Sunday, September 27, 2020

चापलूसी ! लच्छेदार बातें ! छवि-निर्माण ! क्या ये ही हैं सफलता के वास्तविक सूत्र ?

सफलता वह वस्तु है जिसके पीछे आज के युग में लगभग प्रत्येक कार्यशील व्यक्ति भाग रहा है । सफलता वह सब कुछ दिला सकती है जिसकी अभिलाषा है जबकि असफलता का अंतिम परिणान है - वंचन, कुंठा एवं लोगों की अस्वीकृति । सफलता सब को चाहिए, असफलता किसी को नहीं । तो क्या हैं आज के भारत में सफलता के वास्तविक सूत्र (जिनके विषय में सभी सफल व्यक्ति जानते हैं किन्तु मुख से कहते नहीं) ?

इस विषय पर विस्तृत विमर्श से पूर्व मैं विगत मास 'हिंदुस्तान टाइम्स' समाचार-पत्र में पढ़े गए एक लेख का उल्लेख समीचीन समझता हूँ - 'Meritocracy is a myth. And that is not bad' जिसे 'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप' के भारत स्थित प्रभाग के अध्यक्ष जनमेजय शर्मा ने लिखा है ।  'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप' संसार भर में प्रसिद्ध एक वैश्विक प्रबंधन सलाहकार संस्था है जिसके परामर्श को संसार की अनेक बड़ी एवं प्रतिष्ठित कंपनियां तथा संस्थाएं बहुमूल्य मानती हैं । लेकिन ऐसी सम्मानित संस्था जिससे कार्य-प्रदर्शन संबंधी उच्च मानदंडों के ही उत्थान एवं प्रसार की ही सभी को अपेक्षा होती है, की भारतीय इकाई के प्रमुख शर्मा जी ने जो कुछ इस लेख में कहा है, उसमें तो भारत में चिरकाल से प्रचलित मानसिकता की ही अनुगूंज मुझे सुनाई दी ।  

छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास को एक आधुनिक गणतंत्र बनने से पूर्व भारत चिरकाल तक (अनेक टुकड़ों में बंटकर) राजतंत्र में रहा था । अलग-अलग राज्य अथवा रजवाड़े हुआ करते थे जिनके पृथक्-पृथक् राजा होते थे । कई स्थानों पर राजाओं के अधीनस्थ सामंतों या सूबेदारों का शासन चलता था । जागीरें एवं ज़मींदारियां भी होती थीं जिनके ऊपर संबंधित जागीरदार एवं ज़मींदार शासन करते थे । १८५८ में भारत सरकार अधिनियम द्वारा भारत के एक बड़े भू-भाग को (जो पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में था) बरतानवी सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया जिसके उपरांत भी निजी रियासतें अथवा रजवाड़े (साथ ही जागीरें एवं ज़मींदारियां भी) स्वतंत्र बने रहे तथा बीसवीं शताब्दी में स्वाधीनता के उपरांत भारत के एकीकरण तक उन्होंने जैसे-तैसे समय निकाला । किंतु १८५७ तक स्थिति यही थी कि विभिन्न राज्य अथवा रियासतें अपने शासकों की साम्राज्य-विस्तार की लालसा के चलते परस्पर युद्धरत रहते थे । जनकल्याण की भावना प्राचीन ग्राम-स्वराज्य के समय रही हो तो रही हो, ईस्वी संवत के आरंभ होने से पूर्व ही तलवार के बल पर राज्य-विस्तार करने वाले (अथवा उपलब्ध सुख-भोगों का आनंद उठाने वाले) शासक ही भारत-भू पर अधिकांशतः दृष्टिगोचर होने लगे थे । ऐसा कोई समय विरला ही हो सकता था जब आर्यावर्त तथा कालांतर में हिंदुस्तान कहलाने वाली इस धरा पर कहीं-न-कहीं युद्ध न हो रहा हो । राजाओं की वीरता उनका भूषण मानी जाने लगी थी । विदेशी आक्रांताओं के आगमन तथा मुग़लों एवं अंग्रेज़ों जैसे विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारत में ही स्थापित होकर शासन करने लगने पर भी स्थिति यही रही । जनसामान्य की मानसिकता धीरे-धीरे यही हो गई कि कोउ नृप होइ, हमें का हानि । 

ऐसे में विविध राज्यों, रजवाड़ों, रियासतों, सूबों आदि में एक चाटुकारिता की संस्कृति विकसित हुई । चारण-भाट पनपे जो शासकों की वीरता तथा अन्य (वास्तविक अथवा काल्पनिक) गुणों का यशोगान करके अपनी आजीविका चलाने लगे । यद्यपि अनेक शासकों ने जनहित के कार्य भी किए तथा विभिन्न कला-प्रेमी शासकों की अपनी-अपनी रुचि के अनुरूप अनेक लोक-कलाएं तथा सांस्कृतिक धरोहरें भी अस्तित्व में आईं एवं भलीभांति विकसित हुईं जिनसे जनसामान्य एवं समाज का अप्रत्यक्ष रूप से भला ही हुआ, तथापि धीरे-धीरे लोग राजाओं के चरण-वंदन के अभ्यस्त हो गए । ऐसा भी समय था जब राजा ईश्वर के अवतार के रूप में देखे जाते थे एवं तदनुरूप ही पूजनीय थे । व्यक्ति की योग्यता अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं रही, राजा की मान्यता पर निर्भर हो गई । अर्थात् योग्य वही जिसे राजा योग्य मान ले । चाटुकारिता स्वयमेव ही एक कला बन गई । 

और यह कला आज तक चली आ रही है । इसके कलावंत इसे बिना किसी के सिखाए अपने आप ही साधते हैं । सच पूछिए तो शताब्दियों की दासता के परिणामस्वरूप यह कला कला ही न रहकर अधिकांश भारतीयों के स्वभाव का, संस्कारों का तथा व्यक्तित्व का एक अंग बन चुकी है । संयोगवश ऐसा हुआ कि मैंने जब (१९९४ में) प्रथम बार भारतीय सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा दी तो अनिवार्य हिंदी विषय के प्रश्न-पत्र में मुझे निबंध लेखन के लिए उपलब्ध विषयों में एक विषय मिला - 'चापलूसी की कला' । परीक्षा भवन में बैठे हुए मैंने अपनी कल्पनाओं को विस्तार दिया और इसी विषय को चुनकर एक ललित निबंध लिख डाला । परंतु आज मैं अनुभव करता हूँ कि काग़ज़ पर निबंध लिखना एक बात है जबकि वास्तविक जीवन में इस कला (!) को साधना पूर्णतः दूसरी । जो इसे साध सकता है (और साधना चाहता है), वह स्वतः ही इसमें पारंगत हो जाता है । जो न साध सके अथवा जिसका स्वाभिमान उसके समक्ष इस संदर्भ में कोई दुविधा खड़ी करे, वह जीवन भर इस मामले में अनाड़ी ही रह जाता है । भारतीय नाभिकीय ऊर्जा निगम में मेरे भूतपूर्व वरिष्ठ अधिकारी श्री एस. अलगुवेल ने मुझे एक बार (संभवतः सन दो हज़ार पाँच में) एक शुभचिंतक की भांति एकांत में अंग्रेज़ी भाषा में समझाया था - 'माथुर, तुम्हारी प्रगति के पथ में बाधा यह है कि तुम काम तो ठीक करते हो लेकिन तुममें दूसरे व्यक्तियों को प्रसन्न रखने की कला का अभाव है' । मैं संकोचवश उनसे पूछ नहीं सका -'आदरणीय श्रीमान, यदि इस कला को सिखाने की प्रशिक्षण कक्षाएं कहीं चलती हों तो मैं ज्वॉइन कर लूं' । ख़ैर ... 

आज भारतीय संगठनों, संस्थानों एवं व्यवस्थाओं में विशेषतः राजकीय क्षेत्र में चापलूसों का बोलबाला लगभग सभी स्थानों पर देखने को मिलता है । जो योग्य एवं कर्मठ हैं, वे भी अपनी योग्यता एवं परिश्रम का फल तभी पा सकते हैं जब वे काम के साथ-साथ ठीक से चापलूसी भी करें एवं उनके हितों का ध्यान रखने वाला कोई उच्च पद पर आसीन व्यक्ति हो (राजस्थानी भाषा में ऐसे व्यक्ति को धणीधोरी कहते हैं) जिसके वे निकटस्थ (अर्थात् चमचे) हों । अन्यथा सारी योग्यता उपेक्षित हो सकती है, सत्यनिष्ठापूर्वक किया गया संपूर्ण परिश्रम निष्फल हो सकता है । 

संगठन अथवा संस्था में पदोन्नति एवं अन्य परिलाभों की प्राप्ति के निमित्त व्यक्तिपरक निष्ठा एवं चापलूसी के साथ-साथ लच्छेदार बातें करने की कला भी बहुत उपयोगी होती है । प्रायः चापलूसी की कला में निष्णात लोग इस कला को भी साध लेते हैं । आज बातें बनाना श्रेष्ठ कार्य एवं प्रदर्शन (परफ़ॉरमेंस) की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गया है । जो बातों का जादूगर है, वह उन्हीं बातों का सौदागर बनकर बहुत कुछ पा लेता है जबकि चुपचाप अपना कर्तव्य-निर्वहन करने वाला देता ही रहता है, पाने वालों की पंक्ति में वह पीछे ही रह जाता है । आज कम-से-कम भारत में तो मीठी-मीठी बातें बनाना और सुनने वालों को लुभाकर अपना काम बना लेना ही विपणन (मार्केटिंग) की परिभाषा हो गया है । 

मेरे भूतपूर्व उच्चाधिकारी श्री अलगुवेल ने मुझे छवि-निर्माण का महत्व भी समझाया था एवं कहा था कि व्यक्ति की छवि उसके द्वारा किए गए कार्य से भी अधिक सार्थकता रखती है । आप सप्रयास अपनी एक बहुत अच्छी छवि गढ़ लें तो वह अन्य लोगों के लिए आपकी वास्तविकता से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है । आज का समाज ऊपरी आवरण ही देखता है, नीचे की वास्तविकता नहीं । अच्छा काम करो या न करो, बस अच्छी छवि बनाकर रखो तो  लगभग वह सब कुछ मिल सकता है जो आपको दूसरों से या तंत्र से चाहिए । छवि आपकी अपनी किसी त्रुटि से अथवा आपके किसी विरोधी की कुटिल चालों से कलंकित हो गई तो गए काम से । क्यों ? क्योंकि आपके विषय में लोगों का निर्णय आपकी छवि ही निर्धारित करती है, आपकी वास्तविकता अथवा आपके द्वारा किए गए वास्तविक कार्य नहीं ।

व्यक्ति के स्तर पर ये गुण तथा ये कार्यकलाप सफलता दिला सकते हैं जो कि इस भौतिक संसार में रहने वाले लगभग सभी (व्यावहारिक) लोगों का अभीष्ट है किंतु इनसे संबंधित संगठन, संस्थान अथवा व्यवस्था को हानि ही पहुँचती है । इसीलिए सफल संगठनों के स्वामी अथवा सर्वोच्च अधिकारी योग्य व्यक्तियों की योग्यता को एवं तदोपरांत उनकी कर्तव्यनिष्ठा को ही सर्वप्रथम परखते हैं । योग्यता को वरीयता देने पर ही योग्यता-तंत्र अथवा मेरिटोक्रेसी का पथ-प्रशस्त होता है जो कि किसी भी वृहत् व्यावसायिक संगठन अथवा संस्था अथवा सरकारी कार्यालय या मंत्रालय या निकाय की सफलता की कुंजी हो सकता है । अपने इस लेख के आरंभ में मैंने 'बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप'(बीसीजी) के भारत स्थित उच्चाधिकारी शर्मा जी के जिस लेख का उल्लेख किया है उसका सारांश यह है कि मेरिटोक्रेसी केवल एक मिथक (कपोल-कल्पना) है तथा इसका न होना कोई आपत्तिजनक बात नहीं । इस लेख में शर्मा जी ने संगठनों में उन्नति करने के लिए उच्चाधिकारियों के अनुकूल रहने एवं उनसे अच्छे संबंध रखने को निज-उन्नति के लिए आवश्यक बताया है एवं यह विचार व्यक्त किया है कि अधिक योग्य व्यक्ति उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के साथ सामंजस्य न बैठा सकें तो उनका अपने से कम योग्य व्यक्तियों से पिछड़ जाना स्वाभाविक है । उनके विचार में ऐसे (योग्य) व्यक्तियों को वह संगठन छोड़कर किसी ऐसे स्थान पर जाना चाहिए जहाँ वे सही समय पर एवं सही स्थान पर सही व्यक्ति के रूप में स्थापित हो सकें । घुमा-फिराकर परिष्कृत भाषा में कही गई ये बातें वस्तुतः हमारे देश में सर्वव्यापी चापलूसी की वकालत ही है ।

लेकिन वास्तविक उन्नति के लिए आवश्यक तो मेरिटोक्रेसी ही होती है चाहे उसे कोई कपोल-कल्पना ही क्यों न कहे । यदि विशुद्ध मेरिटोक्रेसी की स्थापना व्यावहारिक रूप से अत्यंत कठिन भी है तो भी उसके लिए निरंतर प्रयास किया जाना चाहिए क्योंकि आदर्श व्यवस्था तो वही है चाहे यथार्थ रूप में दिखाई न देती हो । मेरिटोक्रेसी को नकारना मीडियोक्रेसी (अर्थात् ऐसा तंत्र जिसमें कम योग्य अथवा अति-साधारण लोगों को प्राथमिकता दी जाए एवं पुरस्कृत किया जाए) की ओर ले जाता है क्योंकि यदि कोई कम योग्य व्यक्ति केवल प्रभावशाली एवं उच्च-पदस्थ लोगों के साथ अपने मधुर निजी संबंधों द्वारा आगे बढ़कर उच्च पद पर पहुँचेगा तो वह अपने जैसे लोगों को ही तो आगे बढ़ाएगा जिसके परिणामस्वरूप योग्यता की उपेक्षा आगे भी चलती ही रहेगी । आज मेरिटोक्रेसी की उपेक्षा के कारण ही हमारे भारतवर्ष में सर्वत्र मीडियोक्रेसी दिखाई देती है - विशेषतः सरकार में तथा सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी संस्थानों व संगठनों में । निजी क्षेत्र में भी जहाँ यह पांव पसार देती है, वहाँ संबंधित संस्था अथवा संगठन को सफल से असफल होने में अधिक समय नहीं लगता । और यह ढीला-ढाला अकुशल तंत्र बनता है चापलूसों, लच्छेदार बातें करने वालों एवं निजी छवि को येन-केन-प्रकारेण धवल बनाने (चाहे सत्य कुछ और हो) वाले अयोग्य एवं अकर्मठ (यानी निकम्मे) लोगों से । 

यही त्रासदी है हमारे देश की । यही कारण है अनेक समस्याओं के अकारण ही जन्म ले लेने का एवं अनेक समस्याओं के सुलझने के स्थान पर अनवरत उलझते जाने का जो अंततोगत्वा जनसामान्य को ही दारूण दुख देती हैं (समर्थों का कुछ नहीं बिगड़ता) । मुझे शर्मा जी का लेख पढ़कर दुख इस बात से हुआ कि अब उनके जैसे पेशेवर प्रबंधन विशेषज्ञ भी आगे बढ़ने के लिए निजी संबंधों (जिनका आधार चापलूसी अथवा स्वार्थाधारित आदान-प्रदान ही होता है) को व्यक्ति की योग्यता से अधिक महत्वपूर्ण बता रहे हैं । नई पीढ़ी तो वैसे भी 'सफलता किसी भी मूल्य पर' को अपने कार्यशील जीवन (करियर) का मूलमंत्र बना ही चुकी है । सभी को सफलता ही तो चाहिए चाहे वह कैसे भी मिले । और जब सफलता के सूत्र चापलूसी, लच्छेदार बातें एवं छवि-निर्माण ही हों तो मन लगाकर ईमानदारी से काम क्यों किया जाए ? कुर्सी चाहे राजनीति की हो अथवा किसी संगठन या कार्यालय के उच्च एवं अधिकार-संपन्न पदाधिकारी की, इन्हीं सूत्रों पर अमल करने से प्राप्त हो रही है । अपवादों को छोड़कर सभी प्रैक्टिकल हो गए हैं । आदर्शों की परवाह किसे है ? चरित्र, स्वाभिमान एवं सद्गुणों को पुस्तकीय बातें माना जाने लगा है (वैसे अब तो ये बातें पुस्तकों में भी नहीं दिखाई देतीं) । 

क्या होगा इस देश का ? 

© Copyrights reserved 

14 comments:

  1. बहुत ही सच्चा और सटीक लेख ।

    ReplyDelete
  2. जब सफलता के सूत्र चापलूसी, लच्छेदार बातें एवं छवि-निर्माण ही हों तो मन लगाकर ईमानदारी से काम क्यों किया जाए ?
    सही कहा आपने आजकल चापलूसी का जमाना है
    लच्छेदार बातें बनाने वाले बिना कुछ किये अपनी छवि बना लेते हैं...और बाकी सब बनी बनायी या सुनी सुनाई छवि के से ही किसी का आंकलन करते हैं सच्चाई कोई महत्व ही नहीं रखती।
    बहुत ही सटीक एवं सार्थक लेख।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीया सुधा जी ।

      Delete
  3. सटीक आलेख। लेकिन जहाँ तक मेरा अनुभव है ज्यादातर संस्थान इस तरह से बने हैं कि वहाँ करने के लिए विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं होती है। भले ही घुसना कठिन हो लेकिन एक बार आप अगर दाखिल हो जायें तो अगर आप अपने कार्य में उतना दक्ष भी नहीं है तो आप ज्यादातर कार्य कर ही देते हैं। यही कारण है कि ऐसे संस्थानों में मेरिट की जगह पीपल स्किल्स को तव्वजों देने लगते हैं। हाँ, कई लोग पीपल स्किल्स को चापलूसी ही मान लेते हैं और इसी कार्य में लग जाते हैं। अफसर लोगों को भी पता होता है कि यह व्यक्ति चूँकी अपने काम में कुशल नही है तो उनकी जी हुजूरी करेगा और फिर उनके लिए आगे जाकर खतरा भी नहीं होगा तो इस कारण वह भी इस मानसिकता को पोसते हैं। भारतीय समाज के हर पहलू में यह दिखता है फिर वो आम नौकरी हो या राजनीति। क्या इसमें सुधार होगा?? शायद नहीं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बिलकुल ठीक विकास जी । हार्दिक आभार मूल्य-संवर्द्धन करने वाली विस्तृत टिप्पणी के लिए ।

      Delete

  4. चाटुकारिता के बिना आज के समाज की कल्पना नहीं कि जा सकती, फिर भी कुछ धारा के विपरीत चलने का प्रयास करते ही हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आप ठीक कह रहे हैं यशवंत जी ।

      Delete
  5. बहुत बढ़िया विचारोत्तेजक लेख
    बधाई 🙏💐🙏

    कृपया मेरी इस पोस्ट पर पधारने का कष्ट करें -

    https://vichar-varsha.blogspot.com/2020/10/2.html?m=1

    ReplyDelete
  6. हार्दिक आभार वर्षा जी । मैं आपकी पोस्ट पर शीघ्र ही आता हूँ ।

    ReplyDelete
  7. चापलूसों की फ़ौज देखने को मिलती है आजकल बहुत ही ज्यादा, कमबख्त इनके कारण भले और सीधे-साधे लोग पिसते है इनके चक्कर में हर जगह
    लेकिन यह बहुत लम्बे समय तक नहीं चलता
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार माननीया कविता जी ।

      Delete
  8. सटीक लेख- जितेन्द्र जी | इस लेख पर दे रही विलंबित प्रतिक्रिया के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ | चापलूसी हर जगह चलती हो ऐसा कहना शायद गलत होगा | पर यत्र तत्र इसका अस्तित्व सदैव बना रहा है | चापलूसी ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज और देश को बहुत हानि पहुंचाई है | सबसे बड़ी हानि ये कि अयोग्य व्यक्ति झूठी प्रशंसा पा जाता है और ऐसे ओहदे पर जा विराजता है जो किसी योग्य के लिए बना रहता है | और एक अत्यंत सुयोग्य व्यक्ति की प्रतिभा और उसके योगदान से देश समाज वंचित रह जाता है और वह व्यर्थ चली जाती है | फिर भी कुछेक लोग या संस्थान ऐसे जरुर हैं जहाँ इनकी घुसपैठ असफल हो जाती है | एक बहुत ही सार्थक लेख के लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है | हार्दिक शुभकामनाएं और आभार |

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपने सत्य कहा रेणु जी । विस्तृत एवं समुचित विचाराभिव्यक्ति के लिए हार्दिक आभार आपका ।

      Delete