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गुरुवार, 16 जुलाई 2026

उनका क्या जो वोट न दें या जिनके वोटों की ज़रूरत न हो ?

भारत में सत्ता चुनाव के माध्यम से प्राप्त होती है। चुनाव में मतदाता विभिन्न प्रत्याशियों अथवा दलों के लिए मतदान करते हैं। जिसे डाले गए मतों का बहुमत प्राप्त हो जाए, वह विजयी हो जाता है। अतः सत्ता के लिये चुनाव लड़ने वाले दलों हेतु वे महत्वपूर्ण होते हैं जो मत डालते हैं तथा जिनके मतों की संख्या इतनी होती है कि वह चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सके। जिस समूह के मतदाता इतनी संख्या में होते हैं कि वह चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सके, वह सत्ता पर दबाव डालकर अपनी बात मनवा सकता है। उसे प्रसन्न रखने के लिये सत्ताधारी भी अपनी ओर से पूरा-पूरा प्रयास करते हैं। उसके मनोनुकूल नीतियां बनाते हैं तथा निर्णय लेते हैं (कभी-कभी उसकी नाराज़गी के कारण लिये गए निर्णयों को वापस भी ले लेते हैं)। तो ऐसे में लोकतंत्र उन्हीं के लिए हुआ जिनके मत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हीं के मतों का बहुमत काम आता है। इस व्यवस्था का एक अन्य महत्वपूर्ण घटक वे पूंजीपति भी होते हैं जो दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन देते हैं। सत्ताधारियों द्वारा नीतियां एवं निर्णय उनके हिसाब से भी लिए जाते हैं।

लेकिन उनका क्या जिनके पास या तो मताधिकार ही नहीं है या उनके मत इतने नहीं हैं कि किसी चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकें ? उनकी आवश्यकताओं और कष्टों का क्या ? उनका स्वर सत्ता के कानों तक कैसे पहुँचेगा तथा उसे उनके हितों के वास्ते काम करने के लिए कैसे प्रेरित किया जा सकेगा ? इसका एक उदाहरण एंग्लो-इंडियन समुदाय है जिसे संसद में प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु हमारे संविधान-निर्माताओं ने उसके लिए लोक सभा में दो सदस्यों के मनोनयन का प्रावधान किया था जिसे सरकार ने कुछ वर्ष पूर्व समाप्त कर दिया क्योंकि उनके मत किसी भी चुनाव के परिणाम को प्रभावित नहीं करते (जबकि इस प्रावधान का मूल कारण ही यही था)। समुदाय के लोगों ने विरोध किया पर कौन सुनता ?

ऐसे समुदायों में बालक आते हैं क्योंकि मताधिकार वस्तुतः वयस्क मताधिकार है। बालक वोट नहीं डालते। ऐसे में उनके हिताहित की चिंता करने वाला कोई होना चाहिए। उनकी सुरक्षा तथा हितों की परवाह की जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए संगठन होने चाहिए जो सत्ता पर दबाव डालकर उनकी भलाई के निर्णय करवा सकें। इसीलिए बाल अधिकार समूह किसी भी लोकतंत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। 

जब संसार में लोकतांत्रिक व्यवस्था आरंभ हुई थी तो मताधिकार केवल वयस्क पुरुषों को दिया गया था। महिलाओं को मताधिकार नहीं था। संसार की आधी जनसंख्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने से वंचित थी। महिला समुदाय ने यह अधिकार लंबे संघर्ष के उपरांत प्राप्त किया। आज किसी भी लोकतंत्र में महिलाओं की बात और विचार पुरुषों की भांति ही महत्व रखते हैं। स्वतंत्र भारत में वयस्क मताधिकार में महिलाओं को आरंभ से ही सम्मिलित रखा गया। यह पृथक् बात है कि सदनों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

तृतीय लिंग तथा संबंधित वर्गों का समुदाय जिसे समेकित रूप से एलजीबीटीक्यू कहा जाता है, भी एक ऐसा ही समुदाय है जो कि सत्ता ही नहीं, समाज के द्वारा भी उपेक्षित ही रहा। मताधिकार होने के बावजूद इस समुदाय के मतों की संख्या अपर्याप्त होने के कारण इन लोगों की आवाज़ अनसुनी ही रही। अंततः इनके हितों का ख़याल रखने के लिए भी अधिकार समूह बने और धीरे-धीरे ही सही, इनकी बात भी सुनी गई और यह माना गया कि इनके भी बुनियादी अधिकार वही हैं जो सामान्य स्त्री-पुरुषों के।

अब मूक पशु-पक्षियों की बात करें जो न बोल सकते हैं, न मनुष्यों जैसा मस्तिष्क रखते हैं। भारत में पशु अधिकार संगठन एवं पशु-प्रेमी समूह धीरे-धीरे अस्तित्व में आए और उन्होंने इनकी रक्षा के लिए तथा इन्हें यातनाओं से बचाने के लिए आवाज़ उठाई। ऐसा होने पर भी इनकी सुरक्षा एवं देखभाल का लक्ष्य ठीक से प्राप्त नहीं किया जा सका है। सत्ता को तो इनसे कोई सरोकार नहीं (गाय जैसे धार्मिक आस्था से जुड़े पशुओं को छोड़कर)। जो पशु पालतू होते हैं, उनका जीवन तो चल जाता है लेकिन जो पालतू न हों, उन्हें आवारा कहकर उनकी पूर्णतः उपेक्षा करना किसी भी दृष्टि से मानवीय नहीं। वे भी ईश्वरीय व्यवस्था में अपना स्थान रखते हैं एवं उचित पालन के अधिकारी हैं। शाकाहार का महत्व भी मूलतः उसमें प्राणियों की रक्षा का तत्व अंतर्निहित होने के कारण ही है। 

ऐसे में न्यायालयों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। जिनकी बात सत्ता न सुने, समाज का बहुमत न सुने; उनकी बात चाहे कहीं से भी उठाई जाए, उसे सुनना और समझना न्यायालयों का कर्तव्य है। जैसा कि मैंने कहा, सत्ताधारी तो उन्हीं वर्गों की बात सुनेंगे जो चुनाव के माध्यम से सत्ता दिलाने में सहायक हों या दूसरे शब्दों में कहें तो वोट बैंक माने जाते हों। लेकिन जो वोट न दें या जिनके वोटों की सत्ता के लिए ज़रूरत न हो, उनके हिताहित का ध्यान रखने का काम भी किसी को तो करना है। यह बात न्यायालयों को समझनी चाहिए। चाहे आवारा पशु हों, पक्षी हों, एलजीबीटीक्यू समुदाय हो, बालक हों या फिर ऐसे समुदाय हों जिनके वोट किसी चुनाव परिणाम को प्रभावित न कर सकते हों; उनके हितों की बात चाहे जो भी संगठन करे, न्यायालयों को मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए न केवल वह बात सुननी चाहिए वरन किसी भी संबंधित मामले में निर्णय देते समय भी उसे ध्यान में रखना चाहिए। आख़िर देश केवल वोट बैंकों एवं पूंजीपतियों का ही तो नहीं। सनद रहे कि हमें अपनी अगली पीढ़ी को सभी प्राणियों के प्रति संवेदनशील बनाना है। इसलिए हमें अपने आचरण से उसे यही संदेश देना है कि हम किसी भी वर्ग या समुदाय के प्रति संवेदनहीन नहीं हैं। 

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मंगलवार, 7 जुलाई 2026

सच्चाई की कांटों भरी राह

मैंने अपने लेख 'सत्य और न्याय ! कितने असहाय !' में लिखा है कि सत्य का पथ पुष्पाच्छादित नहीं होता, कंटकाकीर्ण होता है जिस पर चलना बड़े साहस का कार्य है। अभी-अभी 'साझा संसार' में जेन्नी शबनम जी का बिहार के बिलौटी गाँव के भारत भूषण तिवारी के बलिदान पर लिखा गया लेख पढ़ा तो दिल भर आया। एक अट्ठाईस वर्षीय युवक जिसने विवाह तक न करके अपना जीवन समाज को समर्पित कर दिया था, गंगा के कटाव के कारण विस्थापित हुए जवइनिया नामक गाँव के लोगों की भलाई के लिए संघर्ष करते हुए पुलिस वालों के हाथों मारा गया। क्या उसका बलिदान देश की व्यवस्था और स्थिति को सुधारने में कोई योगदान देगा ? कुछ वर्ष पूर्व ऐसे ही देशभक्त युवाओं ने (शहीद भगत सिंह की भांति देश की अवस्था की ओर ध्यानाकर्षण के लिए) लोक सभा में धुएं के बम फेंके थे और देशप्रेम के नारे लगाते हुए अपनी गिरफ़्तारी दी थी। उनका क्या हुआ, पता नहीं। कोई न्यायिक कार्रवाई हुई या वे बिना किसी उचित कार्रवाई के ही कारागार में सड़ रहे हैं, पता नहीं। लेकिन देश की व्यवस्था में सुधार की उनकी आकांक्षा पूरी नहीं हुई। 

जेन्नी जी के लेख से पता चला कि भारत भूषण तिवारी ने अपना लाइव वीडियो बनाया था जिसके कारण उसकी पुलिस द्वारा की गई हत्या का सच सामने आ गया अन्यथा नक़ली मुठभेड़ों में जाने कितने ही निर्दोष मार दिए जाते हैं। उसके परिवार की पीड़ा और उसके गाँव के लोगों की पीड़ा को बाँटने वाला आज कौन है ? कम-से-कम पुलिस और सत्ताधारी राजनेता तो नहीं। वह हृदयहीन व्यवस्था से जवइनिया गाँव के विस्थापितों के पुनर्वास की लड़ाई लड़ रहा था। उन्हें न्याय न मिलने की सूरत में उसने आत्म-बलिदान की घोषणा की थी। पुलिस ने पहले तो उसकी माँग पूरी होने का आश्वासन उसे दिया लेकिन उसके हथियार फेंककर समर्पण कर देने के उपरांत उसे छलपूर्वक मार दिया। सत्य और न्याय के लिए जूझने वालों का हमारे देश में अंजाम शायद यही है। यही प्रार्थना है कि उसका बलिदान व्यर्थ न जाए तथा उसे न्याय मिले।

सुप्रसिद्ध निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने एक मर्मस्पर्शी फ़िल्म बनाई थी - सत्यकाम (१९६९) जो कहानी सुनाती थी एक सत्य के पथिक की। सुप्रसिद्ध बांग्ला उपन्यासकार नारायण सान्याल के एक उपन्यास पर आधारित है यह फ़िल्म। नायक जो सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लेता है, आजीवन कष्ट ही उठाता रहता है और अन्त में मर्मभेदी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। देश की संवेदनहीन व्यवस्था में उसके लिए यही संभव था। भ्रष्ट व्यवस्था से जुड़े लोग शक्तिशाली होते हैं और इस संसार की वास्तविकता 'सत्यमेव जयते' नहीं,  'शक्तिमेव जयते' ही है। आततायी शक्तिशाली होते हैं जबकि उत्पीड़ित दुर्बल। ऐसे में किसी भी पीड़ित को न्याय कैसे मिले ? और सांसारिक जीवन में रहकर ही सत्य के लिए जूझना वास्तव में जूझना होता है। सांसारिक जीवन से दूर रहकर आदर्शों की बड़ी-बड़ी बातें करना और दूसरों को उपदेश देना तो बहुत सरल है। फ़िल्म में दिखाया गया है कि नायक के पिता इस तथ्य को उसके संसार से चले जाने के उपरांत ही समझ पाते हैं कि सच्चाई की राह पर वस्तुतः कैसे चला जाता है। दशकों पूर्व बनी इस फ़िल्म का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था।

आए दिन अन्याय होते हैं। आए दिन उत्पीड़न होते हैं। पी‌ड़ित न्याय की आस लगाए बैठे रहते हैं लेकिन उनमें से अधिकांश को न्याय नहीं मिलता क्योंकि अत्याचार करने वाले बहुत समर्थ होते हैं। गोस्वामी तुलसीदास तो बहुत पहले ही कह गए हैं-समरथ को नहिं दोष गुसाईं। यदि कोई संवेदनशील व्यक्ति या संस्था किसी असहाय पीड़ित या पीड़िता को व्यवस्था द्वारा न्याय दिलाने का प्रयास करे तो उसे भी शक्तिशाली उत्पीड़क अपने शत्रु के रूप में ही देखते हैं तथा उसे भी ठिकाने लगा देने की कोशिश में लग जाते हैं ताकि फिर कभी कोई किसी असहाय पीड़ित या पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए उठ खड़ा होने का साहस न करे। ऐसे में किसी बेसहारा का हाथ थामना ही बड़ी हिम्मत का काम होता है। यह हिम्मत भारत भूषण तिवारी ने जवइनिया गाँव के विस्थापितों के लिए दिखाई और परिणाम में उसे अपनी शहादत देनी पड़ी। बहुत आत्मबल चाहिए ऐसा कुछ करने के लिए। उसने अपने लाइव वीडियो में कहा है कि यदि वह मारा जाता है तो उसका शरीर दान कर दिया जाए। कितनी असाधारण बात है यह !

भारत भूषण तिवारी की शहादत सोशल मीडिया के कारण देश के सामने आ गई अन्यथा आज का बिक चुका भारतीय मीडिया सच को कभी सामने नहीं आने देता। वह या तो उसे छुपा देता या विकृत कर देता। आज तो ईमान की बात कहना तक मुश्किल है, कुछ ठोस करना तो बहुत दूर। हमारे न्यायालय तक आज न्याय का नहीं, सत्ता का साथ दे रहे हैं। जिसे भी देखो, वह सत्ता के आगे नतमस्तक हो रहा है और स्वार्थ-साधन में लिपटी सत्ता केवल जनसामान्य को (धर्म का अवलम्ब लेकर) भ्रमित करने में लगी है। न्यायालयों का हाल तो यह हो गया है कि वे अपने निर्णयों एवं वक्तव्यों से उन संवेदनशील लोगों को भी हतोत्साहित ही कर रहे हैं जिन्हें निरीह मूक प्राणियों की परवाह है। ऐसे में सच्चाई की राह कांटों भरी ही हो सकती है जिस पर फूलों का मिलना दुर्लभ होता है। 'सत्यकाम' फ़िल्म के नायक सत्यप्रिय (धर्मेन्द्र) या बिलौटी गाँव के भारत भूषण तिवारी की तरह जो इस बात को समझ कर स्वीकार कर ले, वही उस पर चल सकता है। 

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

विश्वास के कच्चे धागे से जुड़ा रिश्ता

पति और पत्नी का रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है जिसमें सबसे अधिक निकटता होती है। इससे अधिक निकटता माता और शिशु के रिश्ते में ही संभव है। यह दैहिक निकटता मानसिक निकटता में भी परिवर्तित हो, इसके लिए आवश्यक है विश्वास। इसीलिए पति और पत्नी का संबंध प्रेम के साथ-साथ विश्वास से भी जुड़ा होता है। यह विश्वास एक कच्चे धागे की भांति होता है जिसे टूटना हो तो एक झटके में टूट जाए और जो न टूटना हो तो हज़ार हाथियों के बल से भी न टूटे। यह विश्वास बना रहे, इसके लिए आवश्यक है दंपती का परस्पर संवाद। किसी भी रिश्ते में संवादहीनता की नौबत कभी नहीं आने देनी चाहिए, पति-पत्नी के रिश्ते में तो विशेष रूप से। संवादहीनता ही ग़लतफ़हमियों की जननी है और ग़लतफ़हमियों से ही रिश्ते दरकते हैं। अतः अच्छा यही है कि जो बात मन में हो, अपने जीवन साथी से साफ़-साफ़ कह दी जाए ताकि जो भी मुद्दा हो, वो बातचीत से सुलझ जाए।

शक़ और संवादहीनता के कारण पति-पत्नी के संबंध में दरार आने के विषय पर कई हिंदी फ़िल्में बनी हैं। मैं आज दो फ़िल्मों की बात करूंगा। एक फ़िल्म है 'गुमराह' (१९६३) जो एक श्वेत-श्याम फ़िल्म है। जिन लोगों ने 'हम आपके हैं कौन?' फ़िल्म देखी है, उन्हें याद होगा कि उसमें बड़ी बहन के अकस्मात् देहांत के उपरांत उसकी छोटी बहन का विवाह उसके विधुर जीजा से तय कर दिया जाता है जो होते-होते बच जाता है। 'गुमराह' में ऐसा विवाह हो भी जाता है तथा छोटी बहन को अपने जीजा की पत्नी बनने के साथ-साथ दिवंगत बड़ी बहन के बच्चों के लालन-पालन का दायित्व भी संभालना पड़ता है। यह कहानी है मीना (माला सिन्हा) की जिसे राजेन्द्र (सुनील दत्त) से प्रेम है किन्तु उसकी बड़ी बहन (निरूपा रॉय) के निधन के उपरांत उसके पिता उसका विवाह उसके विधुर जीजा अशोक (अशोक कुमार) से कर देते हैं। विवाह के कुछ समय बाद मीना का राजेन्द्र से फिर से मिलना होता है, प्रेम की चिंगारी पुनः उन दोनों के मन में भड़क उठती है और दोनों चुपके-चुपके मिलने लगते हैं। अचानक मीना को एक अजनबी औरत (शशिकला) इस बारे में अशोक को बता देने की धमकी देकर ब्लैकमेल करने लगती है। अंत में पता लगता है कि वह औरत अशोक की सचिव (सेक्रेटरी) है तथा उसके कहने पर ही वह मीना को ब्लैकमेल कर रही थी क्योंकि (उसकी राय में) मीना एक विवाहिता की लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन कर रही थी। अशोक मीना को बताता है कि उसे उसकी राजेन्द्र से मुलाक़ातों के बारे में पता था और वह चाहे तो राजेन्द्र के पास जा सकती है। लेकिन मीना राजेन्द्र से अपना संबंध-विच्छेद करके अशोक के साथ अपना वैवाहिक जीवन जारी रखने का निर्णय लेती है।

दूसरी फ़िल्म है 'आप की कसम' (१९७४) जो कमल (राजेश खन्ना) और सुनीता (मुमताज़) के वैवाहिक जीवन की कहानी है। कमल और सुनीता प्रेम विवाह करते हैं और अपने सुखी दाम्पत्य जीवन का आरंभ करते हैं। कमल के पड़ोसी मोहन (संजीव कुमार) का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं है और वह अपनी पत्नी की बेरूख़ी से परेशान रहता है। सुनीता से उसे हमदर्दी और सांत्वना मिलती है। सुनीता के मन में उसे लेकर कोई ग़लत भावना नहीं है लेकिन कमल को मोहन और सुनीता के संबंध पर संदेह हो जाता है। वह छुपकर सुनीता पर नज़र रखने लगता है। जब सुनीता को कमल के अपने पर संदेह का पता चलता है तो उसे गहरा धक्का लगता है। वह कमल के जीवन से निकल जाती है तथा अपने माता-पिता के पास चली जाती है। कमल को बाद में सच्चाई (अर्थात् सुनीता की निर्दोषिता) का पता लगता है तो उसे अपने किए पर पश्चाताप होता है लेकिन उसका और सुनीता का वैवाहिक जीवन समाप्त हो जाता है।

इन दोनों ही फ़िल्मों में समस्या पति और पत्नी के बीच विश्वास की कमी की दिखाई गई है। 'आप की कसम' एक बेहतर फ़िल्म है और पितृसत्तात्मक समाज में नारी के आत्म-सम्मान की बात पुरज़ोर ढंग से कहती है। कमल यदि छुपकर अपनी पत्नी पर नज़र रखने के बजाय उससे स्पष्ट बात करता और अपने संदेह का निवारण कर लेता तो उसका और सुनीता का वैवाहिक जीवन नष्ट नहीं होता। सुनीता अंत में कमल के पास नहीं लौटती और कमल को अपनी ग़लती का बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है। कमल का घर छोड़ने से पहले सुनीता का कमल से यह कहना - 'मोहन जी से मेरा क्या संबंध है, मैं तुम्हें नहीं बताऊंगी लेकिन आज के बाद तुमसे मेरा कोई संबंध नहीं रहेगा' एक स्वाभिमानी नारी के अंतस से निकली आवाज़ है। वह यह सहन नहीं कर सकती कि उसका पति उस पर विश्वास न करे और उसके चरित्र पर निराधार संदेह करे। आख़िर उन दोनों ने प्रेम विवाह किया था और विश्वास ही प्रेम का आधार होता है।

इसके विपरीत 'गुमराह' में पितृसत्तात्मक सोच ही दिखाई गई है। यद्यपि 'गुमराह' को आज एक क्लासिक माना जाता है, मुझे यह फ़िल्म बड़ी दोषपूर्ण और प्रतिगामी लगी। सर्वप्रथम तो मीना का उसकी मर्ज़ी के बिना उसके विधुर जीजा अशोक से विवाह कर दिया जाना ही ग़लत था। न तो मीना के पिता ने उसकी इच्छा जाननी चाही और न ही अशोक ने। विवाह के उपरांत यदि मीना का राजेन्द्र से छुपकर मिलना ग़लत था तो अशोक का भी उसे अपनी सचिव के माध्यम से ब्लैकमेल करवाना ग़लत था। यदि अशोक को मीना और राजेन्द्र के इस तरह मिलने की बात पता थी (वैसे उनका संबंध भावनात्मक ही था, कुछ और नहीं) तो वह मीना से स्पष्ट बात कर सकता था। उसे अपनी ही पत्नी को ब्लैकमेल करवा कर और फिर शर्मिंदा करके क्या हासिल हुआ ? मीना ने ग़लत किया लेकिन उसने भी तो मीना पर न तो विश्वास किया, न ही उससे संवाद। इससे पति-पत्नी का रिश्ता मज़बूत नहीं हुआ, कमज़ोर ही हुआ। अंत में मीना को पत्नी के उत्तरदायित्व और मर्यादा पर भाषण देकर उसे अपने प्रेमी के पास चले जाने की छूट देना भी अशोक की पितृसत्तात्मक सोच का ही प्रतीक है। मीना उसकी संपत्ति नहीं, जीवन-संगिनी है, एक मनुष्य है जिसे अपने जीवन के संबंध में निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। उसे पति की दी हुई ऐसी किसी छूट की कोई आवश्यकता नहीं। और उसके पति को उसे नीचा दिखाने का कोई अधिकार नहीं चाहे उसने भूल ही की थी। वैवाहिक संबंध में पति और पत्नी दोनों ही समान होते हैं। कोई किसी से बेहतर या कमतर नहीं होता। यह बात अशोक को समझनी चाहिए थी। ऐसी दोषपूर्ण फ़िल्म को क्लासिक माना जाता है, यह आश्चर्य की बात है। 

'गुमराह' का निर्माण और निर्देशन बी.आर. चोपड़ा ने किया है जबकि 'आप की कसम' का जे. ओम प्रकाश ने। गीत-संगीत दोनों का ही बहुत अच्छा है और कलाकारों के सुंदर अभिनय से सजी दोनों ही फ़िल्में मनोरंजक हैं। पर जहाँ 'आप की कसम' सार्थक है, वहीं 'गुमराह' में सार्थकता का अभाव है। अंत में मैं फिर से यही बात कहूंगा कि पति-पत्नी का संबंध विश्वास के कच्चे धागे से जुड़ा होता है जिसे दोनों में से किसी को भी टूटने नहीं देना चाहिए। पारस्परिक विश्वास की नींव पर ही सुखी वैवाहिक जीवन का भवन खड़ा होता है। और दोनों जीवन साथियों में संवाद तो बराबर रहना ही चाहिए। भूल किसी से भी हो सकती है क्योंकि सभी मनुष्य ही हैं। लेकिन यदि एक जीवन साथी भटक जाए तो दूसरे का दायित्व उसे नीचा दिखाना या शर्मिंदा करना नहीं, बल्कि उससे स्पष्ट रूप से (खुलकर) बात करके समस्या का समाधान निकालना होता है। यही परिपक्वता की निशानी है। पति-पत्नी मन एवं व्यवहार से परिपक्व होंगे तो ही दाम्पत्य जीवन सुदीर्घ, शांतिपूर्ण एवं सुखद होगा।

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