'कौन बनेगा करोड़पति' कार्यक्रम का मैं तभी से प्रशंसक हूँ जब यह सन २००० में स्टार प्लस चैनल पर प्रसारित होना आरंभ हुआ था। इसके संचालक फ़िल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन का प्रशंसक मैं पहले भी था और इस कार्यक्रम को देखकर तो और भी बड़ा प्रशंसक बन गया। हाल के कुछ महीनों में मैं और मेरा परिवार इसकी पुरानी कड़ियां यूट्यूब पर देखने लगे हैं। अभी-अभी एक कड़ी में प्रिया कौर नामक एक पंद्रह वर्षीया बच्ची द्वारा अमिताभ को सम्पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उनकी प्रत्येक बात का समुचित प्रत्युत्तर देते देखकर बड़ा आनंद आया वरना तो हॉट सीट पर पहुँचने वाले अधिकतर प्रतिभागी अमिताभ के व्यक्तित्व एवं उनके आभामंडल के समक्ष नतमस्तक ही रहते हैं और बस उनका प्रलाप सुनते रहते हैं। विगत एक दशक में प्रसारित हुई केबीसी की अनेक कड़ियों को देखकर मुझे इसकी कुछ बातें आपत्तिजनक लगीं।
प्रथम तो अमिताभ का संबंधित प्रतिभागी से यह पूछना कि वह जीती हुई धनराशि का क्या करेगा (या करेगी)। यह एक नितांत निजी बात है। इसी संदर्भ में अमिताभ का यह पूछना कि 'इतनी धनराशि क्या मायने रखती है आपके जीवन में' और भी अधिक आपत्तिजनक है। किसी भी मनुष्य के जीवन में धन का महत्व भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही होता है (वैसे अर्जित धन का कुछ भाग परोपकार हेतु भी व्यय किया जा सकता है)। धन अपने आप में कोई मायने नहीं रखता। जीवन के शाश्वत मूल्य धन से अधिक मायने रखते हैं। ऐसे में हरिवंशराय बच्चन जैसे महान कवि के पुत्र का प्रतिभागियों के सामने 'पैसा-पैसा' करते रहना वितृष्णा उत्पन्न करता है। प्रतिभागियों से बहुत अधिक धन तो अमिताभ स्वयं इस कार्यक्रम से कमाते होंगे (उन्होंने अपने जीवन में धन कमाने के अतिरिक्त और कुछ किया भी नहीं है)। वे इस बात को भी बड़ी आसानी से दरकिनार कर देते हैं कि प्रतिभागी को जीती हुई सम्पूर्ण धनराशि नहीं मिलती है। उसका एक भाग तो सरकार कर के रूप में ले लेती है। अतः प्रतिभागी को तो कर कट जाने के उपरांत बची धनराशि ही मिलती है। बाक़ी रही बात मायने की तो इस महंगाई के ज़माने में जब तक धनराशि बहुत बड़ी न हो, उसके मायने की बात के ही कोई मायने नहीं। फिर किसी निर्धन (या निर्धन परिवार से आये हुए) प्रतिभागी के लिए और किसी संपन्न (या संपन्न परिवार से आये हुए) प्रतिभागी के लिए धनराशि के मायने अलग-अलग हो सकते हैं। अमिताभ कई बार ऐसे प्रश्नों के माध्यम से संबंधित प्रतिभागी के निजी जीवन को भी उघाड़ते हैं (कभी-कभी तो उसके ज़ख़्मों पर नमक छिड़कते हैं) जो नितांत अनुचित है। प्रतिभागी का जीतना उसके ज्ञान और भाग्य पर निर्भर करता है। अमिताभ या कार्यक्रम को बनाने वाले उसमें उसकी कोई सहायता नहीं करते हैं। और इसीलिए उसके जीतने से उन्हें उसके निजी जीवन को सार्वजनिक तमाशा बनाने का लाइसेंस नहीं मिल जाता है। इसके अलावा विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा किसी धर्मार्थ कार्य या परोपकार के निमित्त इस कार्यक्रम में आकर यह खेल खेलने वाली कड़ियां इसलिए मुझे बेकार लगती हैं क्योंकि उन्हें कितनी धनराशि जितानी है, यह चैनल पहले ही तय कर देता है।
'पत्नी' का उच्चारण सदा 'पतनी' करने वाले और गाहे-बगाहे अपनी इलाहाबादी भाषा में 'एक ठो' 'दोय ठो' बोलते रहने वाले अमिताभ की भाषा की शुद्धता पर तो मैं क्या कहूँ ? वे विवाहित व्यक्तियों से उनके पति या पत्नी को लेकर छेड़खानी करते रहते हैं, यहाँ तक तो ठीक है क्योंकि पति-पत्नी का रिश्ता ही ऐसा होता है और ऐसा करके अमिताभ दर्शकों का मनोरंजन करने के अपने उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। लेकिन जब उनके समक्ष हॉट सीट पर कोई अविवाहित युवक आ जाता है तो वे यह जानने के लिए उसके पीछे पड़ जाते हैं कि उसकी कोई गर्लफ़्रेंड (प्रेमिका) है या नहीं। यदि वह ऐसा कुछ होने का संकेत देता है तो वे उसका नाम जानने के लिए उसके पीछे पड़ जाते हैं। क्या उनका ऐसा करना उचित है ? हरगिज़ नहीं। मैं ऐसा मानता हूँ कि अमिताभ हर समय अभिनय ही करते हैं और उनकी हर बात और भाव-भंगिमा को इस कार्यक्रम के दिग्दर्शक पहले ही तय कर देते हैं। अर्थात् वे अपनी मर्ज़ी से ऐसा नहीं करते, उनका यह काम स्क्रिप्टेड होता है। लेकिन कार्यक्रम बनाने वालों के लिए भी उनसे ऐसा करवाना क्या उचित है ? नहीं ! बल्कि यह घोर आपत्तिजनक है और सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने (एवं घटिया मनोरंजन प्रदान करने) के प्रयास के अतिरिक्त कुछ नहीं। क्या हर लड़के की कोई गर्लफ़्रेंड होना आवश्यक है ? अपनी इस आयु में भी ऐसी निचले स्तर की बातें करने वाले अमिताभ क्या हॉट सीट पर आने वाली किसी अविवाहित युवती के साथ भी ऐसा करना चाहेंगे ? और अगर वे ऐसा करें तो कौन सी ऐसी संस्कारी भारतीय युवती होगी जो अपने ब्वॉयफ़्रेंड या प्रेमी से संबंधित कोई बात अपने माता-पिता-भाई आदि के सामने एक राष्ट्रीय चैनल पर करना चाहेगी ? क्या अमिताभ का केवल लड़कों के साथ बातचीत में ऐसा करना भारतीय पितृसत्तात्मकता (या पितृसत्तात्मक मानसिकता) का ही एक उदाहरण नहीं है जिसमें लड़कों को तो गर्लफ़्रेंड (या प्रेमिका) बनाने की छूट हो (यही नहीं, इसे उनकी अतिरिक्त योग्यता के रूप में भी देखा जाए) पर लड़कियों को ऐसी कोई छूट न हो ? और क्या अमिताभ स्वयं कभी अपने और रेखा के बहुचर्चित संबंधों की बात इस तरह सार्वजनिक रूप से होना गवारा करेंगे ?
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