भारतीय स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न नायकों (एवं नायिकाओं) में से किसी ने मेरे हृदय पर स्थायी रूप से आधिपत्य जमाया है तो वे हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस। सुभाष बाबू ने अपने जीवन को ऐसे जिया कि आज उसका सिंहावलोकन करने पर एक रूमानियत का अहसास होता है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने जो कर दिखाया, वह आज एक स्वप्न सरीखा लगता है। वे मेरे प्रेरणा-स्रोत रहे हैं और रहेंगे। उनके प्रशंसकों की संख्या वैसे तो करोड़ों में है लेकिन मैं एक व्यक्ति को निश्चय ही जानता हूँ जिसके मन में सुभाष बाबू का वही स्थान रहा जो मेरे मन में है। वह व्यक्ति है - हिंदी उपन्यासकार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा।
वेद प्रकाश शर्मा ने यूँ तो भारत के स्वाधीनता संग्राम को आधार बनाकर कई उपन्यास लिखे किंतु वे सुभाष बाबू के व्यक्तित्व की दृढ़ता एवं अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा से बहुत अधिक प्रभावित रहे और उन्होंने कुछ उपन्यास ऐसे लिखे जिनमें सुभाष बाबू स्वयं एक पात्र के रूप में उपस्थित हैं। प्रमुखतः दो ऐसे कथानक उन्होंने रचे - पहला 'ख़ून दो आज़ादी लो' व 'बिच्छू' नामक दो भागों में विभाजित कथानक तथा दूसरा 'जय हिंद' व 'वंदे मातरम' नामक दो भागों में विभाजित कथानक। पहला कथानक पराधीन भारत में अंग्रेज़ों से लोहा ले रहे क्रांतिकारियों की गतिविधियों का वर्णन करता है जबकि दूसरा कथानक स्वाधीन भारत में सुभाष बाबू के जीवन से प्रेरित भारतीय युवकों के एक विदेशी षड्यंत्र द्वारा गुमराह हो जाने का वर्णन करता है। मैं अपने इस लेख में इन्हीं दोनों कथानकों की जानकारी दे रहा हूँ।
'ख़ून दो आज़ादी लो' व 'बिच्छू': वेद प्रकाश शर्मा ने भारत की स्वतंत्रता हेतु अंग्रेज़ों से जूझने वाले एक क्रांतिकारी दल की गतिविधियों को आधार बनाते हुए 'वतन की कसम' नामक थ्रिलर उपन्यास लिखा था जो अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। उसकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर वेद जी ने उसका सीक्वल लिखने का निर्णय लिया जो कि इन उपन्यासों के रूप में सामने आया। 'वतन की कसम' के अंतिम दृश्य से आरंभ हुए इस कथानक में बताया गया है कि 'वतन की कसम' में जिस क्रांति दल का उल्लेख था, वास्तविक क्रांति दल उससे बहुत अधिक बड़ा है जिसके सरदार की वास्तविकता कोई नहीं जानता है। सरदार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपना आदर्श एवं प्रेरणा-स्रोत मानता है तथा समय-समय पर उनसे मार्गदर्शन लेता है। नेताजी उसे मार्गदर्शन देने के अतिरिक्त दल की गतिविधियों में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाते हैं। वह अपनी वास्तविकता केवल नेताजी पर ही प्रकट करता है।
क्रांति दल की गतिविधियों के साथ-साथ एक समानांतर कहानी गगन, धरा एवं नीला नामक तीन व्यक्तियों की भी चलती है। विद्यार्थी जीवन में वे साथ-साथ पढ़ते थे। नीला एवं धरा सहेलियां थीं। गगन को धरा से प्रेम था जबकि नीला को गगन से। धरा गगन को उसे अपनी बहन स्वीकार करने हेतु मना लेती है और वह नीला से विवाह कर लेता है। अब इन घटनाओं को बारह वर्ष बीत चुके हैं तथा गगन एवं नीला का एक दस वर्षीय पुत्र भी है - टिंकू। गगन के पिता एक उद्योगपति हैं तथा अंग्रेज़ सरकार के पिट्ठू बने हुए हैं जबकि नीला के पिता अंग्रेज़ सरकार के वफ़ादार पुलिस अधिकारी हैं। गगन ने अपने कॉलेज जीवन की सारी बातें (धरा एवं नीला से संबंधित बातों सहित) एक डायरी में लिख रखी हैं जिन्हें वह समय-समय पर पढ़ता रहता है। लंबे समय से उसे धरा की कोई ख़बर नहीं है।
क्रांति दल अंग्रेज़ सरकार के पिट्ठू बने हुए लोगों के पीछे पड़ा रहता है। स्वभावतः वह गगन के पिता के भी पीछे पड़ता है। इधर एक अनजान व्यक्ति जो स्वयं को बिच्छू के नाम से संबोधित करता है, भी गगन के पिता के पीछे पड़ जाता है। गगन स्वयं क्रांति दल में सम्मिलित है। एक दिन अचानक उसकी मुलाक़ात धरा से भी हो जाती है। इधर अंग्रेज़ सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नज़रबंद कर लेती है तथा वे देश से भागकर विदेश जाने की योजना बनाते हैं जिसमें क्रांति दल का सरदार उन्हें सहयोग देता है। देश से बाहर निकलते समय सरदार के कहने से वे गगन और धरा को भी साथ ले जाते हैं। कथानक के अंत में एक ओर तो गगन एवं धरा सुभाष बाबू के साथ-साथ ही विमान-दुर्घटना में फंसकर (सुभाष बाबू को बचाते हुए) शहीद हो जाते हैं जबकि दूसरी ओर संपूर्ण क्रांति दल अंग्रेज़ों के साथ हुई मुठभेड़ में समाप्त हो जाता है।
इस कथानक में दर्शाई गई कई बातें विश्वसनीय नहीं हैं लेकिन कथानक अत्यन्त रोचक भी है एवं प्रेरक भी। क्रांति दल का सरदार तथा बिच्छू नामक व्यक्ति वास्तव में कौन हैं, यह उपन्यास के अंत में ही पता लगता है। इस वृहत् कथानक में प्रारम्भ से अंत तक देशप्रेम के साथ-साथ एक रहस्य का वातावरण बना रहता है जो कि पाठक को अंतिम दृश्य तक बांधे रखता है। अंतिम पंक्तियों में भी एक रहस्य का ख़ुलासा होता है जो पाठक को चौंका देता है। उपन्यास में भावनाओं का भी भरपूर सम्प्रेषण है। गगन, धरा एवं नीला के पात्रों के माध्यम से मानवीय संबंधों का बड़ा ही सजीव एवं भावुकतापूर्ण चित्रण किया गया है। कुछ कमियों के बावजूद यह एक श्रेष्ठ उपन्यास है जिसमें मानवीय प्रेम भी है तो देश प्रेम भी, एक्शन भी है तो रहस्य भी और सबसे बढ़कर एक पात्र के रूप में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की उपस्थिति भी जो कि उपन्यास के क्रांति दल के लिये ही नहीं, पाठकों के लिये भी प्रेरणा-स्रोत हैं। वैसे तो 'वतन की कसम' अपने आप में संपूर्ण एवं पृथक् उपन्यास है, फिर भी यदि इस कथानक को पढ़ने से पूर्व 'वतन की कसम' को पढ़ लिया जाए तो इसका अधिक आनंद उठाया जा सकता है।
'जय हिंद' व 'वंदे मातरम': दो भागों में प्रस्तुत यह कथानक वेद प्रकाश शर्मा की विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत लिखा गया है। इसमें बताया गया है कि देश के युवकों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रति जो सम्मान की भावना है, उसका लाभ उठाकर एक विदेशी षड्यंत्र भारत को अस्थिर करने हेतु रचा जाता है एवं एक नक़ली सुभाष चंद्र बोस प्रस्तुत कर दिये जाते हैं जो कि एक तथाकथित 'अखंड हिंद फ़ौज' की स्थापना कर रहे हैं। बहुत-से देशभक्त युवक उस कथित नेताजी के प्रभाव में आकर उसके दल से जुड़ जाते हैं जिनमें विकास के पिता रघुनाथ भी हैं। उपन्यास के घटनाक्रम का स्थान राजनगर नामक एक कल्पित नगर है (विजय-विकास सीरीज़ के उपन्यास प्रायः इसी नगर में घटित होते हैं)। जब भारतीय सीक्रेट सर्विस को इन बातों का पता चलता है तो भारतीय गुप्तचर विजय और विकास इस षड्यंत्र को विफल करके निर्दोष भारतीय युवकों को वास्तविकता से अवगत करवाने की ज़िम्मेदारी लेते हैं। इधर वे अपना काम शुरु करते हैं, उधर नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्वयं विजय के यहाँ पहुँच जाते हैं। अब वे असली सुभाष हैं या नक़ली, यह जानना विजय के लिये ज़रूरी हो जाता है। अंत में वास्तविक नेताजी पुनः परिदृश्य से बाहर हो जाते हैं जबकि नक़ली नेताजी बने बैठे विदेशी एजेंट की योजना को विफल करके उसके चंगुल में फंस गये निर्दोष भारतीय युवकों को उसकी वास्तविकता बताकर उसके षड्यंत्र से बाहर निकाल लिया जाता है।
दो भागों में फैला हुआ यह कथानक बहुत रोचक है किंतु इसमें थ्रिल ही अधिक है, सस्पेंस नहीं। नेताजी बना बैठा व्यक्ति किसी विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा है, यह बात बहुत पहले ही स्पष्ट कर दी जाती है, अतः यह कोई रहस्य उत्पन्न नहीं करती। रहस्य वास्तव में कथानक के प्रथम भाग के अंतिम दृश्य में आता है जबकि विजय स्वयं से मिलने आये नेताजी पर संदेह करता है तथा वे वास्तविक हैं या नहीं, यह जानने के लिये अपना दिमाग़ लगाता है। उपन्यास इस बात को रेखांकित करता है कि सुभाष बाबू के प्रशंसक तथा उनके जीवन से प्रेरणा लेने वाले असंख्य लोग भारत में हैं तथा कोई भी व्यक्ति (अथवा भारत का शत्रु देश) इस तथ्य का अनुचित लाभ उठा सकता है। अपने नाम पर की गई विदेशी साज़िश को नाकाम करने के लिए स्वयं नेताजी भारतीय जासूसों को किस प्रकार सहयोग देते हैं, यह भी बड़े रोचक ढंग से चित्रित किया गया है। कुल मिलाकर कथानक आरंभ से अंत तक पाठक को बांधे रखने वाला एवं प्रभावी है। यह उपन्यास लेखक की विजय-विकास सीरीज़ के संसार (परिवेश एवं विभिन्न पात्रों) से भी पाठकों का परिचय करवाता है।
सुभाष बाबू हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक विलक्षण नायक रहे हैं जिन्होंने अपनी अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी अंग्रेज़ सरकार को चकमा देकर देश से निकलने एवं विदेश में आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन करके भारत में शासन कर रही गोरी सरकार को चुनौती देने का ऐसा साहसिक कार्य कर दिखाया जिसके विषय में दूसरा कोई तो सोच तक नहीं सकता। वेद प्रकाश शर्मा ने उनके जीवन को अपने लेखन की प्रेरणा बनाया तथा उन्हीं को एक पात्र के रूप में लेकर रोचक एवं प्रेरक उपन्यास अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किये। ये ऐसे उपन्यास हैं जिन्हें एक बार पढ़ना आरंभ कर देने के उपरांत पूरा पढ़े बिना नहीं रहा जा सकता। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि वेद जी द्वारा वर्षों पूर्व रचित ये उपन्यास आज भी यदि कोई पढ़ेगा तो उसे मनोरंजन के साथ-साथ अपने देश के लिये कुछ करने तथा अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा प्राप्त होगी।
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मेरे विचार में, इस समीक्षा की सबसे प्रभावी बात यह है कि यह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रति अटूट जन-श्रद्धा और उनके नाम पर होने वाली संभावित साजिशों के प्रति सचेत करती है। विजय-विकास जैसे जासूसी पात्रों के माध्यम से देशभक्ति का ऐसा ताना-बाना बुनना काबिले तारीफ है। यह लेख सिद्ध करता है कि वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम और साहस का पाठ भी पढ़ाते हैं, जो आज की पीढ़ी के लिए भी उतने ही प्रेरक हैं।
जवाब देंहटाएंआपने बिल्कुल ठीक कहा आदरणीया कविता जी। हृदयतल से आभार आपका।
हटाएंउपन्यासों के प्रति उत्सुकता जगाता आलेख। काफी दिनों से मैंने वेद जी का कोई उपन्यास नहीं पढ़ा। जल्द ही उनका कोई उपन्यास अपने संग्रह से निकालकर पढ़ता हूँ।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार विकास जी। वेद जी का कोई अच्छा-सा उपन्यास पढ़िए। हो सके तो मेरे द्वारा समीक्षित उपन्यास पढ़िए।
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शुक्रवार 8 मई 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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हार्दिक आभार आदरणीय रवींद्र जी
हटाएंसुंदर संकलन
जवाब देंहटाएंअरसा बीत गया
ओम प्रकाश शर्मा, गुलशन नंदा, इब्ने शफी को पढ़े
याददास्त वापस लाने के लिए आभार
वंदन
हार्दिक आभार आदरणीय दिग्विजय जी
हटाएंउपन्यासों का खूबसूरती से पिरोया आलेख
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार मनोज जी
हटाएंवेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास मैंने भी बहुत पढ़ें आदरणीय।उनके उपन्यास पढ़ते हुए समय का ख्याल ही नहीं रहता था। बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्धक लेख उपन्यासों की विस्तृत जानकारी के साथ।सादर
जवाब देंहटाएंहृदयतल से आपका आभार व्यक्त करता हूँ आदरणीया अभिलाषा जी। आपके आगमन ने मन प्रफुल्लित कर दिया। आपने ठीक कहा कि वेद जी के उपन्यास पढ़ते हुए समय का ख़याल ही नहीं रहता था।
हटाएंवेद प्रकाश जी के देशभक्ति और स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस के कृतित्व पर केन्द्रित ये उपन्यास मेरे लिए नये हैं जिनकी विषयवस्तु से मैं अपरिचित थी ।प्रयास रहेगा इन्हें पढ़ने का । हार्दिक आभार जितेन्द्र जी रोचक और ज्ञानवर्धक लेख हेतु ।
जवाब देंहटाएंहृदयतल से आपका आभार माननीया मीना जी। मुझे विश्वास है कि आप इन्हें पढ़ेंगी तो ये आपको पसंद आयेंगे।
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