सोमवार, 25 जनवरी 2021

नक़लचियों का बोलबाला

सारी दुनिया में आज नक़लचियों का बोलबाला है । नक़लची हर जगह घुस जाते हैं और दूसरों के सृजन को कॉपी-पेस्ट करके या फिर चंद अल्फ़ाज़ की हेरा-फेरी करके वाह-वाही (और भौतिक लाभ भी) लूटते हैं जबकि वास्तविक सर्जक कई बार अपनी सृजन की इस चोरी से अनभिज्ञ रहता है । साहित्य और कला के क्षेत्र में यह आम बात है । कभी-कभी नक़ल करने वाले लोग मूल सृजनकर्ता को (प्रेरणा देने का) श्रेय भी दे देते हैं जबकि बाज़ मर्तबा ऐसा भी होता है कि जिसे श्रेय दिया जा रहा है, उसने भी किसी और की नक़ल ही की थी ।  

कृतिस्वाम्य या कॉपीराइट का विधान इस संदर्भ में केवल समर्थ लोगों के लिए ही प्रभावी होता है (वैसे भारत की तो सम्पूर्ण वैधानिक व्यवस्था ही समर्थों के लिए हैं जो न्याय को मुँहमांगे दाम चुकाकर क्रय कर सकते हैं, साधारण व्यक्ति के लिए न्याय है कहाँ ?) । आर्थिक और व्यावहारिक रूप से अपेक्षाकृत दुर्बल सृजनकर्ताओं को इससे कोई विशेष लाभ नहीं मिलता है । प्रत्यक्षतः कॉपीराइट द्वारा सुरक्षित बौद्धिक सम्पदा की चोरी को भी रोक पाने में भी भारतीय विधि-व्यवस्था प्रायः प्रभावहीन ही सिद्ध होती है ।  

कुछ वर्ष पूर्व आई हिन्दी फ़िल्म 'दबंग' का एक गीत 'मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए' बहुत लोकप्रिय हुआ तथा यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है । यह गीत 1995 में आई हिन्दी फ़िल्म 'रॉक डांसर' के गीत 'लौंडा बदनाम हुआ लौंडिया तेरे लिए' की नक़ल है जिसे माया गोविंद ने लिखा था और बप्पी लहरी ने संगीतबद्ध किया था । लेकिन वस्तुतः वह गीत भी मशहूर भोजपुरी लोकगीत 'लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए' की ही नक़ल था जिसे तारा बानो फ़ैज़ाबादी के स्वर में उत्तर-मध्य भारत की कई पीढ़ियों ने सुना और उसका आनंद उठाया । चूंकि यह लोकगीत है, इसलिए अधिकतर लोकगीतों की तरह इसके मूल लेखक का भी कोई पता नहीं । लेकिन पहले 'रॉक डांसर' में और डेढ़ दशक बाद 'दबंग' में इस गीत को थोड़े हेर-फेर के साथ उठा लिया जाना निर्लज्ज साहित्यिक और सांगीतिक चोरी का ही नमूना कहा जा सकता है । और यह कोई एक ही उदाहरण नहीं, ऐसे ढेरों उदाहरण हैं । 

कई वर्ष पूर्व चर्चित फ़िल्मकार श्याम बेनेगल द्वारा अपनी फ़िल्म 'वेल डन अब्बा' की कहानी के लिए जिलानी बानो को उनकी कहानी - 'नरसईंया की बावड़ी' और संजीव कदम को उनकी कहानी 'फुलवा का पुल' के लिए श्रेय दिया गया था क्योंकि बेनेगल ने अपनी फ़िल्म की कहानी इन कहानियों से प्रेरणा लेकर लिखी थी । लेकिन जब मैंने रमेश गुप्त जी द्वारा दशकों पूर्व रचित व्यंग्य 'चोरी नए मकान की' पढ़ा तो मैं दंग रह गया क्योंकि फ़िल्म की कहानी उस अत्यंत पुराने भूले-बिसरे व्यंग्य से बहुत मिलती-जुलती थी । इसका आशय यह हुआ कि बेनेगल ने जिन कथाओं को पढ़कर अपनी फ़िल्म की कथा रची थी, वस्तुतः उन कथाओं के लेखकों ने अपनी रचनाओं की विषय-वस्तु गुप्त जी के व्यंग्य से ही चुराई थी ।

भारत में हिन्दी के असंख्य उपन्यास विदेशी उपन्यासों की नक़ल मारकर धड़ल्ले से लिखे गए हैं और अब भी लिखे जाते हैं । लुगदी साहित्य के नाम से रचे गए उपन्यासों के लेखकों ने पहले तो यह सोचकर विदेशी उपन्यासों की नक़ल मारी कि हिन्दी के पाठक वर्ग को विदेशी भाषाओं के साहित्य का क्या पता ।  लेकिन अपनी इस चोरी के पकड़े जाने के बाद भी वे खम ठोककर यही करते रहे क्योंकि उन्हें कॉपीराइट संबंधी कानून का कभी कोई ख़ौफ़ नहीं रहा ।

कई भाषाओं में बनाई गई चर्चित फ़िल्म 'दृश्यम' के लेखक ने निर्लज्ज होकर उसे अपनी 'मौलिक कहानी' के नाम से प्रचारित किया जबकि यह सर्वविदित था कि 'दृश्यम' की कहानी स्पष्टतः जापानी उपन्यास 'द डिवोशन ऑव सस्पैक्ट एक्स' से प्रेरित थी जिस पर जापानी भाषा में फ़िल्म भी बनी थी । लेकिन श्रेय और लाभ के बुभुक्षित लोगों को लज्जा कहाँ आती है । वे नक़ल को भी एक बहुत बड़ी कला समझते और मानते हैं और अपनी इस निपुणता पर गर्वित भी होते हैं ।

चर्चित अभिनेता और फ़िल्मकार आमिर ख़ान और उनके निर्देशक आशुतोष गोवारीकर ने अपनी फ़िल्म ‘लगान’ की कहानी के मौलिक होने का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ी । लेकिन सच्चाई यह है कि ‘लगान’ का मूल विचार बी॰आर॰ चोपड़ा द्वारा निर्मित-निर्देशित अपने समय की अत्यंत सफल फ़िल्म ‘नया दौर’ से उठाया गया है जिसमें दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं । स्वयं आमिर ख़ान ने ‘लगान’ के अनेक दृश्यों में ‘नया दौर’ के दिलीप कुमार की भाव-भंगिमाओं की हूबहू नक़ल की है । फिर भी मौलिकता का दावा ? ऐसे निष्णात नक़लची संभवतः स्वयं को महाज्ञानी और शेष संसार को निपट मूर्ख समझते हैं ।

सारांश यह कि साहित्य और कला की चोरी एक लाइलाज़ बीमारी है । चूंकि यह चोरी सरलता से की जा सकती है, इसीलिए चोर निर्भय रहते हैं । अकसर तो चुराए गए संगीत या साहित्य के वास्तविक सर्जक अपने सृजन की इस चोरी से अनभिज्ञ ही रहते हैं और यदि वे जान भी जाएं तो चोर के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई करने में स्वयं को अक्षम ही पाते हैं । संगीत और साहित्य के कद्रदानों को भी इत्तफ़ाक़ से ही पता लगता है कि जिस सृजन को वे सराह रहे हैं, वह वस्तुतः किसी और की प्रतिभा और परिश्रम का सुफल है ।

अत्यंत खेद एवं क्षोभ का विषय है यह ।

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रविवार, 24 जनवरी 2021

प्रश्न पारिवारिक संपत्ति में स्त्री के अधिकार का

कुछ वर्षों पूर्व केंद्रीय सरकार ने तलाक के उपरांत पति की संपत्ति में पत्नी के अधिकार संबंधी कानून में संशोधन किया था जिसकी प्रशंसा भी हुई थी, आलोचना भी । पत्नी या यूं कहें कि स्त्री की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए यह अधिनियम बनाया गया था । इसके तथा इसके जैसे अन्य विधानों को बनाए जाने की पृष्ठभूमि में है पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्थाओं में स्त्री को दिया गया दोयम दरज़ा, उसकी जीवन-यापन हेतु सदा पुरुष पर निर्भर रहने की विवशता तथा उसके प्रति पुरुष वर्ग द्वारा किए जाते रहे अन्याय । स्वाभाविक रूप से, इन विधानों के निर्माण का एकमात्र प्रयोजन है स्त्री के प्रति न्याय ।  

संसार की प्रत्येक विषय-वस्तु के दो पक्ष होते हैं पहला यथार्थ जो कि विद्यमान है और दूसरा आदर्श जो कि होना चाहिए । नारी के संदर्भ में भारतीय आदर्श तो यही होता कि 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग-पगतल में, पीयूष स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में' किन्तु जिस कटु एवं पीड़ादायक यथार्थ से भारतीय महिलाएं सदा दो-चार होती रही हैं वह है 'अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी' । आधुनिक महिलाएं जब मध्ययुगीन इतिहास पढ़ती होंगी तो उन्हें बात निश्चय ही चुभती होगी कि संपत्ति में भागीदारी तो दूर, स्त्रियों को तो स्वयं ही पुरुषों की संपत्ति माना जाता था । आज भी हिन्दू विवाह-संस्कार  में कन्यादान  की प्रथा सम्मिलित है जिसके मूल में यही धारणा है ।

भारतीय आयकर विधान में करदाताओं की एक श्रेणी रही है – हिन्दू अविभाजित परिवार जिसमें परिवार के ज्येष्ठतम पुरुष सदस्य को कर्ता की प्रस्थिति प्राप्त होती है एवं वह विभिन्न वैधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत परिवार के कार्यकलापों के लिए उत्तरदायी माना जाता है । यह सामंतवादी व्यवस्थाओं में पिता के देहांत के उपरांत पुत्र के राज्याभिषेक तथा उत्तर भारत के हिन्दू परिवारों में अब भी होने वाली रस्म पगड़ी के लगभग समकक्ष ही है जिसमें परिवार के सभी दायित्व (और स्वभावतः सभी अधिकार) पुत्र के ही होते हैं, पुत्री के नहीं । हिन्दू अविभाजित परिवार से जुड़ी वैधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत पैतृक संपत्ति के विभाजन की मांग भी परिवार के पुरुष ही कर सकते हैं, महिलाएं नहीं । अविवाहित कन्याओं की स्थिति तो और भी विकट रही है । पूर्व में लागू व्यवस्थाओं के अधीन उन्हें तो पैतृक संपत्ति के विभाजन की स्थिति में किसी भी भाग का अधिकारी ही नहीं माना जाता था और उनका अधिकार केवल भरण-पोषण तक ही सीमित माना जाता था । विवाह के उपरांत वे अपने जन्म के परिवार की सदस्य भी नहीं रहती थीं और उनकी सदस्यता उनके पति के परिवार में स्वतः ही स्थानांतरित हो जाती थी ।

भारतीय संपत्ति अधिनियम तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत ये प्रत्यक्षतः अन्यायपूर्ण प्रावधान भारतीय समाज में कन्या के अनिवार्यतः होने वाले विवाह तथा उसके विवाह में दिए जाने वाले दहेज की प्रथा से जोड़कर देखे जाने पर इतने अधिक अन्यायपूर्ण प्रतीत नहीं होते । दहेज-प्रथा एक बहुत बड़ा सामाजिक अभिशाप है, इसमें कोई संदेह नहीं । किन्तु जब यह आरंभ हुई होगी तो इसके पीछे एक उचित तर्क यही रहा होगा कि माता-पिता अपनी धन-संपत्ति में पुत्री का भाग उसे दहेज के रूप में तब दे दें जब वह वैवाहिक जीवन में प्रवेश करके उनके परिवार को छोड़कर अपने ससुराल जा रही हो । इसे कानूनी भाषा में स्त्रीधन कहा जाता है जिस पर पूर्ण अधिकार संबंधित स्त्री का ही होता है, उसके पति का नहीं । स्त्री का पति यदि दिवालिया घोषित हो जाए तो भी स्त्रीधन को कुर्क नहीं किया जा सकता ।

किन्तु महिलाओं की स्थिति शताब्दियों से शोचनीय ही रही है । उनके जीवन से जुड़े सभी निर्णय पुरुषों द्वारा ही लिए जाते रहे तथा उन पर थोपे जाते रहे हैं । महिलाओं को उनके उचित अधिकार देने के मामले में पुरुष वर्ग सदा से कृपण रहा है तथा कई सामाजिक प्रथाएँ उनके प्रति अन्याय करने वाली ही नहीं, अमानवीय भी रही हैं । अठारहवीं शताब्दी तक प्रचलित सती प्रथा के पीछे संभवतः विधवा के परिजनों द्वारा उसकी संपत्ति हड़पने की मानसिकता ही थी । आज भी वृंदावन में जैसे-तैसे अपना जीवन बिता रही विधवाओं की दयनीय स्थिति के मूल में भी यही बात है कि उनके परिवार वाले उनके प्रति अपना कोई दायित्व नहीं मानते और पति के देहांत के उपरांत ऐसी स्त्री उन्हें परिवार पर भार लगने लगती है ।

ऐसे में विधि-विधान तो बनाए ही गए हैं, तथाकथित न्यायिक सक्रियता के चलते न्यायालय भी वैधानिक व्यवस्थाओं से इतर ऐसे निर्णय सुना रहे हैं जो महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देते हुए प्रतीत हों । न केवल तलाक़शुदा महिलाओं वरन पुरुष के साथ बिना विवाह किए (लिव-इन) रहने वाली महिलाओं के हितों का भी ध्यान रखने वाले निर्णय देखने में आए हैं । अब ऐसे निर्णय सार्वभौम रूप से कितने लागू होते हैं, यह एक पृथक् बात है किन्तु भारतीय न्यायाधीश अपने विवेक से ऐसे निर्णय संभवतः अपनी ओर से प्राकृतिक  न्याय के सिद्धान्त के अनुरूप  ही दे रहे हैं । यदि भारतीय पुरुष वर्ग महिलाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण न्यायपूर्ण रखता तो ऐसे न्यायिक निर्णयों की नौबत ही न आती । 

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में वर्ष २००५ में किए गए संशोधन द्वारा विवाहित पुत्रियों का भी पैतृक संपत्ति में अधिकार सुनिश्चित किया गया है । प्रश्न यह है कि क्या विवाहित स्त्री पिता और पति दोनों ही की संपत्ति में दावा कर सकती है ? यदि हाँ तो क्या यह न्यायपूर्ण है ? पारंपरिक मानसिकता के अनुसार विवाह के उपरांत स्त्री अपने पति के घर की हो जाती है तथा तदनुरूप उसका अधिकार अपने पति की संपत्ति में ही होना चाहिए । किन्तु यदि पति शराबी हो, जुआरी हो, दुराचारी हो तथा अपनी सम्पूर्ण संपत्ति को फूंक दे तो ऐसे में आश्रय के लिए क्या पुत्री अपने माता-पिता की ओर न देखे जिनके यहाँ वह जन्मी है, जिनकी गोद में खेलकर वह बड़ी हुई है ?

लेकिन क्या परिवार के भीतर के स्त्री-पुरुष संबंधों की हर बात अर्थ से ही जुड़ी हुई रहेगी ? क्या स्त्री-पुरुष केवल संपत्ति में भागीदारी से ही सरोकार रखेंगे ? क्या भाई-बहिन का स्नेह, पति-पत्नी का अनुराग आदि कोई मूल्य नहीं रखते ? क्या हम यह चाहते हैं कि रक्षाबंधन के दिन बहिन अपने भाई की कलाई पर स्नेह का धागा बांधने के स्थान पर पैतृक संपत्ति में भागीदारी को लेकर न्यायालय में उससे लड़े ? क्या हम यह चाहते हैं कि जीवन-साथी एक नई संस्कारी पीढ़ी के निर्माण हेतु सौहार्द्र पूर्वक संयुक्त प्रयत्न करने के स्थान पर संपत्ति के मामले को लेकर वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया में फंसे रहें ? आख़िर हम भविष्य में समाज को किस रूप में देखना चाहेंगे ? समाज की धुरी है परिवार और परिवार की धुरी है महिला । महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय का निराकरण हो और उन्हें अपना जायज़ हक़ मिले, इस बारे में कोई दो-राय नहीं हो सकती । किन्तु साथ ही यह भी तो सुनिश्चित हो कि स्त्री-पुरुष सौहार्द्र अक्षुण्ण रहे, परिवार न टूटें, समाज न बिखरे ।

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शनिवार, 23 जनवरी 2021

आर्टिकल पंद्रह और मोहल्ला अस्सी

विगत दिनों दो बहुचर्चित फ़िल्में देखीं  'आर्टिकल 15' और 'मोहल्ला अस्सीआर्टिकल 15' सिनेमाघर में जाकर देखी और 'मोहल्ला अस्सीइंटरनेट पर । प्रत्यक्षतः इन दोनों फ़िल्मों में कोई समानता नहीं दिखाई पड़ती । लेकिन मैंने फुरसत में जब ग़ौर से इन दोनों ही फ़िल्मों की कहानियों और उन्हें पेश करने की ईमानदारी पर मनन किया तो मुझे इनमें तुलना करने के लिए कई बिंदु मिले । दोनों ही की कथाओं का ठोस आधार है । हाल ही में (२०१९ में) प्रदर्शित 'आर्टिकल 15' जहाँ मई २०१४ में उत्तर प्रदेश के बदायूँ  में हुए दो दलित बालिकाओं के जघन्य हत्याकांड से प्रेरित हैवहीं गत वर्ष (२०१८ में) प्रदर्शित 'मोहल्ला अस्सीहिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार काशीनाथ सिंह की कृति 'काशी का अस्सीके एक अध्याय - 'पांडे कौन कुमति तोहे लागीपर आधारित है । दोनों ही फ़िल्में गुणवत्ता की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं लेकिन दोनों को ही वह व्यावसायिक सफलता नहीं मिली जो सैकड़ों करोड़ कमा लेने वाली औसत गुणवत्ता की फ़िल्मों को प्राय: सहज ही मिल जाती है । 'आर्टिकल 15' को प्रेरक होने के साथ-साथ मनोरंजक होने पर भी साधारण व्यावसायिक सफलता ही मिल सकी जबकि 'मोहल्ला अस्सीबुरी तरह असफल रही और अपनी लागत तक नहीं निकाल सकी । कारण ? हम भारतीय पलायनवादी हैं जो सत्य के साक्षात् से घबराते हैं । इसीलिए नेताओं द्वारा किया जाने वाला भांडनुमा मनोरंजन हमें भाता है और हम प्रसन्न होकर उन्हें वोट दे देते हैं चाहे वे हमारे प्रतिनिधि के रूप में अपने किसी भी कर्तव्य का पालन न करें । 


'आर्टिकल 15' के लेखक-निर्देशक अनुभव सिन्हा हैं जिन्होंने किसी ज़माने में 'तुम बिन' (२००१जैसी दिल को छू लेने वाली प्रेमकथा बनाकर अपने निर्देशकीय करियर का श्रीगणेश किया था और कुछ ही वर्षों में 'दस' (२००५) जैसी बड़े बजट की बहुसितारा थ्रिलर फ़िल्म उत्तम ढंग से बनाकर सभी को चौंका दिया था । व्यावसायिक फ़िल्में बनाते-बनाते उन्होंने 'मुल्क' (२०१८से अपने काम की धारा बदली और सार्थक सिनेमा की ओर मुड़े  'आर्टिकल 15' इस बात का प्रमाण है कि यह प्रतिभाशाली फ़िल्मकार निरंतर अपने क्षितिज का विस्तार कर रहा है और जोखिम उठाने से पीछे नहीं हट रहा है  

'मोहल्ला अस्सीके लेखक-निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी हैं जिन्होंने किसी ज़माने में दूरदर्शन के निमित्त अत्यंत प्रभावशाली तथा लोकप्रिय धारावाहिक 'चाणक्यबनाया था और उसमें शीर्षक भूमिका भी स्वयं ही निभाई थी । आने वाले समय में उन्होंने विभिन्न सृजनात्मक कार्यों में अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी जिनमें से प्रमुख रहा फ़िल्म 'पिंजर' (२००३) का लेखन-निर्देशन जो कि अमृता प्रीतम की इसी नाम वाली अमर कृति का सिनेमाई संस्करण थी । फ़िल्म चाहे व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही लेकिन वह अमृता जी की साहित्यिक कृति का अत्यंत ईमानदाराना और हृदयस्पर्शी प्रस्तुतीकरण थी । 

'आर्टिकल पंद्रह' और 'मोहल्ला अस्सी' दोनों ही फ़िल्मों के नायक ब्राह्मण हैं जिनकी अपनी-अपनी विचारधारा, अपनी-अपनी पृष्ठभूमि एवं अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं । एक परंपरा में गहरे तक समा चुकी बुराइयों को दूर करना चाहता है और इसके लिए शत्रु-सदृश परिवेश तथा पक्षपाती प्रशासकीय तंत्र से जूझता है ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके जबकि दूसरा परंपरा की जड़ों से कटना नहीं चाहता, न ही उन जड़ों को बाज़ार के प्रहारों से मिटते-बिखरते हुए देख सकता है । एक को अपने ब्राह्मण होने का कोई अभिमान नहीं है तथा वह उस जातिवादी एवं विभेदकारी सामाजिक व्यवस्था का घोर विरोधी है जो एक वर्ग को उच्च तथा दूसरे वर्ग को निम्न की श्रेणी में डालते हुए एक के द्वारा दूसरे के शोषण तथा उत्पीड़न को न्यायोचित एवं अनदेखा करने के योग्य मान लेती है जबकि दूसरा उस सामाजिक व्यवस्था में भरपूर आस्था रखता है और उसे अपने ब्राह्मणत्व का अभिमान भी है लेकिन वह मानवीय संवेदनाओं से कोरा नहीं है तथा जीवन के उच्च मूल्यों एवं आदर्शों में पूर्ण  विश्वास रखते हुए उनका वास्तविक जीवन में पालन करता है  अपनी-अपनी जगह और अपने-अपने नज़रिये से दोनों ही ठीक हैं क्योंकि दोनों के परिवेश भिन्न हैं, हेतु भिन्न हैं और वैचारिक विकास तो भिन्न रूप में हुआ ही है । दोनों अपने प्रति ईमानदार हैं । दोनों के ज़मीर ज़िंदा हैं । दोनों ही अपने भीतर की आवाज़ को अनसुना नहीं करते । दोनों वही करते हैं जो उनकी नज़र में सही है चाहे दूसरों की राय कुछ भी हो  

'आर्टिकल 15' विदेश में शिक्षा-प्राप्त उस युवा अंग्रेज़ीदां पुलिस अधिकारी के दृष्टिकोण से उत्तर भारत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में व्याप्त शोचनीय परिस्थितियों की सूक्ष्मता से पड़ताल करती है जिसके मन में भारतीय गाँवों की बड़ी रूमानी कल्पना है और जो उसे नगरीय भीड़ तथा प्रदूषण से दूर पर्यटन-स्थल सरीखे लगते हैं  उसके भ्रम अपने थाना-क्षेत्र में पदार्पण के साथ ही टूटने आरंभ हो जाते हैं और दो दलित वर्ग की अवयस्क श्रमिक बालिकाओं की दुराचार के उपरांत हत्या के अत्यंत घृणित अपराध के अण्वेषण में लगने पर यह रहस्य परत-दर-परत उसके समक्ष उजागर होता है कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद पंद्रह के माध्यम से समस्त नागरिकों को प्रदत्त समानता का मौलिक अधिकार केवल काग़ज़ी है जिसका वास्तविकता के धरातल पर अस्तित्व न के बराबर है । जिस बदायूँ काण्ड की उत्पीड़ित बालिकाओं तथा उनके निर्धन एवं पददलित परिजनों को आज तक न्याय नहीं मिला है, उसी की तर्ज़ पर इस फ़िल्म का कथानक रचा गया है जो कि पुलिस प्रक्रियात्मक थ्रिलर के ढंग से आगे बढ़ता है और अपनी उस तार्किक परिणति तक पहुँचता है जिस तक वह वास्तविक काण्ड नहीं पहुँच पाया है  इस दौरान नायक के साथ-साथ फ़िल्म देख रहे उस पाखंडी भारतीय समाज का भी उसी के भीतर सड़ांध मारती हुई उस वास्तविकता से साक्षात् करवाया गया है जिसे वह भलीभाँति जानने के बावजूद उसकी ओर देखने तथा उसके अस्तित्व को स्वीकार करने से परहेज़ करता है । फ़िल्म में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) की घटिया तथा पक्षपातपूर्ण कार्यशैली भी बेबाकी से दिखाई गई है जिसमें ईमानदारी से दोषियों को पकड़ने केे स्थान पर पीड़ित वर्ग को ही न केवल तंग किया जाता है वरन उसी पर मिथ्या दोषारोपण किया जाता है  बदायूँ में हुए वास्तविक कांड के संदर्भ में भी सीबीआई का यही रवैया (पीड़ित परिवारों की ज़ुबानी) सामने आया था । फ़िल्म में ये कटु सच्चाइयां इतने स्पष्ट रूप से दिखाई गई हैं कि मुझे भारतीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड से फ़िल्म का अपने मूल स्वरूप में पारित हो जाना ही फ़िल्मकार की एक उपलब्धि लगती है 

'मोहल्ला अस्सी' लगभग एक दशक की समयावधि (१९८८ से १९९८) में बाबा विश्वनाथ की नगरी के नाम से विख्यात काशी (अथवा वाराणसी अथवा बनारस) में हुईं सामाजिक-राजनीतिक हलचलों को सत्यनिष्ठा से प्रदर्शित करती है और साथ ही नब्बे के दशक में उभरे उदारीकरण और वैश्वीकरण द्वारा धर्मप्राण भारतीय मानस में सदा पावन समझी गईं पुरातन परंपराओं पर निर्ममता से किए गए प्रहारों और उनके दारूण परिणामों को भी बिना किसी लागलपेट के ज्यों-का-त्यों पटल पर रखती है । यह फ़िल्म परिवेश में हो रही सभी आंतरिक एवं बाह्य हलचलों को एक विद्वान एवं धर्मनिष्ठ पंडित को केंद्र में रखकर देखती है लेकिन उनका प्रभाव संपूर्ण ब्राह्मण (या यूँ कहिए कि सवर्ण) समाज पर किस प्रकार पड़ा था, इसे समग्रता से दर्शक-वर्ग के समक्ष प्रस्तुत करती है कभी देवभाषा के नाम से सम्मानित संस्कृत परिवर्तित परिवेश में जहाँ अंग्रेज़ी का ज्ञान ही प्रमुखतः महत्व रखता है, अपनी प्रासंगिकता किस प्रकार खो चुकी है, इस पर भी यह फ़िल्म मार्मिक ढंग से प्रकाश डालती है  

इन दोनों ही फ़िल्मों को देखने वालों को प्रत्यक्षतः ऐसा आभास हो सकता है कि 'आर्टिकल 15' तथाकथित मनुवादी वर्ण-व्यवस्था का विरोध करती है जबकि 'मोहल्ला अस्सी' उसका समर्थन  वस्तुतः ये दोनों ही फ़िल्में एक मानवीय दृष्टिकोण की अंतर्धारा लिए हुए चलती हैं जिसमें न तो किसी वर्ग का समर्थन है और न ही किसी वर्ग का विरोध  'आर्टिकल 15' का नायक दूसरों की उस पीड़ा को अनुभव करता है जो उसने नहीं भोगी और इसीलिए वह संवेदनशील युवक मन-ही-मन स्वयं को लज्जित भी पाता है कि वह ऐसे विशेषाधिकारों से युक्त वर्ग में जन्मा जिसमें ऐसी पीड़ाओं के लिए कोई सम्भावना नहीं है । यह अनुभूति राजकुल में जन्म लेकर सभी सुख भोगने वाले राजकुमार सिद्धार्थ की संसार में व्याप्त दुख की उस अनुभूति से तुलनीय है जिसने उन्हें गौतम बुद्ध बना दिया था । इसके विपरीत जीवन के ऊँचे मूल्यों को लेकर चलने वाले और 'सादा जीवन उच्च विचार' में आस्था रखने वाले 'मोहल्ला अस्सी' के धर्मनाथ पांडेय की पीड़ा पहले तो बाह्य रहती है लेकिन धीरे-धीरे समय के प्रवाह के साथ वह न केवल निजी बन जाती है वरन उसका स्वरूप भी बदल जाता है । अपने सिद्धांतों के साथ आजीवन समझौता न करने वाले और मूल्यों के हनन तथा भोगवादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध दूसरों से झगड़ते रहने वाले पांडेयजी को जब अपने परिवार के पालन-पोषण के निमित्त उनसे समझौता करना पड़ता है तो उससे जो कष्ट उभरता है, वह पूर्णतः उनका अपना है जिसमें उनकी उनके जैसी ही धर्मप्राण पत्नी के अतिरिक्त कोई साझेदार नहीं है । परिवार की निर्धनता एवं अभावों को लेकर उन्हें निरंतर ताने देती रहने वाली उनकी अर्द्धांगिनी भी नहीं चाहती कि सदा अपने सिद्धांतों के साथ जीने वाले पांडेयजी अब उन्हीं सिद्धांतों से समझौता करें लेकिन जीवन की कटु वास्तविकता ने पांडेयजी को यह अनुभव करवा दिया है कि संसार की भौतिक भागमभाग में वे बहुत पिछड़ चुके हैं और जो समझौता वे विवश होकर कर रहे हैं, वस्तुतः उसके लिए भी पहले ही बहुत विलम्ब हो चुका है । उनके द्वारा अपनी पत्नी से कही गई यह बात किसी भी आदर्शवादी हृदय को चीर  सकती है – रोटी का चक्कर जब कुचलता है तो सबसे पहले मूल्य-सिद्धांत ही कुचले जाते हैं सावित्री; ग़रीबी सब कुछ रौंद देती है  

'आर्टिकल 15' तथा 'मोहल्ला अस्सी' के विवेकशील दिग्दर्शकों ने नायकों के साथ-साथ  अन्य पात्रों को भी कथा-प्रवाह में यथोचित स्थान दिया है और उनके माध्यम से ठोस तथ्यों पर आधारित सच्चाइयों के साथ-साथ उनसे प्रभावित होने वाली मानसिकताओं को भी पूरी ईमानदारी से दर्शाया है । इस संदर्भ में वे वास्तविक जीवन के चरित्रों (जिनमें भारत के राजनेता तथा राजनीतिक दल सम्मिलित हैं) पर घेरा डालने से कतराए नहीं हैं और निर्भय होकर कथा के पात्रों के माध्यम से उन पर छींटाकशी की है  'आर्टिकल 15' में दलों के चुनाव-चिह्नों का उल्लेख करके उन्हें लक्ष्य बनाया गया है जबकि 'मोहल्ला अस्सी' में तो नेताओं के साफ़-साफ़ नाम लिए गए हैं  'आर्टिकल 15' की कहानी में एक विद्रोही दलित युवक तथा उसकी दलित वर्ग से ही संबंधित प्रेयसी भी है । यह पात्र तथा उसका दल निश्चय ही उत्तर प्रदेश के एक वास्तविक युवा दलित नेता एवं उनके दल से प्रेरित है । इन पात्रों के अतिरिक्त नायक के विभाग के अन्य पुलिसकर्मियों के पात्र, उसके घर में काम करने वाली कम आयु की कन्या का पात्र (जो कि एक पुलिसकर्मी की ही बहिन है), जातिवादी सोच वाले शोषक ठेकेदार का पात्र, शव-परीक्षण (पोस्टमार्टम) करने वाली चिकित्सिका का पात्रनायक की महिला-मित्र का पात्र (जिससे वह फ़ोन पर अपने अनुभव बांटता रहता है और विचार-विमर्श करता रहता है), नायक के बालपन के मित्र का पात्र, अफ़सरशाही वाली सोच रखने वाले सीबीआई के उच्चाधिकारी का पात्र आदि सभी कथा में अपनी पहचान बनाए रखते हैं तथा जितना भी समय (स्क्रीन टाइम) उन्हें मिलता हैदर्शकों के मन पर अपनी (अच्छी या बुरी) छाप छोड़ते हैं 'मोहल्ला अस्सी' में पांडेयजी के साथ-साथ उनकी धर्मपत्नी, उसकी सखी (जो कि एक नाविक की पत्नी है), विभिन्न प्रकार की दलालियां करके धनोपार्जन करने वाला तथाकथित गाइड, विदेशी पर्यटक स्त्री से विवाह करके कालांतर में योगाचार्य बन बैठने वाला नाई, पांडेयजी के मोहल्ले के अन्य ब्राह्मण जो कि अस्सी घाट पर बैठकर यजमानों के माध्यम से जीविकोपार्जन करते हैं, मांसाहार करके असत्य वोलने वाले ब्राह्मण गली के किराएदार युवक, सब्ज़ी की दुकान करने वाला मुसलमान, पर्यटक विदेशी महिलाएं, काशी के भविष्य की व्याख्या करने वाले महात्माजी, संस्कृत विद्यालय के व्यवस्थापक, पांडेयजी की बड़ी हो रही पुत्री और सबसे बढ़कर विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े वे लोग जो 'पप्पू की दुकान' के नाम से जानी जाने वाली एक चाय की दुकान पर चाय सुड़कते हुए हँसी-ठट्ठे के बीच सामाजिक-राजनीतिक बहस करते हैं; सभी कथानक में महत्वपूर्ण हैं । इस प्रकार ये दोनों ही फ़िल्में अपनी-अपनी बात का अधिकांश भाग अपने-अपने पात्रों और उनके संवादों के माध्यम से कहती हैं  दोनों ही फ़िल्मों के संवाद अत्यंत प्रभावशाली हैं और सीधे मर्म पर प्रहार करते हैं 

'आर्टिकल 15' की समीक्षा करते हुए एक समीक्षक महोदय ने फ़िल्मकार से प्रश्न किया है कि क्या होता यदि फ़िल्म का नायक ब्राह्मण न होकर दलित वर्ग (एस सी) से ही संबंधित होता प्रश्न उचित है जिसका उत्तर मेरे पास तो निश्चय ही है । संविधान-प्रदत्त आरक्षण की सुविधा से उच्च राजकीय पदों पर पहुँचने वाले ऐसे दलित वर्ग के अधिकारी विरले ही हैं जिन्होंने अपने वर्ग के निम्नतम स्तर पर नारकीय जीवन जी रहे लोगों की दशा सुधारने के लिए, उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकने तथा उत्पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए अथवा उन्हें मानव-जीवन की मूलभूत सुविधाओं से युक्त सम्मानपूर्ण जीवन जीने में सक्षम बनाने हेतु कुछ सार्थक कार्य किया है । ऐसे अधिकांश महानुभावों ने अपनी ऊर्जा अपने निज-हित की रक्षार्थ जातिगत आरक्षण को चिरस्थायी बनाने तथा उससे अधिकाधिक लाभ उठाने में ही व्यय की है अन्यथा मैला ढोने की घृणित प्रथा इक्कीसवीं सदी तक नहीं चलती रहती  पददलित वर्ग की वास्तविक समस्याओं एवं उन पर हो रहे अत्याचारों को देखने-समझने तथा उन्हें सच्चे अर्थों में न्याय दिलाने की दिशा में कुछ किया है तो उसी सवर्ण वर्ग के सही सोच वाले लोगों ने किया है जिन्हें दलित नेता तथा उन्हीं की बोली बोलने वाले आरक्षणवादी बिना सोचे-समझे गालियां देते रहते हैं  कथा के सवर्ण नायक की ही संवेदना उत्पीड़ितों के लिए जागी अन्यथा जातियों से भी आगे उपजातियों में बंटे हमारे समाज में विशुद्ध मानवीय आधार पर तथ्यों को देखने वाले कहाँ मिलते हैं और कितने मिलते हैं ? इस नग्न सत्य को कथानायक अपने थाने के अधीनस्थों के साथ होने वाली बातचीत में ही देख लेता है  'आर्टिकल 15' की वास्तविक आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि नायक को अंततः विजयी बनाने के लिए लेखकीय तथा सिनेमाई छूटें ली गई हैं जो वास्तविकता में संभव नहीं होतीं (अन्यथा बदायूँ कांड में मारी गई निर्दोष बालिकाओं एवं उनके दुखी परिवारों को भी न्याय मिल गया होता)  मैले से भरे गड्ढे में एक सफ़ाई कर्मचारी का बिना किसी रक्षक-उपकरण (प्रोटेक्टिव गियर) को धारण किए आपादमस्तक उतरने का दृश्य हृदयवेधक तो है किंतु व्यावहारिक नहीं लगता  संभवतः फ़िल्म को अधिक प्रभावशाली बनाने के अतिरिक्त प्रयास में ही दिग्दर्शक अनुभव सिन्हा उसे महानता की देहरी तक ही ले जा सके, उसकी परिधि में प्रवेश नहीं दिला सके 

'मोहल्ला अस्सी' की विभिन्न समीक्षकों ने तीखी आलोचना की है तथा कहा है कि किसी पुस्तक के आधार पर ऐसी फ़िल्म नहीं बननी चाहिए जिसे देखने से पहले (अर्थात् समझने के लिए) उस पुस्तक को पढ़ना आवश्यक हो क्योंकि सिनेमा अपने आप में एक स्वतंत्र माध्यम है । मैं इस तर्क को स्वीकार करता हूँ क्योंकि मैंने स्वयं काशीनाथजी की कृति 'काशी का अस्सीपढ़ी है और फ़िल्म देखने से पहले ही पढ़ी है । इसी कारण मैं समझ सकता हूँ कि पुस्तक को पढ़ने वाले उस पर आधारित इस फ़िल्म को बेहतर समझ सकते हैं और इसका बेहतर आनंद उठा सकते हैं  लेकिन ऐसा भी नहीं है कि जिन्होंने पुस्तक नहीं पढ़ी, उनके लिए यह फ़िल्म बेकार है । फ़िल्म मनोरंजक है और कथावाचक (एवं कथानायक) के दृष्टिकोण से प्रेरक भी । फिर भी यदि इसको देखकर किसी कमी का आभास होता है तो वह इस कारण है कि काशीनाथजी की कृति का विन्यास ही ऐसा है कि उस पर उचित लंबाई की फ़ीचर फ़िल्म ठीक तरह से बनाना कोई सरल कार्य नहीं । उसमें भारत में राजनीतिक तथा सामाजिक विक्षुब्धता एवं अस्थिरता से ओतप्रोत एक दशक के काशी के समाज (विशेषतः ब्राह्मण समाज) पर पड़े प्रभावों का विवरण विभिन्न अध्यायों के माध्यम से किसी रेखाचित्र की मानिंद किया गया है, कथा की मानिंद नहीं । इसीलिए चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा उस पर (मुख्यतः उसके एक अध्याय पर) पूरी लंबाई की फ़िल्म बनाने का निर्णय जोखिमपूर्ण ही था । जब पुस्तक की सामग्री ही बिखरी-बिखरी थी तो उस बिखराव का फ़िल्म में भी आ जाना स्वाभाविक ही था चाहे द्विवेदीजी ने फ़िल्म के लिए पटकथा कितनी भी सावधानी से लिखी हो । लेकिन बिखराव के बावजूद फ़िल्म अच्छी बन पड़ी है एवं इसकी कटु आलोचना अंग्रेज़ी के समीक्षकों ने इसलिए की है क्योंकि वे हिंदी फ़िल्में ही देखते हैं, हिंदी पुस्तकें नहीं पढ़ते; इसी कारण वे इसकी गुणवत्ता को ठीक से देख-समझ-पहचान नहीं सके  

'मोहल्ला अस्सी' की आलोचना अपशब्दों के प्रयोग के कारण भी की गई है जिसके कारण इसे महिलाओं के न देखने योग्य पाया गया है । चूंकि चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने पुस्तक की आत्मा को यथावत् रखते हुए ईमानदारी से फ़िल्म बनाई, इसलिए पुस्तक में प्रयुक्त अपशब्द समझे जाने वाले शब्दों को भी उन्होंने संवादों में स्थान दिया । मैं स्वयं फ़िल्मों में (तथा पुस्तकों में भी) अभद्र शब्दों के प्रयोग को वर्जनीय मानता हूँ तथा अनुभव सिन्हा की इस बात के लिए प्रशंसा करता हूँ कि कथानक के परिवेश को देखते हुए (पुलिसिया ज़ुबान वाले) अपशब्दों की गुंजाइश होने के बावजूद उन्होंने 'आर्टिकल 15' के संवादों को अपशब्दों से मुक्त रखा लेकिन द्विवेदीजी चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि यदि वे ऐसा करते तो फ़िल्म में पुस्तक की सामग्री ही रहती, उसकी आत्मा नहीं  यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देता हूँ कि फ़िल्म में माताओं-बहिनों को अपमानित करने वाले सर्वथा त्याज्य अपशब्द नहीं हैं बल्कि वे अपशब्द हैं जो काशी की लोकभाषा में अंग्रेज़ी भाषा के व्याकरण में अंतर्निहित सहायक क्रियाओं की भाँति उपयोग में लाए जाते हैं एवं जो जितना अधिक आत्मीय होता है, उस पर उतनी ही अधिक आवृत्ति में ये अपशब्द न्यौछावर किए जाते हैं  पुस्तक की ही भाँति फ़िल्म में भी दो ही अपशब्दों का प्रयोग किया गया है जिनमें से बात-बात पर और लगभग प्रत्येक वाक्य में लगाया जाने वाला (स्त्रियों द्वारा भी) अपशब्द तो एक ही है । शालीन दर्शक वर्ग यदि इस तथ्य को परिवेश की प्रामाणिकता के लिए आवश्यक मानकर सह ले तो यह फ़िल्म निश्चय ही उसे भी प्रशंसनीय ही लगेगी । जिन लोगों को भारतीय राजनीति तथा तत्कालीन (१९८८ से १९९८ की अवधि वाले) कालखंड में हुए सामाजिक-राजनीतिक उच्चावचनों तथा उनके जनमानस पर प्रभाव में रुचि है, उन्हें तो यह फ़िल्म पसंद न आने का कोई कारण ही नहीं है । सम्भवतः इन अपशब्दों के कारण ही इस फ़िल्म को विवेक से कोरे भारतीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने वर्षों तक अटकाए रखा और इसमें अनावश्यक काट-छांट भी की जिसने फ़िल्म के प्रभाव को भी घटाया और इसके व्यावसायिक रूप से सफल होने की संभावना को तो ग्रहण ही लगा दिया  

इन दोनों ही फ़िल्मों में कला-निर्देशकों तथा छायाकारों ने अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया है और कथानकों के परिवेश को हू-ब-हू चित्रपट पर उतार दिया है । दोनों में ही गीत-संगीत की अधिक गुंजाइश नहीं थी लेकिन संगीत-निर्देशकों ने अच्छा संगीत दिया है 'आर्टिकल 15' का सबसे असरदार नग़मा इसके आरंभ में ही आने वाला लोकगीतनुमा गाना 'कहब को लग जाई धक से' है जिसके बोलों से फ़िल्म की रूह झाँकती है और जिसे फ़िल्म में एक अहम किरदार निभाने वाली सयानी गुप्ता ने ही गाया है  लेकिन अनुभव सिन्हा (और फ़िल्म के संपादक) अगर केवल यह एक ही गाना फ़िल्म में रखते तो बेहतर होता  दोनों ही फ़िल्मों में पार्श्व संगीत भी अच्छा है और अभिनय पक्ष तो अत्यंत सराहनीय है । कुछ समय पूर्व तक इक्कीसवीं सदी के अमोल पालेकर कहे जा रहे आयुष्मान खुराना के अभिनय की सीमाएं लगातार फैलती जा रही हैं और 'आर्टिकल 15' में वे सचमुच के नायक बनकर उभरे हैं जो कहीं से भी फ़िल्मी नहीं लगता । छोटी-सी भूमिका में मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब भी दिल को छू जाते हैं । और बाकी कलाकारों के लिए इतना ही कहना पर्याप्त है कि उनमें मानो होड़ लगी थी कि कौन सबसे अच्छा अभिनय करता है   'मोहल्ला अस्सी' में सर्वश्रेष्ठ अभिनय निश्चय ही पांडेयजी की धर्मपत्नी सावित्री के रूप में साक्षी तंवर ने किया है । उनके बाद सबसे प्रभावशाली एक चतुर गाइड और दलाल के रूप में रवि किशन रहे हैं । सहायक भूमिकाओं में अन्य सभी कलाकारों ने कम समय मिलने पर भी कमाल कर दिखाया है और दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया है । सन्नी देओल को समीक्षकों ने विद्वान और कट्टर धार्मिक पंडित धर्मनाथ पांडेय की भूमिका के लिए अनुपयुक्त (मिस्कास्ट) बताया है लेकिन जहाँ तक मेरी राय है, वे केवल अपशब्दों का उच्चारण करते हुए ही अस्वाभाविक लगते हैं और ऐसा आभास होता है जैसे वे मन  मारकर विवशता में उन्हें अपने मुख से निकाल रहे हों । लेकिन इसके अतिरिक्त वे अपनी भूमिका में उपयुक्त ही लगते हैं और फ़िल्म के पहले भाग में पांडेयजी की अतिरेकपूर्ण धार्मिकता (या धर्मांधता) को तथा दूसरे भाग में उनकी निर्धनता-जनित विवशता और उससे उपजी आंतरिक पीड़ा को उन्होंने अत्यंत स्वाभाविकता से प्रदर्शित किया है  

दोनों ही फ़िल्में हिंदू चतुर्वर्णीय व्यवस्था में भी प्रत्येक वर्ण (या जाति) में विद्यमान ऊँचे-नीचे के विभाजन को सामने रखती हैं  'आर्टिकल 15' में जहाँ नायक को उसका सहायक बताता है कि उसकी सरयूपारीण जाति ब्राह्मण वर्ग में कान्यकुब्ज जाति से नीचे ही है, वहीं 'मोहल्ला अस्सी' में पांडेयजी को चतुर दलाल कन्नी उनके मुँह पर ही कह देता है कि उसका शांडिल्य गोत्र पांडेयजी के गोत्र से ऊँचा है (अतः वे धर्म के मामले को लेकर उससे बहस न करें)  और सौ बातों की एक बात - दोनों ही फ़िल्में अंत में अपने-अपने नायकों के हश्र द्वारा यह पत्थर जैसी चोट करने वाली हक़ीक़त दर्शकों के सामने रख देती हैं कि घाटे में वही रहेगा और तक़लीफ़ वही उठाएगा जो अपने अंतर की सुनेगा, अपने और अपने आदर्शों-सिद्धांतों के प्रति ईमानदार रहेगा । उसी के मन में तो पीड़ा उठेगी जिसकी अंतरात्मा अस्तित्व में होगी । जो अपनी अंतरात्मा को पहले ही गहरी नींद सुला चुके हों, उन्हें निजी भौतिक लाभ हेतु कुछ भी कर गुज़रने में कैसी हिचक होगी और कहाँ दर्द  होगा फिर भी हम चाहें तो 'आर्टिकल 15' में  विद्रोही  दलित नेता द्वारा  हत्यारों के हाथों प्राण गंवाने से पहले कही गई  इस अंतिम बात को स्मरण करके भविष्य के प्रति आशान्वित हो सकते हैं - 'हम आख़िरी थोड़े ही न थे 

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शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

दुनिया से निराले, मतवाले जादूगर की दास्तान

श्री पराग डिमरी मेरे अत्यंत प्रिय मित्र हैं और हम दोनों के स्वभाव की समानताओं के अतिरिक्त जो दो तथ्य हमें निकट लेकर आए (विगत आठ-नौ वर्षों से हमारी मित्रता अनवरत चल रही है), वे हैं – श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक द्वारा रचित उपन्यासों का रसिया होना तथा संगीत से लगाव । मैं यह जानता था कि पराग जी संगीत में गहन रुचि रखते हैं एवम् स्वर्गीय ओ.पी. नैय्यर साहब द्वारा सृजित गीतों के प्रति उनका अनुराग असाधारण है लेकिन मैं यह कभी नहीं भाँप सका था कि इस संबंध में उनका ज्ञान इतना अधिक है जब तक कि मैंने उनके द्वारा रचित पुस्तक – दुनिया से निराला हूँ, जादूगर मतवाला हूँनहीं पढ़ी थी ।

दुनिया से निराला हूँ, जादूगर मतवाला हूँओ.पी. नैय्यर के नाम से सुविख्यात ओंकार प्रसाद नैय्यर की दास्तान है, जीवन-कथा है । नैय्यर साहब सचमुच ही निराले थे, दूसरों से अलग थे, फिल्मी संगीतकारों की भीड़ में अपना अलग ही अस्तित्व, अलग ही परिचय रखते थे । वे अतुलनीय संगीतकार थे जिसने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी और जिसे शास्त्रीय संगीत का आधारभूत ज्ञान तक नहीं था लेकिन जिसकी बनाई हुई धुनों में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाला सम्मोहन था । उन्हें सदा एक ऐसे संगीतकार के रूप में स्मरण किया जाएगा जिसने स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर से कभी कोई गीत नहीं गवाया । यहाँ तक कि लता मंगेशकर के नाम से दिए जाने वाले सरकारी सम्मान को भी उन्होंने निस्संकोच ठुकरा दिया था ।

सम्प्रति समीक्षाधीन पुस्तक के रचयिता पराग डिमरी इस अनूठे संगीतकार के मुरीद हैं जिन्होंने इस पुस्तक को अत्यंत परिश्रमपूर्वक लिखा है और इसके लिए गहन शोध द्वारा प्रामाणिक तथ्य एकत्र किए हैं । न केवल नैय्यर साहब के निजी तथा कार्यसाधक जीवन वरन उनके सृजन से संबंधित तथ्यों के वर्णन की भी एक-एक पंक्ति, एक-एक शब्द डिमरी जी की निष्ठा, श्रम तथा सुरों के इस जादूगर के प्रति उनकी अनन्य आस्था को प्रतिबिम्बित करता है । परंतु इसके साथ-साथ यह श्रेय भी उन्हें देना ही होगा कि उन्होंने  भावनाओं में बहकर किसी अंधभक्त की भाँति लेखन नहीं किया है । उनका लेखन-कार्य पूर्णरूपेण वस्तुपरक एवम् निष्पक्ष है और इसीलिए विश्वसनीय है । स्वयम् मुरीद होकर भी उन्होंने अपने आराध्य को पीर-पैगम्बर या भगवान के समकक्ष न रखते हुए दुर्बलताओं से युक्त एक साधारण मानव के रूप में ही चित्रित किया है ।     

ओ.पी. नैय्यर मनमौजी थे और काम के साथ-साथ जीवन का भरपूर आनंद लेने में विश्वास रखते थे । सम्पूर्ण जीवन अपनी शर्तों पर जीने वाले इस अलबेले संगीतकार ने अपनी ज़िन्दगी का अंदाज़ हमेशा  शानो-शौक़त और स्टाइल से लबरेज़ रखा । अपनी रसिकमिज़ाजी के कारण महिलाओं का साथ उन्हें बहुत भाता था । संभवतः महिलाएं उनके सृजन के लिए प्रेरणा-स्रोत की भाँति थीं । इसके कारण उन्होंने अपने परिवार के प्रति दायित्वों से तो मुंह नहीं मोड़ा लेकिन अपने जीवन की संध्या में वे संगीत से मुंह मोड़कर अपना वार्धक्य एक ऐसे अजनबी परिवार (नख़वा परिवार) के साथ बिताने लगे जिससे उनके संबंध को समझ पाना किसी बाहरी व्यक्ति के लिए  असम्भव ही था (और है) । उन्होंने गीता दत्त तथा लता मंगेशकर की बहन आशा भोसले को गायिकाओं के रूप में स्थापित करने में महती भूमिका निभाई (चाहे आज आशा इसे स्वीकार न करती हों) । लेकिन गुरु दत्त को आत्मघात से न रोक पाने तथा गीता दत्त के जीवन के बुरे दौर में उन्हें सहारा न देने के लिए वे स्वयं को कभी मा नहीं कर सके और इन बातों के लिए आजीवन पछताते रहे । उनके स्वभाव का अक्खड़पन भी सदा बना रहा – जैसा उनके बेहतरीन वक़्त में था, वैसा ही उनके ढलते दौर में भी रहा । लेकिन भारतीय फ़िल्मी संगीत में शास्त्रीय परम्परा से हटकर नवाचरण की नई बयार चलाने वाले इस विद्रोही संगीतकार ने प्रत्येक फ़िल्म में अपना सर्वश्रेष्ठ ही दिया चाहे फ़िल्म किसी प्रतिष्ठित निर्माता की हो या फिर वह किसी छोटे निर्माता द्वारा बनाई गई दोयम दर्ज़े की फ़िल्म रही हो । अपने मिज़ाज के साथ समझौता नहीं करने वाले ओ.पी. नैय्यर ने कभी अपने काम की बेहतरी और पैसा देने वाले को उसका पूरा सिला देने की अपनी ईमानदाराना नीयत से भी कभी समझौता नहीं किया । नतीज़ा यह रहा कि लोग चाहे फ़िल्मों को भूल गए, ओ.पी. नैय्यर द्वारा रचे गए उनके गीतों को नहीं भूले । इन सभी तथा ओ.पी. नैय्यर के जीवन से संबंधित ऐसे अनेक अन्य तथ्यों को लेखक ने विभिन्न अध्यायों में विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया है ।

शब्दों में पिरोए गए महत्वपूर्ण तथ्यों के अतिरिक्त जो बात इस पुस्तक को विशिष्ट एवम् संग्रहणीय बनाती है, वह है उस बीत चुके स्वर्णिम युग की दुर्लभ तसवीरें । जो श्वेत-श्याम चित्र लेखक ने अपने अनथक परिश्रम से जुटाए हैं, उन्होंने इस किताब को केवल ओ.पी. नैय्यर की संगीत-यात्रा के ही नहीं, वरन हिंदी फ़िल्मों के इतिहास के एक अहम दस्तावेज़ में बदल डाला है । ओ.पी. नैय्यर के साथ-साथ विभिन्न गायक-गायिकाओं, गीतकारों, संगीतकारों और फ़िल्म-जगत के स्वनामधन्य लोगों की छवियां दर्शाते ये चित्र सच्चे संगीत-प्रेमियों के लिए उस युग का झरोखा हैं जब गीत-संगीत केवल एक व्यवसाय-मात्र न होकर एक साधना हुआ करता था

किताब की ख़ामियों की अगर बात की जाए तो यह कहना ही होगा कि प्रूफ़-रीडिंग स्तरीय नहीं है और अशुद्धियों की भरमार है । पुस्तक का विन्यास भी बेहतर हो सकता था । कुछ अध्यायों के शीर्षक भिन्न और अधिक उपयुक्त हो सकते थे । अलबत्ता कागज़ और छपाई की गुणवत्ता उच्च है तथा आवरण-पृष्ठ भी आकर्षक एवम् प्रशंसनीय है । चूंकि यह लेखक का प्रथम प्रयास है, अतः सिने-संगीत के प्रेमी विशेषतः ओ.पी. नैय्यर के प्रशंसक पुस्तक की त्रुटियों को क्षम्य मानकर उदार हृदय से इसे स्वीकार कर सकते हैं । आशा है, लेखक इन बातों को अपने ध्यान में रखेंगे तथा सुनिश्चित करेंगे कि उनकी अगली पुस्तक दोषमुक्त हो एवम् उसका प्रस्तुतीकरण बेहतर हो । बहरहाल ओ.पी. नैय्यर की मौसीक़ी के शैदाइयों के लिए यह किताब एक अनमोल तोहफ़ा है, इस बात में शक़ की कोई गुंजाइश नहीं ।

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गुरुवार, 21 जनवरी 2021

भारतीय क्रिकेट टीम के संकटमोचन : बिन्नी और मदन

अब जबकि भारतीय क्रिकेट दल द्वारा शक्तिशाली ऑस्ट्रेलियाई दल को उसके घर में ही पराजित करके विश्व टेस्ट चैम्पियनशिप में  अंकतालिका के शीर्ष पर विराजमान होने पर भारतीय क्रिकेट-प्रेमी मंत्रमुग्ध हो रहे हैं तो मुझे दो ऐसे भारतीय हरफ़नमौला (ऑलराउंडर) खिलाड़ियों की याद आ रही है जिन्होंने न केवल १९८३ के विश्व कप में एवं उसके दो वर्षों के भीतर ही ऑस्ट्रेलिया में आयोजित विश्व चैम्पियनशिप में भारत की ऐतिहासिक विजयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी वरन अस्सी के दशक में विभिन्न टेस्ट मैचों में भी भारतीय क्रिकेट दल के लिए संकटमोचन सिद्ध हुए थे । ये कभी हिम्मत न हारने वाले एवं जीवट के धनी हरफ़नमौला थे - मदन लाल तथा रोजर बिन्नी ।

रोजर माइकल हम्फ़्री बिन्नी ने १९७९ में भारत के लिए पहला मैच खेला लेकिन इस प्रतिभाशाली ऑलराउंडर को अपनी पहली टेस्ट शृंखला में गेंद और बल्ले दोनों ही से संतोषजनक प्रदर्शन करने के बावजूद भारतीय चयनकर्ताओं का विश्वास जीतने में लंबा समय लगा । जल्दी ही उन्हें भारतीय दल से बाहर कर दिया गया जिसके लिए चयनकर्ताओं की आलोचना भी हुई । आख़िर १९८३ के विश्व कप के लिए कपिल देव के नेतृत्व में जब भारतीय दल का चयन हुआ, तब बिन्नी को अवसर मिला तथा उन्होंने इस अवसर का पूरा लाभ उठाते हुए अपने शानदार प्रदर्शन से भारत की अविस्मरणीय विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर भारतीय टेस्ट एवं एकदिवसीय क्रिकेट टीम में अपने लिए पक्का स्थान बनाया जिसके बाद वे बीच-बीच में दल से बाहर होते रहने के बावजूद १९८७ तक भारत के लिए खेले ।


मदन लाल शर्मा को भारत के लिए खेलने का अवसर १९७४ में ही मिल गया था जिसके बाद उन्होंने भारत के लिए टेस्ट ही नहीं, सीमित ओवरों के एक दिवसीय मैच भी उन दिनों खेले, जिन दिनों यह प्रारूप अपनी शैशवावस्था में था । मदन लाल को विश्व कप क्रिकेट की पहली गेंद फेंकने (बाउल करने) का श्रेय प्राप्त हुआ जब उन्होंने १९७५ में इंग्लैंड में हुए पहले विश्व कप के उद्घाटन मैच में इंग्लैंड के ही विरुद्ध नई गेंद से भारतीय तेज़ गेंदबाज़ी आक्रमण की शुरुआत की और अपना नाम इतिहास में लिखवा लिया । वे भारतीय क्रिकेट की एक ऐतिहासिक उपलब्धि के भी साक्षी बने जब १९७६ में भारत ने वेस्ट इंडीज़ की अत्यंत शक्तिशाली टीम को पोर्ट ऑव स्पेन टेस्ट में चौथी पारी में चार सौ से भी अधिक रनों का लक्ष्य प्राप्त करके हरा दिया । इस टेस्ट में मदन लाल ने भारत की पहली पारी में सर्वाधिक ४२ रन बनाए थे जबकि दूसरी पारी में वे मैदान में बृजेश पटेल के साथ उस ऐतिहासिक क्षण में उपस्थित थे जब विजयी लक्ष्य प्राप्त हुआ । भारतीय क्रिकेट में कपिल देव का युग आरंभ होने के बाद प्रायः मदन लाल ही उनके नई गेंद के जोड़ीदार रहे तथा १९८१ में बंबई टेस्ट में जब भारत ने इंग्लैंड को दूसरी पारी में केवल १०२ रन पर धराशायी करके टेस्ट जीता था तो मदन लाल ने केवल २३ रन देकर पाँच विकेट लिए थे । १९८२-८३ में छः टेस्ट मैचों के पाकिस्तान दौरे में भारत बुरी तरह हार गया लेकिन मदन लाल ने इमरान ख़ान की ख़ौफ़नाक स्विंग गेंदबाज़ी का ज़ोरदार तरीके से सामना किया तथा कराची टेस्ट की दूसरी पारी में नॉट आउट रहते हुए ५२ रन तथा फ़ैसलाबाद टेस्ट की पहली पारी में ५४ रन बनाए । यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उस ज़माने में वे विश्व के सर्वश्रेष्ठ आउट-फ़ील्डरों में से एक थे । घरेलू क्रिकेट में भी वे भरपूर योगदान देते थे । परंतु रोजर बिन्नी की ही भाँति मदन लाल को भी भारतीय चयनकर्ताओं का विश्वास लगातार नहीं मिल सका । अतः वे भी भारतीय दल में कभी ले लिए जाते थे तो कभी बाहर कर दिए जाते थे । अंततः उनके भी अंतर्राष्ट्रीय खेल जीवन का स्वर्णिम अध्याय १९८३ का विश्व कप ही बना ।

१९८३ के विश्व कप के लिए जब कपिल देव के नेतृत्व में चौदह सदस्यीय भारतीय दल चुना गया तो मदन लाल को तो चुना ही गया, रोजर बिन्नी को भी लंबे समय के उपरांत वापस बुलाया गया । दोनों ने ही अपनी धारदार गेंदबाज़ी का कमाल पहले ही मैच से दिखाना शुरु कर दिया जब पहले के दोनों विश्व कपों में एक भी मैच न हारने वाली शक्तिशाली वेस्ट इंडीज़ टीम को भारत ने पहले ही मैच में चौंतीस रन से हरा दिया । इस मैच में बिन्नी ने तीन महत्वपूर्ण विकेट लिए । अगले ही मैच में मदन ने तीन महत्वपूर्ण विकेट लेकर मैन ऑव द मैच का पुरस्कार जीता जब भारत ने ज़िम्बाब्वे की टीम पर आसान जीत दर्ज़ की । आगे के दो मैच बुरी तरह से हारने के बाद ज़िम्बाब्वे के विरुद्ध दूसरे मैच में भी भारत पर पराजय का संकट आ खड़ा हुआ जब भारत ने केवल १७ रन के कुल योग पर पाँच विकेट खो दिए । ऐसे में कपिल देव ने नॉट आउट रहते हुए १७५ रनों की असाधारण पारी खेली और भारत को सुरक्षित स्कोर तक पहुँचाया । लेकिन कपिल की यह ऐतिहासिक पारी बिना साझेदारों के संभव नहीं हो सकती थी । पहले बिन्नी ने उनका साथ दिया और छठे विकेट के लिए ६० रन जोड़े । फिर मदन उनके साथी बने और आठवें विकेट के लिए ६२ रन की भागीदारी हुई (आख़िर में कपिल का साथ विकेटकीपर किरमानी ने दिया जिन्होंने उनके साथ १२६ रनों की अविजित साझेदारी की) । 

अब भारत फिर से सेमीफ़ाइनल की दौड़ में आ गया था लेकिन अंतिम मैच ऑस्ट्रेलिया के साथ था जिसने भारत को पहले मैच में बहुत बुरी तरह (१६२ रनों से) हराया था । भारत ने ऑस्ट्रेलिया को २४८ रन का लक्ष्य दिया जिसके जवाब में मदन और बिन्नी की धारदार गेंदबाज़ी के सामने ऑस्ट्रेलियाई टीम चारों खाने चित्त हो गई और भारत ने ११८ रनों की शाही जीत के साथ शान से सेमीफ़ाइनल में प्रवेश किया । बिन्नी ने चार विकेट लेकर ऑस्ट्रेलियाई पारी की रीढ़ तोड़ दी और मैन ऑव द मैच बने जबकि मदन ने भी चार विकेट लेकर ऑस्ट्रेलियाई पारी का परदा गिरा दिया ।

सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड को सहजता से पराजित करके भारत फ़ाइनल में पहुँचा जहाँ क्लाइव लॉयड के नेतृत्व में शक्तिशाली वेस्ट इंडीज़ की टीम लगातार तीसरा विश्व कप जीतने के लिए तैयार बैठी थी । वेस्ट इंडीज़ के ख़तरनाक तेज़ गेंदबाज़ों ने भारतीय पारी को केवल १८३ रनों पर समेट दिया लेकिन भारत ने ज़ोरदार जवाबी प्रहार किया और मदन लाल ने तीन विकेट लेकर वेस्ट इंडियन पारी की कमर तोड़ दी । इन तीन विकेटों में विवियन रिचर्ड्स का बेशकीमती विकेट भी शामिल था जिसका कपिल देव ने पीछे की ओर भागते हुए असाधारण कैच लपका था । रोजर बिन्नी ने वेस्ट इंडीज़ के कप्तान लॉयड को आउट किया और अंततः भारत ने तैंतालीस रनों से मैच, फ़ाइनल और कप जीतकर इतिहास रच दिया । पूरे विश्व कप में बिन्नी और मदन की गेंदबाज़ी छाई रही । जहाँ बिन्नी ने सर्वाधिक अट्ठारह विकेट लिए, वहीं मदन ने सतरह विकेट लिए । 

कुछ महीनों बाद पाकिस्तान की टीम भारतीय दौरे पर आई जिसमें इमरान ख़ान और अब्दुल क़ादिर जैसे कई बड़े खिलाड़ी शामिल नहीं थे । लेकिन बंगलौर में खेले गए पहले टेस्ट में पाकिस्तान के दोयम दर्ज़े के गेंदबाज़ी आक्रमण के सामने भारत के सूरमा बल्लेबाज़ों ने घुटने टेक दिए और भारत ने ८५ रनों पर ही छः विकेट खो दिए  । ऐसे में रोजर बिन्नी और मदन लाल भारत के लिए संकटमोचन बने और उन्होंने सातवें विकेट पर १५५ रनों की रिकॉर्ड साझेदारी निभाकर भारत को संकट से निकाला । बिन्नी अंत तक आउट नहीं हुए और उन्होंने ८३ रन बनाए जबकि मदन ने ७४ रन बनाए । दोनों के ही टेस्ट करियर के ये सर्वोच्च स्कोर रहे । मदन ने तीन महत्वपूर्ण विकेट भी लिए और मैन ऑव द मैच का पुरस्कार जीता ।

इसी शृंखला के दूसरे टेस्ट (जालंधर) में बिन्नी ने अपना लगातार दूसरा अर्द्धशतक (५४ रन) बनाया लेकिन तीसरे टेस्ट (नागपुर) में उन्हें भारतीय एकादश में सम्मिलित नहीं किया गया । इस टेस्ट के अंतिम दिन पहली पारी में ७७ रनों से पिछड़े भारत ने अपनी दूसरी पारी में भी आठ विकेट खो दिए और अचानक ही पराजय का ख़तरा मंडराने लगा । ऐसे में मदन ने विकेटकीपर किरमानी के साथ नवें विकेट पर ५५ रनों की अविजित साझेदारी की और टेस्ट को ड्रॉ करवाया । 

इसके तुरंत पश्चात् विश्व कप में अपनी पराजय से लगी चोट को सहलाते हुए क्लाइव लॉयड किसी घायल सिंह की भाँति अपना दल लेकर छः टेस्ट मैचों की शृंखला खेलने के लिए भारत पहुँचे । कानपुर में खेले गए पहले टेस्ट में वेस्ट इंडीज़ ने ४५४ रनों का स्कोर खड़ा किया और फिर मैल्कम मार्शल की अगुआई में उसके तेज़ गेंदबाज़ों ने ऐसी डरावनी गेंदबाज़ी की कि भारत के आठ विकेट केवल नब्बे रनों पर ही गिर गए और फ़ॉलोऑन का ख़तरा सर पर आ गया । ऐसे में रोजर बिन्नी और मदन लाल एक बार फिर संकट के साथी बनकर विकेट पर आ डटे और भारत के नामी बल्लेबाज़ों को बल्लेबाज़ी का सबक देते हुए नवें विकेट पर ११७ रनों की साझेदारी निभा डाली । बिन्नी ३९ रन बनाकर आउट हुए जबकि मदन ने अंत तक नॉट आउट रहते हुए ६३ रन बनाए । भारत न फ़ॉलोऑन बचा सका, न ही टेस्ट लेकिन बिन्नी और मदन के खेल का लोहा सभी को मानना पड़ा । 

दिल्ली में खेले गए इस शृंखला के दूसरे टेस्ट में पहली पारी में भारत ने ज़बरदस्त बल्लेबाज़ी करते हुए ४६४ रन बनाए जिसमें बिन्नी के भी ५२ रन शामिल थे । अंतिम दिन दूसरी पारी में भारतीय बल्लेबाज़ों की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बल्लेबाज़ी का नतीज़ा यह निकला कि केवल १६६ रनों पर आठ विकेट गिर गए और एक अनचाहा संकट सामने आ गया । फिर से भारत के संकटमोचन बिन्नी और मदन ने धीरज के साथ विकेट पर टिकते हुए नवें विकेट पर ५२ रन जोड़े और मैच का रुख़ भारत की हार से परे करते हुए अनिर्णय की ओर मोड़ा । 

अहमदाबाद में हुए तीसरे टेस्ट में मदन को भारतीय एकादश से बाहर कर दिया गया । ऐसे में बिन्नी ने कपिल के साथ भारतीय गेंदबाज़ी आक्रमण की शुरुआत करते हुए देखते-ही-देखते वेस्ट इंडीज़ के तीन विकेट सस्ते में चटका दिए । लेकिन छः ओवर डालने के बाद ही मांसपेशियों के खिंचाव के कारण उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा और उसके बाद वे मैच में गेंदबाज़ी नहीं कर सके । नतीजा यह निकला कि गेंदबाज़ी का लगभग पूरा दायित्व कपिल देव पर ही आ गया और दूसरी पारी में कपिल की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ी (नौ विकेट) के बावजूद भारत टेस्ट हार गया  

भारत यह शृंखला बुरी तरह से हारा लेकिन बिन्नी ने सभी टेस्ट खेलते हुए कई उपयोगी पारियां खेलीं जबकि मदन को केवल तीन टेस्ट मैचों में अवसर मिला । एक गेंदबाज़ के रूप में यह मदन के करियर का सबसे ख़राब दौर था जब उन्हें लगातार पाँच टेस्ट मैचों में कोई विकेट नहीं मिला । लेकिन एक सच यह भी था कि एक कप्तान के रूप में कपिल ने उन पर अधिक विश्वास नहीं जताया और उनके द्वारा खेले गए इस शृंखला के तीन टेस्ट मैचों में उन्हें बहुत कम ओवर दिए । 

कुछ माह के उपरांत (१९८४ में) शारजाह में आयोजित प्रथम एशिया कप क्रिकेट प्रतियोगिता में कपिल भारतीय दल का हिस्सा नहीं रहे लेकिन सुनील गावस्कर के नेतृत्व में भारतीय दल ने श्रीलंका और पाकिस्तान को सरलता से हराते हुए कप जीत लिया । जीत का अधिकतम श्रेय (तथा प्रमुख पुरस्कार) विकेटकीपर-बल्लेबाज़ सुरिंदर खन्ना ले गए लेकिन बिन्नी और मदन ने भी भारत की विजयों में महत्वपूर्ण योगदान दिया । श्रीलंका के विरुद्ध हुए प्रथम मैच में मदन ने तीन विकेट लिए जबकि पाकिस्तान के विरुद्ध हुए द्वितीय मैच में बिन्नी ने तीन विकेट लिए । 

कुछ माह के अंतराल के पश्चात् पाँच एक दिवसीय मैचों की शृंखला खेलने के लिए किम ह्यूज के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम भारत आई तो सलामी बल्लेबाज़ जोड़ी का चयन भारत के लिए एक समस्या बन गया क्योंकि कप्तान सुनील गावस्कर मध्य क्रम में खेलना चाहते थी और दूसरे बल्लेबाज़ फ़ॉर्म में नहीं थे । ऐसे में चौथे मैच में रवि शास्त्री के साथ रोजर बिन्नी को पारी की शुरुआत के लिए भेजा गया । बिन्नी ने शास्त्री के साथ प्रथम विकेट पर शतकीय साझेदारी निभाते हुए अपने एक दिवसीय करियर का सर्वश्रेष्ठ स्कोर (५७ रन) बनाया लेकिन उसके उपरांत कभी उन्हें ऐसा अवसर पुनः नहीं दिया गया । 

तदोपरांत पाकिस्तान के संक्षिप्त दौरे (भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के आकस्मिक निधन के कारण यह दौरा बीच में ही समाप्त कर दिया गया था) के पश्चात् जब डेविड गोवर के नेतृत्व में इंग्लैंड का दल भारत के लंबे दौरे पर आया तो बिन्नी और मदन, दोनों को ही भारतीय दल से बाहर कर दिया गया । इंग्लैंड की कमज़ोर टीम ने भी भारत को उसके घर में ही (टेस्ट और एक दिवसीय मैचों, दोनों की ही) शृंखला में परास्त किया और गावस्कर को कप्तान के रूप में पहली बार घरेलू टेस्ट शृंखला में पराजय सहनी पड़ी । 

फ़रवरी १९८५ में विक्टोरिया में यूरोपीय सैटलमेंट की डेढ़ सौ वीं जयंती के अवसर पर ऑस्ट्रेलिया में आयोजित बेंसन एंड हेजेज़ विश्व क्रिकेट चैम्पियनशिप के लिए जब सुनील गावस्कर के नेतृत्व में भारतीय दल चुना गया तो चयनकर्ताओं ने विवेक का परिचय देते हुए रोजर बिन्नी और मदन लाल को पुनः भारतीय दल में सम्मिलित किया । भारत ने सम्पूर्ण प्रतियोगिता में उच्च स्तरीय खेल का प्रदर्शन करते हुए अपने सभी मैच एवं अंततः प्रतियोगिता भी जीत ली जो निश्चय ही एक असाधारण उपलब्धि थी । बिन्नी अस्वस्थ होने के कारण फ़ाइनल नहीं खेल सके लेकिन उन्होंने  भारत की विजयों में अपनी भूमिका निभाते हुए स्पर्द्धा में आठ विकेट लिए जबकि मदन ने सात विकेट लिए । बिन्नी ने पाकिस्तान के विरुद्ध पहले ही मैच में चार विकेट चटकाए जबकि मदन ने न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध कठिन सेमीफ़ाइनल मैच में चार विकेट लिए । 

उसके उपरांत भारत ने रोथमैंस कप भी जीता लेकिन अगले विदेशी दौरों के लिए भारतीय दल के चयन में मदन लाल को पूरी तरह से उपेक्षित किया गया जबकि रोजर बिन्नी को श्रीलंका में हुई अप्रत्याशित पराजय के उपरांत ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के दौरों के लिए चुना गया । ऑस्ट्रेलिया दौरे में भारत बार-बार विजय के निकट पहुँच कर भी चूक गया लेकिन इंग्लैंड दौरे में कप्तान कपिल देव को अंततः चिर-प्रतीक्षित विजय मिल ही गई । लॉर्ड्स में हुए प्रथम टेस्ट में विजय के उपरांत भारतीय तेज़ गेंदबाज़ चेतन शर्मा के अस्वस्थ होने के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई कि उनके स्थान पर किसे लिया जाए । मदन लाल तो भ्रमणकारी भारतीय दल के सदस्य ही नहीं थे । लेकिन वे उन दिनों इंग्लैंड में ही थे और लंकाशायर की ओर से काउंटी क्रिकेट चैम्पियनशिप में खेल रहे थे । ऐसे में भारतीय दल प्रबंधन ने भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड से (तथा इंग्लैंड के भी संबंधित प्राधिकरण से) अनुमति लेकर मदन लाल को हैडिंग्ले (लीड्स) में खेले गए दूसरे टेस्ट के लिए भारतीय एकादश में सम्मिलित किया । और फिर जो हुआ, वह इतिहास है । 

२० जून, १९८६ से आरंभ हुए इस टेस्ट में  भारत के पहली पारी के २७२ रनों के उत्तर में इंग्लैंड की टीम मैदान में उतरी और कपिल के साथ मदन ने भारतीय गेंदबाज़ी आक्रमण का श्रीगणेश किया । देखते-ही-देखते मदन ने इंग्लैंड के दो विकेट और कपिल ने एक विकेट चटका दिए और स्कोर केवल चौदह रन पर तीन विकेट हो गया । कुछ देर बाद बिन्नी ने गेंद संभाली और अपने तब तक के करियर की सबसे प्रभावी गेंदबाज़ी करते हुए इंग्लैंड के पाँच विकेट गिरा दिए । मदन ने इंग्लैंड की इस पारी के कुल तीन विकेट लिए और भारत के इन दोनों हरफ़नमौला सीमरों के आगे इंग्लैंड की पारी १०२ रनों पर ढेर हो गई । भारत ने यह टेस्ट (और साथ ही शृंखला भी) मुश्किल से सवा तीन दिन में २७९ रनों के भारी अंतर से जीता जो उस समय टेस्ट क्रिकेट में इस दृष्‍टि से भारत की सबसे बड़ी जीत थी । मैन ऑव द मैच का पुरस्कार दिलीप वेंगसरकर को मिला लेकिन भारतीय गेंदबाज़ी के हीरो बिन्नी और मदन ही थे । इस मैच जिताऊ प्रदर्शन के बावजूद यह मदन के करियर का अंतिम टेस्ट साबित हुआ । एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैचों में वे अंतिम बार भारत के लिए १९८७ में  खेले । उन्हें भारत में ही आयोजित रिलायंस विश्व कप के लिए भी भारतीय दल में नहीं चुना गया । 

बिन्नी बहरहाल रिलायंस विश्व कप में खेले और उसके उपरांत उनके अंतर्राष्ट्रीय करियर का भी समापन हो गया । लेकिन उससे पूर्व उन्होंने भ्रमणकारी पाकिस्तानी दल के विरूद्ध टेस्ट शृंखला में भारत का प्रतिनिधित्व किया जिसके कलकत्ता टेस्ट में उन्होंने अपने टेस्ट करियर की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ी करते हुए पहली पारी में छः विकेट  और दूसरी पारी में दो विकेट लिए लेकिन भारत वह मैच जीतने में सफल नहीं रहा । बिन्नी के टेस्ट करियर का पाकिस्तान और बंगलौर से कुछ अजीब-सा नाता रहा । उन्होंने अपने  प्रथम एवं अंतिम टेस्ट पाकिस्तान के विरुद्ध बंगलौर में ही खेले और अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ी भी पाकिस्तान के विरुद्ध (१९८३ में) बंगलौर टेस्ट में ही की । 

बिन्नी और मदन ने बाद के वर्षों में भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ताओं की भूमिका भी निभाई । मदन भारतीय क्रिकेट टीम के प्रशिक्षक भी बने और वे इतने अनुशासन-प्रिय थे कि सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली जैसे नामी खिलाड़ियों को भी खरी-खरी सुनाने से चूकते नहीं थे । सम्भवतः इसीलिए एक कोच के रूप में उन्हें लंबा कार्यकाल नहीं दिया गया क्योंकि भारत में ठकुरसुहाती कहने वालों की ही कद्र है । बिन्नी के पुत्र स्टुअर्ट ने भी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व किया और उनके नाम एक दिवसीय क्रिकेट में भारत की ओर से सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ी (बांग्लादेश के विरुद्ध केवल चार रन देकर छः विकेट) का रिकॉर्ड है । 

रोजर बिन्नी और मदन लाल आज अपने जीवन के वार्धक्य में हैं और अपने स्वर्णिम अतीत को स्मरण करके आनंदित हो सकते हैं । भारतीय क्रिकेट टीम में हरफ़नमौला खिलाड़ी इनके जाने के बाद भी आए लेकिन जो जीवट इन दोनों में था - मुश्किल हालात में भी हौसला न हारने और जूझने का, वह फिर किसी भारतीय हरफ़नमौला क्रिकेटर में देखने को नहीं मिला । भारतीय क्रिकेट इनके योगदान को सदैव स्मरण रखेगा । 

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