सोमवार, 19 अप्रैल 2021

शर्तों पर प्रेम ?

सलमान ख़ान को प्रमुख भूमिका में प्रस्तुत करती हुई फ़िल्म 'सुल्तान' की मैंने बहुत प्रशंसा सुनी और पढ़ी थी लेकिन इसे देखने का अवसर कुछ विलंब से ही मिल पाया जब इसे मेरे नियोक्ता संगठन (भेल) के क्लब में प्रदर्शित किया गया । कहानी के प्रस्तुतीकरण के उद्देश्य की पूर्ति हेतु फ़िल्म के लेखक एवं निर्देशक द्वारा ली गई अनेक छूटों के बावजूद यह फ़िल्म जिस प्रकार सामान्य दर्शकों एवं स्थापित समीक्षकों को अच्छी लगी थी, उसी प्रकार मुझे भी अच्छी लगी । जीवन में पराजित एवं निराश हो चुके नितांत एकाकी एवं अवसादग्रस्त व्यक्तियों के लिए बड़ा प्रेरणास्पद संदेश है इस फ़िल्म में - किसी और से नहीं, अपने से जीतो; किसी और के लिए नहीं, अपने लिए जीतो; किसी और की दृष्टि में उठने से पूर्व अपनी दृष्टि में उठो । यह फ़िल्म सहज ही अनेक स्थलों पर मेरे हृदय को स्पर्श कर गई, अपने संदेश को मेरे हृदय-तल पर ले जाकर उसे वहाँ सदा के लिए स्थापित कर गई ।

लेकिन इस अत्यंत प्रभावशाली तथा किसी भी फ़िल्म की गुणवत्ता के मूल्यांकन के सभी मानकों पर खरी उतरने वाली इस फ़िल्म में एक ऐसी बात मैंने पकड़ी जो संभवतः किसी भी और समीक्षक ने या तो पकड़ी नहीं या पकड़कर भी उसे महत्व नहीं दिया । इस फ़िल्म में नायक को नायिका से सच्चे मन से प्रेम करते हुए दिखाया गया है जो नायिका का हृदय जीतने के लिए ही अपने निरर्थक तथा संसार की दृष्टि में हास्यास्पद जीवन को एक दिशा, एक सार्थकता प्रदान करने का निर्णय लेता है । इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु वह नायिका की ही भाँति एक पहलवान बनता है एवं कुश्ती के खेल में सफल हो चुकने के उपरांत नायिका की सहमति से उसे जीवन-संगिनी के रूप में प्राप्त करता है । उसके जीवन में दुखद मोड़ तब आता है जब अपनी गर्भवती पत्नी के मना करने पर भी वह विश्व चैम्पियनशिप में भाग लेने के लिए जाता है एवं उसकी अनुपस्थिति में नायिका के गर्भ से उत्पन्न उसकी संतान रक्ताल्पता के कारण बच नहीं पाती । नायिका नवजात शिशु के न बच पाने के लिए नायक को दोषी ठहरा कर उसे छोड़ देती है तथा वह पूर्णतः एकाकी एवं अवसादग्रस्त हो जाता है । चूंकि उसकी संतान अपने समूह का रक्त न मिल पाने के कारण नहीं बच सकी थी, अब उसकी एकमात्र अभिलाषा अपने आवासीय क्षेत्र में एक रक्त-बैंक स्थापित करने की है जिसे वह अपने कथित पाप के प्रायश्चित्त के रूप में देखता है । किन्तु कुश्ती छोड़ देने के कारण उसके पास आय का कोई समुचित साधन नहीं रहता तथा उसका लक्ष्य उससे आकाश-कुसुम की भाँति तब तक दूर रहता है जब तक वह इसी उद्देश्य के निमित्त पुनः कुश्ती से नाता जोड़कर एक पेशेवर प्रतिस्पर्द्धा में भाग नहीं लेता । अंत में उसे ठुकरा चुकी नायिका पुनः उसका हाथ थाम लेती है एवं उनके सुखी गृहस्थ-जीवन का नवीन आरंभ होता है ।

फ़िल्म देखकर मेरे मन में जो प्रश्न उठा, वह यह था कि नायक को तो नायिका से प्रेम था लेकिन नायिका को किससे प्रेम था - नायक के व्यक्तित्व एवं उसमें निहित एक सच्चे प्रेमी से या फिर नायक की भौतिक सफलता से ? नायक के सफल न होने तक तो नायिका न केवल उसके प्रेम को ठुकराती है, वरन उसे यथोचित सम्मान भी नहीं देती लेकिन जैसे ही वह भौतिक सफलता के सांसारिक मानदंड पर खरा उतरकर दिखा देता है, वैसे ही नायिका उसके प्रणय-निवेदन को स्वीकार कर लेती है (यह स्वीकृति भी फ़िल्म में नायिका द्वारा यूं करते हुए दिखाया गया है मानो वह नायक पर कोई उपकार कर रही हो) । अर्थात् नायिका की न तो एक नारी के रूप में नायक रूपी पुरुष के प्रति कोई भावनाएं हैं और न ही वह एक पुरुष के रूप में अपने प्रति उसकी भावनाओं को कोई महत्व देती है । उसके लिए महत्वपूर्ण है तो केवल नायक की भौतिक सफलता । लेकिन यह प्रेम तो नहीं । यह तो सांसारिकता है । सारा संसार ही सफलता की पूजा करता है । ऐसे में नायिका ने ही क्या अलग किया ?

नायिका का फ़िल्म में सदा यही दृष्टिकोण दिखाया गया है कि नायक उसकी इच्छानुरूप ही चले, अपनी इच्छानुरूप नहीं । उसे कहीं पर भी स्वयं की किसी भूल को अनुभव करते या स्वीकार करते हुए नहीं बताया गया है । वह ओलंपिक से पूर्व गर्भवती हो जाती है तो ओलंपिक में भाग न लेकर एवं नायक की प्रसन्नता के लिए संतान को जन्म देने का निर्णय लेकर अपने इस निर्णय को नायक के प्रति त्याग (या उस पर किए गए उपकार) के रूप में प्रदर्शित करती है लेकिन जब उसे ओलंपिक में भाग लेना था तो संभावित गर्भधारण को रोकने के लिए वह स्वयं भी तो सचेत रह सकती थी (जैसा कि उसके पिता भी अनुभव करते हैं) । लेकिन अपने इस कथित त्याग का उसे प्रतिदान इस रूप में चाहिए कि जब उसके प्रसव का समय निकट आए तो नायक भी त्याग करते हुए विश्व कुश्ती प्रतियोगिता में भाग न ले । क्या प्रेम और त्याग व्यापार के सिद्धांतों पर किए जाते हैं ? नायक विश्व कुश्ती प्रतियोगिता में न जाकर उसके प्रसव के समय में उसके निकट रहकर क्या कोई महान कार्य करता ? नायक उसी के प्रेम के लिए पहलवान बना था और उसकी सभी सफलताओं से वह प्रसन्न थी लेकिन अब वह चाहती है कि वह उसी की इच्छा का मान रखने के लिए विश्व चैम्पियनशिप में भाग न ले । भौतिक सफलता प्राप्त करने के उपरांत फ़िल्म के नायक-नायिका पर्याप्त धनी एवं साधन-सम्पन्न हो चुके दिखाए गए हैं, ऐसे में नवजात शिशु से जुड़ी सभी संभावनाओं एवं आवश्यकताओं का ध्यान नायक की अनुपस्थिति में भी रखा जा सकता था (नायिका के पिता वहीं पर थे) । उसकी संतान रक्ताल्पता के कारण जी नहीं सकी, इसके लिए वह नायक को उत्तरदायी ठहराकर उसे छोड़ देती है । अंत में नायक के पास लौटकर भी वह अपने इस कार्य को यह कहकर न्यायोचित ही ठहराती है कि संतान के लिए माता का दर्द पिता से अधिक होता है । मुझे उसकी यह बात सत्य होते हुए भी अपनी भूल को न मानने एवं नायक को त्यागने को न्यायोचित सिद्ध करने का कुतर्क ही लगी । नायक उसके प्रति अपने प्रेम के कारण ही नियमित रूप से दरगाह जाता रहता है जहाँ वह आती है ताकि वह उसे देख सके । अंत में नायिका उसे बताती है कि वह भी इसीलिए नियमित रूप से दरगाह जाती थी ताकि वह उसे देख सके । यदि ऐसा ही था तो पूरे आठ वर्षों तक नायक के प्रेम को अपने नयनों से देखने के उपरांत भी उसका हृदय पिघला क्यों नहीं ? क्या पत्थरदिल होना ही नारी-शक्ति का प्रतीक है ? वह नायक के रक्त-बैंक स्थापित करने के पावन लक्ष्य को भी कहीं कोई महत्व देती हुई दिखाई नहीं देती । अंत में नायक के पास वह लौटती भी है तो तब जब वह सभी विपरीत परिस्थितियों के मुख मोड़ता हुआ शक्तिशाली प्रतिस्पर्द्धियों को परास्त करते हुए पेशेवर प्रतियोगिता को जीतने के निकट पहुँचता है । यानी नायक के पास सफलता लौटी तो नायिका भी लौट आई और जब वह असफल व एकाकी था तो नायिका ने भी मुँह मोड़ रखा था । इससे यही सिद्ध हुआ कि नायिका को प्रेम नायक से नहीं उसकी सफलता से रहा ।

फ़िल्म में नायिका की भूमिका अनुष्का शर्मा ने निभाई है । उन्होंने ठीक ऐसी ही भूमिका एक दशक पूर्व आई फ़िल्म 'बैंड बाजा बारात' में भी निभाई थी । उस फ़िल्म को भी भारी व्यावसायिक सफलता मिली थी एवं उसका गुणगान विभिन्न लेखों में कुछ इस प्रकार किया गया था मानो वह कोई महान फ़िल्म हो । 'बैंड बाजा बारात' में भी उनके नायक (रणवीर सिंह) ने केवल उनके निकट रहने तथा उनका हृदय जीतने के लिए ही उनके साथ वैवाहिक प्रबंधक (वेडिंग प्लानर)  बनने के व्यवसाय में उनके साथ कदम रखा था एवं उसके बाद पग-पग पर उनका साथ निभाया था । उस व्यवसाय को छोटे पैमाने से उठाकर बड़े पैमाने पर ले जाने में भी नायक की ही प्रेरणा एवं विश्वास की मुख्य भूमिका रही थी । उस फ़िल्म में भी नायिका अपने सिद्धांतों एवं व्यवहार को नायक पर थोपती ही रही थी । वैसे तो मैं नहीं मानता कि कोई भी नारी अपने को प्रेम करने वाले पुरुष के निकट संपर्क में रहते हुए उसकी भावनाओं से अनभिज्ञ रह सकती है लेकिन यदि नायिका नायक की भावनाओं से अनभिज्ञ रही भी तो जब उसे उसके प्रति स्वयं अपनी भावनाओं का पता चला, तब तो उसका दृष्टिकोण बदल सकता था । उसने नायक से कहा था कि 'जिसके साथ व्यापार करो, उससे कभी न प्यार करो' के सिद्धान्त पर अमल करे एवं उसके निकट आने का प्रयास न करे और नायक ने उसकी यह बात उसके प्रति अपनी भावनाओं को अपने मन में ही दबाकर मानी । लेकिन जब वह स्वयं नायक से प्रेम कर बैठी तो अब वह चाहती थी कि नायक उस कथित सिद्धान्त का उल्लंघन करके उसके प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करे । अर्थात् नायक किसी सामान्य पुरुष की भांति नहीं उसके हाथों की कठपुतली की भाँति व्यवहार करे । और जब नायक ऐसा नहीं कर पाता (या उसके एकतरफ़ा नज़रिए को ठीक से नहीं समझ पाता) तो वह नायक को अपने व्यवसाय तथा कार्यालय से अपमानित करके निकाल देती है । यह प्रेम है या कृतघ्नता ? फिर भी अंत में उनका पुनर्मिलन दिखाया गया है । मैं नहीं समझ सका कि अपने प्रति ऐसा अपमानजनक एवं कृतघ्नतापूर्ण व्यवहार करने वाली तथा अपनी भावनाओं को कभी भी सम्मान न देने वाली ऐसी नायिका के साथ नायक कैसे प्रेमपूर्वक जीवन बिता सकेगा विशेष रूप से तब जबकि नायिका को अपने किए का कोई पछतावा भी नहीं है ?

स्त्री-पुरुष समानता में मेरा दृढ़ विश्वास है लेकिन यह समानता सबसे अधिक प्रेम के क्षेत्र में होती है क्योंकि सच्चा प्रेम लिंग-भेद से ऊपर होता है । मुझे 'बैंड बाजा बारात' तथा 'सुल्तान' जैसी फ़िल्मों में यह देखकर दुख हुआ कि नारी-उत्थान एवं नारी-शक्ति के नाम पर नारी के एकांगी दृष्टिकोण तथा पुरुष के प्रति अवहेलनापूर्ण व्यवहार को स्थापित किया गया है एवं उसे न्यायोचित ठहराया गया है । हिन्दी फ़िल्मों में ऐसा पहली बार १९९९ में प्रदर्शित 'हम आपके दिल में रहते हैं' नामक फ़िल्म में किया गया था । ऐसा लगता है कि जिस तरह कुछ दशकों पूर्व तक की भारतीय फ़िल्में पुरुष-प्रधान दृष्टिकोण के आधार पर बनाई जाती थीं जिनमें नारी को नीचा दिखाते हुए पुरुष दर्शकों के अहं को संतुष्ट किया जाता था, वैसे ही अब भारतीय फ़िल्में नारी-प्रधान दृष्टिकोण से बनाई जाती हैं जिनमें पुरुष को नीचा दिखाते हुए (कथित आधुनिक) स्त्री दर्शकों के अहं को संतुष्ट करने का लक्ष्य साधा जाता है । लेकिन नर-नारी का पारस्परिक प्रेम तो दोनों में से किसी को भी नीचा दिखाने में निहित नहीं । सच्चा प्रेम दूसरे के दृष्टिकोण को समझने में है, अपने दृष्टिकोण को दूसरे पर आरोपित करने में नहीं । किसी से सच्चा प्रेम वह करता (या करती) है जो विभिन्न बातों को अपने प्रियतम के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता (या करती) है । अपने प्रिय के दृष्टिकोण एवं भावनात्मक आवश्यकता को समझना एवं तदनुरूप अपने आचरण को निर्धारित करना ही निस्वार्थ प्रेम है । 'सुल्तान' फ़िल्म में नायिका का यह दृष्टिकोण केवल एक दृश्य में दिखाई देता है जब उसे अपने गर्भवती होने का पता चलता है एवं वह नायक के पिता बनने की प्रसन्नता को अपने ओलंपिक में भाग लेने एवं पदक जीतने के लक्ष्य पर वरीयता देती है ।

'सुल्तान' फ़िल्म के आरंभिक भाग में में जब नायिका नायक को उसके किसी भी योग्य न होने का ताना देती है एवं कहती है कि स्त्री उस पुरुष से कैसे प्रेम कर सकती है जिसे वह सम्मान न दे सके तो मुझे महान साहित्यकार एवं स्वतन्त्रता सेनानी यशपाल जी के कालजयी उपन्यास 'झूठा-सच' की याद आ गई जिसमें यही बात कुछ भिन्न शब्दों में कही गई है - 'स्त्री सदैव पुरुष को अपने से बेहतर ही देखना चाहती है, वह उसी को अपना हृदय अर्पित करना सार्थक समझती है जो उसे अपने से बेहतर लगे' । मैं यशपाल जी के दृष्टिकोण से सहमत हूँ लेकिन मेरा प्रश्न यही है कि सम्मान किसका होना चाहिए - पुरुष के गुणों तथा स्त्री के प्रति उसकी भावनाओं का या फिर पुरुष की भौतिक सफलता का ? यदि स्त्री के लिए पुरुष की भौतिक सफलता ही सम्मान-योग्य है, पुरुष के वास्तविक गुण तथा उसका सच्चा प्रेम नहीं तो फिर स्त्री की स्वीकृति एवं समर्पण न तो सम्मान है और न ही प्रेम । वह तो सौदा है । और प्यार में सौदा नहीं होता । प्यार तो प्रिय को उसके गुण-दोषों के साथ यथावत् स्वीकार करने में है, उसे बलपूर्वक परिवर्तित करने में नहीं । न तो प्रेम शर्तों पर किया जा सकता है और न ही किसी को सम्मान देने के लिए उसकी भौतिक सफलता को शर्त बनाया जाना उचित है । मैंने 'आशिक़ी २' नामक अत्यंत प्रभावशाली फ़िल्म देखकर अनुभव किया था कि हृदय के तल से किया गया वास्तविक प्रेम भी स्वार्थी हो सकता है यदि वह प्रेयस या प्रेयसी की वास्तविक इच्छाओं एवं भावनाओं को समझे बिना उस पर अपनी आकांक्षाओं को आरोपित करते हुए किया जाए । उस फ़िल्म में नायक द्वारा नायिका को अपने से मुक्ति देने हेतु किया गया आत्मघात भी वस्तुतः उसकी स्वार्थपरता ही है क्योंकि ऐसा वह नायिका की वास्तविक भावनाओं एवं प्रसन्नता के स्रोत को समझे बिना अपने एकांगी दृष्टिकोण के आधार पर करता है । आवश्यक तो नहीं कि जिसे आप अपने प्रिय के लिए ठीक समझते हों, आपका प्रिय भी उसी को अपने लिए ठीक समझे । उसकी वास्तविक प्रसन्नता किसी और बात में भी हो सकती है । और आपके प्रेम की सत्यता की कसौटी यही है कि आप उस तथ्य को जानने एवं आत्मसात् करने का प्रयास करें ।

निजी अनुभव से मैं जानता हूँ कि सम्मान प्रेम से पहले आता है और बात चाहे पुरुष की हो या नारी की, प्रेम उसी से किया जा सकता है जिसे आप अपने हृदय में सम्मान भी देते हों । लेकिन प्रेम एवं सम्मान जैसी उदात्त भावनाएं सांसारिक सफलता पर निर्भर नहीं होनीं चाहिए । प्रेम एवं सम्मान की अर्हता स्थापित करने के लिए यह मानदंड उचित नहीं है क्योंकि सांसारिक दृष्टि से असफल व्यक्ति भी वस्तुतः गुणी हो सकता है एवं अवगुणी व्यक्ति भी भौतिक रूप से अत्यंत सफल हो सकता है । मूल्य प्रेमी के मन में अपने प्रति विद्यमान भावनाओं का होना चाहिए, न कि उसकी भौतिक उपलब्धियों का । व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रेम का पर्यायवाची नहीं हो सकता क्योंकि प्रेम हृदय करता है, मस्तिष्क नहीं । जो सशर्त है, वह और कुछ भी हो सकता है लेकिन प्रेम नहीं । मैं 'सुल्तान' फ़िल्म के नायक के स्थान पर होता तो फ़िल्म के अंत में अपने पास लौटने वाली नायिका को फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' में स्वर्गीय मुकेश जी द्वारा गाया गया अमर गीत सुनाते हुए कहता - 'कोई शर्त होती नहीं प्यार में मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया . . . ।'

© Copyrights reserved

रविवार, 18 अप्रैल 2021

विरह-वेदना की सरिता

हिन्दी के महान कवि सुमित्रानंदन पंत जी की अमर पंक्तियाँ हैं – वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, निकलकर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान । सत्य ही यह अपने प्रिय से बिछुड़ने की पीड़ा ही तो है जो अमर कविताओं और गीतों को जन्म देती है । वियोग की पीड़ा ही ऐसी कालजयी रचनाओं के जन्म से पूर्व की प्रसव पीड़ा का कार्य करती है । यह पीड़ा ही वह मूल्य है जो अमर कृतियों के रचयिताओं को अपने निजी जीवन में चुकाना पड़ता है । ऐसे ही एक विरही की घनीभूत पीड़ा से उद्भूत भावों का सागर है महाकवि कालीदास द्वारा संस्कृत में रचित खंड-काव्य मेघदूतम और उस काव्य को आधार बनाकर सृजित चित्रों की एक शृंखला प्रस्तुत है संप्रति समीक्षित पुस्तक मेघदूत-चित्रण में । मेघदूत-चित्रण एक विलक्षण पुस्तक है जिसमें विरह-वेदना दो पृथक-पृथक स्वरूपों में उपस्थित है – शब्दों में एवं चित्रों में । इसके सर्जक हैं पारंपरिक राजस्थानी शैली में बनाए गए अपने चित्रों के लिए देश-विदेश में ख्याति प्राप्त मूर्धन्य भारतीय चित्रकार स्वर्गीय कन्हैयालाल वर्मा ।

मूल रूप से एक शिक्षक तथा अपना सम्पूर्ण जीवन चित्रकला की साधना को समर्पित करने वाले कन्हैयालाल वर्मा ने महाकवि के अमर काव्य पर चौंतीस चित्रों की एक शृंखला तैयार की है जो समीक्षित पुस्तक में इस प्रकार प्रस्तुत की गई है कि दाईं ओर के पृष्ठ पर चित्र है जबकि बाईं ओर के पृष्ठ पर उस चित्र से संबंधित  संस्कृत का मूल श्लोक, उसकी स्वयं चित्रकार द्वारा हिन्दी भाषा में की गई सुंदर व्याख्या एवं उस व्याख्या का अंग्रेज़ी अनुवाद दिया गया है । अपने ढंग की यह एकमात्र पुस्तक साहित्य-प्रेमियों तथा कला-प्रेमियों के हृदय को विजय करने में पूरी तरह सक्षम है ।

मेघदूतम अथवा मेघदूत की कथा कैलाश पर्वत के समीप बताई गई अलकापुरी नगरी के राजा कुबेर के सेवक यक्ष के प्रेम एवं विरह की कथा है । अपनी प्रेयसी के प्रेम में उन्मत्त यक्ष द्वारा अपने कर्तव्य-निर्वहन में हुई त्रुटि का दंड उसे रामगिरी पर्वत पर निर्वासन के रूप में मिलता है । विरह-विदग्ध यक्ष जैसे-तैसे समय व्यतीत करता है किन्तु आषाढ़ माह अर्थात वर्षा ऋतु के आगमन पर उसकी वेदना सहिष्णुता की सभी सीमाओं को तोड़ने लगती है और वह अपनी दूर बैठी प्रेयसी तक प्रेम-संदेश पहुंचाने को आतुर हो उठता है । वह आकाश में स्थित एक मेघ को अपना दूत बनाकर उसे अपना संदेश देता है और उसे अलकापुरी स्थित अपनी प्रिया तक ले जाने की प्रार्थना करता है । इसी संदेश का विस्तार है कालीदास का काव्य और इसी का अंकन है वर्मा के सौन्दर्य-बोध से ओत-प्रोत चित्रों में ।

मेघदूत खंड-काव्य दो भागों में बंटा है – १. पूर्वमेघ, २. उत्तरमेघ । वर्मा ने पूर्वमेघ पर उन्नीस चित्र बनाए हैं जो कि रामगिरी से अलकापुरी के पथ का वर्णन करते हैं । उत्तरमेघ पर उन्होंने पंदरह चित्र बनाए हैं जो कि यक्ष की विरह-विदग्धा प्रेयसी श्यामा की अवस्था तथा यक्ष द्वारा उसे भेजे जा रहे प्रेम-संदेश का वर्णन करते हैं । वर्मा के कतिपय चित्र स्त्री के सौंदर्य तथा स्त्री-पुरुष के प्रेम को तो दर्शाते हैं किन्तु उनमें अश्लीलता लेशमात्र भी नहीं है । सौंदर्य-बोध एवं अश्लीलता के मध्य की क्षीण सीमा-रेखा को वर्मा की तूलिका भली-भांति पहचानती है । वर्मा की चितपरिचित पारंपरिक राजस्थानी शैली में बनाए गए इन चित्रों में रंग संयोजन भी उत्कृष्ट एवं सुरुचिपूर्ण है । इन चित्रों में रचा-बसा सौंदर्य कला-प्रेमी के नेत्रों को भी ठण्डक पहुंचाता है एवं उसके हृदय को भी ।

प्रत्येक चित्र पर संबंधित संस्कृत श्लोक चित्रकार की अत्यंत सुंदर लिखावट में दिया गया है । वर्मा ने प्रत्येक श्लोक की व्याख्या हिन्दी भाषा में तत्सम शब्दों का अद्भुत चयन करते हुए की है जो कि यह दर्शाता है कि वे एक उच्च कोटि के चित्रकार होने के साथ-साथ भाषा एवं साहित्य का भी विशद ज्ञान रखते थे । हिन्दी न जानने वाले पाठकों की सुविधा के लिए इस व्याख्या का अंग्रेज़ी अनुवाद भी साथ में दिया गया है जो रूपनारायण काबरा ने किया है । वर्मा ने पुस्तक के आरंभ में दिए गए प्राक्कथन में इन चित्रों के सृजन की पृष्ठभूमि तथा महाकवि के अमर काव्य के प्रति अपनी समझ एवं दृष्टि का विवेचन प्रस्तुत किया है । हिन्दी में लिखे गए इस प्राक्कथन का भी अंग्रेज़ी अनुवाद साथ ही दिया गया है ।

चित्रकला एवं साहित्य का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती मेघदूत-चित्रण एक ऐसी अनुपम पुस्तक है जो कला एवं साहित्य के प्रेमियों को अवश्य पढ़नी एवं संगृहीत करके रखनी चाहिए । मेघदूत-चित्रण के पृष्ठों की यात्रा इस शाश्वत सत्य को रेखांकित करती है कि प्रेम का आनंद और विरह की वेदना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । विरह की वेदना क्या होती है, यह वही जानता है जो किसी को हृदय की गहनता से प्रेम करता है ।

© Copyrights reserved


शनिवार, 17 अप्रैल 2021

राजनगर : हिंदी जासूसी उपन्यासों के संसार का एक कल्पित किन्तु लोकप्रिय नगर

भारत में एक ही नाम के कई नगर या कस्बे मिल जाना एक सामान्य बात है । ऐसा ही एक नाम राजनगर है । हमारे देश में राजनगर नाम के कई नगरकस्बे और विधानसभा क्षेत्र हैं । राजनगर आपको छत्तीसगढ़ में भी मिलेगाबिहार में भीओडिशा में भीराजस्थान में भीपश्चिम बंगाल में भी । यहाँ तक कि बांग्लादेश में भी एक राजनगर है । लेकिन मेरा यह लेख राजनगर नामधारी वास्तविक स्थानों के सम्बन्ध में नहीं है बल्कि एक काल्पनिक राजनगर के सम्बन्ध में है जिसे पिछली आधी शताब्दी से भी अधिक समय से हिंदी में लुगदी साहित्य के नाम से सस्ता और लोकप्रिय गल्प रचने वाले लेखकों ने अपनी रचनाओं (उपन्यासों) में बड़ी उदारता से स्थान दिया है और उसके विभिन्न स्थलों का ऐसा सजीव वर्णन किया है मानो वह भारत के नक़्शे पर स्थित कोई वास्तविक नगर हो । संयोगवश ऐसी लगभग सभी रचनाएं जासूसी कथा साहित्य अथवा रहस्यकथाओं की श्रेणी में आती हैं । वैसे तो राज कॉमिक्स से प्रकाशित होने वाली कॉमिक पुस्तकों में भी विभिन्न पात्रों के कार्यकलापों का स्थल राजनगर ही है लेकिन इस लेख की विषय-वस्तु मैंने राजनगर को घटनाओं के केंद्र में रखने वाले लोकप्रिय उपन्यासों तथा उनके रचयिताओं को बनाया है । 

पहले वेद प्रकाश काम्बोज ऐसे उपन्यास अपनी विजय-रघुनाथ सीरीज़ के अंतर्गत लिखते थेबाद में स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा अपनी विजय-विकास सीरीज़ में राजनगर का चित्रण करने लगे । सत्तर का दशक बीतने के बाद जासूसी उपन्यासों के क्षितिज पर दो ही नाम छाए हुए थे – वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक । वेद जी के निधन के उपरांत अब केवल पाठक साहब ही हैं जो हिंदी में इस विधा के झंडाबरदार के रूप में कायम हैं और अपनी सुनील सीरीज़ के माध्यम से पाठक वर्ग को राजनगर नामक काल्पनिक नगर से जोड़े हुए हैं । लेकिन २०१६ में इस आकाश पर एक नया सितारा भी उभर कर आया – कँवल शर्मा जिनके पहले ही उपन्यास ‘वन शॉट’ ने हिंदी में लुप्तप्राय होते जा रहे लुगदी साहित्य (या पल्प फ़िक्शन) की लोकप्रियता को फिर से परिभाषित किया । और कँवल शर्मा ने भी अपने पदार्पण उपन्यास में घटनाक्रम का आधार उसी कल्पित राजनगर को बनाया जिससे कि हिंदी जासूसी साहित्य पढ़ने वाले पुराने पाठक अपने हाथ के पृष्ठ भाग की भाँति परिचित हो चुके हैं ।

 

मैं खेद के साथ लिख रहा हूँ कि मैंने एक ज़माने के अत्यंत लोकप्रिय जासूसी उपन्यासकार वेद प्रकाश काम्बोज का अब तक कोई उपन्यास नहीं पढ़ा है लेकिन उनके उत्तराधिकारी वेद प्रकाश शर्मा के और उनके समकालीन सुरेन्द्र मोहन पाठक के लगभग सभी उपन्यास पढ़े हैं । हिंदी जासूसी कथा-साहित्य के सिरमौर रहे इन दोनों ही उपन्यासकारों ने राजनगर के भूगोल को अपने-अपने ढंग से गढ़ा । इन दोनों ने ही इस कल्पित नगर के आसपास के तथा इससे सड़करेल या वायु मार्ग से जुड़े हुए नगरों के नाम भी कल्पित ही रखे हैं । नवोदित उपन्यासकार कँवल शर्मा ने भी राजनगर को एक काल्पनिक नगर ही रखा हैअतः उसके भीतर के उल्लिखित स्थान (जहाँ कि उपन्यास की घटनाएं घटित होती हैं) भी स्वभावतः काल्पनिक ही हैं । कँवल जी ने ‘अपने  राजनगर’ में जिन जगहों को खास तवज्जो के काबिल माना हैवे हैं – पलटन बाज़ाररॉयाल एस्टेट और पूर्वा इलाही बक्श ।

 

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने वेद प्रकाश काम्बोज की विजय-रघुनाथ सीरीज़ में विकास नाम का एक नवीन पात्र सृजित करके उसे विजय-विकास सीरीज़ के रूप में ढाला  विजय-विकास भारतीय सीक्रेट सर्विस के लिए काम करने वाले सरकारी जासूस हैं और राजनगर में रहते हैं । राष्ट्रहित के काम करने के लिए वे चाहे सारी दुनिया में घूमते रहें लेकिन उनका स्थाई ठिकाना राजनगर ही है । यहीं विकास के पिता और विजय के मित्र पुलिस सुपरिटेंडेंट रघुनाथ भी अपनी धर्मपत्नी (जो  विजय की चचेरी बहन है) रैना के साथ रहते हैं और विजय के पिता इंस्पेक्टर जनरल ऑव पुलिस ठाकुर निर्भयसिंह भी अपनी धर्मपत्नी उर्मिलादेवी के साथ रहते हैं । विकास तो अपने माता-पिता के साथ ही रहता है लेकिन विजय अपने माता-पिता से अलग रहता है । विजय की बहन कुसुम का विवाह हो चुका है जबकि विकास अपने माता-पिता की इकलौती संतान है ।

 

वेद प्रकाश शर्मा के इस सीरीज़ के उपन्यासों में अकसर होटल डिगारिगा का ज़िक्र आता है । यह होटल वस्तुतः राजनगर में स्थित एक रेस्तरां है जिसमें विजय जब-तब रघुनाथ की जेब से दावत उड़ाता है । जब भी रघुनाथ को किसी केस को हल करने के लिए विजय की मदद की ज़रूरत पड़ती हैउसे विजय को पटाने के लिए पहले उसे होटल डिगारिगा में शाही दावत देनी पड़ती है । होटल डिगारिगा में (रघुनाथ के खर्च पर) अपनी पसंद का भरपेट भोजन करने के बाद ही विजय उसकी मदद के लिए हाथ-पाँव हिलाने को राज़ी होता है । इसी होटल में विकास और उसका साथी बंदर धनुषटंकार उर्फ़ मोंटो भी गाहे-बगाहे चक्कर लगाते रहते हैं । मोंटो एक अद्भुत प्राणी है जिसका शरीर बंदर का है लेकिन उसमें मस्तिष्क मनुष्य का है । वह शराब और सिगार का रसिया है और वक़्त-वक़्त पर विजय-विकास की उनके कामों में मदद करने के अलावा विकास के साथ राजनगर में तफ़रीह करना ही उसका शगल है । होटल डिगारिगा विकास और मोंटो का पसंदीदा अड्डा है ।


वेद प्रकाश शर्मा ने अपने इस सीरीज़ के उपन्यासों में राजनगर की भौगोलिक स्थिति का अधिक विस्तार से चित्रण नहीं किया है । कुछ उपन्यासों में राजनगर के निकट स्थित एक अन्य नगर रामनगर का उल्लेख अवश्य उन्होंने किया है । सुपरिटेंडेंट रघुनाथ की कोठीआई. जी. पुलिस ठाकुर साहब की कोठी और विजय की अपनी कोठी कहाँ स्थित हैं (उन्होंने इन सभी को कोठियों में रहते हुए ही बताया है)वे नहीं बताते । लेकिन राजनगर की जिस जगह ने उनके विजय-विकास सीरीज़ वाले उपन्यासों में सबसे ज़्यादा ज़िक्र हासिल किया हैवह है – ‘गुप्त भवन’ । अब नाम ही ‘गुप्त भवन’ है तो ज़ाहिर-सी बात है कि उसके बारे में सामान्य लोगों को जानकारी नहीं हो सकती । इस गुप्त स्थान पर सीक्रेट सर्विस का मुखिया ब्लैक ब्वॉय तथा सीक्रेट सर्विस के अन्य सदस्य मिलते हैं । यहीं पर सीक्रेट सर्विस द्वारा निपटाए गए मामलों की फ़ाइलें रखी जाती हैं । यहाँ एक डेथ चैम्बर भी है । इसमें पहुँचने के सभी रास्ते आम लोगों की निगाहों से छुपे हुए हैं जिनमें से एक रास्ता विजय की कोठी के भीतर से जाता है । जब भी ब्लैक ब्वॉय को विजय-विकास या अन्य सदस्यों से सीक्रेट सर्विस के किसी अभियान या अन्य संबंधित विषय पर बात करनी होती हैवह अपनी भर्राई हुई आवाज़ में उन्हें ‘गुप्त भवन’ पहुँचने का हुक्म देता है जहाँ वह अपनी चीफ़ वाली कुरसी पर बैठकर सिगार पीते हुए उनसे बातचीत करता है ।

 

लेकिन जिस उपन्यासकार ने अपने उपन्यासों में सचमुच एक जीता-जागता राजनगर दर्शाया हैवे हैं वन एंड द ओनली सुरेन्द्र मोहन पाठक । पाठक साहब ने अपनी सुनील सीरीज़ का आग़ाज़ १९६३ में पुराने गुनाह नए गुनाहगार’ के साथ किया और तब से अब तक वे इस खोजी पत्रकार नायक के पुस्तकाकार में १२२ उपन्यास लिख चुके हैं और उसे लेकर कई लघु उपन्यास तथा लघु कथाएं भी उन्होंने रची हैं । सुनील कुमार चक्रवर्ती का राजनगर स्थित आवासीय पता - ३बैंक स्ट्रीट उसी तरह प्रसिद्ध हो चुका है जिस तरह सर आर्थर कॉनन डॉयल के अमर चरित्र शेरलॉक होम्स का लंदन स्थित आवासीय पता - २२१ बीबेकर स्ट्रीट हो चुका है । ब्लास्ट’ नामक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र में नौकरी करने वाला यह साहसी और निष्ठावान पत्रकार अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने के लिए सारे राजनगर में घूमता रहता है । सुरेन्द्र मोहन पाठक ने राजनगर का बाकायदा एक विस्तृत नक़्शा बना रखा है जिसके विभिन्न स्थानों का वर्णन वे बड़ी प्रामाणिकता के साथ करते हैं । उनके द्वारा रचित इस राजनगर में मैजेस्टिक सर्कल है, मुग़ल बाग़ है, जौहरी बाज़ार है, शंकर रोड है, हर्नबी रोड है, मेहता रोड है, धोबी नाका क्रीक है, शेख सराय है, नेपियन हिल रोड है, कूपर रोड है, धर्मपुरा है, विक्रमपुरा है,  लिंक रोड है (जहाँ श्मशान घाट है),  ईसाई  समुदाय की बहुतायत वाला इलाका जॉर्जटाउन है, मुख्य शहर से कोई तीस मील दूर समुद्र के किनारे स्थित इलाका नाॅर्थ शोर है और भी बहुत-से स्थल हैं जिनके बारे में पढ़ते समय पाठकों को लगता ही नहीं कि उनके द्वारा पढ़ी जा रही कहानी किसी काल्पनिक नगर में घट रही है । सुनील का मित्र रमाकांत मल्होत्रा 'यूथ क्लब' के नाम से एक मनोरंजन प्रदान करने वाला क्लब चलाता है जिसमें सुनील नियमित रूप से आता-जाता रहता है । पाठक साहब ने  हमेशा से राजनगर को एक घनी आबादी वाले महानगर के रूप में चित्रित किया है जिसकी आबादी अब कम-से-कम करोड़ में होनी चाहिए  इस महानगर में सुनील कभी अपनी मोटर साइकिल पर घूमता है तो कभी रमाकांत से उधार ली हुई कार पर । और सुनील के साथ भ्रमण करते हैं उपन्यास के पाठक 

 

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने एक अन्य नायक प्रमोद को लेकर भी चार उपन्यास लिखे हैं और प्रमोद का निवास भी उन्होंने राजनगर में ही बताया है । समय-समय पर भारत छोड़कर विदेश चला जाने वाला प्रमोद राजनगर में कमर्शियल स्ट्रीट में मार्शल हाउस नामक एक इमारत में रहता है । बहरहाल सुरेन्द्र मोहन पाठक के शैदाइयों का राजनगर भ्रमण प्रमोद के स्थान पर सुनील के ही साथ भलीभाँति हो पाया है ।

 

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने राजनगर से पैंसठ मील दूर एक रमणीक पर्यटन-स्थल भी बताया है जिसका नाम ‘झेरी’ है और जिसका मुख्य आकर्षण एक झील है । उससे भी कोई छह मील आगे वे सुंदरबन नामक एक और पर्यटन-स्थल बताते हैं जो एक विशेष मौसम में ट्राउट-फिशिंग के लिए प्रसिद्ध है । उससे भी और आगे एक पंचधारा नामक स्थान है और है ‘स्कैंडल प्वॉइंट’ 

 

सुरेन्द्र मोहन पाठक ने राजनगर को न केवल समुद्र के किनारे स्थित महानगर बताया है बल्कि उसके भीतर बहने वाली एक नदी भी बताई है – कृष्णा नदी । उन्होंने राजनगर के आसपास स्थित नगर और कस्बों के नाम भी काल्पनिक ही रखे हैं । ये हैं – विशालगढ़विश्वनगरइक़बालपुरतारकपुरसुनामपुरसोनपुरनूरपुरखैरगढ़ आदि । इनमें से पहले चार नगरों के और झेरी के चक्कर पाठक साहब ने सुनील से लगवाए हैं तो बाकी जगहों के चक्कर अपने दूसरे लोकप्रिय नायक विमल से लगवाए हैं । अपने कुछ अत्यंत लोकप्रिय कारनामों में विमल ने भी राजनगर में काफ़ी वक़्तगुज़ारी की है तो एक असाधारण उपन्यास के असाधारण क्लाईमेक्स में विमल के साथ-साथ सुनील भी नूरपुर जा पहुँचता है । पाठक साहब का इन काल्पनिक नगरों से लगाव कितना ज़्यादा हैइस बात का प्रमाण यह है कि उनके कई थ्रिलर उपन्यास भी इनमें ही अपनी कथा को प्रवाहित करते हैं ।

 

राजनगर के बाद पाठक साहब का सबसे ज़्यादा दुलार किसी कल्पित नगर ने पाया है तो वह है – विशालगढ़ जिसमें उनके कई लोकप्रिय थ्रिलर उपन्यासों का पूरा-का-पूरा घटनाक्रम चलता है । पाठक साहब ने जहाँ राजनगर को एक महानगर बताया हैवहीं विशालगढ़ को वे एक छोटा शहर बताते हैं । लेकिन राजनगर की तरह इसे भी एक नदी का सान्निध्य प्राप्त है – सोना नदी । इसके अतिरिक्त यहाँ रिचमंड रोड है जो एक कारोबारी चहल-पहल वाला इलाका लगता है । पाठक साहब के किसी उपन्यास की कहानी जब विशालगढ़ में घटती है तो रिचमंड रोड का उल्लेख आए बिना नहीं रहता । 

कथ्य की प्रामाणिकता स्थापित करने के लिए पाठक साहब सहित अधिकांश रहस्य-कथा लेखक प्रायः वास्तविक शहरों और उनके भीतर स्थित वास्तविक स्थानों के नाम ही अपनी रचनाओं में प्रयुक्त करते हैं लेकिन काल्पनिक शहरों विशेषतः लुगदी साहित्य की दुनिया में एक किवदंती का दर्ज़ा पा चुके राजनगर और उसके निकटस्थ नगरों में उपन्यासों के पृष्ठों के द्वारा बैठे-बैठे ही विभिन्न स्थानों की सैर करने का आनंद ही कुछ और है । यह आनंद हक़ीक़त में नहीं लिया जा सकता क्योंकि ये नगर कहीं मौजूद नहीं हैं । बहरहाल तसव्वुर में ही सही, इस सैर से मिलने वाला आनंद अद्भुत है और इस बात का ज़ामिन मैं ख़ुद हूँ 

© Copyrights reserved

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

काश्मीर : जटिल समस्या की सरलीकृत व्याख्या से उसका समाधान संभव नहीं

(यह लेख जम्मू-काश्मीर में अगस्त 2019 में हुए प्रशासनिक परिवर्तनों से तीन वर्ष पूर्व लिखा गया था एवं मूल रूप से दिनांक चार अगस्त, 2016 को प्रकाशित हुआ था; अतः इसे उस समय के संदर्भों को ध्यान में रखते हुए पढ़ा जाए)

काश्मीर में अलगाववादी आंदोलन तथा उससे जुड़ी हिंसा भारत की एक गंभीर समस्या के रूप में देखी जाती है । विभिन्न मंचों पर विचारक समस्या की अपनी-अपनी व्याख्या तथा उससे उद्भूत अपने-अपने समाधान प्रस्तुत करते हैं । ऐसे अधिकतर लेख वस्तुनिष्ठ एवं निरपेक्ष न होकर लेखकों के अपने-अपने पूर्वाग्रहों एवं सामाजिक, धार्मिक अथवा राजनीतिक झुकावों के अनुरूप होते हैं तथा इस उलझी हुई समस्या को सरलीकृत रूप में देखते हैं । यही कारण है कि उनकी व्यावहारिक उपादेयता सीमित होती है । काश्मीर की गुत्थी जटिल है जिसे वहाँ की ज़मीनी सच्चाईयों से कटकर केवल सतही जानकारी एवं एकांगी दृष्टिकोण के द्वारा नहीं समझा जा सकता ।

एक दशक पूर्व फ़िल्मकार राहुल ढोलकिया ने इस विषय पर हिन्दी फिल्म 'लम्हा' प्रस्तुत की थी । फ़िल्म से दर्शकों तथा समीक्षकों दोनों ही को वृहत् अपेक्षाएं थीं जिन पर फ़िल्म खरी नहीं उतर सकी और इसीलिए आलोचना का पात्र बनी । लेकिन मैंने जब यह फ़िल्म इसके प्रदर्शन के समय ही बड़े चित्रपट पर देखी थी, तब भी एवं हाल ही में इसे इन्टरनेट पर पुनः देखने पर भी मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा कि फ़िल्मकार के अथक परिश्रम एवं निष्ठायुक्त प्रयास के प्रति समीक्षक एवं दर्शक दोनों की ही प्रतिक्रिया आवश्यकता से अधिक कठोर रही थी । राहुल ढोलकिया ने फ़िल्म की अवधि बहुत कम रखी तथा सीमित समय में ही इस जटिल समस्या के अनेक पक्षों को टटोलने का प्रयास किया । यही कारण रहा कि किसी भी पक्ष के साथ न्याय करने के लिए वे स्वयं को पर्याप्त समय नहीं दे सके । तथापि इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि उनका यह प्रयास एक शोधपूर्ण, निष्पक्ष एवं ईमानदार प्रयास था जिसकी प्रासंगिकता आज भी वैसी ही है जैसी कई वर्षों पूर्व तब थी जब यह फ़िल्म बनकर प्रदर्शित हुई थी ।

हाल ही में मैंने पत्रकार मनु जोसेफ़ का इस विषय पर एक लेख पढ़ा जिसमें उनकी यह बात मुझे बिलकुल सटीक लगी कि काश्मीर की समस्या को उलझाने के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी वे लोग हैं जो स्वयं काश्मीर में नहीं रहते लेकिन दूरस्थ नियंत्रण (रिमोट कंट्रोल) द्वारा काश्मीर की उन गतिविधियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जिनके दुष्परिणाम उन्हें स्वयं नहीं भुगतने पड़ते (क्योंकि वे तो भौतिक रूप से वहाँ रहते नहीं), ये दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं उन निर्दोषों को जो वहाँ रहते हैं लेकिन जिनके जीवन इन दूर बैठे शतरंज के खिलाड़ियों के हाथों मोहरों से अधिक कुछ नहीं होते । दूर बैठे साधन-सम्पन्न लोगों और नज़दीक रहकर भी जनसामान्य के दुख-दर्द से प्रभावित न होने वाले पाखंडी राजनेताओं के अपने-अपने स्वार्थ हैं जिनके अनुरूप वे समस्या की सरलीकृत व्याख्याएं गढ़ते एवं प्रचारित करते हैं ।

हाल ही में एक नवीन फ़िल्म के विज्ञापन-चित्र (टीज़र) में कहा गया है कि किसी भी बात के तीन पहलू होते हैं - प्रथम दूसरे पक्ष का दृष्टिकोण, द्वितीय अपना दृष्टिकोण और तृतीय सत्य । काश्मीर के मुद्दे पर भी यही बात लागू है क्योंकि इस पर अपना-अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाले न तो अन्य पक्षों के दृष्टिकोणों को समझने का प्रयास करते हैं और न ही सत्य के उस भाग को जानने का प्रयास करते हैं जो कि निहित स्वार्थों द्वारा छुपा दिया जाता है तथा जिससे केवल भुक्तभोगी ही अवगत होते हैं । सियासतदानों के घड़ियाली आँसू आम काश्मीरी के दर्द को बयां नहीं कर सकते । आम काश्मीरियों के दर्द को काश्मीर में उनके मध्य रहकर ही समझा जा सकता है जिसके लिए उन विषम परिस्थितियों में रहने और उन संकटों का सामना करने का धैर्य तथा साहस होना चाहिए जिनसे वे बदनसीब रोज़ दो-चार होते हैं ।

राहुल ढोलकिया ने 'लम्हा' में जिस्मफ़रोशी के जहन्नुम में जाने के लिए मजबूर की जाने काश्मीरी लड़कियों के दर्द को उनके मुँह से यूं बयां करवाया है - 'हमें तो हर कोई लूटता है चाहे वे जेहादी हों या मिलिटरी वाले' । आम काश्मीरी का दर्द दरअसल इन्हीं और इनके जैसे अल्फ़ाज़ में ही छुपा है जो बरसों से बहरे कानों पर ही पड़ रहे हैं । भारतीय सेना के साहस और धैर्य दोनों ही की भूरि-भूरि प्रशंसा करने के साथ-साथ मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि काली भेड़ें उनमें भी हैं जिनकी पहचान करना बहुत आवश्यक है । यदि सेना में सभी देवदूत ही होते तो कोर्ट-मार्शल जैसी व्यवस्था की आवश्यकता ही नहीं होती । राहुल ढोलकिया ने जहाँ एक ओर ईमानदार सैनिकों के दर्द को उन्हीं के मुख से कहलवाया है जिन्हें जान जोखिम में डालकर कर्तव्य-निर्वहन करने के उपरांत भी पर्याप्त वेतन नहीं मिलता, वहीं दूसरी ओर भ्रष्ट सैनिकों की गतिविधियों पर भी प्रकाश डाला है जो सीमा पार के घुसपैठियों से भारी राशि रिश्वत के रूप में लेकर उनकी सुविधानुसार अल्पकाल के लिए चुपचाप सीमा खोल देते हैं और इस प्रकार अपनी जेबें भरने के लिए निर्दोषों के जीवन और काश्मीर की शांति के शत्रुओं के सहयोगी बन बैठते हैं । ढोलकिया ने उन महिलाओं का दर्द भी शिद्दत से बयां किया है जिनके परिवारों के पुरुषों को पूछताछ के नाम पर पुलिस वाले या सैनिक उनके घरों से बलपूर्वक उठा ले गए और फिर वे कभी नहीं लौटे । ऐसी दुखी और लाचार महिलाओं को उन उठा ले गए पुरुषों के बारे में पूछताछ करने के लिए पुलिस या सैन्य अधिकारियों तक पहुँचने पर यथोचित सहयोग भी नहीं दिया जाता है और स्पष्ट झूठ कह दिया जाता है कि उन्हें तो उठाया ही नहीं गया था । यह सैन्य उच्चाधिकारियों का ही दायित्व है कि वे काश्मीर में उपस्थित सैन्यबल की गतिविधियों पर पैनी दृष्टि रखें ताकि न तो कर्तव्यपरायण सैनिकों की समस्याएं अनसुनी रहें और न ही उनकी नाक के नीचे हो रही उनके ही कतिपय अधीनस्थों की भ्रष्ट, अनैतिक एवं क्रूर कार्रवाईयां अनदेखी रहें ।

ढोलकिया ने फ़िल्म की नायिका अज़ीज़ा (बिपाशा बसु) के चरित्र के माध्यम से संकेत किया है कि सही सोच वाली महिलाएं किस प्रकार वहाँ के हालात सुधारने में अहम भूमिका निभा सकती हैं यद्यपि ज़ाहिल एवं गुमराह मुस्लिम महिलाओं की एक भीड़ द्वारा अज़ीज़ा की पिटाई एवं मुँह काला किए जाने के एक हृदयविदारक दृश्य के माध्यम से उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उनकी राह किस सीमा तक कठिन हो सकती है । आतिफ़ (कुणाल कपूर) के चरित्र के माध्यम से उन्होंने बताया है कि काश्मीरियों की खुशहाली बंदूक के रास्ते से नहीं आ सकती लेकिन चुनावी राजनीति की मुख्यधारा में सम्मिलित होकर वे अपनी समस्याओं के हल के लिए अपनी आवाज़ सही माध्यम से बुलंद कर सकते हैं और अपने भाग्य-नियंता स्वयं बन सकते हैं । आतिफ़ द्वारा अपने चुनाव प्रचार के दौरान जम्मू में काश्मीरी पंडितों के शिविर में जाकर उनके साथ खड़े होने तथा उनसे काश्मीर घाटी में वापस लौटने का आह्वान करने के प्रसंग से ढोलकिया ने इस अटल सत्य को रेखांकित किया है कि काश्मीरी मुस्लिम तभी अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ सकते हैं जब वे पंडितों को भी काश्मीर का अंग समझें तथा उन्हें घाटी में पुनः लौटने में व्यावहारिक सहयोग तथा भावनात्मक एवं नैतिक समर्थन दें । यह दृष्टिकोण वस्तुतः फारूक़ अब्दुल्ला एवं महबूबा मुफ़्ती जैसे स्वार्थी एवं दोगले राजनेताओं के मुँह पर तमाचा है जो मज़हबी अलगाववाद को परोक्ष समर्थन देते हैं तथा यही चाहते हैं कि काश्मीरी पंडित घाटी में कभी न लौटें एवं अंततः घाटी पूर्णतः मुस्लिम जनसंख्या वाला प्रदेश बन जाए

मुझे यह देखकर दुख एवं आश्चर्य दोनों होते हैं कि काश्मीरियों के दर्द की बात करने वाले सभी लेखक, बुद्धिजीवी एवं राजनेता जम्मू एवं लद्दाख की समस्याओं के हल पर चुप्पी साध लेते हैं या ऐसा प्रदर्शन करते हैं मानो जम्मू एवं लद्दाख में कोई समस्या है ही नहीं । सत्य यह है कि अलगाववादी आंदोलन तो काश्मीर के स्थान पर जम्मू में होना चाहिए था जहाँ की समस्याओं के प्रति इस राज्य की तथा केंद्र की भी सभी सरकारों ने उपेक्षा ही दर्शाई । सभी संसाधन काश्मीर घाटी में झोंक दिये जाते हैं एवं विधान सभा का ढाँचा प्रारम्भ से ही ऐसा बनाया गया है कि जम्मू का व्यक्ति मुख्यमंत्री बन ही नहीं सकता । जब जम्मू से आने वाले राजनेता ग़ुलाम नबी आज़ाद को उनके दल ने मुख्यमंत्री बनाया था तो महबूबा मुफ़्ती इसी बात को लेकर सड़कों पर उतर आई थीं कि जम्मू का व्यक्ति मुख्यमंत्री कैसे बना ? ऐसे में कोई ग़ैर-मुस्लिम तो राज्य का मुख्यमंत्री बनने की सोच तक नहीं सकता । लद्दाख में रहने वाले बौद्धों की तो बात ही छोड़ दीजिए । उनकी सुध लेने की तो किसी को भी फ़ुरसत नहीं । हज़ारों करोड़ रुपया काश्मीर घाटी में फूंक दिये जाने के उपरांत भी वहाँ अशांति ही है और विकास नाम की चिड़िया तक दिखाई नहीं देती । सब ओर काश्मीर-काश्मीर का ही शोर सुनाई देता है । जम्मू और लद्दाख की पीड़ा इसी शोर में खो जाती है जिसे सुनने वाला कोई नहीं

तीन दशक पूर्व कांग्रेसी नेता एवं हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल ने पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू-काश्मीर को मिलाकर 'महापंजाब' नामक एक वृहत् राज्य बनाए जाने का सुझाव दिया था । उनके आला दिमाग़ के मुताबिक ऐसा करने से न केवल पंजाब एवं हरियाणा के मध्य सीमा तथा जल संबंधी विवाद समाप्त हो सकते थे वरन जम्मू-काश्मीर से जुड़ी समस्याओं के भी समाधान ढूंढे जा सकते थे । उनका यह सुझाव अव्यावहारिक ही नहीं था, उनके दिमाग़ी दिवालियेपन का भी प्रमाण था । लेकिन इसका उलटा करने के विषय में सोचा जाना चाहिए तथा विचार पर स्थिरमति हो जाने के उपरांत उसे अमली जामा पहनाया जाने का भी सार्थक प्रयास किया जाना चाहिए । जम्मू-काश्मीर राज्य को एक बनाकर रखने का अब कोई अर्थ नहीं है विशेष रूप से तब जबकि काश्मीर घाटी एवं जम्मू की जनता में स्पष्ट राजनीतिक विभाजन भी हो चुका है जो विगत विधानसभा चुनाव में दृष्टिगोचर हुआ था । अतः एक साहसिक कदम उठाते हुए इस राज्य को काश्मीर तथा जम्मू नाम के दो पृथक राज्यों तथा लद्दाख नाम के केन्द्रशासित प्रदेश में विभाजित कर दिया जाना चाहिए । लद्दाख पूर्णतः केंद्र के नियंत्रण में रहे जबकि जम्मू की अपनी पृथक विधानसभा हो, पृथक शासन-प्रशासन हो । संविधान का विवादित अनुच्छेद ३७० केवल काश्मीर घाटी पर लागू हो जबकि जम्मू एवं लद्दाख को उसके दायरे से बाहर कर दिया जाए । ऐसे में न केवल सीमापार से संचालित होने वाले आतंकवाद को काश्मीर घाटी में ही केंद्रीकृत करके उससे बेहतर ढंग से निपटा जा सकेगा बल्कि जम्मू एवं लद्दाख के सदा से उपेक्षित प्रदेशों के साथ भी न्याय हो सकेगा

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, राज्य के विकास के नाम पर काश्मीर घाटी में हजारों करोड़ रुपये का पैकेज झोंकने से काश्मीरियों को अपना नहीं बनाया जा सकता जो कि भारत को भी उसी तरह से एक दूसरा देश समझते हैं जिस तरह से वे पाकिस्तान को समझते हैं । भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३७० तथा महाराजा हरी सिंह द्वारा हस्ताक्षरित विलय-पत्र का संदर्भ भी व्यर्थ है क्योंकि  १९४७ से अब तक झेलम में इतना पानी बह चुका है कि ये बातें अपना अर्थ खो चुकी हैं एवं अलगाववादी आंदोलन की आँधी से प्रभावित काश्मीरी इन्हें न समझते हैं, न समझना चाहते हैं । काश्मीर को केवल सेना के बल पर स्थायी रूप से भारत से जोड़कर नहीं रखा जा सकता । सुशिक्षित काश्मीरी मुस्लिम युवक भी मज़हबी अपनत्व के कारण पाकिस्तान से ही हमदर्दी रखते हैं जबकि भारत के प्रति कोई सौहार्द्र अपने मन में रखे बिना भी भारत के ही संसाधनों का उपयोग अपने हित-साधन के लिए करने में वे किसी झिझक का अनुभव नहीं करते । अब उनका स्वप्न एक सार्वभौम इस्लामी काश्मीर राज्य का है जो शरीयत के अनुरूप चले एवं जो भारत व पाकिस्तान दोनों से ही स्वतंत्र हो । पाकिस्तान की खोखली एवं बनावटी हमदर्दी में बहकर वे यह नहीं समझ पा रहे कि पाकिस्तान ही उनका यह स्वप्न कभी पूरा नहीं होने देगा । भारतीय सेना के सभी अच्छे कार्यों के बावजूद उसकी छवि काश्मीरी अवाम की नज़र में उसी तरह बिगड़ी हुई है जिस तरह पुलिस की बिगड़ी हुई है । जम्मू-काश्मीर को जब हम भावनात्मक रूप से अपनेपन का अहसास कभी नहीं करवा सके तो केवल संसाधनों को झोंककर और सैन्य बलों को तैनात करके उसे भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने की आशा करना स्वयं को धोखा देना ही है । हम में तो इतनी भी हिम्मत नहीं है कि पाक-अधिकृत काश्मीर को आज़ाद करवा सकें । वस्तुतः सैन्यबल का प्रयोग तो इस कार्य में होना चाहिए था । १९९९ में कारगिल में घुसपैठ करके एवं हम पर अप्रत्याशित युद्ध थोपकर पाकिस्तान ने हमें एक ऐतिहासिक भूल को सुधारने का ऐतिहासिक अवसर दिया था जिसे हमारी सरकार ने कतिपय पूर्ववर्ती सरकारों की ही लीक पर चलते हुए गंवा दिया । मौजूदा हालात में तो संयुक्त राष्ट्र के संज्ञान में जनमत-संग्रह में भी कोई हर्ज़ नहीं है बशर्ते कि वह जनमत-संग्रह काश्मीर के दोनों ही भागों में एक साथ समान रूप से हो तथा उसके आधार पर संयुक्त काश्मीर के लिए निर्णय लिया जाए

तथापि यदि हम काश्मीर को सच्चे मन से भारतवर्ष का अभिन्न अंग मानते हैं एवं उसे अपने साथ बनाए रखना चाहते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वहाँ की जनता की जिस सेक्यूलर मानसिकता के कारण काश्मीर मज़हबी उन्माद की नींव पर बने पाकिस्तान के स्थान पर उदार भारत के साथ जुड़ा था, वह अब हमारी अपनी ही भूलों एवं दुर्बलताओं के कारण तिरोहित हो चुकी है । उसे पुनः जागृत करने के लिए हज़ारों करोड़ के पैकेज जैसा कोई शॉर्टकट या वहाँ जाकर दीवाली मनाने जैसा कोई स्टंट या सैन्यबल के माध्यम से शक्ति-प्रदर्शन काम नहीं आने वाला । काश्मीरियों को कृतघ्न मानकर उनके लिए अपने मन में वितृष्णा रखना भी अनुचित होगा । इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक दीर्घकालिक परियोजना बनाकर अत्यंत धैर्य के साथ कार्य आरंभ करना होगा, मनोमस्तिष्क खुला रखते हुए पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सभी तथ्यों पर निरपेक्ष भाव से विचार करना होगा, हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों ही समुदायों के घावों पर मरहम लगाना सीखना होगा, तोड़ने वालों को मानसिक रूप से पराजित करके लोगों को एकदूसरे से जोड़ना होगा, वाणी में संयम एवं उदारता बरतनी होती तथा अन्याय से पीड़ित लोगों को वास्तविक अर्थों में न्याय देना होगा क्योंकि अन्याय-पीड़ित के मन के घाव तभी भरते हैं और पीड़ा तभी घटती है जब उसे न्याय मिलता है । राहुल ढोलकिया की फ़िल्म 'लम्हा' का नायक विक्रम (संजय दत्त) भारत सरकार का एक गुप्तचर ही नहीं वरन एक अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति भी है जो एकांगी दृष्टिकोण न रखते हुए संतुलित भाव से प्रत्येक तथ्य का विश्लेषण करता है एवं तदनुरूप अपना कर्तव्य निर्धारित करता है । ऐसे ही संवेदनशील प्रतिनिधियों को काश्मीर में वहाँ के जनसामान्य के बीच रहते हुए वहाँ की जटिल एवं बहुआयामी परिस्थिति को समझकर काश्मीरियों को अपना बनाने का दायित्व सौंपना होगा । तभी इस मकड़ी के जाले की भांति उलझी हुई जटिल समस्या का वांछित समाधान हो सकेगा 

© Copyrights reserved