जब हिंदी में लुगदी साहित्य की श्रेणी के अंतर्गत विविध उपन्यास नियमित रूप से रचे जाते थे, तब कई उपन्यासकार कुछ ऐसे पात्रों का भी सृजन करते थे जो कि उनके उपन्यासों में दोहराए जाते थे। ऐसे पात्र स्टॉक कैरेक्टर अथवा स्थायी पात्र कहलाते थे। स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत बहुत-से पात्र ऐसे ही हैं। लेकिन इस सीरीज़ से हटकर भी उन्होंने कुछ ऐसे अद्भुत पात्रों का सृजन किया जो पाठकों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ गये। ऐसे एक पात्र का नाम है - विभा जिंदल।
विभा जिंदल को वेद प्रकाश शर्मा ने सबसे पहले अपने थ्रिलर उपन्यास 'साढ़े तीन घंटे' में प्रस्तुत किया था। वेद प्रकाश शर्मा ने उस उपन्यास में स्वयं को (तथा अपनी पत्नी मधु को) भी प्रस्तुत किया था। यद्यपि विभा का पात्र काल्पनिक ही है, वेद जी ने उन्हें अपने कॉलेज की सहपाठिनी बताया एवं यह बताया कि वे उनसे प्रेम करने लगे थे किन्तु उन्हें यह बात बताने से झिझकते थे। कॉलेज के अंतिम दिन विभा ने उनसे बातचीत की एवं बताया कि वे उनकी भावनाओं से परिचित हैं लेकिन उन्हें इन बातों से परे हटकर अपने लेखन पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि उनमें एक उच्च श्रेणी का जासूसी उपन्यासकार बनने के गुण हैं। वेद जी ने लिखा है (उपन्यास में अपनी पत्नी मधु को बताते हुए) कि विभा की बात को गांठ बाँधकर वे अन्य बातों से ध्यान हटाकर केवल लेखन में ध्यान लगाने लगे। विभा का विवाह एक उद्योगपति परिवार में अनूप जिंदल से हुआ तथा इस प्रकार वे जिन्दल परिवार की बहू बनीं और विभा जिन्दल कहलाने लगीं। वेद जी ने 'साढ़े तीन घंटे' में लिखा है कि वे सपत्नीक विभा से मिलने उनके नगर जिंदलपुरम गये। जिन्दल परिवार के भव्य आवास का नाम 'मंदिर' है क्योंकि उसकी दीवारों पर सम्पूर्ण रामायण अंकित की गई है। वेद जी की इसी यात्रा के दौरान विभा के पति अनूप जिंदल साढ़े तीन घंटे के लिए अपने कमरे में बंद हो जाते हैं तथा उस अवधि के पूर्ण होने पर स्वयं को गोली मारकर आत्महत्या कर लेते हैं। इस उपन्यास का कथानक यही है कि विभा अपने पति को खोने के ग़म को भूलकर किसी कुशल जासूस की भांति उसकी मृत्यु की छानबीन करने लगती हैं तथा अंत में वास्तविक अपराधी को पकड़ने के साथ-साथ सम्पूर्ण रहस्य को भी स्पष्ट कर देती हैं।
कुछ वर्षों के उपरांत वेद प्रकाश शर्मा ने विभा जिंदल को लेकर दूसरा उपन्यास लिखा - 'बीवी का नशा' जिसमें उन्होंने एक बार फिर स्वयं को एक पात्र के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने लिखा कि उनके एक मित्र संजय ने अपनी पत्नी की सहेली की हत्या कर दी थी जिसके आरोप में उसी की पत्नी किरन फंस गई थी और उसके पास कोई ऐसा सबूत नहीं था जिससे वह यह प्रमाणित कर सके कि हत्या उसकी पत्नी ने नहीं, ख़ुद उसी ने की थी। अब वेद जी उसे साथ लेकर चल देते हैं जिन्दलपुरम विभा जिंदल से मिलने और इस मामले में उनकी मदद माँगने। विभा संजय की मदद करती हैं एवं एक कुशल अण्वेषक (इनवेस्टिगेटर) की भांति न केवल सारे रहस्य की परतें खोल देती हैं बल्कि संजय को भी निर्दोष सिद्ध करके वास्तविक हत्यारे को बेनक़ाब कर देती हैं। वेद जी यह भी बताते हैं कि 'साढ़े तीन घंटे' में अपने पति की मृत्यु के समय विभा गर्भवती थीं तथा कुछ समय के उपरांत उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम बाद में वेद जी ने 'विराट' बताया।
एक दशक से अधिक के उपरांत वेद जी ने 'मि० चैलेंज' नामक एक उपन्यास लिखा जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हीं के शहर मेरठ के एक कॉलेज में पहले एक महिला व्याख्याता का क़त्ल होता है एवं उसके बाद तो एक के बाद एक क़त्लों का सिलसिला ही चल पड़ता है। अब वे पुनः विभा को जिन्दलपुरम से बुलवाते हैं जिसके लिये वे स्वयं अपना ही अपहरण हो गया दर्शाते हैं। विभा जिंदलपुरम से आती हैं और पहले तो वेद जी को ही ढूंढ़ती हैं तथा उसके बाद सारे मामले की इनवेस्टिगेशन करके हत्यारे के चेहरे को अनावृत कर देती हैं। इस उपन्यास में वेद जी ने समय काल को ध्यान में रखते हुए (अपनी पत्नी मधु के साथ-साथ) अपने चार बच्चों का उल्लेख किया है तथा अपने नन्हे पुत्र शगुन को विभा के साथ-साथ रहकर उनकी इनवेस्टिगेशन में शामिल होते हुए बताया है। चूंकि इस उपन्यास की पृष्ठभूमि वेद जी ने अपने गृहनगर मेरठ को बनाया है, उपन्यास में मेरठ के विभिन्न स्थानों का भी उल्लेख है एवं पाठक उपन्यास के पृष्ठों के माध्यम से मेरठ की सैर करता है।
एक लंबे समय के अंतराल के बाद वेद जी ने विभा को लेकर पुनः एक उपन्यास लिखा - 'क्योंकि वो बीवियां बदलते थे'। इस उपन्यास की ख़ासियत यह है कि उपन्यास में हो रही विभिन्न हत्याओं का कारण उपन्यास के शीर्षक में ही स्पष्ट कर दिया गया है। फिर भी यह उपन्यास अत्यन्त रोचक बन पड़ा है। इस बार विभा को विभिन्न उद्योगपति घरानों के पुरुषों एवं महिलाओं की एक के बाद एक हो रही हत्याओं के रहस्य को सुलझाना है। इस काम में उनकी मदद वेद जी तथा उनका बेटा शगुन भी करते हैं। यह सुदीर्घ उपन्यास पाठकों के दिमाग़ को चकरा कर रख देता है। हत्यारे की वास्तविकता अंतिम पृष्ठ पर अंतिम पंक्तियों में ही पता चलती है। इस उपन्यास में वेद जी ने विभा के व्यक्तित्व पर भी आयु का प्रभाव पड़ा दिखाया है और साथ ही बताया है कि उनका पुत्र विराट अब बड़ा हो चुका है।
विभा जिंदल के ये चारों उपन्यास वेद जी की श्रेष्ठ कृतियों में सम्मिलित हैं। जिस प्रकार विश्वप्रसिद्ध रहस्यकथा लेखिका अगाथा क्रिस्टी ने मिस मार्पल नामक एक उम्रदराज़ महिला जासूस का अत्यन्त लोकप्रिय पात्र रचा है, कुछ-कुछ वैसा ही यह वेद जी द्वारा रचा गया पात्र है। विभा के साथ-साथ स्वयं को एवं अपने परिवार के सदस्यों को भी इन उपन्यासों में प्रस्तुत करके वेद जी ने न केवल इस काल्पनिक चरित्र पर वास्तविकता का रंग चढ़ाया है वरन उपन्यासों की रोचकता को भी बढ़ा दिया है। इन उपन्यासों में वेद जी ने स्वयं को एक सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति के रूप में ही चित्रित किया है। और जहाँ तक विभा के चित्रण की बात है, वेद जी ने अपने शब्दों से विभा के व्यक्तित्व का ऐसा जीवंत चित्र ख़ींचा है कि इन उपन्यासों को पढ़ते समय हमें लगता है मानो हम किसी काल्पनिक पात्र के बारे में नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि अपने सामने जीती-जागती विभा जिंदल को उपस्थित देख रहे हैं। यूँ तो वेद जी ने विकास, वतन, केशव पंडित आदि कई पात्रों का सृजन किया है लेकिन विभा जिन्दल की बात ही कुछ और है। जिन्हें हिंदी उपन्यास पढ़ने में रुचि है, उन्हें मैं सलाह दूंगा कि इन उपन्यासों को पढ़ें एवं जिन्दलपुरम के औद्योगिक साम्राज्य की मालकिन होते हुए भी सादगी से परिपूर्ण इस असाधारण नारी से मिलें।
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विभा जिंदल के विषय में काफी सुना है। इस शृंखला का पहला उपन्यास भी मेरे संग्रह में मौजूद है। जल्द ही पढ़ने की कोशिश रहेगी। शृंखला के सभी उपन्यासों की विषय वस्तु रोचक लग रही है। वो भी मिले तो पढ़ने की कोशिश रहेगी।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार विकास जी। विभा जिंदल के सभी उपन्यास सहज उपलब्ध हैं। हो सके तो सभी को पढ़िए।
हटाएंबढ़िया विश्लेषण किया है आपने। अब तो शायद ही कोई उपन्यास जो छूटा हो इनका पढ़ने के लिए। इतना रोचक होता है कि पढ़ने बैठे तो कितना भी बड़ा क्यों ना हो दो ढाई घंटे में खत्म हो जाता है। शर्मा जी जैसा कोई लिखने में नया लेखक नहीं दिखा। एक सत्य व्यास जी हैं इनका पढ़ा हूं ये भी रोचक लिखते हैं ।
जवाब देंहटाएंबहुत-बहुत आभार आदरणीय पाण्डेय जी
हटाएंलाजवाब समीक्षा !
जवाब देंहटाएंसमीक्षा चाहे फिल्मों की हो या उपन्यास की ,आप ऐसा लिखते हैं कि उस उपन्यास या फिल्म को पढने समझने देखने की उत्कट लालसा उत्पन्न हो जाती है ।
🙏🙏🙏🙏
हृदयतल से आपका आभार माननीया सुधा जी
हटाएंअद्भुत एवं रोचक पोस्ट ..,वेद प्रकाश जी के ये उपन्यास पढ़ने की उत्सुकता हो गई इस पोस्ट को पढ़कर ।काश अब भी पहले की तरह इन उपन्यासों की सर्व सुलभता जगह जगह बुक स्टॉलस् पर होती तो ये उपन्यास निश्चित रुप से मेरे संग्रह में सम्मिलित होते ।
जवाब देंहटाएंहृदयतल से आपका आभार प्रकट करता हूँ माननीया मीना जी। ये उपन्यास सरलता से उपलब्ध हैं। आप इंटरनेट पर ढूंढ़िए।
हटाएंवेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उनके पात्र बिल्कुल असली इंसानों जैसे लगते हैं। विभा जिंदल का किरदार भी ऐसा ही है। वह समझदार, साहसी और हर रहस्य को सुलझाने वाली महिला के रूप में बहुत प्रभावित करती हैं। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
जवाब देंहटाएंअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद