बुधवार, 16 मार्च 2011

कहीं आप ब्रेकिंग प्वॉइंट के निकट तो नहीं ?

तनाव आज के भागते हुए जीवन का एक ऐसा सच बन गया है जिसे अनदेखा करना अपने आपको छलने से अधिक कुछ भी नहीं । हर पत्र-पत्रिका में आए दिन तनाव, उसके प्रभावों एवं उससे बचने अथवा उससे राहत पाने के उपायों पर लिखा जा रहा है । तनाव से राहत तो सभी चाहते हैं किन्तु वस्तुतः ऐसा कैसे किया जाए, इसका व्यावहारिक ज्ञान बहुत ही कम लोगों को होता है ।

तनाव की कई अवस्थाएँ होती हैं । पहली अवस्था रोज़मर्रा के तनाव की है जिसका कि व्यक्ति-चाहे वह कोई विद्यार्थी हो या कामकाजी मानव या गृहिणी-आदी हो जाता है और उससे उसकी सामान्य दिनचर्या पर कोई विपरीत प्रभाव इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि वह तनाव वस्तुतः उस दिनचर्या का ही एक अंग बन चुका होता है ।

किन्तु तनाव की अगली अवस्थाएँ जिन्हें कि एडवांस्ड स्टेजेज़ कहा जाता है, विशेष ध्यानाकर्षण माँगती हैं । एक ऐसी ही अवस्था को बोलचाल की भाषा में ब्रेकिंग प्वॉइंट कहा जाता है । यह वह बिंदु है जहाँ पहुँचकर तनावग्रस्त व्यक्ति मानसिक रूप से टूट जाता है । ऐसे में वह किसी शारीरिक व्याधि से ग्रस्त हो सकता है अथवा तंत्रिकाताप (न्यूरोसिस) की चपेट में आ सकता है । शारीरिक व्याधि में नर्वस ब्रेकडाउन से लेकर ब्रेन हैमरेज तक आ सकते हैं और जीवनलीला समाप्त तक हो सकती है । मानसिक स्तर पर व्यक्ति अधिक परेशान हो जाए तो उसका प्रभाव तंत्रिकाताप की सूरत में उसकी दैनंदिन गतिविधियों पर नज़र आ सकता है । अगर सावधानी न बरती जाए और तुरंत उपचारात्मक कदम न उठाए जाएँ तो तंत्रिकाताप मनस्ताप (साइकोसिस) की शक्ल ले सकता है और व्यक्ति लोगों की दृष्टि में मनोरोगी बन सकता है । ऐसे में आत्मघात की भी पूरी-पूरी संभावनाएँ होती हैं ।

ऐसी नौबत न आए, इसके लिए तनावग्रस्त व्यक्ति को स्वयं ही अपना ख़याल रखना होगा । उसे इस सार्वभौम सत्य को आत्मसात करना होगा कि संसार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति वह स्वयं है तथा अन्य सभी लोग बाद में आते हैं । यदि आप तनावग्रस्त हैं तथा आपको यह अहसास हो रहा है कि धीरे-धीरे आप अपने ब्रेकिंग प्वॉइंट के निकट पहुँचते जा रहे हैं तो निम्नलिखित उपायों पर अमल करें :

1. यदि घर एवं परिवार के भीतर कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है जिससे अपने तनाव का कारण एवं परिस्थिति कही जा सके तो ऐसे किसी विश्वसनीय मित्र अथवा शुभचिन्तक को ढूंढें जो बिना कोई अनावश्यक सलाह दिए एवं टीका-टिप्पणी किए आपकी बात को सहानुभूतिपूर्वक सुने एवं उसे गोपनीय रखे । एक बार अपने तनाव एवं घुटन को किसी से कह देने के बाद आप हलकापन महसूस करेंगे एवं ब्रेकिंग प्वॉइंट दूर खिसक जाएगा । इस मामले में सावचेत रहना आवश्यक है क्योंकि यदि वह व्यक्ति विश्वसनीय नहीं है तो आपकी गोपनीय बात के सार्वजनिक हो जाने अथवा भविष्य में उसी व्यक्ति के द्वारा आप पर इस बात को लेकर ताना कसे जाने या प्रहार किए जाने का संभावना रहती है ।

2. तनाव की स्थिति में रसभरी चीज़ें यथा चेरी, स्ट्राबेरी आदि खाएँ क्योंकि तनाव का निकट संबंध मूड से होता है और रसभरी चीज़ें मूड सुधारने वाली मानी जाती हैं । इस संदर्भ में चॉकलेट को भी विशेषज्ञों ने लाभदायक माना है ।

3. अपनी पसंद की पुस्तकें पढ़ें, फ़िल्में देखें एवं गीत सुनें । पढ़ी हुई पुस्तक को दोबारा पढ़ने एवं देखी हुई फ़िल्म को दोबारा देखने में कोई हर्ज़ नहीं होता है वरन् कभी-कभी तो दोबारा पढ़ते या देखते समय किसी प्रसंग या संवाद के नये मायने समझ में आ जाते हैं और देखने या पढ़ने वाले को ऐसी नई दिशा मिलती है कि निराशा छूमंतर हो जाती है – भले ही थोड़े समय के लिए । पर यह अस्थायी परिवर्तन भी व्यक्ति को उसके ब्रेकिंग प्वॉइंट से दूर कर देता है । संगीत में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिये तो अपने आप को संभालना बेहद सुगम है । न केवल आशा से परिपूर्ण गीत वरन् निराशा एवं दुख में डूबे हुए गीत भी सुनने वाले को स्वयं को संभालने में मदद करते हैं क्योंकि वह गीत के बोलों से अपने जीवन एवं परिस्थिति को जोड़कर देखता है एवं उसे लगता है कि जैसे गीत के रूप में उसी की कहानी कही जा रही है । इससे वह अन्य किसी व्यक्ति से बात किए बिना भी अपने आप को हलका अनुभव करता है ।

4. उन लोगों से पूरी तरह दूर रहें जो आपके ज़ख्मों को कुरेदते हों या आपको हीनता का अहसास कराते हों । ऐसे लोगों से संपूर्ण रूप से दूरी बनाते हुए (उन्हें अवॉइड करते हुए) अन्य लोगों से मिलें जिनसे आप पहले अधिक न मिलते रहे हों । नए लोगों से होने वाली नई बातें न केवल अपने साथ चिपके हुए तनाव की तरफ़ से ध्यान हटाती हैं बल्कि उनके माध्यम से कई बार ऐसी नई गतिविधियों में सम्मिलित होने का अवसर मिल जाता है जो किसी समस्या के व्यावहारिक हल अथवा मानसिक शांति की ओर ले जाती हैं ।

5. जब ऐसा लगे कि हृदय दुख से लबालब भर गया है और रोना आ रहा है तो एकान्त में रोने में कोई बुराई नहीं । अकसर लोग रोने के लिए किसी के कंधे की तलाश करते हैं लेकिन अगर किसी निकट व्यक्ति का कंधा न मिले तो आँसुओं को रोके रखना ठीक नहीं क्योंकि ये मन में भरे हुए दुख को बाहर निकाल देते हैं और शरीर के रासायनिक संतुलन को ठीक कर देते हैं जिससे रो लेने के बाद व्यक्ति को हलकेपन का अनुभव होता है । हाँ, दीर्घावधि तक रोना एवं बारंबार रोना निश्चय ही हानिकारक है ।

इन उपायों पर अमल करें एवं देखें कि आप तनावग्रस्त एवं समस्याग्रस्त होने के बावजूद टूटेंगे नहीं । यह भी स्मरण रखें कि समस्याओं से पलायन नहीं किया जा सकता । पलायन का कोई भी प्रयास केवल कायरता है और कुछ नहीं । ज़िन्दगी की लड़ाई में आपदा रूपी साँड को सींगों से पकड़ना होगा । संघर्ष एवं जुझारूपन का कोई विकल्प नहीं । इसीलिए कहा गया है – टफ़ टाइम्स नैवर लास्ट बट टफ़ पीपुल डू ।

© Copyrights reserved

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

संवेदना

आज भारतीय समाज या यूँ कहें कि संपूर्ण मानव समाज एक गंभीर समस्या से जूझ रहा है और वह है संवेदनहीनता की समस्या । सच पूछिए तो यही वह समस्या है जो कि अनेक अन्य समस्याओं का मूल है । यही वह समस्या है जिसने निराशा की अंधकारमय रात्रि को इतना दीर्घ कर दिया है कि प्रकाश की किरण कहीं दूरदूर तक दृष्टिगोचर नहीं होती । इसीलिए आज मानव समाज को जिस बात की सबसे अधिक आवश्यकता है वह है संवेदना अथवा संवेदनशीलता ।

कहते हैं कि दर्द जब हद से गुज़र जाता है तो वह दवा बन जाता है । इसका आशय यह नहीं कि हद से गुज़र जाने के बाद दर्द समाप्त हो जाता है या अपने आप ठीक हो जाता है । इसका आशय यह है कि सहनशक्ति की सीमा से आगे निकल जाने के बाद व्यक्ति उस दर्द के प्रति संवेदनहीन हो जाता है अर्थात् दर्द उपस्थित तो रहता है किन्तु दर्द सहने वाले की देह ऐसी सुन्न हो चुकी होती है कि उसे दर्द के होने की अनुभूति ही नहीं होती । यह अवस्था तो दर्द के होने से भी अधिक संकटपूर्ण है क्योंकि दर्द उपस्थित रहता है तो व्यक्ति उस दर्द को दूर करने के लिए इच्छुक एवं जागरूक रहता है एवं उस दिशा में प्रयास करता है जबकि दर्द की अनुभूति ही समाप्त हो जाए तो व्यक्ति उसके प्रति लापरवाह हो जाता है और अपने कष्ट के निवारण के लिए इच्छुक ही नहीं रहता । वह उस दर्द के साथ जीना सीख जाता है । यह संवेदनहीनता ही उसकी चिकित्सा में सबसे बड़ा बाधक तत्व बन जाती है । यह उपमा हमारे इस सुंदर विश्व तथा हमारे इस महान राष्ट्र की अनेक ज्वलंत समस्याओं पर चरितार्थ होती है । समस्याओं को जीवन का अपरिहार्य अंग मानकर जब अंगीकार कर लिया जाता है तो क्या आश्चर्य कि हम उनकी उपस्थिति के प्रति संवेदनशील ही न रहें और उनके समाधान की कोई आवश्यकता ही न समझें ? समस्या के समाधान की दिशा में प्रथम पग है उसके अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता ।

आज हमारे समाज से करूणा, परोपकार, भ्रातृत्व-भाव आदि भावनाओं का लोप होता जा रहा है । सड़क पर पड़े दर्द से कराह रहे व्यक्ति से हम कतराकर निकल जाते हैं । किसी रोते हुए बालक के अश्रु हमें विगलित नहीं करते । निर्धन की निर्धनता हो या पीड़ित की पीड़ा, हम उसी प्रकार निष्प्रभावित रहते हैं जिस प्रकार चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता । कारण वही कि हमारी संवेदना या तो समाप्तप्रायः हो गई है या अत्यन्त दुर्बल । समाज तो नागरिकों से ही बनता है । जब नागरिकों में ही संवेदना न रहे तो समाज कैसे संवेदनशील बने ?

चाहे कोई भी समाज हो, हमारी मानसिकता अत्यन्त तटस्थ होती जा रही है । मुहल्ले में, समुदाय में, वृहत् समाज में, राष्ट्र में अथवा संसार में चाहे जो भी हो जाए, हमारी तो एक ही प्रतिक्रिया होती है हमें क्या ? और हम कोऊ नृप होय हमें का हानिकी पुरातन कहावत को चरितार्थ करते दृष्टिगोचर होते हैं । हमारी संवेदना अब हमें किसी भी बात पर झकझोरती ही नहीं । न्यूनाधिक हम सभी कोई मरे कोई जिये, सुथरा घोल बताशा पियेवाली श्रेणी में आ गए हैं । जब तक कि स्वयं हम पर या हमारे किसी सगे वाले पर कोई विपदा न आए, हमारी संवेदना जड़ रूप में ही रहती है ।

यही कारण है कि चाहे भ्रष्टाचार हो या राजनीति का अपराधीकरण, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता और ऐसी समस्याएँ ज्यों-की-त्यों बनी ही नहीं रहतीं वरन् दिन-ब-दिन बढ़ती ही जाती हैं । हम समाचार-पत्र की सुर्खियों पर एक दृष्टि डालते हैं और फिर उसे एक ओर उछाल देते हैं । कभीकभार घर की बैठक में या कार्यालय में अवकाश के क्षणों में अवश्य चर्चा छिड़ सकती है लेकिन वह समय बिताने की विलासिता ही होती है, उसमें कोई ऐसी संवेदना नहीं होती जो कि किसी ठोस कार्य का आधार बन सके । अगर कोई हमारी संवेदना को झिंझोड़ने का प्रयास भी करे तो हम वही अपना मानक राग अलापते हैं - भई, अपनी ही समस्याएँ इतनी अधिक हैं कि दूसरों की क्या सोचें ?’ हमारी यही तटस्थता कुमार्गियों को संबल प्रदान करती है । उचित ही कहा गया है कि बुराई की विजय तो तभी हो जाती है जब अच्छाई अपने नेत्र बंद कर लेती है । हम भूल जाते हैं कि कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़े सुखन, ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है ।

कोई भी सफल एवं महान राष्ट्र बनता है संवेदनशील एवं जागरूक नागरिकों से, तथाकथित तटस्थ एवं आत्मकेंद्रित नागरिकों से नहीं । बुराइयों के प्रति संवेदना जागेगी तभी तो उन्हें दूर करने का प्रयास होगा । शरीर में चुभा हुआ काँटा निकालने की आवश्यकता तभी तो अनुभव होगी जबकि उसकी चुभन से दर्द की लहर देह में दौड़ेगी । अतः प्रथम आवश्यकता है अपनी संवेदना को जगाना, हमें क्या की मानसिकता से बाहर आना । हम स्वयं संवेदनशील बनेंगे तभी तो दूसरों को संवेदनशील बनाने का कोई सार्थक प्रयास कर पाएंगे ।

बुरा व्यक्ति उपदेशों से प्रभावित नहीं होता । संवेदनहीन प्रशासन हमारे कहने भर से संवेदनशील नहीं बन सकता । जड़भूत समाज की संवेदनाएँ खोखली चर्चाओं से पुनरूद्भूत नहीं होने वालीं । क्षेत्र कोई भी हो, पर उपदेश कुशल बहुतेरेसे काम नहीं चलता । अतः पहले हम स्वयं संवेदनशील बनें तथा इस बात को अपने आचार में उतारकर अन्य लोगों के लिए उदाहरण बनें । तभी हमारी बात में वज़न आएगा तथा वह दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के योग्य बनेगी । हमारा अनुकरण लोग तभी तो करेंगे जब हमारा अपना आचरण उन्हें अनुकरणीय लगे । तदोपरांत हम प्रयास कर सकते हैं कि एक से दूसरा, दूसरे से तीसरा, तीसरे से चौथा व्यक्ति संवेदनशील बने तथा यह संवेदनशीलता समाज में एक संक्रामक रोग की भाँति प्रसृत हो । भ्रष्ट व्यक्ति भ्रष्टाचार छोड़ने की बात तभी सोच सकता है जबकि वह उसके दुष्परिणामों को अपनी आँखों से देखे तथा उनके प्रति संवेदनशील बने । अपराधी अपराध तभी छोड़ सकता है जबकि वह अपने अपराध से प्रभावित लोगों की पीड़ा को देखे, समझे, जाने तथा उसके भीतर की सुप्त संवेदनशीलता जागृत हो । यह संवेदना ही वह नींव की ईंट है जिस पर एक स्वस्थ और उदात्त समाज रूपी राजप्रासाद का निर्माण हो सकता है ।

आज अगर हम अपने निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर कुछ नहीं सोच पाते तो इसका एक ही कारण है संवेदना का अभाव । संवेदना जागृत होगी तो सोच अपने आप ही सही दिशा में मुड़ेगी । व्यक्ति से परिवार, परिवार से समुदाय, समुदाय से ग्राम, ग्राम से राज्य और राज्य से राष्ट्र में संवेदनाओं का प्रसार होगा और तमाम बिगड़ी बातें बनने लगेंगी । एक बार अपनी संवेदना का दामन थामकर अकेले चलिए तो सही । आगे चलकर आपको यह शेर बरबस ही याद आ जाएगा - मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल, लोग आते गए, कारवाँ बनता गया ।

© Copyrights reserved




बुधवार, 26 जनवरी 2011

भावनाएँ


मानवीय जीवन का एक अविभाज्य अंग हैं भावनाएँ । भावनाओं के बिना जीवन कैसा ? भावनाएँ ही तो हैं जो कि एक रुखेसूखे और रंगहीन जीवन को रसरंगयुक्त बनाती हैं । एक भावनाविहीन जीवन उपयोगी तो हो सकता है लेकिन उसकी उपयोगिता सीमित ही रहेगी । यदि व्यक्ति भावनाओं से रहित है तो न तो उसकी प्रतिभा का ही समुचित उपयोग हो सकता है और न ही उसके प्रयास अपनी सम्पूर्णता में सफल हो सकते हैं । अतः जीवन में भावनात्मक होना अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

अकसर ऐसा कहा जाता है कि जीवन तर्क तथा मस्तिष्क से चलना चाहिए, भावनाओं तथा हृदय से नहीं । व्यावहारिक जीवन में यह बात कुछ हद तक सही है, विशेष रुप से संकट के समय में क्योंकि कठिन समय में भावनाएँ कभी-कभी विचार-प्रक्रिया को अवरुद्ध कर देती हैं । लेकिन इसके साथ ही यह भी सत्य है कि संकट जितना बड़ा हो, संकल्प उतना ही दृढ़ होना चाहिए और संकल्प का सीधा संबंध हृदय से है जो कि भावनाओं से जुड़ा होता है । जिस संकल्प के पीछे भावना नहीं है, वह किसी भी झंझावात में एक कमज़ोर वृक्ष की भाँति लड़खड़ा कर टूट सकता है । 

अब प्रश्न यह है कि भावनात्मक होने से क्या अभिप्राय है ? क्या बातबात पर अश्रु बहाने लगना तथा गले का रुंध जाना ही भावनात्मक होना है ? बातबेबात पर भावनाओं में बह जाने तथा तदनुरुप ही व्यवहार करने लगने को ही क्या हम व्यक्ति का भावनात्मक होना समझें ? मेरे विचार से यह सही नहीं है क्योंकि भावुकता तथा भावनात्मकता में एक सूक्ष्म अंतर है जो कि व्यक्ति की परिपक्वता से संबंध रखता है । अतिभावुक व्यक्ति संकट के समय में अपने को संभाल नहीं सकता । उसके लिए तो अपनी सहायता करना भी कठिन हो जाता है, अन्य की तो बात ही क्या । जबकि भावनात्मक व्यक्ति वह है जो भावना और कर्तव्य में संतुलन करना जानता हो, जो भावनाओं को अपने हृदय में संजोकर रखे लेकिन उन्हें कर्तव्य-पालन पर हावी न होने दे । 

दशकों पूर्व महान कहानीकार जैनेन्द्र कुमार ने एक कहानी लिखी थी – श्रेय एवं प्रेय । सच्चा भावनात्मक व्यक्ति वही है जो कि श्रेय अथवा कर्तव्य तथा प्रेय अथवा प्रिय कार्य में उचितअनुचित का भेद कर सके तथा सही समय पर सही कार्य का चुनाव कर सके । उदात्त भावनाओं को अपने हृदय में स्थान देते हुए उनके अनुरुप ही चलकर कर्तव्य-पालन में कोई चूक न करना ही सच्चे भावनात्मक व्यक्ति की पहचान है । ऐसा व्यक्ति ही श्रेय को प्रेय से पृथक् करके उसे अपने जीवन में प्राथमिकता दे सकता है ।

भावनाओं के कई प्रकार होते हैं । जब हम भावनात्मक होने की बात करते हैं तो हमारा आशय उदात्त एवं वांछनीय भावनाओं से ही होता है । यहाँ मैं जयशंकर प्रसाद जी के प्रसिद्ध नाटक – ‘कामना’ का स्मरण करता हूँ जिसमें विभिन्न मानवीय भावनाओं को चरित्रों के माध्यम से दो वर्गों में बाँटकर प्रस्तुत किया गया था । एक ओर उदात्त एवं कोमल भावनाएँ होती हैं यथा कामना, संतोष, उदारता, करुणा, प्रेम, निष्कपटता, विनोद आदि तथा दूसरी ओर कुछ ऐसी भावनाएँ भी होती हैं जो मानवीय जीवन के कृष्ण पक्ष से संबंध रखती हैं यथा लालसा, विलास, कपट, क्रूरता आदि जिनसे दूरी ही भली । जब हम व्यक्ति से भावनात्मक होने की अपेक्षा करते हैं तो हमारा अभिप्राय वांछनीय भावनाओं से ही होता है जो कि जीवन को सुखद बनाएं, उसके सौंदर्य को बढ़ाएं, उसे संसार हेतु मूल्यवान बनने में सहयोग दें ।

जीवन का भावनात्मक पक्ष प्रबल होने पर ही व्यक्ति निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर अन्य व्यक्तियों या और अधिक विस्तृत रुप में कहें तो अन्य प्राणियों के विषय में सोचता है, उनके सौंदर्य को सराहता है तथा उनके संताप को स्वानुभूत करता है । ऐसा व्यक्ति ही अपने जीवन को जनोपयोगी बना सकता है क्योंकि उसके भीतर की भावनात्मकता उसे आत्मकेंद्रित तथा स्वार्थी बनने से रोकती है । प्राणिमात्र के प्रति करुणा का भाव रखना तथा दीनदुखियों की यथासंभव सहायता करना एक भावनात्मक व्यक्ति के ही वश की बात है, भावनाविहीन व्यक्ति के वश की नहीं ।

मेरा एक निजी विचार यह भी है कि व्यक्ति भावनात्मक तो बने पर अपनी उदात्त भावनाओं के प्रतिदान में कभी कुछ चाहे नहीं । कुछ चाहने की भावना यदि अन्य भावनाओं पर हावी होने लगे तो व्यक्ति की उदारता एवं आंतरिक सौंदर्य का क्रमश: ह्रास होने लगता है और यह बात व्यक्ति को स्वयं पता नहीं लगती । अत: भावनात्मक व्यक्ति को चाहिए कि वह देने के भाव को अपने हृदय में सर्वोच्च स्थान दे किंतु कुछ पाने की लालसा से नहीं । इसमें कोई संदेह नहीं कि यह कार्य अत्यंत कठिन है किंतु यही नि:स्वार्थ भाव एक भावनात्मक व्यक्ति को साधारण से असाधारण बनाता है और उसे महानता के पथ पर अग्रसर करता है । तथापि कुछ चाहना हो तो यही चाहे कि उसकी उदारता का कुछ अंश उन लोगों के व्यक्तित्व में भी प्रविष्ट हो जो उसके संपर्क में आएं और उसकी भावनात्मकता से किसी-न-किसी रुप में प्रभावित हों ।

चूँकि भावनाएँ व्यक्तित्व का एक कोमल पक्ष हैं, अत: हमें चाहिए कि कभी किसी भी कारण से हम किसी भी व्यक्ति की भावनाओं को ठेस न पहुँचाएं । किसी की कोमल भावनाओं को ठेस पहुँचाकर हम उसके व्यक्तित्व के सकारात्मक पक्ष पर आघात करते हैं जो कि अंततोगत्वा व्यक्तिगत तथा सामाजिक स्तर पर नकारात्मक परिणाम ही लाता है । इसके विपरीत किसी की भावनाओं का आदर करके और उसकी भावनात्मकता को सकारात्मक प्रतिक्रिया देकर हम उसके व्यक्तित्व के उज्ज्वल पक्ष को उभार सकते हैं । सहानुभूति और प्रेम तो ऐसी सकारात्मक भावनाएँ हैं जो कि दैत्य को भी देव बना सकती हैं ।

अस्तु, भावनात्मकता मानवीय व्यक्तित्व का वह पहलू है जो उसे रसमय बनाता है तथा स्वार्थी एवं निष्ठुर नहीं बनने देता । भावनाएँ मानव को ईश्वरीय देन हैं जिन्हें संजोकर रखना तथा विकसित करना व्यक्ति का अपना कार्य है । इस कार्य में उसका पारिवारिक तथा सामाजिक वातावरण भी अपनी महती भूमिका निभाता है । एक भावनात्मक व्यक्ति ही समाजोपयोगी हो सकता है, यह बात समाज को भी समझनी चाहिए । आइए, हम भावनाओं के मूल्य को समझें, स्वयं भावनात्मक बनें तथा अन्य लोगों को भी भावनात्मक बनाने में अपना सकारात्मक योगदान दें ।
© Copyrights reserved