Wednesday, April 1, 2020

दर्द सबका एक-सा


लंबे इंतज़ार के बाद आख़िर निर्भया के मुजरिमों को सज़ा-ए-मौत दे ही दी गई । भारत के प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर दिया कि न्याय की विजय हुई है । लम्बे अरसे से विभिन्न संचार माध्यमों पर सलेब्रिटी बनकर दर्शन एवं वक्तव्य दे रही निर्भया की माता ने अपनी असीम प्रसन्नता की अभिव्यक्ति कर दी । प्रचार के भूखे अन्ना हज़ारे (जिन्हें अब कोई टके के भाव भी नहीं पूछता) ने भी अपना तथाकथित मौन-व्रत समाप्त कर दिया जो उन्होंने तब तक रखने की घोषणा की थी जब तक कि निर्भया को न्याय (!) नहीं मिल जाता । दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा ने इसे सारे देश की जीत बताया । सुर्ख़ियों में रहने वाले लगभग सभी लोगों ने आशा व्यक्त की कि अब भारत की महिलाएं अधिक सुरक्षित रहेंगी । क्या वाक़ई ?

निर्भया कांड के कुछ समय के उपरांत जब देश अपनी जाने-पहचाने जुनून में डूबा हुआ थातब मैंने एक लेख लिखा था : आँखों वाला न्याय चाहिएअंधा प्रतिशोध नहीं । मैं आज भी यही मानता हूँ कि समाज में सुधार विवेकपूर्ण न्याय से होता हैविवेकहीन प्रतिशोध से नहीं । आज से कुछ दशक पूर्व समाज के दबंगों द्वारा उत्पीड़ित अनेक लोग व्यवस्था से न्याय न मिलने पर स्वयं समाज एवं कानून के विरूद्ध शस्त्र उठाकर बाग़ी (या डाकू या दस्यु) बन जाते थे । इंसाफ़ का न मिलना या इतनी देर से मिलना कि वह अपने मायने ही खो बैठेही वस्तुतः समाज की अनेक समस्याओं की जड़ है क्योंकि वह मासूमों को अनचाहे ही मुजरिम बना देता है । कुछ लोगों को सूली चढ़ा देने से भीड़ को राज़ी किया जा सकता हैसमस्या का हल नहीं निकाला जा सकता । बहरहाल इस लेख में मेरा विषय यह नहीं है ।

इस लेख में जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि दर्द दर्द में फ़र्क़ करना ग़लत है क्योंकि भुगतने वालों का दर्द एक-सा ही होता है । दिल और रूह में उठने वाले दर्द की माप-तौल के कोई पैमाने ईज़ाद न किए गए हैंन किए जा सकते हैं । निर्भया के अपराधियों को मृत्युदण्ड देने के लिए जो उन्माद देश में उठा (जिसका नेतृत्व स्वयं निर्भया के माता-पिता ही कर रहे थे)वैसा उन्माद ऐसी ही अन्य पीड़िताओं के अपराधियों को मृत्युदंड देने के लिए तो नहीं उठा । क्यों ? क्या उनके दर्द को निर्भया के दर्द से कमतर आँका जा सकता है ? या उनके दर्द को देखते वक़्त आम जनताराजनेताओंसामाजिक कार्यकर्ताओंमीडिया और अन्य उत्साही लोगों की निगाहों में फ़र्क़ आ गया था ?

राजनेताओं की बात छोड़िए जिनके लिए सत्ता के निमित्त वोट बैंक की राजनीति और 'हम अच्छे तुम बुरेवाली मानसिकता ही सब कुछ है । उन्नीस सौ चौरासी के दिल्ली दंगों की बात करने वाले दो हज़ार दो के गुजरात दंगों की बात नहीं करना चाहते और जो दो हज़ार दो के गुजरात दंगों की बात करते हैंवे उन्नीस सौ चौरासी के दिल्ली दंगों पर चुप्पी साध लेते हैं क्योंकि सभी गुनाहगार हैं जो दूसरों के गुनाह गिनाना चाहते हैंअपने गुनाह नहीं । पर इनसे इतर बाकी प्रबुद्ध लोगों के लिए क्या कहा जाए तो पीड़ितों और उनकी पीड़ा में अंतर करते हैं और जो सज़ा एक पीड़ित के अपराधियों को देने के लिए लामबंद हो जाते हैंउसी सज़ा की माँग दूसरे पीड़ित के अपराधियों के लिए कभी नहीं करते 

तीन मार्च दो हज़ार दो को गुजरात में फैले साम्प्रदायिक दंगों के दौरान रणधीकपुर गाँव में दंगाइयों की भीड़ ने बिलकीस बानो के घर पर हमला कियाउस इक्कीस वर्षीया गर्भवती विवाहिता के साथ सामूहिक दुराचार लियाउसकी दुधमुँही बच्ची की उसकी आँखों के सामने नृशंस हत्या कर दी गईउसके परिवार के चौदह लोग निर्ममता से मृत्यु के घाट उतार दिए गएउस अबला का सम्मान ही नहींसब कुछ बरबाद कर दिया गया और फिर वह बरसोंबरस भटकती फिरी संवेदनहीन और पक्षपाती पुलिसप्रशासन और न्याय के रक्षकों के द्वारों पर । उसे न्याय कैसे मिलता जब सत्ता के मालिकों का हाथ अन्याय और अन्यायियों के सर पर था ? सतरह लंबे वर्षों के इंतज़ार के बाद दो हज़ार उन्नीस में उसे सरकारी नौकरी और सरकारी इमदाद तब जाकर मिली जब सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को फटकारा । दो हज़ार सतरह में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा उस अबला के (कुछ) अपराधियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई । अभियोजन पक्ष ने उनके लिए मृत्युदंड की माँग की जिसे न्यायालय ने ठुकरा दिया । क्या नेताक्या मीडियाक्या तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता और क्या निर्भया की माताकिसी ने उन निर्दयी आतताइयों के लिए मृत्युदंड की माँग नहीं की 

सत्ताईस मई दो हज़ार चौदह को बदायूँ (उत्तर प्रदेश) में दो दलित बच्चियों के शव पेड़ से लटके पाए गए जिनकी दुराचार के बाद हत्या कर दी गई थी । उनके अपराधियों को मृत्युदंड तो क्याकिसी भी प्रकार का दंड दिलाने के लिए कोई विशेष होहल्ला नहीं किया गया । पुलिस तो मामले को रफ़ा-दफ़ा करने में लगी ही रहीसीबीआई जाँच भी निष्पक्ष तथा गंभीर नहीं रही और दिवंगत बच्चियों के असहनीय पीड़ा सह रहे माता-पिताओं को ही उनका हत्यारा ठहराने का प्रयास किया गया । इस जघन्य कांड के आरोपी आज भी निडर होकर जी रहे हैं तथा दंडित होने का उन्हें कोई भय नहीं लगता है । क्या निर्भया के दोषियों को फाँसी लग जाने से  उन मासूम  बच्चियों को न्याय मिल गया है ? क्या निर्भया की बड़बोली माता इस संदर्भ में अब तक कुछ बोली हैं या अब बोलना चाहेंगी ?

हमारे देश में तो व्यवस्था तथा उसके प्रति लोगों की आस्था का हाल यह है कि सत्ताईस नवम्बर दो हज़ार उन्नीस को हैदराबाद में एक पशु-चिकित्सिका के साथ अनाचार के बाद उसकी हत्या के गिरफ़्तार आरोपियों (विचाराधीन क़ैदियों) को छह दिसम्बर को तड़के स्थानीय पुलिस ने तथाकथित मुठभेड़ में क्या मार गिराया कि पुलिस पर बधाइयों की बौछार होने लगी, घटना में सम्मिलित पुलिसकर्मियों पर फूल बरसाए जाने लगे बिना यह पुष्टि किए कि वे आरोपी वास्तविक अपराधी थे भी या नहीं और बिना इस बात पर ध्यान दिए कि यही पुलिस यदि समय पर त्वरित कार्रवाई करती तो पीड़िता के प्राण बचाए जा सकते थे । और यदि वे आरोपी समाज के हाई प्रोफ़ाइल शक्तिशाली वर्ग से संबंधित होते तो क्या यही पुलिस उनका ऐसा एनकाउंटर करने का साहस करती स्पष्ट है कि हम अब न्याय के आकांक्षी विवेकशील नागरिक नहीं रहे, रक्तपिपासु अंधी भीड़ में परिवर्तित हो चुके हैं जिसकी संवेदनाएं भी पीड़ितों की जाति, धर्म, वर्ग आदि देखकर जागती हैं  सहानुभूति जताने और न्याय की माँग करने के लिए भी हमारा दृष्टिकोण 'मुँह देखकर तिलक करने' वाला बन गया है 

निर्भया का मामला हाई प्रोफ़ाइल बन गया तो ऐसा वातावरण निर्मित हो गया जैसे सम्पूर्ण भारतवासी बाकी सब काम छोड़कर केवल निर्भया के दोषियों को फाँसी लगा देने के लिए एकजुट हो गए हों लेकिन निर्भया के मर्मान्तक अंत से पहले भी और उसके उपरांत भी देश में हज़ारों निर्भयाओं ने अनाचार सहा है, उन्हें न्याय दिलाने तथा भावी निर्भयाओं की सुरक्षा के प्रति हमारी जागरूकता का स्तर क्या अभी भी वही नहीं है जो पहले था ? निर्भया कांड के उपरांत बने नये कानून ने ऐसे अपराधों की रोकथाम नहीं की है बल्कि ऐसी घटनाओं में बहुत अधिक वृद्धि हुई है । और निर्भया के दोषियों के मर जाने के बाद ऐसी घटनाओं में कमी आने की आशा करना अपने आपको भुलावे में रखने से अधिक कुछ नहीं  

न्यायालयों की जय-जयकार करने वालों की जानकारी के लिए मैं यह सूचना दे रहा हूँ कि इसी वर्ष अट्ठाईस जनवरी को हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने दो हज़ार दो में गुजरात के आणंद ज़िले में हुए दंगों के लिए सज़ा काट रहे अनेक दोषियों को न केवल ज़मानत पर छोड़ दिया बल्कि उन्हें मध्य प्रदेश (गुजरात नहीं) के विभिन्न नगरों में जाकर 'समाज सेवा एवं आध्यात्मिक सेवा' करने का निर्देश दिया । माननीय न्यायालय के इस निर्णय ने दंगा-पीड़ितों के घावों पर कैसा नमक छिड़का होगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है  ऐसे न्यायिक वातावरण में दुर्बल, दबे-कुचले और साधनहीन उत्पीड़ित न्याय पाने के लिए अब किसकी ओर देखें

मुस्लिम समुदाय हमारे देश में और विश्व में भी लगभग अलग-थलग इसीलिए पड़ गया है क्योंकि उसके प्रतिनिधि अपने समुदाय पर होने वाले अत्याचार की तो आवाज़ उठाते हैं लेकिन मुस्लिम बहुल देशों और क्षेत्रों में अल्पसंख्यक ग़ैर-मुस्लिमों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध मौन साध लेते हैं । इससे उनकी छवि अन्य समुदायों में यह बन गई है कि उन्हें केवल अपना दर्द ही दिखाई देता है, दूसरों का नहीं । काश्मीरी पंडितों पर किए गए अत्याचारों के प्रति भारतीय (तथा अन्य) मुस्लिमों की उपेक्षापूर्ण तथा संवेदनहीन चुप्पी ने उनकी छवि बिगाड़ी है और अन्य समुदायों को ऐसा आभास दिया है कि वे यह सोच रखते हैं – हमारा ग़म ग़म है, तुम्हारा ग़म कहानी है; हमारा ख़ून ख़ून है, तुम्हारा ख़ून पानी है । अगर मुस्लिम नेता और विवेकशील मुसलमान इस तथ्य को समझ लेते तो वे भारत और दुनिया में अलग-थलग नहीं पड़ते, अन्य धर्मावलंबियों द्वारा ग़लत नहीं समझे जाते  

मैंने ऊपर संदर्भित अपने आलेख में भी यही कहा था और यहाँ भी यही कहता हूँ कि इस समस्या तथा ऐसी अन्य कई समस्याओं का एकमात्र समाधान चरित्र-निर्माण तथा सुसंस्कारों का विकास ही है । देश के युवा भ्रष्ट, उद्दंड एवं चरित्रहीन बनेंगे तो ऐसी घटनाओं का होना किसी भी कानून से नहीं रोका जा सकेगा चाहे हम कितने ही दोषियों को सूली चढ़ा दें । और हमारी संवेदनाएं सभी उत्पीड़ितों के लिए समान होनी चाहिए क्योंकि दर्द तो सबका एक-सा ही होता है । जैसे आततायी केवल आततायी है, वैसे ही पीड़ित भी केवल पीड़ित ही हैं । जिस पर गुज़रती है, उसका दर्द वही जानता है और सही मायनों में इंसानी नज़रिया उसी का है जो पराये दर्द को बिना सहे भी महसूस कर सके  एक सच्चे नागरिक की सहानुभूति राशन कार्ड पर दिए जाने वाले राशन या मंगलवार के प्रसाद की तरह नहीं बंट सकती  हम यह सोचकर उदासीन (या फिर अति-उत्साही‌) नहीं हो सकते कि जो हुआ है, हमारे या हमारे किसी अपने के साथ नहीं हुआ है । चूंकि यहाँ बात महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार की है, मैं अपनी माताओं-बहनों से यही कहूंगा कि औरत को तो औरत का दर्द होना चाहिए; इसलिए वे हर औरत के दर्द को बिना उसकी जाति-मज़हब-हैसियत को देखे महसूस करें और उसके आँसुओं को पोंछने की दिल से कोशिश करें 

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6 comments:

  1. आपकी इस बात से सहमत हूँ कि हर एक पीड़ित का न्याय बराबर है। निर्भया की माँ ने अपने बेटी के लिए लड़ाई लड़ी और वह जीतीं। यहाँ हर्षोल्लास इसलिए भी मना क्योंकि हताश व्यक्ति को एक रोशनी की किरण नजर आई। अपनी लचर न्याय व्यवस्था से हम सभी लोग वाकिफ हैं। उसे लेकर शायद ही कोई हो जिसके मन में सकारात्मक भाव हो ऐसे में एक फैसला आने से लोगों को कुछ सकारात्मक दिखता है। यह कुछ ऐसा ही जैसे हफ्तों से भूखे व्यक्ति को प्यार रोटी भी छप्पन भोग का अहसास दिलाता है। इसलिए यह फैसला जरूरी था। निर्भया की माँ ने जो भुगता है मैं नहीं चाहूँगा कि कोई भी वो भुगते। उन्होंने अपने दर्द को सबके सामने रखा तो ऐसे में उन्हें बड़बोला कहना शायद उनके प्रति अन्याय होगा। उन्होंने अपनी लड़ाई लड़ी, वो ही बहुत हिम्मत की बात थी। उनसे उम्मीद करना कि वो सभी की लड़ाई लड़े मुझे लगता है उनके प्रति ज्यादती होगी। बाकि लेख में लिखी बातों से सहमत।

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    1. विचाराभिव्यक्ति के लिए आभार विकास जी । मैं आपके विचारों का सम्मान करता हूँ ।

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  2. जितेंद्र जी, आपके इस महत्वपूर्ण लेख पर कुछ और चिंतन के बाद लिखना चाहूँगी। 🙏🙏

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    1. मैं आपके आगमन एवं विचाराभिव्यक्ति की प्रतीक्षा कर रहा हूँ रेणु जी ।

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  3. आदरणीय जितेन्द्र जी , उस दिन मोबाइल से टिप्पणी करना बहुत मुश्किल लग रहा था | आज वादे के अनुसार कुछ शब्द लिखना चाहूंगी | न्याय एक सा हो ये हो भी और होता दिखे भी | समझ नहीं आता इतनी घटनाओं को दरकिनार कर कुछ ही घटनाएँ ऐसी क्यों बन जाती हैं जिन्हें सुर्खियों में दिखाया जाता है | निर्भया के साथ अमानवीयता एक सामाजिक और राष्ट्रीय क्रांति बनी | उसके अभिभावकों ने अपनी जान लगा दी | मैं भी एक बीस साल की बेटी की माँ हूँ | निर्भया की माँ का दर्द समझती हूँ |और कभी नहीं चाहूंगी कोई उन जैसा दर्द सहे |

    | दोषियों के वकील का संघर्ष अतुलनीय रहा | कुछ बातों से सहमत ना होने पर भी उनके जज्बे और उनकी पेशेगत ईमानदारी को नमन करती हूँ | उन्होंने अपराधियों के अधिकारों की नयी इबारत से दुनिया को परिचित कराया | प्रश्न ये है मनु शर्मा का जुर्म कहाँ कम था या फिर रेलूराम की सपरिवार हत्या करने वाले बेटी दामाद का कुसूर इतना कम था क्या , कि एक को सही चाल चलन का प्रमाण पत्र देकर रिहा तो दूसरे को इतने जघन्य अपराध के बावजूद फांसी की सजा से मुक्त कर दिया गया | न्याय के दो चेहरे बहुत पीड़ा देते हैं | सच है दर्द सबका एक है तो दवा भी एक जैसी हो | समाज में बेटियों को कोई समझाता है वे अपनी सुरक्षा का ध्यान रखें तो बवाल मच जाता है | आखिर क्या गलत है बेटियों को देर सवेर सुरक्षागत कारणों से अनाप -शनाप जगहों पर ना जाने की ताकीद ! पौराणिक काल में भी ऋषि मुनियों तक से नारी बच नहीं पायी | जब तक कानून व्यवस्था दुरुस्त नहीं होती तब तक बेटियों को अपनी सुरक्षा के बारे में खुद भी गंभीरता से सोचना होगा | जब तक युवा संस्कारी नहीं बनेंगे , कोई फांसी का भय उन्हें सुधार नहीं सकता | ये कडवा सच चाहे किसी को हजम हो या न हो पर यही सच है कि फांसी तक अधिकतर गरीब तबके के अपराधी ही पहुँचते हैं |बाकी अपने जुगाड़ कर या तो समय के अनुसार रिहा हो जाते हैं या फिर आराम के साधनों के साथ जेल काटते हैं | सादर

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    1. आपके विस्तृत विचार पढ़कर प्रसन्नता हुई माननीया रेणु जी कि कोई तो है जो मेरी ही तरह सोचता एवं अनुभव करता है । आपके द्वारा कही गई सारी बातें सही हैं, तथ्यपरक हैं, अनुकरणीय हैं ।

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