Tuesday, November 24, 2020

jmathur_swayamprabha: इंसाफ़ का सूरज

jmathur_swayamprabha: इंसाफ़ का सूरज: अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है जब मैंने स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास ' जिगर का टुकड़ा ' पर अपने ख़यालात को अल्फ़ाज़ में ढाला था ...

Monday, November 23, 2020

इंसाफ़ का सूरज

अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है जब मैंने स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास 'जिगर का टुकड़ा' पर अपने ख़यालात को अल्फ़ाज़ में ढाला था और उपन्यास में शामिल तंत्र-मंत्र की बातों पर भी तबसरा किया था । हाल ही में 'जिगर का टुकड़ा' से तक़रीबन नौ-दस साल पहले लिखे गए उनके एक और उपन्यास 'इंसाफ़ का सूरज' को पढ़ने का इत्तिफ़ाक़ हुआ तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि इस बेहतरीन उपन्यास में भी तंत्र-मंत्र का ज़िक्र है हालांकि वह उतना ज़्यादा नहीं है जितना कि 'जिगर का टुकड़ा' में है और कहानी में उसकी अहमियत भी कम ही है । बहरहाल इसमें कोई शक़ नहीं कि 'इंसाफ़ का सूरज' भी वेद जी के शानदार उपन्यासों में शामिल है और किसी भी सस्पेंस-थ्रिलर उपन्यासों के शौक़ीन को इसे पढ़े बिना नहीं रहना चाहिए । 

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा का लेखकीय जीवन गुणवत्ता के निकष पर परखा जाए तो सांख्यिकी के सममितीय वितरण (symmetrical distribution) की मानिंद रहा था अर्थात् एकरूप ढंग से उच्चतर होते हुए चरम सीमा पर पहुँचकर उसी प्रकार निम्नतर होता गया तथा अंत में उसी स्तर पर आ गया जिस स्तर पर आरंभ में था । उन्होंने निहायत मामूली उपन्यासों से लिखना शुरु करके आगे चलकर एक-से-एक ज़बरदस्त उपन्यास लिखे लेकिन चोटी पर पहुँचने के बाद फिर से नीचे आते हुए वे मामूली-से-मामूली उपन्यास पेश करते गए जिनमें से कई पर नक़ली (किसी और के लिखे हुए) होने का भी शुबहा होता है । उनका स्वर्णकाल सत्तर के दशक के अंत से लेकर नब्बे के दशक के आरंभ तक माना जा सकता है । अस्सी का दशक तो पूरी तरह उन्हीं का था जब वे लुगदी साहित्य या पल्प फ़िक्शन के बेताज बादशाह माने जाते थे । 'इंसाफ़ का सूरज' उसी समयकाल में सिरजा गया था । 

वेद जी उपन्यासों के नामकरण में भी चतुर थे तथा अपने प्रत्येक उपन्यास का नाम बड़ा आकर्षक रखते थे । प्रायः उनके उपन्यास के नाम का सम्बन्ध उसके कथानक से होता था लेकिन इस उपन्यास में संभवतः उन्हें रखने के लिए कोई ऐसा नाम नहीं सूझा जो कथावस्तु की ओर संकेत करता हो । इसलिए उन्होंने उपन्यास के न्यायप्रिय एवं कर्तव्यपरायण नायक के नाम (सूरज) को रेखांकित करते हुए उपन्यास का नाम 'इंसाफ़ का सूरज' रख दिया जबकि उपन्यास की कहानी से इस शीर्षक का कोई लेना-देना नहीं है । पर उपन्यास है कमाल का । पढ़कर आनंद आ गया ।

'इंसाफ़ का सूरज' कहानी कहता है बम्बई (अब मुम्बई) से कोई पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटे-से कस्बे सरूरपुर में स्थित ठाकुर गजेन्द्रसिंह की हवेली की जो 'ठाकुर की हवेली' के नाम से प्रसिद्ध है । ठाकुर गजेन्द्रसिंह को दिवंगत हुए पाँच वर्ष हो चुके हैं । अब हवेली में उनकी विधवा सुलोचना देवी अपने दो पुत्रों - श्रीकांत तथा शूरवीर के साथ रहती हैं । ज्येष्ठ पुत्र श्रीकांत विवाहित है तथा उसकी पत्नी रमा एक आठ वर्षीय पुत्र की माता है जो दुर्भाग्यवश पैर से विकलांग हो गया है । समस्या कनिष्ठ पुत्र शूरवीर को लेकर है क्योंकि उसकी दो दुलहनों की हत्या हो चुकी है । सुलोचना देवी अब उसका तीसरी बार विवाह करने जा रही हैं मंजू नामक युवती से जिसके लिए उन्हें उसके कथित मामा बिज्जू ने बताया है कि वह बिना माता-पिता की अनाथ युवती है तथा जिसका मामा के अतिरिक्त इस संसार में कोई नहीं है । विवाह को रोकने का प्रयास पुलिस भी करती है तथा प्रकृति भी । वैवाहिक कर्मकांड के मध्य ही भीषण आँधी-तूफान-बारिश आकर विघ्न डालते हैं तथा कई अन्य अपशगुन भी होते हैं । लेकिन विवाह हो ही जाता है ।  

विवाह के उपरांत यह देखकर मंजू का मस्तिष्क घूम जाता है कि उसके ससुराल के विभिन्न व्यक्ति उसे एकदूसरे से सावधान करते हैं तथा उसके पति की पहली दो पत्नियों की मृत्यु की पृथक्-पृथक् व्याख्या करते हैं । परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त घर का एक कुबड़ा नौकर बबरू भी उसे सावधान करने वालों तथा हवेली की दो पूर्व वधुओं की मृत्यु की कहानी सुनाने वालों में सम्मिलित है । ऐसे में मंजू को लगने लगता है कि वह तो किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकती तथा उसके प्राण संकट में हैं । लेकिन उसका अपना चरित्र तथा गतिविधियां भी रहस्यमय हैं । हवेली में पहले भी भुतहा घटनाएं घटती रही हैं तथा अब फिर से वैसा होने के कारण वह बदनाम होती जा रही है । सुलोचना देवी के विचार से ऐसा तंत्र-मंत्र द्वारा करवाया जा रहा है तथा करवाने वाला है उनके पति का पुराना मित्र तथा अब शत्रु जिसका नाम वीर बहादुर है एवं जो बम्बई (मुम्बई) में रहता है । उसकी काट भी वह तंत्र-मंत्र द्वारा ही करवाना चाहती हैं जिसके लिए वे चाण्डाल नामक तथाकथित तांत्रिक की सहायता लेती हैं ।

इधर पुलिस के उप-अधीक्षक त्रिपाठी साहब हवेली की दुलहनों की हत्या के मामले की छानबीन अपने सर्वाधिक विश्वस्त एवं सुयोग्य इंस्पेक्टर सूरज को सौंपते हैं जिसकी वे सदा 'इंसाफ़ का सूरज' कहकर प्रशंसा करते हैं । सूरज अपने साथी सब-इंस्पेक्टर खरे के साथ मिलकर मामले की तह में घुसने लगता है लेकिन तभी हवेली में हो रही डरावनी घटनाओं से घबराकर ठाकुर परिवार हवेली को ख़ाली करके अपने फ़ॉर्म हाउस पर रहने चला जाता है । इन डरावनी घटनाओं में सबसे ज़्यादा ख़ौफ़नाक और दहला देने वाली घटना है बबरू की हत्या । 

ख़ाली हवेली में घुस आता है अपराधियों का एक दल जिसके सदस्य अपने वास्तविक नामों के स्थान पर अपनी विशेषताओं के कारण पशुओं के नाम से जाने जाते हैं - एक चीता कहलाता है, एक बन्दर, एक हिरन, एक तोता; और इस दल के मुखिया को करकेंटा कहा जाता है । ख़ाली हवेली में क्या करना चाहते हैं वे ? क्या है उनका निशाना ? एक  रहस्यमयी 'लोमड़ी' इन लोगों के भी पीछे पड़ी है, वह कौन है ? और क्या हवेली की बहुओं की मौत से इन लोगों का कोई ताल्लुक है ? इन सभी सवालों के जवाब तथा कहानी के सभी रहस्यों का ख़ुलासा पाठकों के सामने भी उसी तरह होता जाता है जिस तरह 'इंसाफ़ के सूरज' के सामने । उसके सामने राज़ उसकी अपनी खोजबीन से खुलते हैं तो पाठकों के सामने उपन्यास के पन्नों को पलटते जाने से । 

पुराने ज़माने में राजा-महाराजा-नवाब वग़ैरह तथा ज़मींदार-जागीरदार जैसे रईस लोग जब हवेलियां बनवाते थे तो उनमें तहख़ाने होते थे, सुरंगें होती थीं, छुपे हुए रास्ते होते थे और होता था एक रहस्य का माहौल । इस उपन्यास की हवेली भी ऐसी ही है जिसके कारण वह भी उपन्यास का वैसा ही अभिन्न एवं जीवंत पात्र है जैसे कि इसके मानवीय पात्र । उपन्यास में यह बहुत अच्छे-से स्थापित किया गया है कि वास्तविक संकट से अधिक व्यक्ति को उसके विचार एवं आशंकाएं भयभीत करती हैं । यह भी रेखांकित किया गया है कि व्यक्तियों के विचार वास्तविक तथ्यों से अधिक उनकी अपनी धारणाओं से प्रभावित होते हैं । इन्हीं कारणों से लोग एकदूसरे पर संदेह करते हैं तथा भ्रमित रहते हैं । 

'इंसाफ़ का सूरज' में वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी का जादू प्रथम दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य तक बना रहता है । उपन्यास के आख़िर में भी वे पाठकों को एक ज़ोरदार झटका दे ही देते हैं । ऐसे ही झटकों के लिए वे अस्सी के दशक में 'झटका स्पेशलिस्ट' के नाम से मशहूर हो गए थे । सरल हिंदी में लिखे गए इस उपन्यास को एक बार यदि आपने पढ़ना आरंभ कर दिया तो इसे अंत तक पढ़े बिना आप रह ही नहीं सकेंगे । उपन्यास में कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर विश्वास न किया जा सके । सब कुछ तार्किक ही है । सब-इंस्पेक्टर खरे के माध्यम से कुछ हास्य भी उत्पन्न किया गया है । अगर आप जानना चाहते हैं कि क्यों अस्सी के दशक में हिंदी के पाठक वेद प्रकाश शर्मा की कलम के दीवाने हो गए थे तो 'इंसाफ़ का सूरज' पढ़ लीजिए । जान जाएंगे । 

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Tuesday, November 3, 2020

पिता-पुत्र संबंध पर बनीं श्रेष्ठ हिन्दी फ़िल्में

आज (तीन नवम्बर को) मेरे पुत्र सौरव का जन्मदिन है । सामान्यतः माता एवं पुत्र के तथा पिता एवं पुत्री के भावनात्मक जुड़ाव ही विमर्श का विषय बनते हैं क्योंकि प्रायः ऐसा देखा गया है कि भारतीय परिवारों में पुत्री अपने पिता की लाड़ली होती है जबकि पुत्र अपनी माता का लाड़ला होता है । लेकिन पिता एवं पुत्र के मध्य का संबंध भी कोई कम महत्वपूर्ण नहीं । कई बार पिता अपने पुत्र के प्रति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं करते (या बहुत कम करते हैं) लेकिन योग्य पुत्र अपने पिता का गौरव होता है, इसमें कोई संदेह नहीं । पिता के अपनी भावनाओं को मन में दबा लेने तथा पुत्र के साथ संवादहीनता के कारण कभी-कभी पुत्र अपने पिता को ग़लत भी समझने लगते हैं लेकिन अधिकांश उदाहरणों में सत्य यही होता है कि जहाँ एक सफल एवं समर्थ पिता अपने पुत्र को अपने उत्तराधिकारी के रूप में देखना चाहता है, वहीं एक असफल एवं विवश पिता अपने पुत्र को जीवन की प्रत्येक अवस्था में अपने से बेहतर देखना चाहता है तथा यही कामना करता है कि जो कुछ उसने अपने जीवन में भुगता है, उसके पुत्र को न भुगतना पड़े; वह सबल एवं सक्षम बने, अपनी योग्यतानुसार भौतिक जीवन में सब कुछ प्राप्त करे, कभी किसी अभाव का मुख न देखे और सदा सर उठाकर ही जिये, ज़िन्दगी में कभी न हारे । ऐसा हर बाप यही चाहता है कि मेरे ख़्वाब तो पूरे न हुए लेकिन मेरे बेटे के ज़रूर पूरे हों । 

बॉलीवुड ने इस जज़्बाती रिश्ते पर कई फ़िल्में बनाई हैं जिनमें से कुछ बेहतरीन फ़िल्मों की चर्चा मैं इस आलेख में करूंगा । यूँ तो फ़ॉर्मूलाबद्ध फ़िल्में बनाने वाले इस उद्योग ने ऐसी असंख्य पारिवारिक फ़िल्में बनाई हैं जिनमें पिता-पुत्र के मध्य कहीं प्रेम का बाहुल्य तो कहीं तनाव दिखाया गया है । ऐसी स्थापित ढर्रे की फ़िल्मों में पिता-पुत्र तनाव का कारण प्राय: पिता अथवा पुत्र का अपराधी या दुराचारी होना दिखाया गया है । दुनिया (१९६८) तथा त्रिशूल (१९७८) जैसी फ़िल्मों में यह भी दिखाया गया है कि पिता या पुत्र या दोनों को ही एक-दूसरे के साथ अपना संबंध ज्ञात नहीं है । स्कूल मास्टर (१९५९), ज़िन्दगी (१९७६), अवतार (१९८३) तथा बाग़बां (२००३) जैसी फ़िल्मों में स्वार्थी एवं कृतघ्न पुत्र दिखाए गए हैं जो अपने निहित स्वार्थ के लिए पिता को (तथा माता को भी) कष्ट देते हैं तथा आगे चलकर कर्मठ पिता अपने जीवट एवं परिश्रम से पुनः अपना भाग्योदय करते हैं जो कि परजीवी पुत्रों के मुख पर तमाचे सरीखा सिद्ध होता है । लेकिन ऐसी फ़िल्में बहुत कम बनी हैं जिनमें कथावस्तु को पिता-पुत्र के भावात्मक संबंध पर ही  केन्द्रित रखा गया हो (फ़ोकस किया गया हो) । ऐसी कुछ उत्कृष्ट हिन्दी फ़िल्में हैं :

१. सम्बंध (१९६९): प्रदीप कुमार तथा देब मुखर्जी को पिता एवं पुत्र के रूप में प्रस्तुत करती इस फ़िल्म को जिन भावुक लोगों ने देखा है, उनके नेत्र अवश्य ही आर्द्र हो उठे होंगे । भाग्य के झंझावात पिता, माता (अनिता गुहा) एवं पुत्र को पृथक् कर देते हैं जिसके उपरान्त पुत्र अपने एकाकी जीवन में बहुत कुछ सह जाता है । लेकिन उसके पिता कोई बुरे व्यक्ति नहीं हैं । किस्मत की आँधी ही ऐसी चलती है कि सब कुछ बिखर जाता है जिस पर किसी का भी कोई बस नहीं चलता । लेकिन आख़िर पिता और पुत्र मिलते हैं । कुछ समय उन्हें एकदूसरे को पहचानने में लगता है लेकिन भावनाओं से भरा पिता अपने पुत्र को बिना पहचाने भी उसके दुख को जान लेता है, अनुभव कर लेता है एवं बांटने का प्रयास करता है । फ़िल्म का अंत कोई अधिक प्रभावी नहीं लेकिन बिछोह के उपरांत जो कुछ घटता है, वह फ़िल्म देखने वालों को कथा के पात्रों से अभिन्न रूप से जोड़ देता है । प्रदीप कुमार एवं देब मुखर्जी दोनों ने ही हृदयस्पर्शी अभिनय किया है । फ़िल्म में 'अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पे भी कुछ डालो, अरे ओ रोशनी वालों' तथा 'चल अकेला चल अकेला चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही, चल अकेला' जैसे कालजयी गीत हैं ।

२. ज़िंदा दिल (१९७५): प्राण तथा ऋषि कपूर की प्रमुख भूमिकाओं वाली यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से बुरी तरह से असफल रही थी लेकिन इसकी विषय-वस्तु बहुत अच्छी है । पटकथा एवं निर्देशन भी यदि अच्छे होते तो कमाल की फ़िल्म बनती क्योंकि बाप-बेटे की भूमिकाओं में प्राण और ऋषि कपूर ने पटकथा से ऊपर उठकर शानदार अभिनय किया है और फ़िल्म को एक बार देखने लायक तो बना ही दिया है । पिता अपने दो पुत्रों में भेदभाव करता है क्योंकि वह जानता है कि जिस पुत्र के प्रति वह पक्षपातपूर्ण ढंग से अन्याय करता है, वह ज़िंदा दिल है जबकि दूसरा पुत्र मानसिक रूप से दुर्बल है जिसके कारण उसकी अतिरिक्त देखभाल करनी होती है । इस फ़िल्म में कठोर बाप और ज़िंदा दिल बेटे के बीच के कुछ दृश्य तो ऐसे हैं कि बरबस ही मुँह से 'वाह' निकल पड़ती है ।

३. शक्ति (१९८२): दिलीप कुमार को पिता तथा अमिताभ बच्चन को पुत्र के रूप में दर्शाती रमेश सिप्पी की यह फ़िल्म चाहे व्यावसायिक रूप से कम चली लेकिन पिता-पुत्र की भूमिकाओं में इन दोनों ही असाधारण कलाकारों ने जान डाल दी । अपने कर्तव्य के प्रति अति-सजग पिता अपने पुत्र से प्रेम तो बहुत करता है लेकिन अभिव्यक्त नहीं करता जिसका परिणाम यह निकलता है कि पुत्र अपने पिता को ग़लत समझने लगता है एवं अनायास ही भावनात्मक रूप से एक अपराधी के निकट आ जाता है जबकि पिता से दूर होता चला जाता है । यह दुखांत फ़िल्म भावनाओं की अभिव्यक्ति के महत्व को रेखांकित करती है एवं दिलीप कुमार तथा अमिताभ बच्चन, दोनों की ही श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिनी जाती है । इससे कुछ-कुछ मिलती-जुलती फ़िल्म 'स्वर्ग यहाँ नरक यहाँ' (१९९१) थी जिसमें मिथुन चक्रवर्ती ने पिता और पुत्र की दोहरी भूमिका निभाई थी लेकिन वह फ़िल्म ख़राब पटकथा एवं कमज़ोर निर्देशन के कारण बोझिल बन गई तथा दर्शकों को अधिक प्रभावित नहीं कर सकी । 

४. शराबी (१९८४): अमिताभ बच्चन को ही बेटे के रूप में पेश करती प्रकाश मेहरा की यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर अत्यधिक सफल रही थी । व्यवसाय में डूबे पिता की भूमिका प्राण ने निभाई थी ।  मातृहीन पुत्र अपने पिता की उपेक्षा के कारण शराबी बन जाता है जिसे स्नेह केवल अपने पिता के एक कर्मचारी मुंशी जी (ओम प्रकाश) से मिलता है । इस कथा में पिता अपने पुत्र की भावनाओं से अनभिज्ञ रहता है एवं उसे ग़लत समझता है । मुंशी जी का निधन शराबी पुत्र को और भी एकाकी बना देता है किन्तु अंत में पिता को अपनी भूल अनुभव होती है तथा फ़िल्म 'शक्ति' के विपरीत सुखद ढंग से समाप्त होती है । बेहद मनोरंजक यह फ़िल्म यकीनन देखने लायक है जिस में प्राण और अमिताभ बच्चन, दोनों का अभिनय कमाल का है ।

५. एहसास (२००१): ज़िन्दगी को बहुत नज़दीक से देखने वाले निर्देशक महेश मांजरेकर ने यह उत्कृष्ट फ़िल्म बनाई थी जिसके साथ न तो दर्शकों ने न्याय किया, न ही समीक्षकों ने । अपनी ज़िन्दगी में हारने वाला पिता (सुनील शेट्टी) अपने पुत्र (मयंक टंडन) को अपने जैसा नहीं बनते देखना चाहता तथा उसे उसके जीवन में विजेता बनाने के लिए वह उसे इतने कठोर अनुशासन में रखता है कि वह बालक अपने पिता को ग़लत समझने लगता है । उसके पिता उसे कितना प्यार करते हैं, यह बात वह बालक फ़िल्म के अंत में जाकर समझ पाता है । फ़िल्म को पूर्ण रूप से यथार्थपरक रखा गया है, यहाँ तक कि क्लाईमेक्स में भी फ़िल्मी फ़ॉर्मूला न अपनाकर वही दिखाया गया है जो उन परिस्थितियों में संभव था । दिल की गहराई में उतर जाने वाली यह फ़िल्म जिन माता-पिताओं ने नहीं देखी है, मैं उनसे यही कहूंगा कि इसे ज़रूर देखें । सुनील शेट्टी और मयंक टंडन, दोनों ही अपने काम से फ़िल्म देखने वालों का दिल जीत लेते हैं । एक ऐसी ही अच्छी फ़िल्म गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित 'विजेता' (१९८२) थी जिसमें पिता की भूमिका शशि कपूर ने तथा पुत्र की भूमिका उनके वास्तविक पुत्र कुणाल कपूर ने निभाई थी लेकिन पिता-पुत्र संबंध उसकी कथा का केवल एक अंश ही था । 

६. उड़ान (२०१०): 'उड़ान' एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें पिता का चरित्र विशुद्ध नकारात्मक है । मन को झकझोर देने वाली यह फ़िल्म किशोर पुत्र के अपने क्रूर पिता की बेड़ियों से मुक्त होकर जीवन में स्वतंत्र उड़ान भरने की स्थिति में पहुँचने की गाथा है जिसमें पुत्र के यौवन एवं साहस के समक्ष अंततः पिता को पराजय स्वीकार करनी पड़ती है । समीक्षकों द्वारा मुक्त-कंठ से सराही गई एवं अनेक पुरस्कार जीतने वाली इस फ़िल्म में पुत्र की प्रेरक भूमिका रजत बारमेचा ने एवं पाषाण-हृदय पिता की भूमिका रोनित रॉय ने निभाई है और दोनों ने ही अविस्मरणीय अभिनय किया है । मनोज बाजपेयी के सुन्दर अभिनय से सजी 'गली गुलियां' (२०१८) में पिता-पुत्र (नीरज काबी-ओम सिंह) का ट्रैक भी कुछ-कुछ ऐसा ही है लेकिन 'गली गुलियां' अपनी एक अलग श्रेणी की फ़िल्म है और यह बात उसे देखे बिना नहीं समझी जा सकती । 

७. पटियाला हाउस (२०११): क्रिकेट के साथ-साथ इंग्लैंड में नस्लभेद की समस्या की पृष्ठभूमि में बनाई गई निखिल आडवाणी की यह फ़िल्म यदि रटे-रटाये फ़ॉर्मूलों का लोभ संवरण कर पाती तो इसकी गुणवत्ता बहुत उच्च होती । तथापि पिता ऋषि कपूर एवं आज्ञाकारी पुत्र अक्षय कुमार के बीच के उलझे हुए संबंंध को यह फ़िल्म बहुत प्रभावी ढंग से प्रदर्शित करती है जिसमें दोनों ही कलाकारों का अभिनय अत्यन्त प्रशंसनीय रहा है । पिता की भावनाएं आहत न हों, इसके लिए पुत्र अपनी उमंगों का दम घोट देता है एवं अपनी युवावस्था के स्वप्नों का बलिदान कर देता है । लेकिन वर्षों के अंतराल के उपरांत जब उसे अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करने का अवसर मिलता है तो वह दुविधा में पड़ जाता है - एक ओर उसका अपना जीवन है, दूसरी ओर पिता की भावनाएं । जब वह पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाता है तो पहले तो पिता उसे ग़लत ही समझता है लेकिन फिर उसके अंदर आया बदलाव फ़िल्म को ख़ुशनुमा ढंग से ख़त्म करता है । 

८. फ़रारी की सवारी (२०१२): आज आदर्शवादी लोग ढूंढे नहीं मिलते । ऐसे में एक आदर्शवादी पिता एवं उसके वैसे ही आदर्शवादी पुत्र की यह कथा न केवल भरपूर मनोरंजन करती है वरन मर्म को स्पर्श करती है तथा एक फ़ीलगुड अनुभूति करवाती है, यह आशा बंधाती है कि इस स्वार्थाधारित समाज तथा मूल्यों के क्षरण के युग में भी अभी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है । आदर्शवादी लोग सदा तथाकथित व्यावहारिक लोगों से हारें, यह आवश्यक नहीं । एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के बालक के स्वप्न भी साकार हो सकते हैं जिसके लिए उसके पिता (तथा दादा क्योंकि फ़िल्म में तीन पीढ़ियों वाला परिवार है जिसमें सभी पुरुष हैं) का अपने आदर्शों से समझौता करना आवश्यक नही । बड़े पहले स्वयं आदर्शों पर चलें, तभी वे बालकों को आदर्शों पर चलने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, इस सत्य को यह फ़िल्म स्पष्ट रूप से उद्घाटित करती है । सभी कलाकारों के सजीव अभिनय से ओतप्रोत यह फ़िल्म एक पारसी परिवार में पिता रुस्तम (शर्मन जोशी), पुत्र कायो (ऋत्विक साहोर) तथा पिता के पिता बहराम देबू (बोमन ईरानी) के भावनात्मक संबंधों को दिल को छू लेने वाले ढंग से चित्रित करती है । नन्हा पुत्र ऐसा आदर्शवादी बन चुका है कि अपने सपने को पूरा करने के लिए भी उसे अपने पिता का कोई अनुचित कार्य करना स्वीकार नहीं है । यह फ़िल्म मनोरंजन तथा संदेश, दोनों ही की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है ।

बाप-बेटे के रिश्ते को समझना आसान नहीं लेकिन यह रिश्ता बहुत अहम होता है दोनों ही की ज़िन्दगी में । ऊपर वर्णित फ़िल्में इसका प्रमाण हैं । अपने पुत्र का हित चाहने वाला स्नेहपूर्ण पिता नारियल की भांति भी हो सकता है जिसकी अनुशासनप्रियता के कठोर आवरण में ही उसका अपने पुत्र के प्रति निश्छल प्रेम एवं शुभचिंतन अन्तर्निहित हो । बेटे को सोने का निवाला खिलाने वाले लेकिन शेर की नज़र से देखने वाले बाप ऐसे ही होते हैं । शेष सत्य यही है कि बालक से बड़े होते हुए अपने पुत्र को निहारते समय पिता के मन में यही पंक्तियां चलती रहती हैं - 'तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा, मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राजदुलारा' ।

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Sunday, November 1, 2020

सतर्क भारत – समृद्ध भारत

भारत हो या कोई भी देश, उसकी समृद्धि तभी सुनिश्चित हो सकती है जब उसके नागरिक जागरूक एवं सतर्क हों । यह सतर्कता चाहिए भ्रष्ट तौरतरीकों के विरूद्ध, अनैतिकता एवं असामाजिकता के विरूद्ध, अपराध एवं नियमों और कानून-कायदों के उल्लंघन के विरूद्ध । 

देश बनता है देशवासियों से, देश में निवास करने वाले उसके नागरिकों से । केवल नदियों, पहाड़ों, रेगिस्तानों, मैदानों और ज़मीन से ही देश नहीं बन जाता । देश का निर्माण उसके नागरिक करते हैं । उनका अच्छा या बुरा चरित्र ही देश को महानता के पथ पर आगे बढ़ा सकता है या पतन के गर्त में ढकेल सकता है ।

कौनसा ऐसा देश है जो समृद्ध नहीं होना चाहता ? हमारा भारतवर्ष भी समृद्ध क्यों न हो ? आप कहेंगे कि भारत तो समृद्ध है ही । लेकिन अनेक विद्वान अर्थशास्त्रियों की मानिंद मैं यह कहूंगा कि भारत एक समृद्ध देश है जिसके अधिसंख्य निवासी समृद्धिविहीन हैं तथा देश के विकास  का लाभ उन तक नहीं पहुँच पाता । क्यों ?

इसके कारण को समझना इतना कठिन नहीं है जितना प्रत्यक्षतः लगता है । जब कोई राष्ट्र प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हो एवं उसके शासकों की नीतियां भी जनकल्याणकारी हों तो जनसामान्य के समृद्ध होने में बाधा एक ही होती है – नीतियों का कार्यान्वयन करने वालों का भ्रष्ट आचरण । इस भ्रष्ट आचरण को ऊर्जा मिलती है उन्हें धन देकर अपने अनुचित (या उचित भी) काम करवाने वालों से ।

एक मामूली खरोंच से बढ़ते- बढ़ते नासूर बन चुका भ्रष्टाचार कोई असाध्य रोग नहीं है । इस रोग का उपचार एक ही है – सतर्कता अथवा जागरुकता । सतर्कता में सम्मिलित है अनुचित कार्य, बात या माँग का विरोध । इस विरोध के रौद्र अथवा हिंसक हो जाने की कोई आवश्यक्ता नहीं है । एक शताब्दी पूर्व ही हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हमें असत्य के सविनय विरोध का मार्ग दिखला चुके हैं । समझने योग्य मुख्य बात है भ्रष्ट व्यक्ति के भ्रष्ट आचरण से असहयोग, उसका अस्वीकरण । हम भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लें तो वह कैसे मिटेगा ? रोगी यदि अपने रोग को  अंगीकार कर ले तो उसका उपचार कैसे होगा ? अधिसंख्य लोगों की मूक स्वीकृति से ही भ्रष्टाचार व्यवस्था में रच-बस जाता है तथा भ्रष्ट व्यक्ति की सोच यह बन जाती है – ‘रिश्वत लेते हुए पकड़े भी गए तो रिश्वत देकर छूट जाएंगे’ । यह मानसिकता ही इस समस्या के मूल में है ।

इस समस्या की गंभीरता के कारण ही १९६४ में केंद्रीय सतर्कता आयोग अस्तित्व में आया । आज सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न कार्यालयों एवं उपक्रमों में सतर्कता विभाग होते हैं, सतर्कता अधिकारी होते हैं, सतर्कता विभाग द्वारा समय-समय पर दिशानिर्देश दिए जाते हैं जिनका अनुपालन करके विभिन्न आधिकारिक कार्यों में पारदर्शिता एवं स्वच्छता सुनिश्चित की सकती है एवं भ्रष्टाचार को पनपने से रोका जा सकता है । कार्मिकों को जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष सतर्कता सप्ताह मनाया जाता है । किन्तु  ये शासकीय प्रयास भ्रष्टाचार के उन्मूलन हेतु पर्याप्त नहीं हैं । तो क्या किया जाए जिससे व्यवस्था स्वच्छ हो एवं नागरिकों की समृद्धि से राष्ट्र वास्तविक अर्थों में समृद्ध कहला सके ?

सर्वप्रथम तो हम अपने आत्मबल को जागृत करें एवं स्वयं भ्रष्ट अथवा नियम-विरुद्ध आचरण से दूर रहें क्योंकि किसी पापी पर पहला पत्थर फेंकने का अधिकार उसी को है जिसने स्वयं कभी कोई पाप न किया हो । बालकों का चारित्रिक विकास करें जिससे उनकी बाल्यावस्था में ही एक आदर्श समाज की सुदृढ नींव रखी जा सके । कोई पिता अपने बालक से यह न कहे कि बेटा, दुनिया न गोल है, न चौकोर, दुनिया तो चार सौ बीस है । भ्रष्टाचार से पूर्ण असहयोग किया जाए, उसके साथ कभी किसी भी प्रकार का समायोजन न किया जाए । भ्रष्टाचार के संबंध में प्रत्येक  सूचना-प्रदाता (व्हिसल ब्लोअर) को सरकार पूर्ण संरक्षण प्रदान करे ताकि लोग भ्रष्टाचारियों से भयभीत न हों तथा निर्भय होकर अनुचित कार्यकर्लापों के विषय में सक्षम प्राधिकारियों को बिना किसी संकोच के सूचित करें ।

और अंतिम बात है व्यक्ति की अपनी अंतरात्मा । हम सबको धोखा दे सकते  हैं, अपने आप को नहीं । दुनिया की हर अदालत से ऊपर होती है इंसान के ज़मीर की अदालत जिससे कोई भी मुजरिम बरी नहीं हो सकता । ‘ऊपर की कमाई’ का प्रलोभन चाहे जितना बड़ा हो, यदि यह स्मरण रखा जाए कि वह तथाकथित ऊपर की कमाई किसी निर्दोष के ख़ून-पसीने की कमाई की लूट है तो ग़लत काम करते हुए हमारे हाथ अपने आप ही रुक जाएंगे । हमारे एक दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा जनकल्याण के कार्यों हेतु प्रेषित किए गए एक  रुपये में से मात्र पंद्रह पैसे ही वास्तविक लाभार्थियों तक  पहुँच पाते हैं । वह पूरा रुपया उन तक पहुँचे, इसके लिए  हमें सतर्क होना होगा – केवल दूसरों के आचरण के प्रति ही नहीं, अपने आचरण के प्रति भी । तभी देश के कोने-कोने में सच्ची समृद्धि आएगी । एक सतर्क भारत ही एक समृद्ध भारत का आधार बनेगा ।

© जितेन्द्र माथुर २०२० सर्वाधिकार सुरक्षित 


(यह लेख मैंने अपने नियोक्ता संगठन में आयोजित सतर्कता सप्ताह के अंतर्गत निबंध प्रतियोगिता की प्रविष्टि के रूप में लिखा था)