Sunday, November 1, 2020

सतर्क भारत – समृद्ध भारत

भारत हो या कोई भी देश, उसकी समृद्धि तभी सुनिश्चित हो सकती है जब उसके नागरिक जागरूक एवं सतर्क हों । यह सतर्कता चाहिए भ्रष्ट तौरतरीकों के विरूद्ध, अनैतिकता एवं असामाजिकता के विरूद्ध, अपराध एवं नियमों और कानून-कायदों के उल्लंघन के विरूद्ध । 

देश बनता है देशवासियों से, देश में निवास करने वाले उसके नागरिकों से । केवल नदियों, पहाड़ों, रेगिस्तानों, मैदानों और ज़मीन से ही देश नहीं बन जाता । देश का निर्माण उसके नागरिक करते हैं । उनका अच्छा या बुरा चरित्र ही देश को महानता के पथ पर आगे बढ़ा सकता है या पतन के गर्त में ढकेल सकता है ।

कौनसा ऐसा देश है जो समृद्ध नहीं होना चाहता ? हमारा भारतवर्ष भी समृद्ध क्यों न हो ? आप कहेंगे कि भारत तो समृद्ध है ही । लेकिन अनेक विद्वान अर्थशास्त्रियों की मानिंद मैं यह कहूंगा कि भारत एक समृद्ध देश है जिसके अधिसंख्य निवासी समृद्धिविहीन हैं तथा देश के विकास  का लाभ उन तक नहीं पहुँच पाता । क्यों ?

इसके कारण को समझना इतना कठिन नहीं है जितना प्रत्यक्षतः लगता है । जब कोई राष्ट्र प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हो एवं उसके शासकों की नीतियां भी जनकल्याणकारी हों तो जनसामान्य के समृद्ध होने में बाधा एक ही होती है – नीतियों का कार्यान्वयन करने वालों का भ्रष्ट आचरण । इस भ्रष्ट आचरण को ऊर्जा मिलती है उन्हें धन देकर अपने अनुचित (या उचित भी) काम करवाने वालों से ।

एक मामूली खरोंच से बढ़ते- बढ़ते नासूर बन चुका भ्रष्टाचार कोई असाध्य रोग नहीं है । इस रोग का उपचार एक ही है – सतर्कता अथवा जागरुकता । सतर्कता में सम्मिलित है अनुचित कार्य, बात या माँग का विरोध । इस विरोध के रौद्र अथवा हिंसक हो जाने की कोई आवश्यक्ता नहीं है । एक शताब्दी पूर्व ही हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हमें असत्य के सविनय विरोध का मार्ग दिखला चुके हैं । समझने योग्य मुख्य बात है भ्रष्ट व्यक्ति के भ्रष्ट आचरण से असहयोग, उसका अस्वीकरण । हम भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लें तो वह कैसे मिटेगा ? रोगी यदि अपने रोग को  अंगीकार कर ले तो उसका उपचार कैसे होगा ? अधिसंख्य लोगों की मूक स्वीकृति से ही भ्रष्टाचार व्यवस्था में रच-बस जाता है तथा भ्रष्ट व्यक्ति की सोच यह बन जाती है – ‘रिश्वत लेते हुए पकड़े भी गए तो रिश्वत देकर छूट जाएंगे’ । यह मानसिकता ही इस समस्या के मूल में है ।

इस समस्या की गंभीरता के कारण ही १९६४ में केंद्रीय सतर्कता आयोग अस्तित्व में आया । आज सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न कार्यालयों एवं उपक्रमों में सतर्कता विभाग होते हैं, सतर्कता अधिकारी होते हैं, सतर्कता विभाग द्वारा समय-समय पर दिशानिर्देश दिए जाते हैं जिनका अनुपालन करके विभिन्न आधिकारिक कार्यों में पारदर्शिता एवं स्वच्छता सुनिश्चित की सकती है एवं भ्रष्टाचार को पनपने से रोका जा सकता है । कार्मिकों को जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष सतर्कता सप्ताह मनाया जाता है । किन्तु  ये शासकीय प्रयास भ्रष्टाचार के उन्मूलन हेतु पर्याप्त नहीं हैं । तो क्या किया जाए जिससे व्यवस्था स्वच्छ हो एवं नागरिकों की समृद्धि से राष्ट्र वास्तविक अर्थों में समृद्ध कहला सके ?

सर्वप्रथम तो हम अपने आत्मबल को जागृत करें एवं स्वयं भ्रष्ट अथवा नियम-विरुद्ध आचरण से दूर रहें क्योंकि किसी पापी पर पहला पत्थर फेंकने का अधिकार उसी को है जिसने स्वयं कभी कोई पाप न किया हो । बालकों का चारित्रिक विकास करें जिससे उनकी बाल्यावस्था में ही एक आदर्श समाज की सुदृढ नींव रखी जा सके । कोई पिता अपने बालक से यह न कहे कि बेटा, दुनिया न गोल है, न चौकोर, दुनिया तो चार सौ बीस है । भ्रष्टाचार से पूर्ण असहयोग किया जाए, उसके साथ कभी किसी भी प्रकार का समायोजन न किया जाए । भ्रष्टाचार के संबंध में प्रत्येक  सूचना-प्रदाता (व्हिसल ब्लोअर) को सरकार पूर्ण संरक्षण प्रदान करे ताकि लोग भ्रष्टाचारियों से भयभीत न हों तथा निर्भय होकर अनुचित कार्यकर्लापों के विषय में सक्षम प्राधिकारियों को बिना किसी संकोच के सूचित करें ।

और अंतिम बात है व्यक्ति की अपनी अंतरात्मा । हम सबको धोखा दे सकते  हैं, अपने आप को नहीं । दुनिया की हर अदालत से ऊपर होती है इंसान के ज़मीर की अदालत जिससे कोई भी मुजरिम बरी नहीं हो सकता । ‘ऊपर की कमाई’ का प्रलोभन चाहे जितना बड़ा हो, यदि यह स्मरण रखा जाए कि वह तथाकथित ऊपर की कमाई किसी निर्दोष के ख़ून-पसीने की कमाई की लूट है तो ग़लत काम करते हुए हमारे हाथ अपने आप ही रुक जाएंगे । हमारे एक दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि सरकार द्वारा जनकल्याण के कार्यों हेतु प्रेषित किए गए एक  रुपये में से मात्र पंद्रह पैसे ही वास्तविक लाभार्थियों तक  पहुँच पाते हैं । वह पूरा रुपया उन तक पहुँचे, इसके लिए  हमें सतर्क होना होगा – केवल दूसरों के आचरण के प्रति ही नहीं, अपने आचरण के प्रति भी । तभी देश के कोने-कोने में सच्ची समृद्धि आएगी । एक सतर्क भारत ही एक समृद्ध भारत का आधार बनेगा ।

© जितेन्द्र माथुर २०२० सर्वाधिकार सुरक्षित 


(यह लेख मैंने अपने नियोक्ता संगठन में आयोजित सतर्कता सप्ताह के अंतर्गत निबंध प्रतियोगिता की प्रविष्टि के रूप में लिखा था) 


4 comments:

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय पाण्डेय जी ।

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  2. केवल दूसरों के आचरण के प्रति ही नहीं, अपने आचरण के प्रति भी हमें सतर्क होना होगा । तभी देश के कोने-कोने में सच्ची समृद्धि आएगी ।

    बहुत सुन्दर सार्थक एवं विचारणीय लेख...
    सही कहा सर्वप्रथम अपने ही आचरण के लिए सतर्क होना होगा....परन्तु हम सब दूसरों को तो सुधारने के लिए लम्बा चौड़ा भाषण दे देते हैं और अपने ही शब्दों पर खुद अमल नहीं करते।

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    1. आप ठीक कह रही हैं सुधा जी । सार्थक टिप्पणी के लिए आभार आपका ।

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