Monday, July 16, 2018

भारतीय कार्य-संस्कृति और व्यवस्था की कड़वी सच्चाई


जॉन अब्राहम द्वारा निर्मित तथा अभिनीत चर्चित हिन्दी फ़िल्म परमाणु को देखने का सौभाग्य मुझे तनिक विलंब से ही मिला जब इसे मेरे नियोक्ता संगठन भेल के क्लब में प्रदर्शित किया गया । फ़िल्म बहुत ही अच्छी निकली । मई १९९८ में पोखरण में किए गए परमाणु विस्फोट जिसने भारत को नाभिकीय शक्ति सम्पन्न देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया, की पृष्ठभूमि को इस फ़िल्म में फ़िल्मकार ने अपनी कल्पना का तड़का लगाकर मनोरंजक तथा प्रभावी स्वरूप में प्रस्तुत किया है तथा इसके माध्यम से वह दर्शक-वर्ग में राष्ट्रप्रेम तथा राष्ट्रीय कर्तव्य के प्रति निष्ठा की भावनाएं जगाने में भी सफल रहा है । फ़िल्म आद्योपांत दर्शक को बाँधे रखती है तथा उसके समापन पर वह अपने मन में राष्ट्र के सम्मान को सर्वोपरि रखने के ध्येय के साथ राष्ट्र के प्रति कर्तव्यपालन का भाव अनुभव करता है । फ़िल्म का तकनीकी पक्ष, अभिनय पक्ष तथा संगीत सभी सराहनीय हैं तथा कुल मिलाकर इसे निस्संदेह एक अच्छी फ़िल्म कहा जा सकता है ।
लेकिन जिस संदर्भ में इस फ़िल्म को एक कटु सत्य का उद्घाटन करने वाली आलोचनात्मक फ़िल्म कहा जा सकता है, वह है भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था एवं तंत्र तथा उसमें समाहित कार्य-संस्कृति का बिना किसी लाग-लपेट के बेबाक चित्रण । यद्यपि यह फ़िल्म परोक्ष रूप से तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री वाजपेयी जी का महिमामंडन-सी करती प्रतीत होती है, तथापि नेताओं एवं मंत्रियों के अधीन जो अफ़सर प्रशासनिक तंत्र की बागडोर संभाले होते हैं, उनकी सोच एवं काम करने के ढंग पर यह फ़िल्म एक करारा व्यंग्य है । यह फ़िल्म उस सम्पूर्ण कार्य-संस्कृति पर भी एक तीखा व्यंग्य है जिसमें अपनी निजी हित के अतिरिक्त प्रत्येक बात को अत्यंत हलके रूप में लिया जाता है चाहे वह कितने ही बड़े राष्ट्रीय अथवा सार्वजनिक हित से जुड़ी हो । 
फ़िल्म में नायक जो कि तकनीकी विशेषज्ञता रखने वाला एक युवा प्रशासनिक अधिकारी है, अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सम्मुख एक बैठक में देश की आणविक क्षमता को प्रतिपादित करने वाले एक परीक्षण का प्रस्ताव तथा उससे सम्बद्ध सम्पूर्ण योजना की रूपरेखा प्रस्तुत करता है । उसके उच्चाधिकारी न केवल उसका एवं उसकी बातों का उपहास करते हैं, बल्कि जिस फ़्लॉपी डिस्क में उसने अपनी विस्तृत कार्य-योजना को संरक्षित किया था, एक अधिकारी उसे चाय का कप रखने वाली तश्तरी की तरह काम में लेते हुए अपनी चाय का कप उसी पर रख देता है । बैठक की अध्यक्षता करने वाला उच्चाधिकारी उस पर मानो कोई अहसान-सा करते हुए उसे प्रधानमंत्री कार्यालय तक ले तो जाता है लेकिन प्रधानमंत्री से उसे नहीं मिलवाता और स्वयं ही प्रधानमंत्री से मिलकर (युवा अधिकारी के परिश्रम का श्रेय स्वयं लेने के लिए) सब कुछ तय कर लेता है । सम्पूर्ण योजना को पढ़ने का कष्ट तक ये वरिष्ठ एवं अनुभवी नौकरशाह नहीं करते और योजना के सबसे आवश्यक अंग गोपनीयता का कोई ख़याल नहीं रखा जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि जो कार्य पूर्णतः गुप्त रूप से बिना किसी को भनक तक लगे किया जाना था, उसकी ख़बर चौतरफ़ा हो जाती है । बिना तकनीकी दक्षता के किया गया वह परीक्षण असफल भी हो जाता है और देश की बदनामी होती है सो अलग । अब इस विफलता का ठीकरा फोड़ने के लिए एक बलि का बकरा भी चाहिए जो कि उसी निष्ठावान एवं कर्तव्यपरायण अत्यंत प्रतिभासम्पन्न युवक को बनाया जाता है जिसने परीक्षण से संबंधित विचार एवं योजना को प्रस्तुत किया था । उस निर्दोष एवं योग्य युवा अधिकारी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है । निकम्मी एवं क्रूर व्यवस्था का मारा वह देशप्रेमी युवा अपने देश के लिए यह परीक्षण तभी कर पाता है जब तीन वर्ष की अवधि के उपरांत शासन-प्रशासन में हुए कतिपय परिवर्तनों के कारण उसके भाग्य से उसे दूसरा अवसर मिलता है ।
फ़िल्म में दिखाई गई यह काल्पनिक कथा हमारे इस अभागे देश की निरंतर दृष्टिगोचर होने वाली वह कड़वी सच्चाई है जिससे क्षुद्र स्वार्थों के हाथों की कठपुतली बनी इस भ्रष्ट, काहिल एवं हृदयहीन व्यवस्था में वे चंद ईमानदार एवं प्रतिभाशाली व्यक्ति दिन-प्रतिदिन दो-चार होते हैं जो अपनी सम्पूर्ण निष्ठा एवं सम्पूर्ण क्षमता के साथ अपने देश के लिए कुछ सार्थक करना चाहते हैं । आए दिन प्रतिभा-पलायन का राग अलापने वाले शृगालों से कोई पूछे कि भारत से प्रतिभा-पलायन का वास्तविक कारण क्या है और क्या कोई उसे दूर करने में सचमुच रुचि रखता है । क्या प्रतिभा-पलायन का झूठा रोना रोने वाले नहीं जानते कि प्रतिभाओं को हमारी संवेदनहीन एवं उत्तरदेयताविहीन व्यवस्था किस प्रकार प्रताड़ित, हतोत्साहित एवं कुंठित करती है एवं उनका मनोबल पूरी तरह तोड़ देती है । ऐसे में या तो वे फ़िल्म के नायक की भाँति बलि के बकरे बन जाते हैं या फिर उसी निकम्मे, स्वार्थी एवं भ्रष्ट तंत्र के अंग बन जाते हैं जिससे जूझना अब उन्हें संभव नहीं लगता । इस तरह कीचड़ में कमल की तरह खिलने का स्वप्न देखने वाली इन कलियों को कीचड़ अपने ही रंग में रंग देता है । ऐसे प्रतिभावान एवं कुछ हटकर करने के इच्छुक युवाओं को बार-बार स्मरण कराया जाता है कि रोम में रहना है तो रोमनों जैसे बनकर रहो । यह कोई नहीं सोचता कि रोम में आने वाला प्रत्येक आगंतुक यदि वहाँ पहले से रह रहे रोमनों के ही रंग में रंगकर उनके जैसा ही बन जाएगा तो रोम में सुधार कैसे होगा ?
सार्वजनिक क्षेत्र की सेवा के उपक्रमों में वर्षों बिता देने के उपरांत मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि भारत की सरकारी कार्य-संस्कृति में तर्क, औचित्य एवं विवेकशीलता का कोई स्थान नहीं है । निष्ठापूर्वक कर्तव्यपालन, प्रतिभा एवं परिश्रम सभी पार्श्व में रहते हैं तथा सभी प्रकार के पुरस्कारों का वितरण रेवड़ियों की भाँति पहुँच के आधार पर किया जाता है । ताक़तवर कुर्सियों पर प्रायः वे ही पहुँचते हैं जो चापलूसी एवं तिकड़मबाजी में तेज़ हैं और कुर्सियां लेने के उपरांत वे अपने जैसे लोगों को ही शासकीय पदानुक्रम में आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं । जिसकी सत्ता के गलियारों में पहुँच है, वह सभी तरह के पुरस्कार ले लेता है और दंड से बच जाता है जबकि जिसकी ऐसी पहुँच नहीं है, उसे उसके परिश्रम का पुरस्कार तो नहीं ही मिलता है, साथ ही वह गाहे-बगाहे बलि का बकरा बना दिया जाता है । ऐसे सभी सुयोग्य एवं कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति परमाणु फ़िल्म के नायक की भाँति सौभाग्यशाली नहीं होते जिन्हें ज़िंदगी अपने आपको साबित करने का दूसरा मौका दे, अपने दिल पर पड़े असह्य भार से मुक्ति पाने का दुर्लभ सुअवसर दे । ऐसी वंचित प्रतिभाएं आजीवन मन मसोसकर रह जाने और अपने भाग्य को कोसने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पातीं । लेकिन यह दुर्भाग्य क्या केवल उन्हीं का है ? क्या यह इस राष्ट्र का दुर्भाग्य नहीं ? क्या सत्ता के शीर्ष पदों पर व्यवस्था को इस दृष्टिकोण से देख सकने वाले सही सोच से युक्त व्यक्ति कभी नहीं पहुंचेंगे ?

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Friday, July 13, 2018

डॉक्टर हाथी की ज़िंदगी और ज़िंदादिली


गुज़री नौ जुलाई को जब मैं सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित एक बहुत पुराने हिन्दी उपन्यास नौ जुलाई की रात पर अपना लेख लिख रहा था, तब मुझे शानो-गुमान भी नहीं था कि हिंदुस्तानी छोटे परदे के एक बहुत ही मक़बूल अदाकार डॉक्टर हाथी नहीं रहे थे । इंटरनेट से ही मैंने जाना कि उनका वास्तविक नाम कवि कुमार आज़ाद था अन्यथा उनके करोड़ों प्रशंसकों की ही तरह मैं भी उन्हें उनके स्क्रीन नेम डॉक्टर हंसराज हाथी के नाम से ही जानता था । दुख की बात है कि इतने लोकप्रिय कलाकार के निजी जीवन के विषय में इंटरनेट पर कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है । उनकी आयु तथा विवाहित एवं पारिवारिक जीवन के विषय में अलग-अलग साइटें विरोधाभासी तथ्य बता रही हैं । बहरहाल इतना तय है कि उनकी आयु अधिक नहीं थी और वे अल्पायु में ही दिवंगत हो गए ।
सब टी.वी. पर एक दशक से अभी अधिक समय से निरंतर प्रसारित हो रहे अत्यंत लोकप्रिय सिटकॉम तारक मेहता का उल्टा चश्मा में डॉक्टर हाथी के किरदार को जीने वाले इस बहुत मोटे लेकिन बेहद ज़िंदादिल अदाकार की इस अकाल मृत्यु से मुझे न केवल गहरा धक्का लगा बल्कि मुझे अपने पिता की याद हो गई जिनके देहावसान को पंद्रह वर्ष पूरे हो रहे हैं । मेरे पिता भी अपने स्वस्थ जीवनकाल में लंबे-चौड़े व्यक्तित्व के स्वामी थे जब तक कि मधुमेह के कारण अपने अंतिम वर्षों में उन्हें दुर्बलता ने नहीं घेर लिया । जीवन की समस्याओं और दुखों से दिन-प्रतिदिन जूझते हुए भी वे सदा हँसते-मुसकराते रहते थे । उनके ज़िंदादिली भरे ठहाकों और ऊंची आवाज़ से उनके आसपास का सारा वातावरण गूँजता रहता था । १९४४ में ही अध्यापक के रूप में नौकरी पर लग जाने के उपरांत वे लगभग सम्पूर्ण जीवन हमारे गृहनगर साम्भर झील (साम्भर लेक जो कि नमक की विश्वप्रसिद्ध झील है) में मोटे मास्टर साहब के नाम से जाने जाते रहे । उनके गुस्से से बहुत-से लोग उनसे नाराज़ हो जाते थे लेकिन उनकी साफ़दिली उस नाराजगी को दूर भी कर देती थी । पंद्रह जुलाई को उनका जन्मदिन पड़ता है और अपने जन्मदिन से एक दिन पहले चौदह जुलाई दो हज़ार तीन को उनका निधन हो गया । उनके अवसान के बाद मेरा अपने हँसना-मुसकराना बहुत कम हो गया लेकिन तब से अब तक मेरे मन में कई बार यही ख़याल आता है कि काश मैं उनकी तरह ज़िंदादिल होता क्योंकि अगर ऐसा होता तो ज़िंदगी की दुश्वारियों से दो-चार होने की जैसी कूव्वत उनमें थी, मुझमें भी होती ।

मैंने अपने परिवार के साथ तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखना २००८ में आरंभ किया था । प्रारम्भ में डॉक्टर हाथी की भूमिका एक दूसरे कलाकार (निर्मल सोनी) निभाते थे लेकिन कुछ समय के उपरांत ही कवि कुमार आज़ाद इस भूमिका में ले लिए गए । यथा नाम तथा गुण को चरितार्थ करते हुए इस धारावाहिक में डॉक्टर हाथी के चरित्र को एक अत्यंत मोटे व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया और इस कसौटी पर कवि कुमार आज़ाद पूरी तरह खरे उतरते थे । दो सौ किलो से भी अधिक वज़न वाले इस मोटे कलाकार ने किसी बालक की भाँति निर्दोष और निश्छल डॉक्टर हंसराज हाथी के रूप में एक दशक तक भारतीय दर्शकों को स्वस्थ मनोरंजन प्रदान किया । धारावाहिक में उन्हें एक उत्तर-भारतीय व्यक्ति बताया गया है जो पेशे से चिकित्सक है, धारावाहिक के अन्य स्थायी पात्रों के साथ गोकुलधाम नामक हाउसिंग सोसायटी में रहता है, कोमल नामक अपने जैसी ही एक भारी देह वाली महिला का पति है और वैसे ही मोटे गोली नामक एक बालक का पिता है । खाने-पीने के बेहद शौकीन तथा सदा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहने वाले इस किरदार में ज़िंदादिली कूट-कूटकर भरी है । कवि कुमार आज़ाद ने इस किरदार को बाख़ूबी निभाया और सम्पूर्ण देश में अपने वास्तविक नाम के स्थान पर डॉक्टर हाथी के रूप में ही जाने जाने लगे ।  
जैसे धारावाहिक में अपने नाम के अनुरूप वे हाथी जैसे व्यक्तित्व के स्वामी थे, वैसे ही वास्तविक जीवन में भी अपने नाम के अनुरूप वे एक (हिन्दी भाषा के) कवि थे । नाम और काम में ऐसा अद्भुत साम्य कम ही देखने को मिलता है । धारावाहिक में वे परदे पर आते ही अपनी छाप छोड़ देते थे । उनका सही बात है कहने का अंदाज़ कौन भूल सकता है ? एक अत्यंत सामान्य-सा यह वाक्य वे सहज भाव से ही बोलते थे लेकिन उनका बोलने का यह सहज स्वाभाविक ढंग ही सुनने वाले दर्शकों का दिल जीत लेता था । उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी अभिनय किया लेकिन अंततः उन्होंने डॉक्टर हाथी के चरित्र को ही आत्मसात् कर लिया था या यूँ कहा जाए कि इस चरित्र ने उन्हें आत्मसात् कर लिया था । उनके इस अकस्मात् और असमय ही  संसार छोड़ देने से जैसा आघात उनके साथी कलाकारों को लगा है, वैसा ही उनके अनगिनत चाहने वालों को भी लगा है । धारावाहिक के निर्माता असित कुमार मोदी ने उन्हें जो श्रद्धांजलि अर्पित की है (यह टी.वी. पर प्रसारित हुई है), वह सर्वथा उचित है ।

ऐसा कहा जा रहा है कि कवि कुमार आज़ाद को अभिनेता बनने के लिए प्रसिद्ध हास्य अभिनेत्री स्वर्गीया टुनटुन ने प्रेरित किया था । और जैसे उमा देवी नामक सुरीली आवाज़ वाली पार्श्व गायिका अपनी भारी देह के साथ हास्य-अभिनेत्री टुनटुन बन गईं, वैसे ही कवि कुमार आज़ाद नामक हिन्दी कवि अपने भारी शरीर के साथ डॉक्टर हाथी रूपी अभिनेता बन गए । जैसे टुनटुन की भारी देह बाद में उनको फ़िल्मों में भूमिकाएं मिलने का माध्यम बन गई, वैसे ही कवि कुमार आज़ाद का भारी शरीर आगे चलकर उन्हें अभिनय का काम दिलाने वाला ज़रिया बन गया । अब अपनी आजीविका के साधन से जैसे टुनटुन कभी मुक्ति नहीं पा सकीं, वैसे ही कवि कुमार आज़ाद भी नहीं पा सके । आजीविका कमाने की यह भी कितनी बड़ी विडम्बना है कि शारीरिक न्यूनताओं या दोषों को भी अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में सदा साथ रखना होता है और उनसे मुक्त होने के विषय में सोचा भी नहीं जा सकता चाहे वे प्राणों के लिए संकट ही क्यों न खड़ा कर दें । कवि कुमार आज़ाद का मोटापा ही अंततः उनके हृदयाघात और प्राणान्त का कारण  बना ।  

अपनी अभिनेता बनने की लगन के चलते घर से भागकर अभिनय के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले ज़िंदादिल कवि कुमार आज़ाद उर्फ़ डॉक्टर हाथी को मैं अपनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिनके साथ ही मुझे अपने पिता स्वर्गीय श्री सूरज नारायण माथुर की भी याद आ रही है जिनके बाह्य व्यक्तित्व में मेरे साथ कुछ भी उभयनिष्ठ (कॉमन) नहीं था क्योंकि उन्हें साहित्य, संगीत, सिनेमा या ललित कलाओं में कोई रुचि नहीं थी, वे तो प्रायः हिन्दी भी नहीं बोलते थे (वे राजस्थानी भाषा में ही बात करना पसंद करते थे) लेकिन भीतर से मैं उन्हीं के (और डॉक्टर हाथी के) जैसा ही हूँ – संवेदनशील और किसी के भी दुख-तकलीफ़ से पिघल जाने वाला जो पीड़ा सह सकता है, दे नहीं सकता; दूसरों के द्वारा ठगा जा सकता है, किसी को ठग नहीं सकता । काश उनकी ज़िंदादिली भी मुझे मिल गई होती तो ज़िन्दगी की जंग को लड़ना कुछ आसान होता मेरे लिए ! ख़ैर ... ।
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Monday, July 9, 2018

आख़िर क्या हुआ था उस रात को ? (पुस्तक समीक्षा : नौ जुलाई की रात)

मैं हिन्दी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, इस तथ्य से अब मेरे लेख एवं समीक्षाएं पढ़ने वाले सभी लोग परिचित हैं । सुरेन्द्र मोहन पाठक अपने उपन्यासों में समाज एवं सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों को टटोलते हैं लेकिन उनके नाम के साथ मिस्ट्री राइटर अथवा  रहस्यकथा लेखक का बिल्ला लग गया है । उन्होंने स्वयं कभी फ़िल्मों के लिए नहीं लिखा लेकिन फ़िल्मी दुनिया (और टी.वी. की दुनिया भी) तथा फ़िल्मी लोगों से जुड़ी तल्ख सच्चाइयों को उन्होंने अपने कई उपन्यासों के कथानकों में छुआ है । उनका ऐसा ही एक उपन्यास है – नौ जुलाई की रात जिसकी याद मुझे प्रत्येक वर्ष नौ जुलाई के दिन आ ही जाती है । आज भी आ गई और मेरी लेखनी इसी उपन्यास पर कुछ लिखने के लिए मचल पड़ी ।

नौ जुलाई की रात सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित सुनील सीरीज़ का उपन्यास है । यह उनकी ऐसी लोकप्रिय सीरीज़ है कि अब तक इसके अंतर्गत वे एक सौ बाईस उपन्यास लिख चुके हैं । इस सीरीज़ का नायक एक खोजी पत्रकार है जिसका नाम है सुनील कुमार चक्रवर्ती और जो ब्लास्ट नामक एक राष्ट्रीय समाचार-पत्र में नौकरी करता है । मूल रूप से बंगाली यह युवक अब ब्लास्ट की नौकरी के सिलसिले में राजनगर नाम एक उत्तर-भारतीय महानगर में रहता है और अपने पेशे के प्रति इतना समर्पित है कि दिन हो या रात, धूप हो या बरसात; जब भी उसे किसी सनसनीखेज़ सामग्री के मिलने की संभावना दिखाई दे, वह तुरंत अपने सूत्र का पीछा करते हुए निकल पड़ता है उस कहानी की तलाश में जो उसे उस सूत्र के अंतिम सिरे पर मिल सकती है और जो ब्लास्ट के पाठकों के लिए रोचक हो सकती है ।
नौ जुलाई की रात का आरंभ वस्तुतः नौ जुलाई के दस दिन बाद यानी कि उन्नीस जुलाई को होता है जबकि ब्लास्ट के कार्यालय में समाचार संपादक (न्यूज़ एडिटर) जो कि राय नाम का एक अधेड़ व्यक्ति है, को एक गुमनाम टेलीफ़ोन कॉल आती है । कॉल करने वाले से राय को यह पता चलता है कि नौ जुलाई की रात को शहर के रूपनगर नामक एक इलाके में चौदह नंबर की कोठी में से गोली चलने की आवाज़ आई थी । राय इस सूत्र को टटोलने और वास्तविकता, यदि कोई है, का पता लगाने का दायित्व उपन्यास के नायक सुनील को सौंपता है । और इसके साथ ही शुरू हो जाता है सुनील का ख़बरें सूंघने का काम ।

सुनील को पता लगता है कि चौदह नंबर की कोठी जवाहर चौधरी नामक एक प्रसिद्ध फ़िल्मी लेखक की है । कोठी तो उसे बंद मिलती है लेकिन पिछवाड़े के एक खुले दरवाज़े से उसे भीतर घुसने का मौका मिलता है तो वह भीतर जाकर देखता है और पाता है कि वहाँ कुछ समय पहले कोई पार्टी हुई थी जिसके बाद साफ-सफ़ाई करवाने से पहले ही कोठी के बाशिंदे कहीं चले गए थे । लेकिन सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथा चौंकाने वाला तथ्य उसे यह मिलता है कि एक कमरे में बिछे एक पलंग की चादर तथा उस कमरे से जुड़े स्नानघर में पड़े कुछ तौलियों पर खून के सूख चुके दाग हैं जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उस रात उस कोठी में निश्चय ही कोई गंभीर रूप से घायल हुआ था । कौन ? कैसे ? क्यों ? क्या हुआ था उस रात उस कोठी में ?

इन सवालों के माकूल जवाब ढूंढने के लिए सुनील अपनी खोजबीन शुरू करता है और उसके साथ-साथ उपन्यास के पाठक भी परत-दर-परत खुलते रहस्यों से रू-ब-रू होते हैं । सुनील फ़िल्मी दुनिया से जुड़े विभिन्न लोगों से मिलता है जिनमें जवाहर चौधरी के अतिरिक्त गौतम सान्याल नामक कला-निर्देशक (आर्ट-डायरेक्टर) तथा काली मजूमदार नामक अत्यंत प्रतिष्ठित फ़िल्म-निर्देशक सम्मिलित हैं । उसका वास्ता फ़िल्मों में नायिका बनने का स्वप्न लेकर आईं तथा क्षेत्र के दिग्गजों के हाथों की कठपुतली बन बैठी चंद युवतियों से भी होता है । पहले ही से गहराते इस रहस्य में बढ़ोतरी तब हो जाती है जब सुनील की नाक के नीचे ही रजनी बाला नामक ऐसी एक महत्वाकांक्षी युवती का क़त्ल हो जाता है । सुनील का साबका बैरिस्टर मंगल दास महंत नामक एक तिकड़मी वकील से भी पड़ता है जिसके दाव-पेच सुनील को ही नहीं, एक ईमानदार तथा निष्ठावान पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर प्रभुदयाल को भी उलझाकर रख देते हैं लेकिन अंत में सुनील मामले के सभी रहस्यों से परदा उठाकर वास्तविक अपराधी को कानून की पकड़ में ले आता है । 

नौ जुलाई की रात एक अत्यंत रोचक उपन्यास है जिसे एक बार पढ़ना शुरू कर देने के बाद बीच में छोड़ना किसी भी पाठक के लिए बेहद मुश्किल है । उपन्यास कोई अधिक लंबा नहीं है और आदि से अंत तक पढ़ने वाले को बाँधे रखता है । उपन्यास कोई चार दशक पहले लिखा गया था जब टी.वी. के धारावाहिकों का ज़माना नहीं आया था और रूपहले परदे की चकाचौंध से भरी दुनिया का हिस्सा केवल फ़िल्में ही थीं । लेकिन रूपहले परदे की चमक के पीछे का जो अंधेरा फ़िल्मी दुनिया में है, उससे टी.वी. के धारावाहिकों की दुनिया जिसका आग़ाज़ भारत में अस्सी के दशक में हुआ था, भी अछूती नहीं है । गाँव-खेड़ों से निकलकर नाम-दाम कमाने की इच्छुक युवतियों पर घर से भागने के बाद क्या बीतती है, यह उपन्यास में बहुत प्रभावी ढंग से दर्शाया गया है । ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उपन्यास तथा इस सीरीज़ के नायक सुनील का चरित्र लेखक ने प्रारम्भ से ही ऐसा गढ़ा है कि वह अत्यंत संवेदनशील है और सदा ज़रूरतमंदों की मदद के लिए ही नहीं वरन भटके हुओं को रास्ता दिखाने के लिए भी तैयार रहता है ।

मैं आज नौ जुलाई सन दो हज़ार अट्ठारह के दिन हिन्दी उपन्यास नौ जुलाई की रात को पढ़ने की अनुशंसा उन सभी हिन्दी पाठकों के लिए करता हूँ जो रहस्यकथाओं को पढ़ने में रुचि रखते हैं । कोई चार दशक पहले लिखे गए इस उपन्यास की विषय-वस्तु आज भी प्रासंगिक है तथा इसे पढ़कर किसी को भी कोई खेद नहीं होगा ।
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