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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग

आशा भोसले नहीं रहीं। आशा ताई के नाम से मशहूर महान गायिका अपने करोड़ों प्रशंसकों से विदा लेकर दिगंत में विलीन हो गई। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की ही भांति वे भी दीर्घायु हुईं। लेकिन सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ने से पूर्व उन्होंने अपने जीवन में जो संघर्ष किया, वह उनकी अग्रजा के संघर्ष से भी अधिक रहा। अपने पिता के निधन के उपरांत चारों बहनें (लता, आशा, उषा और मीना) तथा एक भाई (हृदयनाथ) बम्बई (मुम्बई) की फ़िल्मी दुनिया में अपना एक मुकाम बनाने के लिए उतर पड़े। लता को १९४९ में बीस वर्ष की आयु में ही 'महल' तथा 'बरसात' जैसी फ़िल्मों से जो सफलता मिली, उसके उपरांत उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लेकिन आशा के जीवन में वैसी सफलता को आने में एक लंबा समय लगा। इसके अतिरिक्त आशा ने अल्पायु में ही विवाह कर लिया तथा अल्पायु में ही वे माता भी बन गईं। अपने वैवाहिक जीवन में आशा ने दुख-ही-दुख सहे तथा एक दिन उन्हें अपने तीन बच्चों के दायित्व के साथ अकेले ही जीवन-समर में उतरना पड़ा। लता तो तब तक सफलता की चोटी पर जा बैठी थीं। अब हाल यह था कि एक तो आशा का स्वर लता से मिलता-जुलता था, दूसरी ओर जहाँ लता को नायिकाओं वाले गीत गाने के लिए मिलते थे, वहीं आशा को प्रायः नृत्यांगनाओं वाले गीत ही मिलते थे। उन्हें पारिश्रमिक भी लता से बहुत कम मिलता था जबकि उनके ऊपर अपनी तीन संतानों के भरण-पोषण का दायित्व था। लेकिन आशा ने हिम्मत नहीं हारी।

उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे अपनी बड़ी बहन की परछाईं से निकलकर ही रहेंगी। उन्होंने प्रयास करके अपने स्वर को लता के स्वर से भिन्न बनाया तथा जो भी गीत मिले, उन्हें गाते हुए अपने समय की प्रतीक्षा करती रहीं। विवाह-विच्छेद हो चुकने पर भी उन्होंने अपने प्रथम पति के उपनाम 'भोसले' को जीवन भर अपने नाम के साथ जोड़े रखा। वे 'आशा मंगेशकर' नहीं, 'आशा भोसले' ही बनी रहीं। धीरे-धीरे उनकी अपनी पहचान बनी जो कि लता से पूर्णरूपेण भिन्न थी। 

संगीतकार ओ.पी.नैय्यर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना तथा उन्हें बहुत-से ऐसे गीत गाने को दिए जो कि अत्यंत लोकप्रिय हुए (ओ.पी.नैय्यर ने लता से कभी कोई गीत नहीं गवाया)। आगे चलकर पश्चिमी संगीत से प्रभावित राहुलदेव बर्मन ने भी उनसे कुछ ऐसे गीत गवाए जो कि उनके अलावा शायद कोई गायिका नहीं गा सकती थी। अपनी समकालीन गायिकाओं में वे विलक्षण रहीं। आज ढेरों ऐसे गीत हैं जो उन्हीं के नाम से पहचाने जाते हैं। अपनी विलक्षणता को पहचान कर उन्होंने कालांतर में पॉप गीत भी गाए तथा अपने ही पुराने गीतों के रीमिक्स भी निकाले। वैजयंतीमाला पर फ़िल्माए गए 'नया दौर' (१९५७) के यादगार गीत 'उड़ें जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी' से लेकर करिश्मा कपूर पर फ़िल्माए गए 'दिल तो पागल है' (१९९७) के गीत 'ले गई ले गई' तक आशा जी के स्वर का यौवन जस-का-तस बना रहा। अपने जीवन में सदा साहसिक निर्णय लेने वाली आशा जी ने नानी तक बन चुकने के उपरांत राहुलदेव बर्मन से विवाह करके अपने साहस का फिर परिचय दिया।

उनके स्वर में शायरी को जादुई बना देने का जो गुण था, उसे संगीतकार ख़य्याम ने पहचानकर फ़िल्म 'उमराव जान' (१९८१) में रेखा पर फ़िल्माई गई ग़ज़लें उनसे गवाईं और उन ग़ज़लों ने इतिहास बना दिया। 'दिल चीज़ क्या है', 'इन आँखों की मस्ती के', 'ये क्या जगह है दोस्तों' और 'जुस्तजू जिसकी थी' जैसी ग़ज़लें आशा जी की दिलकश आवाज़ में अमर हो गईं।

लेकिन मैंने आशा जी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों के जादू को सही मायनों में उनके ग़ज़ल एलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' में महसूस किया। यह ग़ज़ल एलबम उन्होंने ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली के साथ मिलकर निकाला था। दो भागों में प्रस्तुत इस एलबम में एक भी ऐसा गीत या ग़ज़ल नहीं है जिसमें आशा जी का स्वर न हो। उनकी आवाज़ एकल में भी है और युगल में भी। मेराज-ए-ग़ज़ल का अर्थ है - ग़ज़ल का उत्कर्ष।

१९८३ में मूल रूप से कैसेट के रूप में निकले इस एलबम के पहले भाग की 'ए' साइड में 'रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए', 'दयार-ए-दिल की रात में' तथा 'यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग' हैं। इनमें से आशा जी की ग़ज़ल 'यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज़ का रंग' मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल है जिसमें उर्दू शायरी अपने पूरे जलाल पर है। 'बी' साइड में 'गए दिनों का सुराग लेकर', 'हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहां तक आ गए (आशा जी की एक बेहतरीन ग़ज़ल) तथा 'रात जो तूने दीप बुझाए (आशा जी की एक बेहतरीन नज़्म) हैं।

इस एलबम के दूसरे भाग की 'ए' साइड में 'फिर सावन रुत की पवन चली', 'दर्द जब तेरी अता है तो गिला किससे करें (आशा जी की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल) और 'करूं न याद मगर किस तरह भुलाऊं उसे' (आशा जी की बेहतरीन ग़ज़ल) हैं। 'बी' साइड में आशा जी के दो बेहतरीन गीत हैं - पहले नम्बर पर 'सलोना-सा सजन है' और तीसरे नम्बर पर 'नैना तोसे लागे' जबकि इनके बीच में दोनों कलाकारों द्वारा गाई हुई ग़ज़ल है - 'दिल धड़कने का सबब याद आया'।

'मेराज-ए-ग़ज़ल' आशा जी के प्रशंसकों के लिए किसी अनमोल उपहार से कम नहीं। यह संगीत-प्रेमियों के लिए भी है तथा शायरी के रसिकों के लिए भी। आशा जी को उनके गीतों, ग़ज़लों, नज़्मों आदि ने अमरत्व प्रदान कर दिया है। वे हमारे दिलों में हमेशा रहेंगी।

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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

वेद प्रकाश शर्मा की क़लम से निकला एक धर्मयुद्ध

इस समय मध्य-पूर्व में जो अवांछित युद्ध चल रहा है, उसके लिए अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एवं इज़राइल के राष्ट्र-प्रमुख बेंजामिन नेतन्याहू की खुली आलोचना सुनने में नहीं आ रही है जबकि ईरान की आलोचना हुई है। निश्चय ही ईरान ने भी ग़लत क़दम उठाया है किंतु किसी राष्ट्र की सार्वभौमिकता पर आक्रमण करके अमरीका एवं इज़राइल ने बहुत बड़ी ग़लती की थी। न तो संयुक्त राष्ट्र में इसकी आलोचना हुई एवं न ही भारत ने इसकी आलोचना की। यदि कोई अन्य राष्ट्र ऐसा ही भारत के साथ करता तो क्या हम उसका सामरिक प्रत्युत्तर नहीं देते एवं अन्य राष्ट्रों से उस आक्रमणकारी राष्ट्र के कुकृत्य की आलोचना की अपेक्षा नहीं करते ? अमरीका ने वही किया है जो कि तथाकथित बड़े देश छोटे देशों के साथ करते आए हैं। यह केवल साम्राज्यवाद है, और कुछ नहीं। केवल डोनाल्ड ट्रम्प की सनक के चलते यह युद्ध बिना किसी चेतावनी के ईरान एवं उसके नागरिकों पर थोपा गया है। यहाँ तक कि अमरीका की संसद ने भी अब तक इसका अनुमोदन नहीं किया है।

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा आज जीवित होते तो निश्चय ही इस विषय को आधार बनाकर कोई उपन्यास लिखते क्योंकि वे सदा समसामयिक विषयों पर अपनी लेखनी चलाने में विश्वास रखते थे। अफ़ग़ानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ के हस्तक्षेप को आधार बनाकर उन्होंने अपनी विजय-विकास सीरीज़ के अंतर्गत एक यादगार उपन्यास लिखा था। इस उपन्यास का नाम है - धर्मयुद्ध।

'धर्मयुद्ध' कहानी सुनाता है एक काल्पनिक राष्ट्र 'मजलिस्तान' (जिसे हम अफ़ग़ानिस्तान मान सकते हैं) की जिसमें एक विदेशी महाशक्ति 'सेमिनार' (जिसे हम सोवियत संघ मान सकते हैं) के हस्तक्षेप से सत्ता परिवर्तन हो जाता है। वहाँ के शासक सादात को मार डाला जाता है एवं एक कठपुतली शासक इबलीस को गद्दी पर बैठा दिया जाता है। सेमिनार की सेनाएं मजलिस्तान में डेरा डाल देती हैं एवं सामान्य नागरिकों पर अत्याचार होते हैं। सादात की पुत्री मुमताज़ कुछ पुराने वफ़ादारों के साथ मिलकर एक विद्रोहियों का दल बनाती है एवं  इबलीस की सेना तथा विदेशी ताक़तों (जिनके उच्चाधिकारी मजलिस्तान में इबलीस के सिर पर सवार रहते हैं) से लोहा लेती है। प्रेस पर सेंसरशिप लागू होने के कारण बाहरी दुनिया को ये सारी बातें पता नहीं होतीं। बाहरी दुनिया को सिर्फ़ वही बताया जाता है जो इबलीस तथा उसके विदेशी आका बताना चाहते हैं।

विद्रोही दल के लोग डॉक्टर भसीन नामक एक भारतीय वैज्ञानिक का अपहरण कर लेते हैं जिसे छुड़ाने का कार्य भारत सरकार अपनी सीक्रेट सर्विस को सौंपती है। भारत के प्रमुख सीक्रेट एजेंट हैं विजय और विकास। जहाँ विजय एक ठंडे दिमाग़ वाला तथा सोच-समझकर कोई भी क़दम उठाने वाला व्यक्ति है, वहीं मुश्किल से इक्कीस वर्ष का विकास एक जल्दी उत्तेजित हो जाने वाला एवं भावनाओं में बह जाने वाला युवक है। विकास विजय की चचेरी बहन रैना तथा उसके मित्र पुलिस सुपरिंटेंडेंट रघुनाथ का पुत्र है। अपने व्यक्तित्व की कुछ कमियों के बावजूद विकास की विशेषता यह है कि वह चरम सीमा तक देशभक्त है। इस सीरीज़ के अन्य कुछ प्रमुख चरित्र हैं - विजय के पिता ठाकुर निर्भयसिंह जो कि राजनगर (इस सीरीज़ के उपन्यासों हेतु सिरजा गया एक कल्पित शहर) के इंस्पेक्टर जनरल ऑव पुलिस हैं, उसकी मां उर्मिलादेवी, भारतीय सीक्रेट सर्विस का मुखिया अजय उर्फ़ ब्लैक ब्वॉय (जो रैना का सगा भाई है), एक अंतर्राष्ट्रीय अपराधी अलफ़ांसे आदि। 

बहरहाल भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा डॉक्टर भसीन को छुड़ाने का दायित्व भारतीय सीक्रेट सर्विस को सौंपा जाता है और उसका मुखिया ब्लैक ब्वॉय यह काम विकास को सौंप देता है। विकास मजलिस्तान पहुँचता है और काम पे लग जाता है। उसकी मुलाक़ात इबलीस तथा सेमिनार के उच्चाधिकारियों तोम्बो एवं गार्जियन से होती है तो उसका माथा ठनकता है तथा उसे महसूस होता है कि जो कुछ भी बाहरी दुनिया को समाचार-माध्यमों से बताया जा रहा है, वस्तुस्थिति उससे भिन्न है और मजलिस्तान के हालात बहुत ख़राब हैं। डॉक्टर भसीन को छुड़ाने के प्रयास मे उसका सामना मुमताज़ एवं उसके दल से होता है। शीघ्र ही वह सब कुछ समझ लेता है। डॉक्टर भसीन को सुरक्षित भारत वापस भेज देने के उपरांत वह मुमताज़ एवं उसके दल से मिल जाता है तथा उनकी सहायता करने लगता है।

जब यह सूचना भारत पहुँचती है तो विजय एवं ब्लैक ब्वॉय असमंजस में पड़ जाते हैं क्योंकि सेमिनार भारत का मित्र देश है तथा विकास के इस कार्य से यह मित्रता संकट में पड़ सकती है। यद्यपि विकास यह कार्य अपनी निजी हैसियत से कर रहा है किंतु है तो वह भारतीय एजेंट ही। विकास अपने ही देश तथा अपने उच्चाधिकारियों के विरुद्ध जाकर मजलिस्तान की घायल मानवता के पक्ष में कार्य करने को एक धर्मयुद्ध कहता है। उसे रोकने हेतु अब उसके गुरु विजय को मजलिस्तान जाना पड़ता है तथा वह अंततः अपने शिष्य विकास को वापस ले ही आता है। किंतु विजय के अपने इस कार्य में सफल होने से पूर्व ही विकास एक पैम्फ़्लैट बनाकर मुमताज़ को दे चुका होता है जिसमें मजलिस्तान के जनसामान्य से देशद्रोहियों तथा उनसे जुड़ी विदेशी ताक़तों के विरुद्ध उठ खड़े होने का आह्वान होता है। इस पैम्फ़्लैट के सम्पूर्ण मजलिस्तान में वितरण का परिणाम यह होता है कि मजलिस्तान में बड़े पैमाने पर जनक्रांति हो जाती है, विदेशी ताक़तों को देश छोड़ना पड़ता है तथा मुमताज़ मजलिस्तान की नई राष्ट्रपति बनती है।

मैंने उपन्यास का सार-संक्षेप दे दिया है लेकिन इस अत्यंत रोचक उपन्यास का वास्तविक आनंद इसे पूर्ण रूप से पढ़कर ही लिया जा सकता है। यह उपन्यास आद्योपांत मनोरंजक है। मजलिस्तान की धरती पर विजय और विकास के टकराव का तो कहना ही क्या ? यह उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ हमें वैश्विक राजनीति से भी परिचित करवाता है एवं स्पष्ट करता है कि महाशक्तियों की राजनीति में छोटे देशों की निर्दोष जनता किस तरह पिस जाती है। यह इस बात को भी स्पष्ट करता है कि कोई भी जनक्रांति विदेशी सहायता से सफल नहीं हो सकती तथा किसी भी देश द्वारा विदेशी सैन्य सहायता ली भी नहीं जानी चाहिए क्योंकि सहायता करने वाला देश फिर अपनी सहायता की क़ीमत वसूल करने में लग जाता है और पीड़ित (छोटे) देश के लिए एक ग़ुलामी से बाहर निकलकर दूसरी ग़ुलामी में फंस जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है। लेखक ने हृदयविदारक ढंग से दर्शाया है कि जब किसी देश में विदेशी हस्तक्षेप से सत्ता-परिवर्तन होता है तो निरीह जनता पर किस प्रकार अमानुषिक अत्याचार किए जाते हैं। विकास के माध्यम से लेखक ने भारतीय विदेश नीति के पाखंड की भी आलोचना की है जिसके अंतर्गत भारत तत्कालीन सोवियत संघ से अपनी मित्रता के चलते उसके अफ़ग़ानिस्तान में घुसपैठ करने का विरोध नहीं करता था। 

उपन्यास विजय एवं विकास के चरित्रों को भी विस्तार से दर्शाता है। जहाँ विकास का दृष्टिकोण मानवीय है वहीं विजय यह मानता है कि एक गुप्तचर को भावनाओं से ऊपर उठ जाना चाहिए तथा उसका एकमात्र लक्ष्य वही करना होना चाहिए जो कि उसके देश के हितों के अनुकूल हो। लेकिन लेखक यह भी (इस उपन्यास में तथा इस सीरीज़ के कई अन्य उपन्यासों में) दर्शाते हैं कि किसी को भी प्यार न करने वाला विजय भी अपने शिष्य विकास से बहुत प्यार करता है। 

इस उपन्यास की गुणवत्ता इतनी उच्च है कि इसे उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है। कई दशक पूर्व लिखा गया यह उपन्यास आज भी ताज़गी से भरा एवं सामयिक लगता है। सरल हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास वेद प्रकाश शर्मा के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है। जो भी इसे पढ़ेगा, उसका न केवल मनोरंजन होगा वरन उसके विश्व राजनीति संबंधी ज्ञान में भी संवर्धन होगा। 

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