीवन की अलसभोर में राजश्री ने ही अवसर दिया और वे आगे चलकर सफल हुए । अपनी पदार्पण फ़िल्म मृगया' (१९७६) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले मिथुन चक्रवर्ती को वास्तविक पहचान और भौतिक सफलता राजश्री की संगीतमय फ़िल्म तराना (१९७९) से मिली । अरुण गोविल ने फ़िल्म पहेली' (१९७७) में मिली एक सहायक भूमिका में अपने अभिनय से फ़िल्म का निर्माण करने वालों को ऐसा प्रभावित किया कि उन्हें राजश्री की फ़िल्म साँच को आँच नहीं' (१९७९) में मधु कपूर नामक नवोदित नायिका के साथ मुख्य नायक की भूमिका दी गई । साँच को आँच नहीं' मुंशी प्रेमचंद की अमर कथा - पंच परमेश्वर' से प्रेरित थी । राजश्री की अगली ही फ़िल्म सावन को आने दो' (१९७९) में अरुण गोविल पुनः नायक बनकर आए जिसकी देशव्यापी व्यावसायिक सफलता ने उन्हें सितारा बना दिया । आगे चलकर वे रामानन्द सागर द्वारा दूरदर्शन हेतु निर्मित रामायण' में राम की भूमिका निभाकर घर-घर में पहचाने जाने लगे । बाल कलाकारों - कोमल महुवाकर तथा अलंकार को पायल की झंकार' (१९८) में प्रमुख भूमिकाएं दी गईं । मैंने भारतीय नृत्यों तथा भारतीय जीवन मूल्यों के अद्भुत संगम वाली ऐसी कोई और फ़िल्म नहीं देखी जिसका एक-एक प्रसंग हृदय को उदात्त भावनाओं से भर देता हो । इसमें कोमल महुवाकर की नृत्य प्रतिभा दर्शकों के सम्मुख पूर्णतः निखरकर आई थी । अनुपम खेर नामक प्रतिभाशाली युवा अभिनेता को सारांश' (१९८४) में एक वृद्ध व्यक्ति की चुनौतीपूर्ण भूमिका दी गई जिसकी सफलता के उपरांत अनुपम खेर तथा फ़िल्म के निर्देशक महेश भट्ट दोनों ही हिन्दी फ़िल्मों के संसार के सम्मानित नाम बन गए ।

नदिया के पार (१९८२) राजश्री की एक ऐसी प्रस्तुति है जिसके सभी गीत तथा अधिकांश संवाद भोजपुरी भाषा में हैं । लेकिन ग्रामीण पृष्ठभूमि में रची गई इस संगीतमय पारिवारिक फ़िल्म ने केवल हिन्दी पट्टी में ही नहीं वरन प्रादेशिक सीमाओं को तोड़ते हुए सम्पूर्ण राष्ट्र में अद्भुत सफलता अर्जित की । सूरज बड़जात्या की अत्यंत सफल एवं बहुचर्चित फ़िल्म - हम आपके हैं कौन (१९९४) वस्तुतः इसी कथा का नगरीय संस्करण है । 

बाबुल (१९८६) की असफलता के उपरांत ताराचंद जी ने फ़िल्म निर्माण बंद कर दिया तथा अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे सक्रिय नहीं रहे । उनका देहावसान २१ सितंबर, १९९२ को हुआ । उनके पोते सूरज ने १९८९ में फ़िल्ममैंने प्यार किया' से राजश्री बैनर को पुनर्जीवित किया लेकिन उसने अपने पितामह द्वारा स्थापित सादगी की परंपरा को तोड़ते हुए बड़े बजट की विलासितापूर्ण फ़िल्में बनानी आरंभ कर दीं जिनके प्रमुख पात्र अत्यंत धनी होते हैं तथा उनके जीवन में वैभव तथा भौतिक सुख-सुविधाएं भरपूर होती हैं । सूरज की कतिपय फ़िल्मों में अंग-प्रदर्शन भी है जो ताराचंद जी के लिए पूर्णतः निषिद्ध था । इतना अवश्य है कि सूरज द्वारा निर्मित फ़िल्में भी भारतीय पारिवारिक मूल्यों को ही प्रतिष्ठित करती हैं । 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सादा जीवन उच्च विचार' के आदर्श को अपने जीवन में अपनाया तथा दूसरों को भी उसे अपनाने के लिए प्रेरित किया । ताराचंद जी के रूप में बापू को एक सच्चा अनुयायी मिला जिसने उनके इस आदर्श को हृदयंगम करके अपने द्वारा निर्मित फ़िल्मों में पूरी निष्ठा के साथ प्रस्तुत किया । ताराचंद जी के कार्यकाल में राजश्री द्वारा निर्मित फ़िल्मों के पात्र इसी पथ पर चलते दिखाए गए तथा अपने सम्पूर्ण जीवन में ताराचंद जी हिन्दी सिनेमा में सादगी तथा भारतीयता के ध्वजवाहक बने रहे । यदि आप धन-वैभव के अतिरेकपूर्ण प्रदर्शन वाली भव्य फ़िल्मों तथा डिज़ाइनर वस्त्रों में सुसज्जित उनके कृत्रिम पात्रों को देख-देखकर ऊब गए हों तो आरती, दोस्ती, तक़दीर, उपहार, गीत गाता चल, चितचोर, तपस्या, पहेली, दुलहन वही जो पिया मन भाए, अँखियों के झरोखों से, सुनयना, सावन को आने दो, मान-अभिमान, हमकदम, एक बार कहो, पायल की झंकार, नदिया के पार जैसी कोई फ़िल्म देखिए और भारतीय मिट्टी तथा जीवन की सादगी की सुगंध से अपने हृदय को सुवासित होने दीजिए ।

हिन्दी सिनेमा में सादगी, भारतीयता तथा जीवन के उच्च मूल्यों की परंपरा के इस पुरोधा को उसके १० वें जन्मदिवस पर मेरा शत-शत नमन । 

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सोमवार, 3 मई 2021

मौत और उसके बाद

सुबह-सुबह अपनी एक पोस्ट ब्लॉगर पर डालकर हटा ही था कि रीडिंग लिस्ट में अत्यन्त लोकप्रिय ब्लॉगर, लेखिका, कवयित्री, शायरा एवं कला-मर्मज्ञा डॉ. शरद सिंह की पोस्ट पर नज़र पड़ते ही दिल धक् से रह गया - कोरोना ने मेरी दीदी डॉ. वर्षा सिंह को मुझसे छीन लिया....।

यकबारगी तो ऐतबार ही नहीं हुआ। क्या ये आंखें जिन शब्दों को पढ़ रही हैं, वे सच हैं? क्या सत्य ही असाधारण लेखिका, कवयित्री, शायरा एवं कला-प्रेरिका वर्षा जी नहीं रहीं? क्या यह विदुषी अब केवल स्मृति-शेष है? कुछ दिवस पूर्व ही वर्षा जी एवं शरद जी ने अपनी माता विद्यावती जी को खोया है। शरद जी के मानस पर उस क्षति का जो प्रभाव पड़ा, वह उनकी कतिपय पोस्टों में स्पष्ट झलका। लेकिन जैसे कि संसार चलता है, यही अपेक्षा थी कि ये दोनों बहनें अपनी माता के अवसान से उत्पन्न अवसाद से अंततः उबरेंगी। पर वर्षा जी का असमय चला जाना तो ऐसा आघात है जिसे सह पाना तो मुझे अपने लिए ही संभव नहीं लग रहा। ऐसे में उनकी सगी बहन शरद जी की स्थिति की तो केवल एक अत्यन्त पीड़ादायी कल्पना ही की जा सकती है।

कोई भी पूर्णतः आकस्मिक परिघटना चाहे अच्छी हो या बुरी, अंतस में उतरकर अवशोषित होने एवं वैचारिक परिदृश्य का अंग बनने में समय लेती है क्योंकि अनपेक्षित होने के कारण मन उस पर तुरंत तो विश्वास ही नहीं कर पाता (सच कहा जाए तो विश्वास करना ही नहीं चाहता)। घटना बुरी हो तो उससे उपजे दुख का अहसास भी धीरे-धीरे ही होता है, ठीक उसी तरह जिस तरह 'दर्द अब जा के उठा, चोट लगे देर हुई'। आंसू तत्काल इसलिए नहीं निकल पाते क्योंकि वह सूचना सम्पूर्ण व्यक्तित्व को जड़ कर देती है, मस्तिष्क को निष्क्रिय कर देती है, वाणी को मूक कर देती है। लेकिन आंसू न निकलना इस बात का सबूत नहीं कि दिल ग़मगीन नहीं है। 

वर्षा जी से मेरा परिचय पुराना नहीं। विगत वर्ष ही मैंने पहले उनकी ग़ज़लें और फिर उनके लेख पढ़ने आरम्भ किए थे। यद्यपि मैं ब्लॉगर पर जनवरी 2011 से सक्रिय हूँ, तथापि मेरा ब्लॉगरों से विशेष परिचय नहीं रहा। मेरे अपने लेख पढ़ने के लिए (और टिप्पणी करने के लिए) कभीकभार ही लोग आया करते थे। मैं इससे अप्रभावित इसलिए रहा क्योंकि मैंने तो सदैव स्वांतः सुखाय के निमित्त ही लिखा चाहे कोई उसे पढ़े चाहे न पढ़े (ये पंक्तियां भी मैं केवल अपने लिए ही लिख रहा हूँ, अपने मन की घुटन एवं अवसाद के विरेचन हेतु लिख रहा हूँ)। मैं केवल इसलिए साथी ब्लॉगरों के पृष्ठों पर नहीं गया कि बदले में वे भी मेरे पृष्ठ पर आएं और टिप्पणी करें। वैसे भी मेरे जैसे विचार रखने वाले लोग मुझे विरले ही मिलते हैं। पर...

पर एक बार जो वर्षा जी के ब्लॉग पर गया तो फिर कभी उस पर जाए बिना रहा ही नहीं गया। मैं शायर नहीं लेकिन शायरी को पढ़ना ही नहीं, पढ़कर सुनाना भी मुझे अच्छा लगता है। वर्षा जी की न जाने कितनी ही ग़ज़लों को पढ़कर मुझे लगा कि इन्हें तो याद करना होगा ताकि किसी महफ़िल में सुना सकूं। जिस तरह ग़ज़ल कहना एक हुनर है, वैसे ही ग़ज़ल पढ़ने का भी एक शऊर होता है जो हर किसी को नहीं आता। मुझे आता है और इसीलिए जब मैंने 'बुक कैफ़े' में जय प्रकाश पांडेय जी द्वारा वर्षा जी के ग़ज़ल-संग्रह 'ग़ज़ल जब बात करती है' की चर्चा (यूट्यूब पर) सुनी तो मुझे लगा कि वर्षा जी की प्रतिभा और पुस्तक की गुणवत्ता ही नहीं, शायरी की विधा के साथ भी न्याय नहीं हुआ। वर्षा जी के हिंदी ही नहीं, बुंदेली बोली के आलेखों को भी एक बार पढ़ा तो लगा जैसे जी ही नहीं भरा, पुनः पढ़ना चाहिए। 

लेकिन मेरे लिए जो सम्मान की बात रही, वह यह थी कि वे मेरे लेखों पर आईं और कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की बल्कि जो कहा दिल से कहा, संबंधित लेखों को आद्योपांत ठीक से पढ़ने और समझने के उपरांत कहा। मैं लम्बे लेख लिखता हूँ और कई बार उन्हें समझने के लिए जो समय और श्रम चाहिए, वह पढ़ने वालों के पास नहीं होता। ऐसे में इतनी व्यस्त रहने वाली साहित्य-सर्जिका एवं कलावंती का मेरे लेखों को इतना समय देना एक असाधारण बात ही थी। मैंने वर्षा जी को कभी नहीं देखा, उनकी आवाज़ कभी नहीं सुनी, उनके व्यक्तित्व के बारे में इतने विलम्ब से जाना और जानने की प्रक्रिया अभी आरंभ ही हुई थी पर ...। 

पर न जाने कौनसे बेनाम रिश्ते की डोर उनसे कब बंधी, पता ही नहीं चला। मुझे बहुत अच्छे से यह मालूम है कि किसी इंसान का असली मोल हमें उसके दूर हो जाने के बाद ही पता लगता है। लेकिन मुझे तो अपनी सृजन-यात्रा में उनका मोल पता लग गया था कि वे अचानक ही दूर हो गईं। बार-बार मन में यही बात उठ रही है कि काश यह समाचार ग़लत निकले, वे अभी इस फ़ानी दुनिया में मौजूद हों लेकिन हम ज़िन्दगी की सच्चाई से भाग तो नहीं सकते। जब मैं जिसका वर्षा जी से कोई नामलेवा रिश्ता नहीं था, उनके जाने की सिर्फ़ ख़बर पाकर अपने को नहीं संभाल पा रहा तो शरद जी पर क्या बीत रही होगी? 

कल ही मैंने नेटफ़्लिक्स पर 'रामप्रसाद की तेरहवीं' नामक नवीन फ़िल्म देखी जिसकी कहानी एक मृत्यु की रू में होने वाले घटनाक्रम पर आधारित है। काश कि न देखता! चारों ओर मौत ही की तो बात हो रही है। विगत कुछ मास में मेरे भी कई रक्त-संबंधी काल-कवलित हो गए हैं। ऐसी प्रत्येक मृत्यु के समाचार को सुनकर मन में यही आया है कि जीवन की बात होनी चाहिए, जीवन को संजीवनी मिलनी चाहिए। मौत के बाद क्या है? मरने वाले के पीछे जो  बच गए हैं, उनकी तक़लीफ़ें और ग़म बस (अगर उन्हें मरने वाले से सच्चा लगाव रहा हो तो) ! लेकिन वर्षा जी के जाने ने मुझे झकझोर दिया है। तर्कपूर्ण ढंग से सोचने का जी ही नहीं कर रहा। आंखें ख़ुश्क हैं मगर लगता है जैसे रोम-रोम रो रहा है। 

संक्रमण के भय से अपनी लगभग समस्त गतिविधियां बंद कर देने वाले अपने सहकर्मियों से मैं यही कहता आ रहा हूँ कि मौत तो ज़िन्दगी का आख़िरी अंजाम है, मौत से डरना अहमक़ों का काम है। ख़ुद को भी एक मुद्दत से यही शेर याद दिलाता आ रहा हूँ - मुझे मालूम है अपना अंजाम नासेह; मैं इक रोज़ मर जाऊंगा, यही न? पर अब महसूस कर रहा हूँ कि मौत की बातें करने में और किसी अपने (या अपने-से लगने वाले) की मौत के रूबरू होने में कितना फ़र्क़ है। तीन दिन पहले ही तो कुँअर बेचैन जी शायरी के शैदाइयों को ग़मज़दा छोड़कर रूख़सत हुए हैं। और अब वर्षा जी छोड़ गईं।

मैं नहीं जानता कि वर्षा जी के परिवार में शरद जी के अतिरिक्त और कौन-कौन हैं, मैं यह भी नहीं जानता कि इनका निवास-स्थान कहाँ है, और न ही यह जानता हूँ कि उनकी आयु कितनी थी। वर्षा जी के जीवन की समस्त उपलब्धियों का तो ठीक से अनुमान भी नहीं लगा सकता। लेकिन उनकी देह मिट्टी हो गई है, इस हक़ीक़त से मुँह कैसे फेरूं? 'ग़ज़लयात्रा 'पर वर्षा जी की (16 अप्रैल को) पोस्ट की हुई आख़िरी ग़ज़ल - 'है ज़रूरी सावधानी' का आख़िरी शेर है - 'रह न जाए याद बनकर बूंद-"वर्षा" की कहानी' क्या सचमुच उनकी कहानी अब याद बनकर ही रह गई है? आज सुबह से यही लग रहा है जैसे मेरी रूह का कोई हिस्सा उससे जुदा हो गया है। आपने अपना यह आख़िरी शेर क्यों लिखा वर्षा जी? आख़िर क्यों?

भटकन से सार्थकता तक की जीवन-यात्रा

उन्नीस सौ साठ के दशक से उन्नीस सौ नब्बे के दशक तक भारत में हिन्दी में सृजित जेबी पुस्तकों (पॉकेट बुक्स) का बोलबाला था जिन्हें सस्ते लुगदी काग़ज़ पर प्रकाशित किए जाने के कारण लुगदी साहित्य के नाम से संबोधित किया जाता था और तथाकथित उच्च साहित्य की तुलना में अवमानना की दृष्टि से देखा जाता था । ऐसी पुस्तकें पॉकेट बुक इसलिए कहलाती थीं क्योंकि अपने छोटे आकार, पतले काग़ज़ तथा काग़ज़ के ही बने आवरण एवं अंतिम पृष्ठों (पेपरबैक) के कारण ये पढ़ने वाले व्यक्ति (पुरुष) की पतलून की जेब में आराम से समा जाती थीं । विशुद्ध मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी जाने वाली ऐसी पुस्तकों की दो श्रेणियाँ हुआ करती थीं- १. जासूसी उपन्यास जिनमें रहस्यकथाएँ (मिस्ट्रीज़) एवं सनसनी (थ्रिल) से युक्त कहानियाँ हुआ करती थीं और २. सामाजिक उपन्यास जिनके कथानक घर-परिवार, विभिन्न पारस्परिक सम्बन्धों,सामाजिक व्यवस्थाओं, मित्रता तथा स्त्री-पुरुष प्रेम पर आधारित होते थे । लगभग तीन दशक लंबे उस कालखंड में भारत में ऐसे सामाजिक उपन्यासों की मानो बाढ़ सी आ गई थी । कुकुरमुत्तों की मानिंद दर्ज़नों हिन्दी प्रकाशक अस्तित्व में आ गए थे और प्रत्येक मास अनेक सामाजिक उपन्यास पाठकों की पठन-क्षुधा को तृप्त करने के लिए पुस्तकों की दुकानों पर छा जाते थे । इतने उपन्यास छपते थे कि पुस्तकें किराए पर लेकर पढ़ने के लिए देने वाली भी कितनी ही दुकानें चल पड़ी थीं जो पाठकों को पुस्तक को क्रय करने के कष्ट से भी बचाती थीं । किराए पर लेकर पुस्तक पढ़ो,लौटाओ और दूसरी ले जाओ । जब माँग बहुत थी और छापने वाले बहुत थे तो लिखने वालों की भी कोई कमी नहीं थी । लेखकों में जहाँ एक ओर रानू, प्रेम बाजपेयी, गुलशन नन्दा, राजहंस और अशोक दत्त जैसे वास्तविक लेखक थे तो दूसरी ओर छद्म नाम से लिखने वालों का तो मानो तांता ही लगा हुआ था । मनोज, समीर, वर्षा, कल्पना, चेतना, लोकदर्शी, अंशुल, महेश,सूरज, पवन, राजवंश, बादल, बसंत, सत्यपाल, भारत, रवि, सीमा और न जाने कितने-कितने नाम थे ।

ऐसे अधिकतर उपन्यास कुछ विशिष्ट फ़ॉर्मूलों को लेकर लिखे जाते थे जैसे रसोईघर में सीमित सामग्रियों को ही भिन्न-भिन्न प्रकार से मिश्रित करके अलग-अलग व्यंजन बना लिए जाते हैं, वैसे ही कुछ गिने-चुने फ़ॉर्मूलों को ही थोड़ी-सी भिन्नता के साथ बार-बार मिश्रित करके नए-नए उपन्यास लिख लिए जाते थे बहुत-से उपन्यास तो सीधे-सीधे बॉलीवुड फ़िल्मों की कहानियों को ही तोड़-मरोड़ कर लिख लिए जाते थे स्वाभाविक रूप से ऐसे उपन्यासों का उद्देश्य भी सिनेमा सरीखा मनोरंजन करना ही था कथित उच्च साहित्य की तुलना में इन्हें नीची दृष्टि से देखे जाने का एक कारण इनकी स्थापित फ़ॉर्मूलाबद्धता भी थी ऐसे हज़ारों उपन्यासों की भीड़ में किसी उपन्यास का वास्तविक अर्थों में उत्कृष्ट होना तथा उत्तम साहित्य के सभी मानदंडों पर खरा उतरना अपवाद ही हो सकता था हाल ही में ऐसे ही एक अपवाद को पढ़ने का मुझे अवसर मिला जिसे पढ़ने के उपरांत मेरे प्रसन्नता-मिश्रित आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, विशेष रूप से यह देखकर कि ऐसी उत्कृष्ट कृति किसी छद्म नाम वाले लेखक (या लेखिका) द्वारा लिखी गई है उपन्यास पर लेखिका का नाम 'संगीता' लिखा है जो कि निश्चित रूप से कोई छद्म नाम ही है क्योंकि लेखिका का कोई परिचय या छायाचित्र नहीं दिया गया है चार दशक पूर्व प्रकाशित हुए इस छोटे-से उपन्यास का नाम है - 'परछाईं'

परछाईं की केंद्रीय पात्र का नाम है सीता जिसके वैवाहिक जीवन का धागा विवाह के दो दिवस उपरांत ही टूट जाता है जब उसके पति को उसके विवाह-पूर्व प्रेम के फलस्वरूप हुए गर्भपात का पता चल जाता है । पति उसके पक्ष को सुने बिना ही उसका परित्याग कर देता है और तब आरंभ होती है दृढ़ता और साहस से युक्त व्यक्तित्व वाली सीता की कठिन डगर से युक्त जीवन-यात्रा । अब उसे अपना उचित पथ चुनकर वास्तविक अर्थों में अपने नवीन जीवन का आरंभ करना होता है । परछाईं उपन्यास का मुख्य भाग सीता की इसी साहसिक यात्रा का वर्णन करता है जो भटकन और अनिश्चितता से आरंभ होती है लेकिन अंततः सार्थकता के गंतव्य तक पहुँचने में सफल होती है । अपनी इस यात्रा में जहाँ उसका संपर्क अपने पूर्व-प्रेमी से भी होता है और अतीत से जुड़ी भावनाएं भी पुनः उसके मन में उमड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर उसे अपना परित्याग करने वाले पति के अंश को भी अपनी कोख से जन्म देना और पालना पड़ता है । लेकिन जीवन-संघर्ष की आँच में तपकर परिपक्व हो चुकी सीता अब अपनी भावनाओं पर संयम रखकर अपने कर्तव्य को पहचानना सीख चुकी है और किसी भी समय-बिन्दु पर स्वयं को दुर्बल नहीं पड़ने देती । श्रेय और प्रेय में भिन्नता करते हुए वह सदा श्रेय को प्रेय पर प्राथमिकता देती है तथा अपने सहज मानवीय गुणों को अक्षुण्ण बनाए रखते हुए एवं सभी कर्तव्यों का उचित अनुपालन करते हुए अपने व्यक्तित्व को दिन-प्रतिदिन परिष्कृत करती चली जाती है । वह जीवन की प्रसन्नताओं का भी मूल्य समझती है तथा जब उसे एक उपयुक्त पुरुष साथी मिल जाता है तो शेष जीवन हेतु उसका हाथ थामने में भी वह संकोच नहीं करती लेकिन उसके द्वारा रखे गए विवाह-प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय करने से पूर्व वह उसे अपने अतीत के विषय में सब कुछ बता देती है ।

उपन्यास का नाम परछाईं इसलिए रखा गया है क्योंकि मनुष्य का अतीत उसकी परछाईं की भांति ही होता है जिससे मुक्ति नहीं पाई जा सकती । लेकिन लेखिका ने इस बात को बहुत ही सुंदरता से रेखांकित किया है कि परछाईं को कभी अपने से आगे नहीं रहने देना चाहिए । उनके मतानुसार मनुष्य को सदा प्रकाश में ही रहना चाहिए ताकि उसकी परछाईं उसके पीछे ही रहे एवं उसके समक्ष उसका पथ निरंतर प्रशस्त रहे जिस पर परछाईं का प्रभाव तनिक भी न पड़ सके । यह सत्य ही एक अनमोल जीवन-संदेश है जिसे कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए विशेषतः तब जब अतीत कटु अनुभवों एवं पीड़ाओं से परिपूर्ण हो ।

परछाईं की नायिका सीता न केवल अपने मृदु व्यवहार तथा निष्ठायुक्त कर्तव्य-निर्वहन से उत्तरोत्तर प्रगति करती है वरन वह अपने क्षमाशील स्वभाव का परिचय भी समय-समय पर देती है । वह अपना परित्याग कर देने वाले पति को ही नहीं, जलन एवं द्वेष के कारण स्वयं को हानि पहुँचाने वाली एक दुष्टा तक को क्षमा कर देती है । उसकी क्षमा के सुप्रभाव से उस कुमार्गी स्त्री का हृदय-परिवर्तन हो जाता है एवं वह अपने कुकर्मों का प्रायश्चित्त करती हुई अपने जीवन की धारा को उचित दिशा में मोड़ देती है ।

लेखिका ने सीता की चारित्रिक दृढ़ता एवं धैर्य का परिचय उपन्यास के आरंभ में ही दे दिया है जब वह अपने पति को अपना पक्ष सुनकर विवेकपूर्ण निष्कर्ष निकालने एवं तदनुरूप निर्णय लेने के लिए एक अवसर देती है एवं उसके प्रत्युत्तर न देने की अवधि में आत्म-शुद्धि हेतु उपवास करती है । लेकिन जब उसका विवाह-विच्छेद तय हो जाता है, तब वह न तो अपने ससुराल से कोई सहयोग लेती है और न ही अपने पैतृक-गृह की ओर देखती है । अपने मन में एक दृढ़ निश्चय करके तथा अपने आत्मबल पर विश्वास करके वह अकेली ही जीवन-समर में कूद पड़ती है ।

परछाईं के अधिकतर पात्र सकारात्मक हैं जो नायिका की जीवन-यात्रा में उसके सहयात्री बनते हैं । लेखिका ने सम्पूर्ण उपन्यास में इस बात को बिना किसी कोलाहल अथवा आडंबर के बड़ी सौम्यता से प्रतिपादित किया है कि संसार में अच्छे व्यक्तियों की कमी नहीं है । जो व्यक्ति स्वयं भीतर से स्वच्छ एवं पुनीत है, उसे अपने जैसे सहृदय एवं निर्विकार लोग कभी-न-कभी अवश्य मिलते हैं । सीता के व्यक्तित्व एवं उपन्यास में वर्णित उसके जीवन के उच्चावचनों ने कहीं मुझे यशपाल जी की कालजयी कृति झूठा-सच की नायिका तारा का स्मरण कराया तो कहीं नासिरा शर्मा जी के प्रेरणास्पद उपन्यास ठीकरे की मंगनी की नायिका महरूख़ की याद दिला दी ।

परछाईं में बहुत ही सुंदर हिन्दी भाषा देखने को मिलती है और बीच-बीच में कथा में उपस्थित प्रसंगों के अनुरूप हिन्दी एवं अंग्रेज़ी की उत्तम कविताओं के मनमोहक अंश बड़ी कुशलता के साथ ऐसे जड़े गए हैं जैसे स्वर्णाभूषणों में रत्न जड़े जाते हैं । सम्पूर्ण उपन्यास में कथा का प्रवाह आद्योपांत अत्यंत सहज है एवं पाठक को अपने साथ बहाए चलता है । उपन्यास में कहीं पर भी न तो थोथी भावुकता दर्शाई गई है और न ही कृत्रिम एवं अलंकारिक संवादों का अवलंब लिया गया है । सर्वत्र एक स्वाभाविकता व्याप्त है । पाठक अनायास ही मुख्य नारी पात्र के साथ मानसिक रूप से जुड़ जाता है तथा स्वयं को उसके साथ घटित होने वाली घटनाओं का साक्षी अनुभव करने लगता है ।

परछाईं को सम्पूर्ण पढ़ चुकने के उपरांत मैंने अपने मन के प्रत्येक कोण को प्रकाश से जगमगाता अनुभव किया तथा मुझमें नवीन उत्साह का संचार एवं जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का पुनर्जागरण हुआ । यह निस्संदेह एक सर्जक के रूप में लेखिका की सफलता ही है । यह अत्यंत कम मूल्य वाला छोटा-सा उपन्यास सर्वप्रथम १९८० में स्टार पॉकेट बुक्स नामक संस्था से प्रकाशित हुआ था । उन दिनों युवतियों में ऐसे सामाजिक उपन्यासों को पढ़ने का बहुत चलन था । मुझे पूर्ण विश्वास है कि जिन युवतियों ने (एवं युवकों ने भी) इस उपन्यास को पढ़ा होगा, उन्हें अपने जीवन के लिए एक नई दिशा अवश्य मिली होगी । सस्ते लुगदी काग़ज़ पर छपा यह छोटा-सा अल्पमोली उपन्यास मेरी दृष्टि में एक श्रेष्ठ साहित्यिक कृति ही है जो किसी भी संवेदनशील एवं विवेकशील पाठक के हृदय को जीतने में सक्षम है ।

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