पेज

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

इंसाफ़ का सूरज

अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है जब मैंने स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास 'जिगर का टुकड़ा' पर अपने ख़यालात को अल्फ़ाज़ में ढाला था और उपन्यास में शामिल तंत्र-मंत्र की बातों पर भी तबसरा किया था । हाल ही में 'जिगर का टुकड़ा' से तक़रीबन नौ-दस साल पहले लिखे गए उनके एक और उपन्यास 'इंसाफ़ का सूरज' को पढ़ने का इत्तफ़ाक़ हुआ तो मैं यह देखकर दंग रह गया कि इस बेहतरीन उपन्यास में भी तंत्र-मंत्र का ज़िक्र है हालांकि ह उतना ज़्यादा नहीं है जितना कि 'जिगर का टुकड़ा' में है और कहानी में उसकी अहमियत भी कम ही है । बहरहाल इसमें कोई शक़ नहीं कि 'इंसाफ़ का सूरज' भी वेद जी के शानदार उपन्यासों में शामिल है और किसी भी सस्पेंस-थ्रिलर उपन्यासों के शौक़ीन को इसे पढ़े बिना नहीं रहना चाहिए । 

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा का लेखकीय जीवन गुणवत्ता के निकष पर परखा जाए तो सांख्यिकी के सममितीय वितरण (symmetrical distribution) की मानिंद रहा था अर्थात् एकरूप ढंग से उच्चतर होते हुए चरम सीमा पर पहुँचकर उसी प्रकार निम्नतर होता गया तथा अंत में उसी स्तर पर आ गया जिस स्तर पर आरंभ में था । उन्होंने निहायत मामूली उपन्यासों से लिखना शुरु करके आगे चलकर एक-से-एक ज़बरदस्त उपन्यास लिखे लेकिन चोटी पर पहुँचने के बाद फिर से नीचे आते हुए वे मामूली-से-मामूली उपन्यास पेश करते गए जिनमें से कई पर नक़ली (किसी और के लिखे हुए) होने का भी शुबहा होता है । उनका स्वर्णकाल सत्तर के दशक के अंत से लेकर नब्बे के दशक के आरंभ तक माना जा सकता है । अस्सी का दशक तो पूरी तरह उन्हीं का था जब वे लुगदी साहित्य या पल्प फ़िक्शन के बेताज बादशाह माने जाते थे । 'इंसाफ़ का सूरज' उसी समयकाल में सिरजा गया था । 

वेद जी उपन्यासों के नामकरण में भी चतुर थे तथा अपने प्रत्येक उपन्यास का नाम बड़ा आकर्षक रखते थे । प्रायः उनके उपन्यास के नाम का सम्बन्ध उसके कथानक से होता था लेकिन इस उपन्यास में संभवतः उन्हें रखने के लिए कोई ऐसा नाम नहीं सूझा जो कथावस्तु की ओर संकेत करता हो । इसलिए उन्होंने उपन्यास के न्यायप्रिय एवं कर्तव्यपरायण नायक के नाम (सूरज) को रेखांकित करते हुए उपन्यास का नाम 'इंसाफ़ का सूरज' रख दिया जबकि उपन्यास की कहानी से इस शीर्षक का कोई लेना-देना नहीं है । पर उपन्यास है कमाल का । पढ़कर आनंद आ गया । 

'इंसाफ़ का सूरजकहानी कहता है बम्बई (अब मुम्बई) से कोई पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटे-से कस्बे सरूरपुर में स्थित ठाकुर गजेन्द्रसिंह की हवेली की जो 'ठाकुर की हवेलीके नाम से प्रसिद्ध है । ठाकुर गजेन्द्रसिंह को दिवंगत हुए पाँच वर्ष हो चुके हैं । अब हवेली में उनकी विधवा सुलोचना देवी अपने दो पुत्रों - श्रीकांत तथा शूरवीर के साथ रहती हैं । ज्येष्ठ पुत्र श्रीकांत विवाहित है तथा उसकी पत्नी रमा एक आठ वर्षीय पुत्र की माता है जो दुर्भाग्यवश पैर से विकलांग हो गया है । समस्या कनिष्ठ पुत्र शूरवीर को लेकर है क्योंकि उसकी दो दुलहनों की हत्या हो चुकी है । सुलोचना देवी अब उसका तीसरी बार विवाह करने जा रही हैं मंजू नामक युवती से जिसके लिए उन्हें उसके कथित मामा बिज्जू ने बताया है कि वह बिना माता-पिता की अनाथ युवती है तथा जिसका मामा के अतिरिक्त इस संसार में कोई नहीं है । विवाह को रोकने का प्रयास पुलिस भी करती है तथा प्रकृति भी  वैवाहिक कर्मकांड के मध्य ही भीषण आँधी-तूफान-बारिश आकर विघ्न डालते हैं तथा कई अन्य अपशगुन भी होते हैं । लेकिन विवाह हो ही जाता है । 

विवाह के उपरांत यह देखकर मंजू का मस्तिष्क घूम जाता है कि उसके ससुराल के विभिन्न व्यक्ति उसे एकदूसरे से सावधान करते हैं तथा उसके पति की पहली दो पत्नियों की मृत्यु की पृथक्-पृथक् व्याख्या करते हैं । परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त घर का एक कुबड़ा नौकर बबरू भी उसे सावधान करने वालों तथा हवेली की दो पूर्व वधुओं की मृत्यु की कहानी सुनाने वालों में सम्मिलित है । ऐसे में मंजू को लगने लगता है कि वह तो किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकती तथा उसके प्राण संकट में हैं । लेकिन उसका अपना चरित्र तथा गतिविधियां भी रहस्यमय हैं । हवेली में पहले भी भुतहा घटनाएं घटती रही हैं तथा अब फिर से वैसा होने के कारण वह बदनाम होती जा रही है । सुलोचना देवी के विचार से ऐसा तंत्र-मंत्र द्वारा करवाया जा रहा है तथा करवाने वाला है उनके पति का पुराना मित्र तथा अब शत्रु जिसका नाम वीर बहादुर है एवं जो बम्बई (मुम्बई) में रहता है । उसकी काट भी वह तंत्र-मंत्र द्वारा ही करवाना चाहती हैं जिसके लिए वे चाण्डाल नामक तथाकथित तांत्रिक की सहायता लेती हैं ।

इधर पुलिस के उप-अधीक्षक त्रिपाठी साहब हवेली की दुलहनों की हत्या के मामले की छानबीन अपने सर्वाधिक विश्वस्त एवं सुयोग्य इंस्पेक्टर सूरज को सौंपते हैं जिसकी वे सदा 'इंसाफ़ का सूरज' कहकर प्रशंसा करते हैं । सूरज अपने साथी सब-इंस्पेक्टर खरे के साथ मिलकर मामले की तह में घुसने लगता है लेकिन तभी हवेली में हो रही डरावनी घटनाओं से घबराकर ठाकुर परिवार हवेली को ख़ाली करके अपने फ़ॉर्म हाउस पर रहने चला जाता है । इन डरावनी घटनाओं में सबसे ज़्यादा ख़ौफ़नाक और दहला देने वाली घटना है बबरू की हत्या । 

ख़ाली हवेली में घुस आता है अपराधियों का एक दल जिसके सदस्य अपने वास्तविक नामों के स्थान पर अपनी विशेषताओं के कारण पशुओं के नाम से जाने जाते हैं - एक चीता कहलाता है, एक बन्दर, एक हिरन, एक तोता; और इस दल के मुखिया को करकेंटा कहा जाता है । ख़ाली हवेली में क्या करना चाहते हैं वे ? क्या है उनका निशाना ? एक  रहस्यमयी 'लोमड़ी' इन लोगों के भी पीछे पड़ी है, वह कौन है ? और क्या हवेली की बहुओं की मौत से इन लोगों का कोई ताल्लुक़ है ?  इन सभी सवालों के जवाब तथा कहानी के सभी रहस्यों का ख़ुलासा पाठकों के सामने भी उसी तरह होता जाता है जिस तरह 'इंसाफ़ के सूरज' के सामने । उसके सामने राज़ उसकी अपनी खोजबीन से खुलते हैं तो पाठकों के सामने उपन्यास के पन्नों को पलटते जाने से । 

पुराने ज़माने में राजा-महाराजा-नवाब वग़ैरह तथा ज़मींदार-जागीरदार जैसे रईस लोग जब हवेलियां बनवाते थे तो उनमें तहख़ाने होते थे, सुरंगें होती थीं, छुपे हुए रास्ते होते थे और होता था एक रहस्य का माहौल । इस उपन्यास की हवेली भी ऐसी ही है जिसके कारण वह भी उपन्यास का वैसा ही अभिन्न एवं जीवंत पात्र है जैसे कि इसके मानवीय पात्र । उपन्यास में यह बहुत अच्छे-से स्थापित किया गया है कि वास्तविक संकट से अधिक व्यक्ति को उसके विचार एवं आशंकाएं भयभीत करती हैं । यह भी रेखांकित किया गया है कि व्यक्तियों के विचार वास्तविक तथ्यों से अधिक उनकी अपनी धारणाओं से प्रभावित होते हैं । इन्हीं कारणों से लोग एकदूसरे पर संदेह करते हैं तथा भ्रमित रहते हैं ।

'इंसाफ़ का सूरज' में वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी का जादू प्रथम दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य तक बना रहता है । उपन्यास के आख़िर में भी वे पाठकों को एक ज़ोरदार झटका दे ही देते हैं । ऐसे ही झटकों के लिए वे अस्सी के दशक में 'झटका स्पेशलिस्ट' के नाम से मशहूर हो गए थे । सरल हिंदी में लिखे गए इस उपन्यास को एक बार यदि आपने पढ़ना आरंभ कर दिया तो इसे अंत तक पढ़े बिना आप रह ही नहीं सकेंगे । उपन्यास में कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर विश्वास न किया जा सके । सब कुछ तार्किक ही है । सब-इंस्पेक्टर खरे के माध्यम से कुछ हास्य भी उत्पन्न किया गया है । अगर आप जानना चाहते हैं कि क्यों अस्सी के दशक में हिंदी के पाठक वेद प्रकाश शर्मा की कलम के दीवाने हो गए थे तो 'इंसाफ़ का सूरज'  पढ़ लीजिए । जान जाएंगे । 

© Copyrights reserved

3 टिप्‍पणियां:

  1. मूल प्रकाशित लेख (23 नवंबर, 2020) पर ब्लॉगर मित्र की टिप्पणी :

    Dr (Miss) Sharad SinghNovember 24, 2020 at 10:15 PM
    दिलचस्प लेख !!!

    Reply
    जितेन्द्र माथुरNovember 25, 2020 at 8:15 AM
    हार्दिक आभार आदरणीया शरद जी ।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपने जिज्ञासा बढ़ा दी उपन्यास के बारे में..मै वैसे तो उपन्यास नहीं प्पढ़ती ,समय मिला तो कभी पढूंगी..श्री वेद प्रकाश शर्मा के बारे में जानकारी देने के लिए शुक्रिया ..बहुत अच्छी प्रस्तुति इंसाफ का सूरज..

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत-बहुत शुक्रिया आपका । मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि यदि आपने यह उपन्यास पढ़ा तो आपको निराशा नहीं होगी ।

      हटाएं