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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

रहस्य की धुंध

निर्माता-निर्देशक बलदेवराज चोपड़ा ने बहुत-सी अच्छी फ़िल्में बनाई हैं जिनमें कानून (१९६०) तथा  हमराज़ (१९६७) जैसी उत्तम रहस्य फ़िल्में भी सम्मिलित हैं। उन्होंने ऐसी ही एक अच्छी रहस्य फ़िल्म धुंध भी बनाई थी जो सन १९७३ में प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्म की कथा के लिए उनकी फ़िल्म निर्माण संस्था बी.आर. फ़िल्म्स के कथा-विभाग को श्रेय दिया गया किंतु वस्तुतः फ़िल्म की कहानी सुप्रसिद्ध रहस्य कथा लेखिका अगाथा क्रिस्टी के नाटक द अनएक्सपेक्टिड गेस्ट (अप्रत्याशित अतिथि) पर आधारित है।


धुंध की कहानी एक हिल स्टेशन पर घटित होती बताई गई है। इस रहस्यकथा का आरंभ एक घर में एक व्यक्ति के आगमन से होता है जिसकी कार रास्ते में ख़राब हो गई है तथा वह किसी गैरेज में फ़ोन करने के उद्देश्य से उस घर में आया है। रात का समय है तथा वातावरण में गहरी धुंध छाई हुई है। उसे घर का द्वार खुला मिलता है जिससे वह अंदर जाता है जहाँ उसे एक व्यक्ति एक कुर्सी पर मरा पड़ा मिलता है। यह व्यक्ति इस घर का स्वामी रंजीत (डैनी) है। आगंतुक चंद्रशेखर (नवीन निश्चल) है जिसकी भेंट हाथ में पिस्तौल लिए हुए एक युवती से होती है। यह युवती रंजीत की पत्नी रानी (ज़ीनत अमान) है। रानी चंद्रशेखर को बताती है कि अपने पति की हत्या उसी ने की है। चंद्रशेखर के कारण पूछने पर वह अपनी दुखभरी कहानी उसे सुनाती है। उसका अपाहिज पति रंजीत उस पर अत्याचार करता था। उसका रवैया अपनी सौतेली मां (उर्मिला भट्ट) तथा अपने सौतेले भाई के प्रति भी वैसा ही था। एक दिन जब वह जीवन से दुखी होकर आत्महत्या करने जा रही थी तो उसे एक वकील सुरेश (संजय) ने बचाया तथा धीरे-धीरे उसका सुरेश से प्रेम-संबंध हो गया। यह बात रंजीत से छुपी नहीं रही। दोनों के बीच झगड़े बढ़ते गए और अंततः आज जब रंजीत उसे मारने जा रहा था तो छीना-झपटी में पिस्तौल चल गई और गोली लगने से रंजीत स्वयं ही मारा गया।

अब रानी चंद्रशेखर को पुलिस को बुलाने के लिए कहती है तो चंद्रशेखर उससे कहता है कि पुलिस तो उसे हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लेगी जबकि उसने तो जान-बूझकर हत्या की नहीं है, साथ ही उसका अत्याचारी पति रंजीत तो इसी योग्य था। ऐसे में अपने आप को कानून के हवाले करना समझदारी नहीं होगी। तब रानी उससे पूछती है कि उसे क्या करना चाहिए तो चंद्रशेखर उसे बताता है कि पुलिस को ऐसी कहानी परोसी जानी चाहिए जिससे हत्या का आरोप किसी बाहर से आए हुए अज्ञात व्यक्ति पर लगे, न कि उस पर। अब चंद्रशेखर की सलाह के अनुरूप तथा उसके सहयोग से रानी ऐसी स्थिति बनाती है जिससे लाश पर घर की नौकरानी की दृष्टि पड़ती है तथा उसके शोर मचाने के उपरांत ही पुलिस को बुलाया जाता है और बताया जाता है कि संभवतः कोई व्यक्ति बाहर से आया और हत्या करके चला गया। पुलिस अपने ढंग से मामले की छानबीन में लग जाती है और चंद्रशेखर को निर्देश देती है कि पुलिस को सूचना दिए बिना तथा उसकी अनुमति लिए बिना वह शहर छोड़कर न जाए।

पुलिस मामले की गहराई में जाती है तो सुरेश एवं रानी का प्रेम-संबंध उससे छुपा नहीं रहता। पुलिस को कुछ सूत्र ऐसे मिलते हैं जिनसे हत्या का संदेह सुरेश पर जाता है। पुलिस सुरेश को गिरफ़्तार कर लेती है तथा उस पर न्यायालय में रंजीत की हत्या का मुक़द्दमा चलता है। रानी सुरेश को बचाने के लिए न्यायालय में स्वयं यह अपराध स्वीकार कर लेती है। पर क्या सुरेश हत्यारा है ? क्या रानी सच बोल रही है ? वास्तविकता का पता फ़िल्म के अंत में चलता है।

धुंध शब्द अपने आप में ही रहस्य को समाहित किए हुए है। रहस्य के लिए अंग्रेज़ी में मिस्ट्री शब्द का प्रयोग किया जाता है जो मिस्ट से बना है जिसका अर्थ ही है – धुंध। अपने नाम के अनुरूप ही यह एक रहस्य में लिपटी कथा है जिसमें पति-पत्नी का संबंध भी समाविष्ट है तथा एक प्रेमकथा भी। अपने प्रारंभिक दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य तक रोचक यह फ़िल्म दर्शक को बांधे रखती है। कहानी तो अच्छी है ही, बलदेवराज चोपड़ा का निर्देशन भी कुशल है।

फ़िल्म तकनीकी दृष्टि से भी उत्कृष्ट है। संवादों से लेकर सम्पादन, पार्श्व संगीत, कला-निर्देशन एवं छायांकन तक सभी उत्तम हैं। हिल स्टेशन के नयनाभिराम दृश्य दर्शक के नयनों को शीतलता प्रदान करते हैं। फ़िल्म की लंबाई भी कम है (मुश्किल से दो घंटे)। निर्देशक ने दर्शकों को सोचने का समय नहीं दिया है। साहिर लुधियानवी के गीतों को संगीतकार रवि ने मधुर धुनों से सजाया है। संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है तथा उलझन सुलझे ना गीत विशेष रूप से अच्छे बन पड़े हैं। पद्मा खन्ना तथा जयश्री तलपदे के नृत्य वाला गीत जो यहाँ था, वो वहाँ क्यूंकर हुआ भी सुनने और देखने में अच्छा लगता है। सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। डैनी का अभिनय विशेष रूप से सराहना योग्य है।

कुल मिलाकर धुंध एक छोटी-सी मगर दिलचस्प फ़िल्म है जिसे बॉलीवुड में बनी सर्वश्रेष्ठ रहस्य फ़िल्मों में शुमार किया जाता है। फ़िल्म में फ़ालतू बातें बिलकुल नहीं हैं। प्रत्येक बात, प्रत्येक दृश्य एवं प्रत्येक चरित्र फ़िल्म के कथानक से पूरी तरह संबद्ध है। फ़िल्म के प्रदर्शन को आधी सदी से अधिक बीत जाने पर भी इसके रंग फीके नहीं पड़े हैं तथा किसी नई फ़िल्म को देखने जैसा ही आनंद प्रदान करते हैं। यह फ़िल्म न केवल रहस्यकथाओं के शौक़ीनों को बल्कि सामान्य फ़िल्में देखने वालों को भी पसंद आएगी। साथ ही यह फ़िल्म उन लोगों को भी पसंद आएगी जिन्होंने अगाथा क्रिस्टी का नाटक द अनएक्स्पेक्टिड गेस्ट पढ़ा है।  

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