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गुरुवार, 20 मई 2021

सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी

सुरेन्द्र मोहन पाठक का ऐसा कोई प्रशंसक नहीं जो उनके द्वारा रचित प्रथम नायक सुनील कुमार चक्रवर्ती से परिचित न हो । राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र 'ब्लास्ट' में पत्रकार की नौकरी कर रहे इस लगभग तीस वर्षीय नौजवान से हम उतने ही परिचित हैं जितने कि इसके प्रणेता पाठक साहब से । यह जीवन के ऊंचे मूल्यों को लेकर चलने वाला, हाज़िर-जवाब, शानदार खान-पान का शौकीन, शानदार कपड़े पहनने और ठाठ से रहने का रसिया, एम. वी. आगस्ता अमेरिका नामक बाइक पर शाही ढंग से विचरने वाला और हर किसी की दुख-तकलीफ़ से पिघल कर उसकी मदद करने को तैयार हो जाने वाला चिर-कुंवारा शख़्स १९६३ से पाठकों के दिलों पर राज कर रहा है । 

पाठक साहब ने ऐसे अनेक उपन्यास लिखे हैं जिनमें सुनील एक पत्रकार से इतर एक गुप्तचर की भूमिका में हमारे समक्ष आता है और 'ब्लास्ट' के लिए नहीं बल्कि भारत के लिए, हमारे राष्ट्र के लिए काम करता है । देश के हितों की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों पर खेल जाने वाला यह युवक 'ब्लास्ट' के मालिक और मुख्य संपादक बलदेव कृष्ण मलिक साहब का कर्मचारी ही नहीं बल्कि भारत सरकार के केंद्रीय जाँच ब्यूरो के एक अत्यंत विशिष्ट विभाग स्पेशल इंटेलिजेंस का सदस्य भी है जिसके प्रमुख हैं कर्नल मुखर्जी । 

सुनील की ही तरह कई विश्वासपात्र और योग्य गुप्तचर हैं जो कर्नल साहब के निर्देशों पर देश के हित के लिए काम करते हैं । यहाँ तक कि कई विदेशी मुल्कों में भी स्पेशल इंटेलिजेंस के एजेंट मौजूद हैं । राजनगर में कर्नल मुखर्जी के सुनील के अलावा दो अन्य अत्यंत कार्यकुशल एजेंट हैं –  १. विंग कमांडर रामू, २. गोपाल । जैसा कि प्रत्यक्ष है,  विंग कमांडर रामू कर्नल मुखर्जी की ही तरह सेना से जुड़ा रहा  है जबकि गोपाल राजनगर के होटल नीलकमल में वेटर की नौकरी करता है । जिस तरह सुनील की 'ब्लास्ट' की नौकरी उसके जासूसी कारोबार के लिए ओट है, वैसे ही गोपाल की वेटरगिरी उसके लिए है । गोपाल कई भाषाएं जानता है और होटल की नौकरी के दौरान अपने कान खुले रखते हुए लोगों की बातें ग़ौर से सुनता है । फिर जो जानकारी काम की लगे, उसे कर्नल साहब को हस्तांतरित कर देता है । 

कर्नल साहब का एक नौकर है – धर्म सिंह । जब भी सुनील विदेश जाता है, उसका पासपोर्ट, वीज़ा, टिकट तथा अन्य काग़ज़ात धर्म सिंह ही हवाई अड्डे पर जाकर उस तक पहुँचाता है । सुनील धर्म सिंह पर हमेशा संदेह करता है । उसे लगता है कि धर्म सिंह महत्वपूर्ण सूचनाएं दुश्मनों को लीक कर देता है । लेकिन उसका संदेह सदा ही निराधार सिद्ध होता है जबकि कर्नल मुखर्जी का धर्म सिंह पर विश्वास सही सिद्ध होता है । 

पाठक साहब ने 'ब्लास्ट' के संवाददाता के रूप में अभी सुनील के कुल जमा पाँच ही उपन्यास लिखे थे कि उन्हें इस सीरीज़ में विविधता पैदा करने की ज़रूरत महसूस होने लगी और सुनील का छठा कारनामा – हांगकांग में हंगामा ही ऐसा आ गया जो कि उसे एक जासूस के रूप में पेश करता था । फिर तो सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी बराबर चली और क्या खूब चली ! 

सुनील के कई ऐसे उपन्यास पढ़ते समय हम उसके साथ विदेशों की सैर करते हैं । उनमें हमें विदेशों का ऐसा सजीव और प्रामाणिक चित्रण देखने को मिलता है जिसे करना केवल पाठक साहब के बस की ही बात है, और किसी भारतीय लेखक के बस की नहीं । इनमें सुनील जमकर ख़ूनख़राबा करता है, जेल जाता है, जेल तोड़कर भागता है और ऐसे-ऐसे साहसिक काम करता है जिनकी कल्पना उसे एक पत्रकार के रूप में देखते हुए नहीं की जा सकती । 

लेकिन सुनील द्वारा किए जा रहे रक्तपात के बीच भी पाठक साहब ने एक संवेदनशील मनुष्य होने का उसका मूल रूप बनाए रखा है क्योंकि वह, जहाँ तक संभव हो, बिना किसी की हत्या किए अपना काम बना लेने का प्रयास करता है । योरोप में हंगामा में लुईसा पेकाटी उसे एस्पियानेज (गुप्तचरी) के खेल का कच्चा खिलाड़ी बताती है क्योंकि वह उसके और उसके साथी के प्राण लेने की जगह केवल उन्हें रस्सियों से बाँधकर छोड़ गया था । 

बसरा में हंगामा और स्पाई चक्र उपन्यासों में हमारी मुलाक़ात त्रिवेणी प्रसाद शास्त्री से होती है जो कि काहिरा में स्पेशल इंटेलिजेंसका कर्ताधर्ता है । कई उपन्यासों में सुनील की टक्कर अंतर्राष्ट्रीय अपराधी कार्ल प्लूमर से होती है तो कई उपन्यासों में सुनील को पाकिस्तान की गुप्तचर सेवा के अधिकारी अब्दुल वहीद कुरैशी को मात देते हुए दिखाया जाता है । कभी सुनील पीकिंग (बीजिंग) जा पहुँचता है तो कभी सिंगापुर तो कभी हांगकांग तो कभी ओस्लो (नार्वे) तो कभी पेरिस तो कभी रोम तो कभी तेहरान लंदन में हंगामा में सुनील 'ब्लास्ट' के लंदन स्थित संवाददाता सरदार जगतार सिंह का सहयोग हासिल करता है जो कि अपनी बातों से पाठकों को हँसा-हँसाकर लोटपोट कर देने में कसर नहीं छोड़ता । 

अमन के दुश्मन और हाईजैक (संयुक्त संस्करण – लहू पुकारेगा आस्तीं का’) बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम पर आधारित हैं । ये पाठक साहब ने इतने भावुक ढंग से लिखे हैं कि इन्हें पढ़कर किसी भी वतनपरस्त की आँखें भर आएं । पाठक साहब हमें यह भी बताते हैं कि सुनील का जन्म भी अविभाजित बंगाल के गोपालगंज नामक स्थान पर हुआ था जो कि अब बांग्लादेश में है ।   

सवाल यह है कि इन सब कारनामों के बीच सुनील की नौकरी कैसे चलती है ? ‘स्पाई चक्र में तो सुनील को डकैती डालकर जानबूझकर गिरफ़्तारी देने के बाद और अदालत से सज़ायाफ़्ता होकर काहिरा की जेल में भी बंद होना पड़ता है । तो फिर वह 'ब्लास्ट' की नौकरी कैसे करता है ? ‘बसरा में हंगामा के अंत में पाठक साहब ने इस सवाल का जवाब दिया है कि जब वह मिशन से लौटकर 'ब्लास्ट' में जॉइन करता है तो तुरंत ही उसे मलिक साहब की लिखित चेतावनी मिल जाती है कि अगर फिर कभी वह इस तरह से बिना सूचना दिए ग़ायब हो तो अपने आपको नौकरी से बर्ख़ास्त समझे । 

एक गुप्तचर के रूप में सुनील का अंतिम उपन्यास ऑपरेशन सिंगापुर  है जो कि इस सीरीज़ का उनसठवां उपन्यास है लेकिन सुनील और कर्नल मुखर्जी की जुगलबंदी सुनील के बासठवें उपन्यास ख़ून का खेल में भी कायम रहती है जिसमें उपन्यास के पूर्वार्द्ध में तो सुनील एक पत्रकार के रूप में ही सक्रिय रहता  है लेकिन उत्तरार्द्ध में वह कर्नल मुखर्जी के सहयोग और मार्गदर्शन से वतन के दुश्मनों को थाम लेता है । 

कर्नल मुखर्जी को आख़िरी बार पाठक साहब ने सुनील के तिरेसठवें उपन्यास नया दिन नई लाश में पलक झपकने जैसी अपीयरेंस में दिखाया है । जिस एकमात्र दृश्य में वे हाज़िरी भरते हैं उसमें सुनील के मौजूद होते हुए भी उनकी आपस में कोई बातचीत या अन्य संपर्क नहीं होता है । 

नया दिन नई लाश के बाद कर्नल साहब सुनील सीरीज़ से विदा हो गए, ‘ख़ून का खेल के बाद सुनील 'ब्लास्ट' के कर्मचारी और पत्रकार के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में दिखाई देना बंद हो गया और ऑपरेशन सिंगापुर के बाद पाठक साहब ने सुनील के जासूसी कारनामे लिखने पूरी तरह छोड़ दिए । लेकिन सुनील सीरीज़ के ये उपन्यास जितने भी हैं, काबिल-ए-दाद हैं । रोलरकोस्टर राइड जैसी उत्तेजना और रोमांच देने वाले ये उपन्यास न केवल पाठकों का मनोरंजन करते हैं बल्कि उन्हें अनमोल जानकारियों से नवाज़ते हैं और दिल में वतनपरस्ती का जज़्बा जगाते हैं । 

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रविवार, 16 मई 2021

मन चंगा तो कठौती में गंगा

भारत धर्मप्राण देश है । ईश्वर की उपासना लोग अपने-अपने ढंग से करते हैं । हिन्दू धर्म में जहाँ तैंतीस करोड़ देवी-देवता बताए गए हैं, वहीं निर्गुणोपासना अथवा निराकार ब्रह्म की भक्ति का मार्ग भी उपस्थित है । जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी । हमारा संविधान धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान करता है । जिसे जिस रूप में भी अपने ईश्वर की आराधना करनी हो, करे । चाहे भगवान की पूजा हो या अल्लाह की इबादत या गॉड की प्रेयर या वाहेगुरु की अरदास; प्रत्येक भारतीय अपने मन और अपनी आस्था के अनुरूप कर सकता है । भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा करता है कि वह दूसरों की आस्था का सम्मान करे । मैं एक ऐसा ही नागरिक हूँ । मेरा यह मानना है कि सच्ची धार्मिकता मनुष्यता और उससे भी बढ़कर प्राणिमात्र के प्रति संवेदनशीलता में ही निहित है । ईश्वरोपासना उसी की सार्थक है जिसके पास एक संवेदनशील हृदय है ।

मैं विगत कई वर्षों से भेल में अपनी नौकरी के चलते हैदराबाद में रहा। भेल द्वारा अपने कर्मचारियों द्वारा निर्मित टाउनशिप में ही मेरा निवास था । इस टाउनशिप के पीछे की ओर ओल्ड एम.आई.जी. नामक आवासीय क्षेत्र है जिसमें रामालयम नामक एक मंदिर है । मंदिर मूल रूप से राम-सीता-लक्ष्मण-हनुमान का है लेकिन उसके बाहरी भाग में शिवलिंग भी स्थापित है । अपने धार्मिक स्वभाव के चलते मैं यथासंभव नियमित रूप से रामालयम जाता था । जो विशिष्ट और असाधारण तथ्य मैं पाठकों के समक्ष रख रहा हूँ, वह यह है कि इस हिन्दू मंदिर के ठीक बराबर में ही एक कैथोलिक गिरजाघर है और उसके ठीक बराबर में ही एक मस्जिद है । इस तरह हिन्दू, ईसाई और मुस्लिम तीन बड़े धर्मों के पूजागृह अगल-बगल में ही स्थित हैं । सुबह मंदिर में घंटियां बजती हैं और आरती की जाती है तो मस्जिद में अज़ान भी दी जाती है और गिरजाघर में प्रेयर भी सम्पन्न होती है । मंदिर में आरती संध्या को भी होती है और रविवार को प्रायः कोई-न-कोई विशेष पूजा या हवन होता है । शुक्रवार की दोपहर में निकट रहने वाले मुस्लिम भाइयों का समूह मस्जिद में नमाज के लिए एकत्र होता है । प्रत्येक रविवार की सुबह गिरजाघर में अलग-अलग भाषाओं में प्रेयर होती है जिसमें निकट रहने वाले ईसाई बंधु अपनी भाषाजनित सुविधा के अनुरूप आते हैं । जब तक मैं यहाँ रहा, मैंने कभी कोई धार्मिक विवाद या कहासुनी होते नहीं देखी । ईद के दिन नमाज के बाद मुस्लिम भाइयों को उनके ग़ैर-मुस्लिम मित्र भी ईद की मुबारकबाद यहाँ देते हैं तो ईस्टर और क्रिसमस के अवसरों पर ईसाई बंधुओं को उनके ग़ैर-ईसाई मित्रों की भी बधाइयां यहाँ मिलती हैं । हिन्दू समाज को भी विभिन्न हिन्दू त्योहारों की शुभकामनाएं मुस्लिम और ईसाई मित्रगणों से मिलती हैं । सांप्रदायिक सद्भाव का यह अनुपम उदाहरण है । यह महानता है हमारे भारत देश की जिसे देश की अधिसंख्य जनता ने सदा से हृदयंगम करके रखा है ।

लेकिन अपने वैविध्यपूर्ण अनुभवों और अपनी नैसर्गिक संवेदनशीलता के कारण मैंने जो निष्कर्ष निकाला है और जिसे मैंने अपने जीवन में उतारा है, वह यह है कि सच्चे धार्मिक व्यक्ति की धार्मिकता उसके मन में ही होती है । उसका ईश्वर उसके हृदय में ही निवास करता है । मनुष्य का निर्मल हृदय ही उसका मंदिर है, मस्जिद है, गिरजा है, गुरुद्वारा है । कस्तूरी-मृग की भाँति ईश्वर को बाह्य संसार में ढूंढने से कोई लाभ नहीं । यदि आपने सद्गुणों को अपनाया है तो वह आपके भीतर ही उपस्थित है । अतः उसे पाने के लिए कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं ।

मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा लेकिन पढ़ने वाले समझ सकते हैं कि हमारे देश में ऐसे अनेक धार्मिक स्थल हैं, जहाँ भक्त की सच्ची आस्था को नहीं, धन को महत्व दिया जाता है । कुछ ऐसे हाई प्रोफ़ाइल मंदिरों में जाकर मुझे जो कटु अनुभव हुए और जो कुछ मैं कतिपय धार्मिक स्थलों की समृद्धि के विषय में और धन के व्यय के आधार पर भक्तों में विभेद करने के विषय में जान पाया हूँ, उससे मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ऐसे स्थलों पर जाना ही व्यर्थ है जहाँ आपकी श्रद्धा से अधिक आपकी जेब की महत्ता हो । आपका मन सच्चा है तो अपने घर में ही ईश्वर के प्रतीक के समक्ष माथा झुकाइए या अपने निकट के किसी छोटे-से पूजास्थल पर (जहाँ भीड़भाड़ और शोरगुल न होता हो) जाकर ईश्वर को अपने आसपास अनुभव कीजिए । ऐसा करना धन और समय का अपव्यय करके दूरस्थ धर्मस्थलों पर जाने से बेहतर है ।

दो दशक पूर्व जिन दिनों मैं तारापुर परमाणु बिजलीघर में  नौकरी करता थामैं सपरिवार (पत्नी और छोटी-सी पुत्री) अपने अभिन्न मित्र श्री राजेन्द्रकुमार टांक और उनके परिवार के साथ जनवरी २००१ में शिर्डी गया और उस यात्रा के उपरांत मेरे मन में साईंबाबा के प्रति कुछ आस्था उमड़ पड़ी । उस यात्रा के कुछ दिनों  के भीतर ही मेरा स्थानांतरण कोटा के निकट रावतभाटा नामक स्थान पर स्थित राजस्थान परमाणु बिजलीघर में हो गया । विकिरण के कारण वहाँ आवासीय क्षेत्र बिजलीघर से कई किलोमीटर दूर रखा गया है । एक दिन जब मैं यूँ ही स्कूटर लेकर बिजलीघर और कॉलोनी के बीच के उस क्षेत्र को टटोल रहा था तो मुझे उस पठारी क्षेत्र की ऊंची-नीची और नागिन की तरह बलखाती सड़क अकस्मात ही एक छोटे-से सफ़ेद रंग के मंदिर तक ले गई । मैंने पाया कि वह मंदिर बिजलीघर और आवासीय क्षेत्र दोनों से ही लगभग समान दूरी पर था और वह साईंबाबा का मंदिर था । मंदिर का मुख्य द्वार बंद था लेकिन निकट एक छोटा झूलता हुआ द्वार भी था जिससे मैं भीतर गया ।  मैंने देखा कि संगमरमर की बनी और पीत-वस्त्र पहनी हुई साईंबाबा की प्रतिमा एक चबूतरे पर बने छोटे-से पूजाघर के भीतर थी, प्रतिमा के सामने दिया जल रहा था लेकिन बाहर एक लोहे का जंगला था जिस पर ताला लटका हुआ था जो इस बात की ओर संकेत करता था कि वह स्थान किसी की निजी संपत्ति था । वह छोटा-सा स्थान साफ़-सुथरा था, ऊपर छत थी, पूजागृह के बाहर परिक्रमा थी और बाहर आगंतुकों के बैठने के लिए बेंचें भी थीं । चबूतरे के निकट के कच्चे क्षेत्र में एक छोटी-सी पानी की टंकी और तुलसी का पौधा भी था । निकट ही एक दूसरे चबूतरे पर एक हनुमान मंदिर भी था जिसकी उस समय की स्थिति बता रही थी कि वह अभी निर्माणाधीन था ।

मैंने वहाँ आधा-पौन घंटा बिताया और उल्लेखनीय तथ्य यह है कि मुझे वहाँ असीम शांति प्राप्त हुई । अपना स्कूटर दौड़ाते हुए अणु किरण कॉलोनी में स्थित अपने क्वार्टर की ओर लौटते समय मैंने निश्चय किया कि अब मैं वहाँ नियमित रूप से आता रहूंगा । और सचमुच ही मैंने नियमित रूप से उस मंदिर में जाना आरंभ कर दिया । कभी-कभी तो मैं दिन में दो बार भी वहाँ गया (प्रातः और सायं) । जो मानसिक शांति मुझे उस छोटे-से मंदिर में सदा निःशुल्क प्राप्त हुई, वह भारीभरकम व्यय करके की गई प्रसिद्ध मंदिरों की यात्राओं से कभी प्राप्त नहीं हुई । मैंने वहाँ सपरिवार भी जाना आरंभ कर दिया । कई बार अच्छे मौसम में मैं, मेरी पत्नी और मेरी नन्ही बच्ची वहाँ पीने का पानी और थर्मस में चाय लेकर चले जाते थे और ईश्वर के चरणों में बैठकर ही एक छोटी-सी पारिवारिक पिकनिक कर लेते थे । कुछ समय के उपरांत २००३ में मेरे यहाँ पुत्र का जन्म हुआ । पुत्र के कुछ बड़ा हो चुकने के उपरांत वह भी अपने माता-पिता और बहन के साथ वहाँ जाने लगा । उसे भी वह स्थान बहुत भाया । शांति के साथ-साथ और जो वस्तुएं हमें वहाँ निःशुल्क प्राप्त होती थीं, वे थीं शीतल वायु और तन-मन को प्रफुल्ल कर देने वाला प्राकृतिक वातावरण । रात्रि के समय वहाँ जाने पर ऊपर आकाश में तारों को या चन्द्रमा को तथा नीचे रावतभाटा कस्बे की रोशनियों को देखने का आनंद भी अद्भुत था (वह मंदिर ऊंचाई पर स्थित था जबकि कस्बा नीचाई पर था) । आज भी वहाँ बिताए गए समय की मधुर स्मृतियां हमारे साथ हैं ।

मेरे लिए तो वह लगभग अनजाना-सा छोटा मंदिर ही संसार का सबसे अधिक शांतिपूर्ण स्थान सिद्ध हुआ । इसलिए धीरे-धीरे मैंने समझ लिया कि सन्मार्ग पर चलो तो ईश्वर कहीं और नहीं, अपने भीतर ही है और तनमन को शांति छोटे लेकिन भीड़भाड़ तथा शोर से रहित स्थानों पर ही मिलती है, भीड़भरे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर नहीं । जहाँ मान और पहचान धन को मिले, मन को नहीं; वहाँ क्या जाना ? और ईश्वर को सच्चे अर्थों में वही समझ सकता है, जो उसके द्वारा सृजित प्राणियों को उचित मान दे; उनके जीवन, आदर-सम्मान और भावनाओं का मूल्य समझे । जो ख़ुदा के बंदों की कद्र न कर सके, वो ख़ुदा के नज़दीक कैसे जा सकता है ? जिसके मन में प्राणिमात्र के लिए करुणा हो, ममत्व हो; जिसके लिए सद्गुणों का मूल्य धन, अधिकार और वैभव से अधिक हो; जो सत्य और न्याय जैसे सनातन मूल्यों को ईश्वर का वरदान मानकर उन्हें महत्व देता हो; उसके लिए तो उसका हृदय ही सबसे बड़ा तीर्थ है क्योंकि मन चंगा तो कठौती में गंगा ।

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शुक्रवार, 14 मई 2021

पति-पत्नी का आपसी विश्वास और शोबिज़ की चकाचौंध के पीछे का सच

हिन्दी उपन्यासकार सुरेन्द्र मोहन पाठक ने ऐसे कई उपन्यास लिखे हैं जिनको उनकी बेहतरीन कहानी और प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण के बावजूद समुचित प्रशंसा नहीं मिलीवो तारीफ़ वो वाहवाही नहीं मिली जिसके वे हक़दार हैं । ऐसा ही एक उपन्यास है ‘साज़िश’ जो थ्रिलर उपन्यासों की श्रेणी में आता है ।

साज़िश’ का विज्ञापन मैंने पहली बार दिसंबर १९९७ में राधा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित उपन्यास ‘गड़े मुर्दे’ के पृष्ठ आवरण (बैक कवर) पर देखा था । मेरी ख़ुशकिस्मती से पाठक साहब से मेरी पहली मुलाक़ात उसके दो महीने बाद ही हो गई जब मैं २६ फ़रवरी१९९८ की शाम को उनके दरियागंज (दिल्ली) स्थित कार्यालय में उनसे मिलने जा पहुँचा । वहाँ विभिन्न विषयों पर हुई चर्चा के दौरान जब उनके आगामी उपन्यासों का ज़िक्र छिड़ा तो उन्होने बताया कि तक़रीबन दो माह बाद शिवा पॉकेट बुक्स से थ्रिलर उपन्यास ‘फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी’ और राधा पॉकेट बुक्स से सुनील सीरीज़ का उपन्यास ‘कमरा नंबर 303’ आगे-पीछे ही प्रकाशित होंगे । इस पर जब मैंने पूछा कि राधा पॉकेट बुक्स से विज्ञापन तो ‘साज़िश’ का हो रहा है तो पाठक साहब ने बताया कि 'राधा' वालों ने नए उपन्यास का विज्ञापन करने के लिए नाम मांगा तो उन्होंने ‘साज़िश’ नाम दे दिया क्योंकि यह कॉमन नाम है । वस्तुतः इस नाम के उपन्यास की कोई रूपरेखा उस समय तैयार नहीं थी । कुछ समय पश्चात् जब ‘कमरा नंबर 303’ आया तो उसके साथ पुनः आगामी उपन्यास के रूप में ‘साज़िश’ का ही विज्ञापन था । लेकिन कोई छः महीने बाद राधा पॉकेट बुक्स से पाठक साहब का जो नया उपन्यास छपावो सुनील सीरीज़ का ही उपन्यास ‘गुनाह की ज़ंजीर’ था । उसके साथ भी 'राधा' से प्रकाशित होने वाले पाठक साहब के आगामी उपन्यास के रूप में ‘साज़िश’ का ही विज्ञापन था । अब नए साल में यानी कि १९९९ में हुआ यह कि पाठक साहब के उपन्यास केवल ‘मनोज पब्लिकेशन्स’ से ही छपने लगे और अन्य प्रकाशन संस्थानों से उनके उपन्यास छपने का सिलसिला टूट-सा गया । लेकिन पाठक साहब अपनी ज़ुबान के पक्के हैं । इसलिए उन्होंने 'राधा' को अपने वादे के मुताबिक ‘साज़िश’ नाम से उपन्यास लिखकर दिया जो कि 'मनोज' से प्रकाशित विमल की ‘दमन-चक्र’ वाली तिकड़ी के अंतिम भाग ‘जौहर ज्वाला’ के लगभग साथ-साथ ही दिसंबर १९९९ में छपा । यह 'राधा' से प्रकाशित उनका अंतिम उपन्यास रहा । उन्हीं दिनों मेरी नौकरी महाराष्ट्र में स्थित तारापुर परमाणु बिजलीघर में लग गई और मैं वहाँ जा पहुँचा जहाँ कॉलोनी से कुछ ही दूर ‘चित्रालय’ नामक बाज़ार में एक पुस्तकें किराए पर देने वाला अपना कारोबार चलाता था । मैं उससे पाठक साहब के पुराने उपन्यास किराए पर ला-लाकर पढ़ने लगा । जनवरी २००० में उसके पास जब मैंने नया उपन्यास ‘साज़िश’ देखा तो उसे किराए पर लेने की जगह मैंने उस नई प्रति को उसकी पूरी कीमत देकर ख़रीद ही लिया और रात को हमेशा की भांति अपने क्वार्टर में उसे एक ही बैठक में पढ़कर समाप्त किया । साज़िश की वह प्रति एक दशक से भी अधिक  समय तक मेरे पास रही और मैं गाहे-बगाहे उसे बार-बार तब तक पढ़ता रहा जब तक कि मेरी नादानी से वह मेरे पास से चली नहीं गई ।

साज़िश’ मुझे इतना पसंद आया कि जब मैंने माउथशट डॉट कॉम पर पाठक साहब के उपन्यासों की समीक्षाएं लिखने का फ़ैसला किया तो मैंने सबसे पहले ‘साज़िश’ को ही चुना । पाठक साहब ने ‘साज़िश’ के लेखकीय में लिखा था कि उन्होंने यह उपन्यास सुनीलविमलसुधीर और थ्रिलर उपन्यासों की एक नियमित रोटेशन बनाने की कोशिश में लिखा था । बहरहाल चाहे कैसे भी लिखा होबिना किसी शोरगुल के अपने पहले विज्ञापन के दो साल बाद बिना किसी पूर्वापेक्षा के एकाएक आया यह उपन्यास एक निहायत ही उम्दा थ्रिलर है जिसे अपनी मुनासिब तारीफ़ नसीब नहीं हुई । शायद इसलिए कि यह विमल के हाई प्रोफ़ाइल उपन्यास ‘जौहर ज्वाला’ के साथ-साथ आया और ‘जौहर ज्वाला’ की चौतरफ़ा वाहवाही के शोर में पाठकों द्वारा दरगुज़र कर दिया गया । कुछ ऐसा ही हादसा पाठक साहब के बेहतरीन थ्रिलर उपन्यास ‘एक ही अंजाम’ के साथ भी हुआ था जो विमल की ‘जहाज़ का पंछी’ वाली तिकड़ी के प्रकाशन के मध्य में आ गया था और शायद इसीलिए उसका पाठकों ने ठीक से नोटिस नहीं लिया था ।

साज़िश’ पाठक साहब का एक बेदाग़ उपन्यास है जिसमें लाख ढूंढने पर भी कोई ख़ामी निकालना मुमकिन नहीं लगता । जहाँ तक ख़ूबियों का सवाल हैयह उपन्यास बेशुमार ख़ूबियों का मालिक है । पाठक साहब ने ख़ुद एक बार फ़रमाया है कि उनके बहुत से उपन्यास केवल इसलिए जासूसी उपन्यास कहलाते हैं क्योंकि उन पर मिस्ट्री राइटर का ठप्पा लगा हुआ है वरना ऐसे कई उपन्यास हैं जिनको सहज ही सामाजिक उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है । ‘साज़िश’ भी एक ऐसा ही उपन्यास है जिसे आप चाहें तो जासूसी उपन्यास मान लें और चाहें तो सामाजिक उपन्यास मान लें ।

साज़िश’ कहानी है अनिल पवार नाम के एक युवक की जो लोनावला स्थित एक कारख़ाने में इंडस्ट्रियल केमिस्ट की नौकरी करता है । उसका वर्तमान नियोक्ता अविनाश जोशी कुछ अरसा पहले उसे पूना से वहाँ लेकर आया था । आने के बाद उसकी मुलाक़ात बिना माँ-बाप की दो बेटियों – मुग्धा पाटिल और नोनिता पाटिल से हुई थी जिनमें से छोटी बहन मुग्धा से उसने विवाह कर लिया । इन दोनों बहनों का एक बुआ के अतिरिक्त कोई और रिश्तेदार नहीं है । मुग्धा को विवाह से पहले दौरे पड़ते बताए जाते थे । इस बात की रू में मुग्धा के साथ-साथ अनिल की साली नोनिता भी मानो मुग्धा के दहेज में उसके घर चली आई थी ताकि वो मुग्धा की देखभाल कर सके । शादी के बाद अब अनिल की समस्या यह हो गई कि उसकी आमदनी के मुक़ाबले उसकी बीवी और साली का रहन-सहन बहुत खर्चीला था । ‘तेते पाँव पसारिए जेती लांबी सौर’ वाली कहावत में उन दोनों बहनों का कोई यकीन नहीं था और उनके पाँव सदा अनिल की आमदनी की चादर के बाहर ही पसरे रहते थे ।

साज़िश’ का श्रीगणेश एक तूफ़ानी रात को होता है जब अनिल एक जुए की फड़ में रमा हुआ है और पीछे से उसकी बीवी यानी मुग्धा और साली यानी नोनिता उसके घर से रहस्यमय ढंग से ग़ायब हो जाती हैं । अब क्या अनिल का एम्प्लॉयर अविनाश जोशीक्या स्थानीय पुलिस चौकी का इंचार्ज मुंडे और क्या उसका पड़ोसी दशरथ राजेसबकी एक ही राय है कि अनिल की मौजूदा पतली माली हालत के मद्देनज़र उसकी बीवी और साली उसे छोड़कर अपने यारों के साथ भाग गई हैं । लेकिन अनिल को सूरत-अ-हवाल की यह तर्जुमानी मंज़ूर नहीं क्योंकि उसे अपनी बीवी के प्यार पर अटूट विश्वास है और वह किसी सूरत यह क़ुबूल नहीं कर सकता कि उसकी बीवी उसे छोड़कर किसी ग़ैर के पास चली गई है । तड़पकर वह अपनी बीवी की तलाश में निकलता है । उसके पास पैसा नहीं है लेकिन वह कुछ उधार अपने मेहरबान पड़ोसी दशरथ राजे से लेता है और कुछ पैसा उसे छुट्टियों के साथ-साथ उसका एम्प्लॉयर अविनाश जोशी देता है । उसे पता चलता है कि उसके उनकी ज़िंदगी में पैवस्त होने से पहले दोनों बहनें फ़िल्म अभिनेत्रियां बनने के लिए घर से भागकर मुंबई चली गई थीं । इसलिए वह अपनी तलाश मुंबई से ही शुरू करने का फ़ैसला करता है । दोनों बहनों के ग़ायब होने के रहस्य की परत-दर-परत उधेड़ता हुआ अनिल आख़िर सच्चाई की तह तक कैसे पहुँचता हैयही ‘साज़िश’ का मुख्य भाग है । अनिल की यह तलाश इतनी दिलचस्प और पाठकों को बांधकर रखने वाली है कि पढ़ने वाले के लिए इस उपन्यास को इसके आख़िरी सफ़े तक मुक़म्मल पढ़े बिना बीच में छोड़ना तक़रीबन नामुमकिन है । केवल छः दिनों के घटनाक्रम पर आधारित यह उपन्यास साहित्य के सभी रसों को अपने में समेटे हुए हैं ।

पाठक साहब ने यह बात अपने कई उपन्यासों में रेखांकित की है कि पति-पत्नी का संबंध विश्वास पर आधारित होता है जिसमें कोई दुई का भेद नहीं होना चाहिएकोई छुपाव नहीं होना चाहिए । अगर दोनों के बीच भरोसा ही नहीं  है तो इस नाजुक रिश्ते को नहीं निभाया जा सकता । विमल सीरीज़ का उपन्यास ‘हज़ार हाथ’ और ‘बीवी का हत्यारा’ एवं ‘अनोखी रात’ जैसे थ्रिलर इसी थीम पर हैं । ‘साज़िश’ भी इसी श्रेणी में आता है । अनिल आधे-अधूरे तथ्यों और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर अपनी बीवी पर कोई तोहमत थोपने को तैयार नहीं । इसीलिए वह हक़ीक़त का पता ख़ुद लगाना चाहता है और जो कुछ हुआ है या हुआ थाउसकी बाबत अपनी बीवी का बयान उसकी ज़ुबानी जानना चाहता है । वह ऐसा खाविंद है जो अपनी बीवी पर शक़ नहींतबार करता है । मियां-बीवी का रिश्ता ऐसा ही होना चाहिए । ‘साज़िश’ की कहानी प्रथम पुरुष में यानी कि फ़र्स्ट पर्सन में लिखी गई है और इसीलिए वह अनिल के साथ-साथ चलती है । पाठक उतना ही जानता है जितना कि इस उपन्यास का नायक यानि कि अनिल जानता है । अतः उपन्यास पढ़ते समय पाठक अनिल के साथ मानसिक रूप से जुड़ा रहता है।

साज़िश’ में पाठक साहब ने लगभग सभी किरदारों को अपने आप उभरने और अपनी छाप छोड़ने का पूरा मौका दिया है । कथानायक अनिल ही नहींअन्य किरदार जो कि सहायक चरित्र ही कहे जा सकते हैंभी कथानक के फ़लक पर अपना अलग वजूद बरक़रार रखते हैं और पाठकों पर अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ते हैं । जो किरदार दिखाए भी नहीं गए हैंजिनका महज़ ज़िक्र  किया गया हैवे भी अपनी अलग पहचान रखते हैं और पाठक उन्हें बड़ी आसानी से विज़ुअलाइज़ कर सकता हैउनके अक्स को अपने ज़हन पर उतार सकता है ।

पाठक साहब ने अखिलेश भौमिक नाम के एक कलरफ़ुल किरदार के माध्यम से पाठकों को हास्य-रस की भरपूर ख़ुराक दी है । अखिलेश भौमिक एक निर्देशक है जो मूल रूप से तो थिएटर में खेले जाने वाले नाटकों का निर्देशन करता है लेकिन अब वह ‘कौन किसकी बांहों में’ नाम का टी.वी. धारावाहिक बनाने की फ़िराक़ में है बशर्ते कि उसे कोई उसमें धन लगाने वाला मिल जाए । वह अल्कोहलिक है और अपने दफ़्तर में बैठे-बैठे भी शराब पीता रहता है । उसकी और अनिल की मुलाक़ात पाठकों को हँसा-हँसा कर लोटपोट कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ती । इस किरदार और कुछ अन्य किरदारों के माध्यम से पाठक साहब ने शोबिज़ की चमक-दमक के पीछे की सच्चाईयों को उजागर किया है जो कि इस दुनिया में घुसने के ख़्वाहिशमंद नौजवानों के लिए एक सबक है ।

साज़िश’ में पाठक साहब ने औरत-मर्द के प्यार के दो बिलकुल जुदा पहलू पेश किए हैं । एक पहलू यह है कि अगर मोहब्बत को उसका सिला न मिलेअगर उसे लगातार ठुकराया जाए और दूसरे द्वारा बार-बार नीचा दिखाया  जाए तो वह नफ़रत में भी बदल सकती है । लेकिन दूसरी ओर मोहब्बत का एक पहलू यह भी है कि सच्चा आशिक़ अपने महबूब के लिए अपनी जान तक दे सकता है । पाठक साहब ने प्रेम के इस दूसरे रूप को जो कि उदात्त हैपवित्र हैबलिदानी हैउपन्यास के अंत में प्रस्तुत किया है और साथ-साथ यह बात भी रेखांकित की है कि जुर्म में शरीक़ होने वाला भी बुनियादी तौर पर एक नेक इंसान हो सकता है । उपन्यास की अंतिम पंक्ति में इसके मुख्य किरदार भारी कदमों से बाहर निकलते हैं और इसे पढ़ने वाला भी अंतिम पंक्ति पढ़कर भारी मन से ही पुस्तक को बंद करता है ।  

साज़िश’ पाठकों को कैसा लगाइस बात का ज़िक्र सुरेन्द्र मोहन पाठक के किसी भी लेखकीय में नहीं आया और यह हर नुक़्तानिगाह से इस असाधारण ख्याति प्राप्त लेखक का एक लो-प्रोफ़ाइल उपन्यास ही साबित हुआ । लेकिन चर्चित उपन्यासकार की इस कम चर्चित कृति की गुणवत्ता बहुत ऊंची है और मैं इसे अपने प्रिय लेखक के सर्वश्रेष्ठ थ्रिलर उपन्यासों में शुमार करता हूँ ।  

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