Tuesday, October 20, 2020

तंत्र-मंत्र : हक़ीक़त या फ़साना

हमारे देश में न तांत्रिकों की कमी है और न ही तंत्र-मंत्र पर लिखी गई किताबों की । कहा जाता है कि तंत्र-साधना करके सिद्ध (तांत्रिक) बन जाने वाले लोग अपनी प्रत्येक इच्छा पूर्ण कर लेते हैं, हर मनचाहा पा लेते हैं । लेकिन जो कुछ भी कथित तंत्र-साधना में की जाने वाली क्रियाओं के विषय में संबंधित पुस्तकों में लिखा गया है, उसे पढ़कर मुझ जैसे साधारण मानव का हृदय कम्पित हो उठता है । ये औघड़ क्रियाएं ऐसी हैं जिन्हें संपादित करना तो छोड़िए, उनकी कल्पना तक करना ही किसी दुर्बल मन वाले व्यक्ति के वश की बात नहीं (यद्यपि कतिपय सात्विक क्रियाओं का उल्लेख भी किसी-किसी पुस्तक में मिलता है) । इसीलिए अघोरी बनना किसी जिगरवाले के ही बस की बात है, कोई पत्थर का कलेजा रखने वाला ही इस दुनिया में घुस सकता है और रह सकता है । अब उसे कुछ (मनचाहा या अनचाहा) मिल पाता है या नहीं, यह दीगर बात है । 

स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा ने एक हिंदी उपन्यास इसी विषय को कथानक बनाकर लिखा था । इस उपन्यास का नाम है - 'जिगर का टुकड़ा' । 'जिगर का टुकड़ा' उस व्यक्ति को कहा जाता है जो आपको अत्यंत प्रिय हो । इसका सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है - माता के लिए उसकी संतान । यदि ऐसी संतान इकलौती हो तो और भी । चाहे पुत्र हो या पुत्री, ऐसा बच्चा अपनी माता के लिए उसके जिगर का टुकड़ा ही होता है । और अपने जिगर के टुकड़े की सलामती के लिए ममतामयी मां कुछ भी कर गुज़र सकती है । उसके जीवन एवं कल्याण के लिए वह सारे जग से लड़ सकती है । ऐसी ही एक मां की कहानी कहता है यह उपन्यास जिसकी कथावस्तु का एक अभिन्न भाग है तंत्र-मंत्र । 

इस उपन्यास में 'परकाया प्रवेश' का भी उल्लेख है । 'परकाया प्रवेश' अर्थात् किसी सिद्ध व्यक्ति का अपनी देह को छोड़कर किसी अन्य देह में प्रवेश कर जाना तथा अपनी इच्छानुसार पुनः मूल देह में लौट आना । यह किवदंती ही है, किसी ने देखी तो है नहीं । शर्माजी ने यह उपन्यास १९९३ में लिखा था और कम-से-कम उस ज़माने में तो वे ऐसी बातों पर यकीन नहीं ही करते थे । इसलिए उपन्यास के आरंभिक दृश्य में प्रदर्शित 'परकाया प्रवेश' के रहस्य को उन्होंने अंतिम पृष्ठों में सांसारिक कृत्यों पर आधारित बताते हुए ही खोला है और यही प्रतिपादित किया है कि वस्तुतः 'परकाया प्रवेश' जैसी कोई बात नहीं होती है । किंतु इसे उन्होंने पूरी तरह से ख़ारिज भी नहीं किया है और इसका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण देते हुए यह कहा है कि हो सकता है कि कोई जीवन भर निष्ठापूर्वक साधना करके इस क्षमता को प्राप्त कर सकता हो ।

'जिगर का टुकड़ा' निस्संदेह शर्माजी के अंडर-रेटेड उपन्यासों में से एक है । न तो स्वयं उन्होंने इस अपने इस बेहतरीन उपन्यास का कोई प्रचार-प्रसार किया, न ही इसे वह चर्चा तथा सराहना मिल सकी जो उनके अनेक अन्य उपन्यासों को मिली । उनका पिछला उपन्यास 'वर्दी वाला गुण्डा' (मुख्यतः भरपूर प्रचार के कारण) व्यावसायिक रूप से अत्यंत सफल रहा था जबकि अगला उपन्यास 'लल्लू' उस पर 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' नामक हिट फ़िल्म बन जाने के कारण बहुचर्चित हो गया । 'जिगर का टुकड़ा' इन दो अत्यंत लोकप्रिय, सफल एवं चर्चित उपन्यासों के बीच आया था, संभवतः इसलिए भी इसकी विशेष चर्चा नहीं हुई । लेकिन यदि एक पाठक एवं शर्माजी के प्रशंसक के रूप में मुझसे पूछा जाए तो मैं इसे उनके सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिनूंगा । एक ज़बरदस्त सस्पेंस-थ्रिलर है यह जिसमें न रहस्य की कमी है और न ही रोमांच की । साथ ही यह विश्वसनीयता की कसौटी पर भी खरा उतरता है क्योंकि इसमें ऐसी कोई बात नहीं है जो असामान्य लगे । नितांत तर्कपूर्ण ढंग से लिखा गया है यह उपन्यास । 

उपन्यास के केंद्र में है अनमोल नाम का एक पंद्रह वर्षीय बालक जो आँचल नामक एक धनाढ्य विधवा का इकलौता पुत्र है (अर्थात् उसके जिगर का टुकड़ा है) जिसकी हत्या का षड्यंत्र रचते हैं उसके चाचा बलराज तथा उनके संपूर्ण भारतवर्ष में फैले हुए विशाल व्यवसाय का मुख्य प्रबंधक जागेश्वर । यह षड्यंत्र रचा जाता है तंत्र-मंत्र की सहायता से जो करता है एक तांत्रिक - कपालतंत्र । कपालतंत्र ने ही तंत्र-मंत्र करके इस व्यवसाय के स्वामी, आँचल के पति तथा अनमोल के पिता मोहक की हत्या करवाई थी जिसके लिए उसे जागेश्वर से धन एवं एक वैभवशाली आवास प्राप्त हुआ था । कपालतंत्र का दावा है कि वह केवल तंत्र-मंत्र ही नहीं जानता वरन परकाया-प्रवेश भी जानता है तथा वह इसका प्रदर्शन (डिमॉन्स्ट्रेशन) भी करके दिखाता है । बलराज तथा जागेश्वर के यह कार्य तंत्र-मंत्र द्वारा करवाने का उद्देश्य यह है कि जिस प्रकार मोहक की मृत्यु एक दुर्घटना समझी गई थी, उसी प्रकार अनमोल की मृत्यु भी स्वाभाविक समझी जाए तथा हत्या जैसी किसी बात का संदेह न तो पुलिस को हो और न ही आँचल सहित अन्य लोगों को । 

लेकिन बलराज को लगता है कि सारे काम कपालतंत्र से ही करवाने से वह आने वाले समय में उन लोगों पर हावी हो जाएगा तथा संभव है कि वह उन्हें (अर्थात् बलराज एवं जागेश्वर को) ब्लैकमेल भी करने लगे । अतः वह षड्यंत्र को तीन भागों में बांटता है - प्रथम भाग में अनमोल को तंत्र-मंत्र द्वारा बीमार करने का, द्वितीय भाग में बीच-बीच में उसके कुछ-कुछ ठीक हो जाने का एवं तृतीय भाग में उसके मर जाने का । वह प्रथम एवं तृतीय भाग को तो पूर्ण रूप से कपालतंत्र को ही सौंपता है किन्तु द्वितीय भाग में झूठे तांत्रिकों का अभिनय करने के लिए कुछ मामूली बदमाशों को पकड़ लाता है जो धन लेकर किसी के भी लिए कैसा भी और कोई भी (कानूनी-ग़ैरकानूनी) काम करने को तैयार रहते हैं । इन चार बदमाशों का सरगना है - मार्कण्डेय तथा बाकी तीन हैं - उसकी पत्नी मोनिका एवं उसके दो विश्वसनीय साथी गबरू एवं रूस्तम । मार्कण्डेय अपने भूतकाल में अभिनेता रह चुका है एवं बलराज उसकी इसी योग्यता का लाभ उठाकर उसे तांत्रिक का अभिनय करने के लिए उसके साथियों सहित उस कोठी में ले आता है जिसमें वह स्वयं, उसकी भाभी आँचल तथा उसका भतीजा अनमोल रहते हैं । ढोंगी तांत्रिक मार्कण्डेय व उसके साथियों का काम होता है (बलराज द्वारा कपालतंत्र से लेकर आई हुई) तांत्रिक वस्तुओं से अनमोल का उपचार करना जिससे वह अस्थायी रूप से स्वस्थ हो जाए तथा कुछ समय के अंतराल के उपरांत पुनः रोगी हो जाए । 

इस सारे झमेले में दो और पात्र उलझे हुए हैं । एक तो है दिल्ली से सरकार द्वारा आँचल के अनुरोध पर अनमोल की सुरक्षा हेतु भेजा गया ब्लैक कैट कमांडो - डगलस तथा दूसरा है एक अत्यन्त रहस्यमय पात्र - 'अजगर' जो स्वयं सामने आए बिना मार्कण्डेय और उसके साथियों से भूतकाल में अपराध करवाता रहा है । मार्कण्डेय और उसका दल बिना कारण जाने तथा कार्य की पृष्ठभूमि के विषय में बिना कोई प्रश्न किए 'अजगर' के आदेश पर उससे धन लेकर अपराध करते रहे थे । इस बार वे 'अजगर' को बिना बताए बलराज से सौदा करके अनमोल की हत्या के षड्यंत्र में सम्मिलित हो जाते हैं । लेकिन उन्हें दो करारे झटके लगते हैं - एक तो 'अजगर' को अपने आप ही सब कुछ पता लग जाता है कि वे किस फ़िराक़ में हैं और वह उन्हें चुपचाप वहाँ से कूच कर जाने के लिए कहता है, दूसरा अचानक कपालतंत्र भी उस कोठी में आ धमकता है और उसे यह देखकर बहुत बुरा लगता है कि उससे बिना पूछे ही बलराज और जागेश्वर मार्कण्डेय एंड कंपनी को वहाँ ले आए थे । अब अपनी-अपनी पोल खुलने से बचने के लिए इन सभी को आँचल के सामने नाटक करना पड़ता है जिसके तहत कपालतंत्र ख़ुद को मार्कण्डेय वग़ैरह का गुरू तथा वे सभी ख़ुद को उसके चेले बताने लगते हैं । इधर डगलस को कतई ऐतबार नहीं है कि तंत्र-मंत्र जैसी कोई चीज़ होती है और वह इन सभी लोगों को शुरू से ही नक़ली तांत्रिक और ठग समझता है । लेकिन उसके कहने पर भी अपनी इकलौती बीमार औलाद के इलाज के लिए फ़िक्रमंद आँचल उन्हें कोठी से नहीं निकालती क्योंकि अनमोल किसी भी डॉक्टर के इलाज से ठीक नहीं हो पा रहा था ।

अब चूंकि यह उपन्यास सस्पेंस-थ्रिलर है, इसलिए लंबी-चौड़ी पृष्ठभूमि बन जाने के उपरांत घात-प्रतिघात का खेल आरंभ होता है तथा हत्याएं होने लगती हैं । इससे पहले कि हत्याओं के पीछे का रहस्य जानने के लिए प्रयासरत डगलस सत्य तक पहुँचे, वेद प्रकाश शर्मा पाठकों के समक्ष रहस्योद्घाटन कर देते हैं कि वास्तविकता क्या है तथा इस रहस्योद्घाटन से पूर्व सभी दुष्ट एवं अपराधी मारे जाते हैं । 

'जिगर का टुकड़ा' एक अत्यंत चुस्त उपन्यास है जिसमें कहीं कोई फालतू बात नहीं लिखी गई है तथा प्रत्येक शब्द मुख्य कथानक से जुड़ा हुआ है । वेद प्रकाश शर्मा अपने आपको 'झटका स्पेशलिस्ट' कहलवाना पसंद करते थे तथा प्रायः अपने उपन्यासों के प्रथम पृष्ठ पर लिखवाते थे - 'इस उपन्यास के हर पृष्ठ पर वेद प्रकाश शर्मा ने शब्दरूपी करेंटयुक्त तार बिछा रखे हैं' (पढ़ने वालों को झटका देने के लिए) । साथ ही अंतिम पृष्ठ पर यह भी लिखवाते थे - 'सावधान ! इस पृष्ठ (या अंतिम पृष्ठ) पर लिखा कथानक से संबंधित एक शब्द भी 'पहले' न पढ़ें अन्यथा आप अपने द्वारा खर्च किए गए पैसे का भरपूर आनंद उठाने से वंचित रह जाएंगे' । ऐसी बातें उन्होंने 'जिगर का टुकड़ा' के भी प्रथम एवं अंतिम पृष्ठों पर लिखी हैं । और ये बातें उनके स्वर्णिम दिनों में सत्य भी होती थीं । 'जिगर का टुकड़ा' भी पाठकों को बीच-बीच में झटके देता है । इस उपन्यास की एक ख़ूबी यह भी है कि शर्माजी ने रहस्य को परत-दर-परत खोला है और पाठकों को सोचने का मौका भी दिया है कि वे ख़ुद सच्चाई का अंदाज़ा लगाएं । अगर कोई जीनियस पाठक लगा भी ले तो भी वह सच्चाई के एक हिस्से का ही अंदाज़ा लगा सकता है, पूरी सच्चाई का नहीं । उपन्यास में अपनी आवाज़ को किसी और की आवाज़ बना लेने की बात को छोड़कर (यह बात एकदम ग़लत है भी नहीं क्योंकि मिमिक्री की कला तो सर्वविदित है, अलबत्ता उसके लिए कुछ प्राकृतिक योग्यता तथा बहुत अधिक अभ्यास की आवश्यकता होती है) कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर विश्वास न किया जा सके ।'

अब तंत्र-मंत्र की बातें हक़ीक़त हैं या फ़साना, ख़ुदा ही जाने । इस वैज्ञानिक युग में इन बातों पर भरोसा करना कठिन ही है (वैसे वेद प्रकाश शर्मा ने उपन्यास में कपालतंत्र द्वारा डगलस को इन बातों का विशेषतः परकाया-प्रवेश का, विस्तृत एवं तार्किक स्पष्टीकरण दिलवाया है जो एक दृष्टि में तो पूर्णतः वैज्ञानिक ही लगता है) । मैं तो इस उपन्यास को वेद प्रकाश शर्मा की लेखनी से निकला एक अत्यंत मनोरंजक एवं आदि से अंत तक पाठकों को बांधे रखने वाला उपन्यास मानता हूँ जो मनोरंजन के अभ्यर्थियों को निराश नहीं करेगा एवं पढ़ चुकने के उपरांत उन्हें संतुष्टि की अनुभूति प्रदान करेगा । 

© Copyrights reserved


16 comments:

  1. आपके इस लेख ने वेद जी के इस उपन्यास को पढ़ने की इच्छा और बलवती कर दी है। मुझे occult पर आधारित रचनाएँ पढ़नी पसन्द हैं तो इसे पढ़ने की पूरी कोशिश रहेगी। आभार।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार विकास जी । ज़रूर पढ़िए । आपको बहुत पसंद आएगा यह उपन्यास ।

      Delete
  2. मैंने करीब पांच साल पहले जिगर का टुकड़ा उपन्यास पढ़ा था कहानी बहुत ही बेहतरीन है

    ReplyDelete
  3. वेद जी का यही पहला उपन्यास पढ़ा था मैंने और बहुत पसंद आया था. हालाँकि वेद जी के बहुत कम उपन्यास पढ़े हैं लेकिन ये और धर्मयुद्ध आज भी फेवरेट हैं. खलीफा. मिस्टर चेलेंज और देवकांता सन्तति की भी बहुत तारीफ सुनी है.

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार ब्रजेश जी । यह उपन्यास निस्संदेह बहुत अच्छा है । 'धर्मयुद्ध' मेरा भी फ़ेवरिट है । आपको 'मिस्टर चैलेंज' अवश्य पसंद आएगा । 'ख़लीफ़ा' मुझे कम पसंद आया था । जहाँ तक 'देवकांता संतति' की बात है तो उस अति-विस्तृत कथा को पढ़ने से पहले आप वेद जी की विजय-विकास सीरीज़ के ढेर सारे उपन्यास पढ़ लें तो बेहतर रहेगा, ऐसा मेरा मानना है ।

      Delete
    2. जी पढ़ता हूँ. विजय-विकास का बस धर्मयुद्ध ही पढ़ा है. अलफांसे का भी एक भी नहीं पढ़ा है. तारीफ बहुत सुनी है. वेद जी द्वारा रचित केशव पंडित का भी नहीं पढ़ा.

      Delete
    3. वेद जी द्वारा केशव पंडित को लेकर लिखे गए पहले सात उपन्यास ही पढ़ने योग्य हैं जिनमें से अंतिम दो विजय-विकास सीरीज़ के हैं । ये उपन्यास हैं : 1. बहू मांगे इंसाफ़, 2. हत्या एक सुहागिन की, 3. क़ैदी नम्बर 100, 4. केशव पंडित, 5. कानून का बेटा, 6. विजय और केशव पंडित, 7. कोख का मोती । ये सभी उपन्यास आसानी से मिल जाएंगे और आपको बहुत पसंद आएंगे । विजय-विकास सीरीज़ के कई प्रसिद्ध उपन्यास भी अब ई-पुस्तक के रूप में सरलता से उपलब्ध हैं । आगमन के लिए पुनः आभार ब्रजेश जी तथा हार्दिक शुभकामनाएं ।

      Delete
  4. बहुत ही शानदार नावल है , 10 साल से ऊपर हो गया पढे हुए./..

    इसके शायद शुरुआत मे ही ये हेंडिग था , कि वेद जी ने पहली बार भूत प्रेत पर आधारित कहानी लिखा है अौर आप जानते है वो इन चीजो पर यकीन नही करते...

    ऐसा ही कुछ लिखा था ..
    हर बात को तार्किक रूप से समझाया है ///

    आपने बहुत बढिया रिव्यु लिखा सर जी बधाई 🌹🌹

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपने ठीक कहा चंदन जी कि वेद जी ने हर बात को तार्किक ढंग से समझाया है । आगमन एवं टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार आपका ।

      Delete
  5. खेद है कि मैंने स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा जी का एक भी उपन्यास नहीं पढ़ा है लेकिन आपकी लिखी इस समीक्षा पढ़ने के बाद लगता है कि इसे ढूंढ-खोज कर पढ़ना पड़ेगा।
    वाकई बहुत बेहतरीन समीक्षा है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार माननीया शरद जी । उनके द्वारा अपने स्वर्णकाल (१९८०-१९९९) में लिखे गए उपन्यास यदि आप पढ़ेंगी तो आपको पसंद आएंगे ।

      Delete
  6. Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीय पाण्डेय जी ।

      Delete