Tuesday, July 28, 2020

कानून का तीसरा हाथ : निर्भीक, निर्लोभी, निष्पक्ष पत्रकारिता

अदालत में खड़ी इंसाफ़ की देवी की आँखों पर पट्टी बंधी होती है, इसलिए वह हक़ीक़त को देख नहीं सकती; सिर्फ़ उन दो पलड़ों पर रखे गए सबूतों और काग़ज़ात के वज़न से यह जाँच सकती है कि कौनसा पलड़ा भारी है जिसके हक़ में उसे फ़ैसला देना है । इसीलिए कहा जाता है कि कानून अंधा होता है जो सच्चे-झूठे में फ़र्क़ नहीं कर सकता । ऐसे अंधे कानून की मदद के लिए सरकारी अमलदारी उसे दो हाथ मुहैया करवाती है - पहले हाथ का नाम है - 'पुलिस' और दूसरे हाथ का नाम है 'वकील' । लेकिन इस अख़लाक़ से कोरे ज़माने में जब सब कुछ बिकाऊ है, अगर ये दोनों हाथ किसी अमीर और ताक़तवर ज़ालिम के हाथों बिक जाएं तो उनके बिना अपाहिज हो चुका कानून क्या करे ? ऐसे में इंसाफ़ की देवी इंसाफ़ किस बिना पर करे ? 

और तब मज़लूम और कानून, दोनों की ही मदद के लिए मौजूद होना चाहिए एक तीसरा हाथ - कानून का तीसरा हाथ ।  मुजरिमों से मिले हुए बेहिस हाकिमों के आगे बेबस अवाम की आवाज़ बनकर इंसाफ़ की देवी के कानों में हक़ीक़त फूंकता है यह तीसरा हाथ जिसे हिंदुस्तान में जम्हूरियत यानी लोकतंत्र का चौथा खंभा भी कहा जाता है । इसका नाम है प्रेस या अख़बारनवीसी या पत्रकारिता । पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस से पहले भी और उसके बाद भी अगर इस मुल्क में इंसाफ़ और इंसानियत का झंडाबरदार बनकर अगर कोई खड़ा हुआ है तो वह है प्रेस, जनता की आवाज़ बनकर अगर किसी ने हुकूमत को ललकारा है तो वह है प्रेस, आम लोगों के जानोमाल और हक़ूक़ की हिफ़ाज़त के लिए अगर किसी ने मुतवातर और बेहिसाब क़ुरबानियां दीं है तो वह है प्रेस ।

कुछ साल पहले तक बड़ी इज़्ज़त हुआ करती थी प्रेस की लोगों की निगाहों में क्योंकि प्रेस की छवि ऐसी थी कि चाहे कोई बिक जाए, अपने उसूलों के पक्के अख़बार और अख़बारनवीस कभी नहीं बिक सकते । देश की आज़ादी के पहले के पत्रकारों में गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम एक प्रकाश स्तंभ की तरह है जिन्होंने क्रूर विदेशी शासन के होते हुए भी निर्भीक पत्रकारिता का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत किया तथा साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के प्रयास में अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया । उस युग में निष्पक्ष एवं सत्यनिष्ठ पत्रकारिता के उदाहरण लोकमान्य तिलक एवं मोहनदास कर्मचंद गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के माध्यम से भी जनता के समक्ष उपस्थित हुए । देश स्वतंत्र हुआ तो उसके उपरांत भी भारतीय प्रेस सत्ताधारियों अथवा धनिकों का चाटुकार नहीं बना । अतएव जनमानस में उसकी धवल छवि निष्कलंक ही बनी रही ।

वह प्रेस ही रहा जिसने शोषण, दमन एवं अत्याचार के विरूद्ध निर्भय होकर स्वर उठाया एवं अपने सत्य के बल पर सत्ताधारियों को भी झुकने पर विवश किया । समाजकंटकों के हाथों न जाने कितने ही सत्य एवं न्याय के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकारों ने अपने परिवार एवं जीवन तक बलिदान होने दिए किन्तु सत्य एवं न्याय को पराजित नहीं होने दिया । लुगदी साहित्य के उस युग में ऐसे आदर्शवादी पत्रकारों पर ढेरों कथाएं रची गईं एवं कई फ़िल्में भी बनाई गईं । उनकी तुलना समाज को सत्य का दर्शन करवाने वाली प्रज्वलित मशाल से की जाती थी जिसकी अग्नि में असत्य भस्म हो जाता था । न्याय के रक्षक चाहे जिसे अनदेखा कर देते, समाचार-पत्रों को अनदेखा नहीं कर सकते थे; चाहे जिसे अनसुना कर देते, चहुँओर गुंजायमान होती पत्रकारिता की ध्वनि को अनसुना नहीं कर सकते थे ।  

अख़बारनवीसों की कलम की ताक़त तलवारों और बंदूकों की ताक़त से ज़्यादा हुआ करती थी, इस बात को जिस तरह अंग्रेज़ी हुकूमत समझती थी, उसी तरह आज़ाद देश के नए हुक्मरान भी समझते थे । अज़ीम शायर अकबर इलाहाबादी ने तो बहुत पहले ही कह दिया था - 
                                                खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो 
                                                जब तोप मुक़ाबिल हो, अख़बार निकालो 
                                                       
सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों में पंजाब में जरनैलसिंह भिंडरांवाले की अगुवाई में आतंकवाद ने सर उठाया और एक-के-बाद-एक हिंसक वारदातें होने लगीं, निर्दोष मरने लगे, हरा-भरा पंजाब जलने लगा और उस आग की लपटें पंजाब के बाहर भी झुलस पैदा करने लगीं । आम लोगों की तो बात ही क्या की जाए, पुलिस अधिकारी तक उस आतंकवाद से सुरक्षित नहीं रहे (२५ अप्रैल, १९८३ को जालंधर रेंज के डी.आई.जी. पुलिस अवतार सिंह अटवाल की पवित्र स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर ही सरेआम हत्या कर दी गई थी) । हाल यह था कि चाहे केन्द्रीय सरकार हो या राज्य सरकार, हथियारबंद दहशतगर्दों के सामने हुकूमत बेबस लग रही थी । 

लेकिन ऐसे में भी निडर पत्रकार अपने फ़र्ज़ से पीछे नहीं हटे थे । अलगाववादी हिंसक आंदोलन तथा उससे जुड़े आतंकवाद के विरूद्ध आवाज़ बुलंद करने वाले अख़बारों में प्रमुख था 'पंजाब केसरी' जो 'हिंद समाचार-पत्र समूह' से निकलने वाले अख़बारों में से एक था । इस समूह के मुखिया थे देश के कद्दावर पत्रकार लाला जगत नारायण । स्वतंत्रता सेनानी रह चुके वयोवृद्ध लालाजी की आवाज़ को भिंडरांवाले और उनका दल नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे । नतीजतन उन पर हमले शुरु हो गए । आख़िर नौ सितंबर उन्नीस सौ इक्यासी को लालाजी दहशतगर्दों की गोलियों के शिकार होकर शहीद हो गए । मगर ...

मगर क्या उनकी शहादत के साथ 'हिंद समाचार-पत्र समूह' की निर्भीक पत्रकारिता ने चुप्पी साध ली ? नहीं ! पिता के न रहने पर पुत्र ने उनके आदर्शों के साथ उनके काम को संभाल लिया । लालाजी के ये पुत्र थे रमेश चंद्र । रमेश चंद्र ने 'हिंद समाचार-पत्र समूह' की कमान संभाली और पंजाब केसरी के सम्पादक के रूप में अपने स्वर्गीय पिता के छोड़े हुए काम को उन जैसी ही निडरता से आगे बढ़ाया । आख़िर अपने पिता की राह पर चलते हुए रमेश चंद्र पिता की ही तरह शहीद हो गए जब बारह मई उन्नीस सौ चौरासी को उनकी भी गोलियां मारकर हत्या कर दी गई ।

उन दिनों हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासकारों में सुरेन्द्र मोहन पाठक का सितारा बुलंदी पर था । अपने उपन्यासों में सुनील नामक एक आदर्शवादी पत्रकार को नायक के रूप में स्थापित करने वाले सुरेंद्र मोहन पाठक को संभवतः रमेश चंद्र की शहादत ने द्रवित किया जिससे प्रेरित होकर उन्होंने अपनी सुनील सीरीज़ के अंतर्गत ही पत्रकारिता के आदर्शों को चित्रित करने वाला हिंदी उपन्यास लिखा - 'मैं बेगुनाह हूँ' जो कि उनके पत्रकार नायक सुनील का नब्बे वां कारनामा था ।

'मैं बेगुनाह हूँ' कहानी कहता है अपने 'जनता जागृति दल' की गतिविधियों द्वारा राजनगर नामक (काल्पनिक) महानगर की राजनीति को स्वच्छ करने का बीड़ा उठाए हुए एक उभरते हुए आदर्शवादी राजनेता सत्येन्द्र पाराशर को एक कैबरे नर्तकी नताशा की हत्या के झूठे आरोप में फँसा दिये जाने की जिसे निर्दोष प्रमाणित करता है आदर्शवादी पत्रकार सुनील जो 'ब्लास्ट' नामक एक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र में नौकरी करता है । उसका सौभाग्य है कि इस समाचार-पत्र के मालिक तथा प्रधान संपादक श्री बी.के. मलिक स्वयं आदर्शवादी हैं तथा उसे मात्र अपना कर्मचारी न समझकर पुत्रवत् स्नेह करते हैं ।

सरल हिंदी में लिखा गया 'मैं बेगुनाह हूँ' न केवल रोचक है वरन प्रेरणास्पद भी है । रमेश चंद्र की शहादत के अतिरिक्त यह अन्य यथार्थ घटनाओं एवं तथ्यों से भी अपने आप को जोड़ता है । इसमें अपराधियों, राजनेताओं तथा व्यवसायियों के अनैतिक गठजोड़ को दर्शाया गया है जो इतना ताक़तवर हो जाता है कि अपने किसी भी विरोधी को बरबाद कर दे और ऐसी मिसाल बना दे कि फिर कोई और ऐसे गठजोड़ के ख़िलाफ़ सर उठाने की जुर्रत न कर सके । आज भी तो हालात ऐसे ही हैं जैसे तब (१९८४ में) थे जब यह उपन्यास छपा था । उपन्यास में सत्येन्द्र पाराशर को मूल रूप से फ़िल्म अभिनेता बताया गया है जो अभिनय से राजनीति में उतरता है तथा सफल हो जाता है । संभवतः इस संदर्भ में लेखक के समक्ष कुछ ही समय पूर्व लोकप्रिय तेलुगु अभिनेता एन.टी. रामाराव के तेलुगु देसम नामक राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ने तथा जीत लेने का उदाहरण था । लेकिन उपन्यास में सत्येन्द्र पाराशर का राजनीति को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने का संकल्प एवं इस निमित्त 'जनता जागृति दल' का गठन वस्तुत: लगभग तीन दशक के अंतराल के उपरांत अरविंद केजरीवाल की भ्रष्टाचार-विरोधी गतिविधियों एवं उनके द्वारा 'आम आदमी पार्टी' के गठन से बहुत समानता रखता है । इस संयोग को अद्भुत ही कहा जा सकता है । 

'मैं बेगुनाह हूँ' का अधिकांश भाग सत्य के अनुयायी एवं आदर्शों को अपने जीवन तथा व्यक्तित्व में ढालने वाले पत्रकार सुनील की गतिविधियों का वर्णन करता है । उपन्यास के अंत में एक दुखद घटना घटती है जो पाठक के मन में एक टीस छोड़ जाती है । बहरहाल उपन्यास श्रेष्ठ है, पठनीय है, प्रेरक है और स्पष्ट शब्दों में रेखांकित करता है कि एक सच्चे पत्रकार का धर्म क्या होता है ।
सुरेंद्र मोहन पाठक की तुलना में एक कम लोकप्रिय हिंदी उपन्यासकार 'टाइगर' के अनेक जासूसी उपन्यास नब्बे के दशक तथा इक्कीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में प्रकाशित हुए । 'टाइगर ' लेखन के लिए उनका छद्म नाम था, उनका वास्तविक नाम (जैसा कि मुझे इंटरनेट से पता चला) जगदीश कुमार वर्मा है । उपन्यासों की व्यावसायिक सफलता निरंतर कम होती चली जाने के कारण अब उन्होंने उपन्यास लिखना छोड़ दिया है लेकिन उन्होंने जब तक लिखा, प्रायः श्रेष्ठ ही लिखा । मैंने उनके कई उपन्यास पढ़े जिन्हें मैंने अत्यंत रोचक ही नहीं, हृदयस्पर्शी भी पाया । ऐसा ही एक उपन्यास है - 'कानून का तीसरा हाथ' । मेरे इस लेख का शीर्षक इस उपन्यास के शीर्षक से ही लिया गया है जिसके लिए तथा कानून के दो पारंपरिक हाथों एवं तीसरे अ-पारंपरिक हाथ संबंधी ज्ञान की प्राप्ति के लिए मैं लेखक का आभारी हूँ । 

'कानून का तीसरा हाथ' एक बेहतरीन सस्पेंस-थ्रिलर है जिसमें रहस्य को अंतिम पृष्ठों तक बनाए रखने में लेखक सफल रहा है । घटनाएं बहुत तेज़ी से घटती हैं और पढ़ने वाले के हाथ से पुस्तक तब तक नहीं छूट सकती जब तक वह उसे पूरा न पढ़ ले । पाठक को आदि से अंत तक बाँधे रखने वाला यह उपन्यास निश्चय ही प्रशंसनीय है । कथानक आरंभ होता है दर्शना नामक एक साधारण गृहिणी की हत्या से जो विनोद कोठारी नामक धनी व्यवसायी के घर में नौकरानी का कार्य करती है । शक़ की सुई मुड़ती है विनोद कोठारी की ओर लेकिन उसे मोनिका सान्याल नामक एक चालाक वकील पैसे की ताक़त और अपनी तिकड़मों से बचाकर मरने वाली के पति को ही इस आरोप में फँसा देती है । ईमानदार न्यायाधीश कामताप्रसाद द्वारा साक्ष्यों के आधार पर उसके विरूद्ध निर्णय दे दिए जाने पर जब वह उनके समक्ष अपनी निर्दोषिता एवं उनके द्वारा अनुचित निर्णय दिए जाने की बात करता है तो व्यवस्था के कारण हुई अपनी भूल को व्यवस्था के माध्यम से ही सुधारने के लिए कामताप्रसाद इस सारे प्रकरण में लेकर आते हैं कानून के तीसरे हाथ अर्थात् प्रेस को । वे अपने पत्रकार मित्र से (जो कि एक प्रसिद्ध समाचार-पत्र का स्वामी है) आग्रह करते हैं कि इस हत्याकांड का गहन अण्वेषण करवाए तथा सत्य को प्रकट करे । उसके उपरांत जो होता है, वही 'कानून का तीसरा हाथ' का मुख्य भाग है जो पाठक को एक अत्यंत रहस्य तथा रोमांच से युक्त यात्रा करवाने के पश्चात् वास्तविकता को अनावृत करता है ।

मुझे ऐसा लगता है कि 'कानून का तीसरा हाथ' को ही 'कानून नहीं बिकने दूंगा' के नाम से भी प्रकाशित किया गया था । बहरहाल इस उपन्यास की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है । किसी बॉलीवुड सस्पेंस फ़िल्म की तरह ही मनोरंजक इस उपन्यास में हास्य भी पिरोया गया है लेकिन उपन्यास के मूल उद्देश्य के साथ कोई समझौता नहीं किया गया है, न ही कथानक को कहीं भटकने दिया गया है । लेखक ने उपन्यास को उन शहीदों को सादर समर्पित किया है जिन्होंने एक पत्रकार बनकर ईमानदारी से देश और समाज की सेवा की---जिन्होंने हर चुनौती का डटकर मुक़ाबला किया तथा अंत में अपने फ़र्ज़ पर क़ुरबान हो गए । उपन्यास में चमनलाल नामक एक सत्यनिष्ठ पत्रकार के बलिदान के माध्यम से इस बात को भलीभांति स्थापित किया गया है कि सच्ची पत्रकारिता वास्तव में क्या होती है । लेेखक ने उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर ही उपन्यास के परिचय के रूप में लिख दिया है - 'जब कानून के दोनों हाथ अपना फ़र्ज़ भूलकर टके-टके में बिकने लगते हैं तो उन्हें सबक सिखाने के लिए कानून के तीसरे हाथ को हरकत में आना ही पड़ता है' ।

मेरे इस लेख का उद्देश्य केवल इन दोनों हिंदी उपन्यासों की समीक्षा करना या इन्हें पढ़ने की अनुशंसा करना नहीं है बल्कि आज निर्भीक, निर्लोभी, निष्पक्ष पत्रकारिता की पुनर्स्थापना की आवश्यकता पर बल देना भी है । टी.वी. और इंटरनेट के इस ज़माने में पत्रकारिता शब्द ही कहीं सुनाई नहीं देता, केवल 'मीडिया' शब्द सुनाई देता है - मीडिया जो बहुत ताक़तवर है, जो किसी को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है लेकिन ... लेकिन जो बिक गया मालूम होता है, जो तोते की तरह उनकी बोली बोलता है जो उसका दाम दे चुके हैं; जो आज़ाद नहीं रहा, हुकूमत की मशीन का पुरज़ा बन गया है, हुक्मरानों के पैर की जूती बन गया है । ऐसे में ज़ुल्मोसितम से पिसते अवाम की आवाज़ कौन बनेगा ? कानून के दो हाथ तो कभी के बिक चुके हैं, यह तीसरा हाथ भी न बचा तो कानून केवल एक झाँसा बनकर रह जाएगा, इंसाफ़ महज़ एक ढोंग बनकर रह जाएगा । कानून के इस तीसरे हाथ को बचाइए वरना न कानून बचेगा, न मुल्क, न इंसानियत ।

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Tuesday, July 21, 2020

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है . . .

प्रति वर्ष नौ जुलाई को स्वर्गीय गुरु दत्त का जन्मदिन पड़ता है । केवल उनतालीस वर्ष की आयु में उन्होंने मौत को ज़िन्दगी से बेहतर पाया और उसी की गोद में सो गए क्योंकि और कोई गोद उन्हें नसीब ही नहीं हुई । वे उस शायर की तरह थे जिसके लिए कहा गया है कि - वो लिखता है ज़ीस्त की हद तक, मरने पर वो शायर होगा । उनके द्वारा बनाई गई अमर कृति 'प्यासा' (१९५७) के नायक की ही तरह उनके चाहने वाले भी उनकी ज़िन्दगी में कम थे लेकिन जिनकी तादाद उनकी मौत के बाद लगातार बढ़ती ही चली गई ।
तेरह वर्ष पूर्व उनके जन्मदिवस के अवसर पर 'दैनिक भास्कर' समाचार-पत्र के 'नवरंग' नामक साप्ताहिक परिशिष्ट में श्री गीत चतुर्वेदी ने उनके ऊपर 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' शीर्षक से एक दिल को चीर देने वाला लेख लिखा था । मैंने उन्हीं दिनों अपनी नौकरी बदली थी तथा राजस्थान के रावतभाटा नामक स्थान से निकलकर दिल्ली जा रहा था । रावतभाटा में मैंने चतुर्वेदी जी के लेख को अख़बार में पढ़ा और मेरी हालत यह हुई कि बस आँखें ही ख़ुश्क थीं क्योंकि मैं अपने आँसू किसी को दिखा नहीं सकता था, दिल भीतर-ही-भीतर रो पड़ा था । ग्यारह जुलाई दो हज़ार सात को जब मैंने अपने परिवार के साथ रावतभाटा को छोड़ा तो अख़बार के उस पन्ने को मैं अपने साथ ही ले गया जिस पर वो लेख छपा था । हफ़्ते भर बाद ही अपनी नई नौकरी में मेरा उत्तर प्रदेश के डाला नामक स्थान पर दौरे पर जाना हुआ । मैं अट्ठारह जुलाई को हवाई जहाज़ से वाराणसी पहुँचा और उसके उपरांत लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी सड़क मार्ग से तय करके डाला (सीमेंट फ़ैक्टरी) पहुँचा जहाँ के मेहमानख़ाने में मुझे ठहराया गया । मैं अख़बार का वो पन्ना अपने सामान में रखकर साथ ले आया था जिस पर चतुर्वेदी जी का लेख 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' छपा था । तीन दिन तक यानी बीस जुलाई तक मैं डाला में रहा और हर रात अपने आरामदेय कमरे के एकांत में उस लेख को बार-बार पढ़ता रहा । मौसम भी बारिश का ही था और हाल यही था कि बाहर आसमान से बारिश होती रहती थी और अंदर (उस लेख को पढ़ते हुए) मेरी आँखों से ।

लेकिन इक्कीस जुलाई को जब मैं डाला से प्रस्थान करके चुनार नामक स्थान पर स्थित अपनी नियोक्ता कंपनी के दूसरे संस्थान (सीमेंट फ़ैक्टरी) चला गया तो अख़बार का वो पन्ना डाला के मेहमानख़ाने के अपने कमरे में ही (शायद तकिये के नीचे) भूल गया । मैं डाला वापस नहीं लौट सका और तीसरे दिन अपना दौरा पूरा करके चुनार से ही दिल्ली चला गया । तक़रीबन दो महीने बाद मैं डाला के दौरे पर पुनः गया तो सही लेकिन अब अख़बार का वह पन्ना मुझे कहाँ मिलता ? बस वो लेख और ख़ासतौर पर उसका उनवान 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' मेरे दिल में किसी फाँस की तरह धंसा रह गया । तेरह साल बाद पिछले दिनों मैंने यूँ ही इंटरनेट पर गूगल सर्च में टटोला तो मुझे वह लेख गीत चतुर्वेदी जी के 'वैतागवाड़ी' नामक ब्लॉग पर मिल गया । और तेरह साल बाद उसे फिर से पढ़कर मेरी आँखों से अश्क उसी तरह टपके जिस तरह तेरह साल पहले टपके थे ।
गुरु दत्त पर मैंने तब से पढ़ना और उन्हें तब से समझना शुरु किया था जब मैं एक नादान बच्चा ही था । मेरे बचपन के दिनों की ही बात है जब फ़िल्मी पत्रिका 'माधुरी' में मैंने गुरु दत्त की माँ वासंती पादुकोण का लिखा हुआ लेख पढ़ा था - 'गुरु दत्त - मेरा बेटा' और इस बात को जाना था कि उनकी माँ ही उन्हें सबसे ज़्यादा समझती थी - वो माँ जिसकी गोद उसके बेटे को मरते वक़्त नसीब नहीं हुई और वो माँ जो बेटे की अकाल मौत के बाद तीस साल तक उसके जाने के ग़म के साथ ज़िन्दा रही (ठीक शहीद भगत सिंह की माँ की तरह)। 

जब मैंने गुरु दत्त की अमर कृति 'कागज़ के फूल' की समीक्षा लिखी थी तो उस पर मेरे ब्लॉगर मित्र निशांत सिंह (sydbarett) ने टिप्पणी की थी कि दुनिया जीनियस को इसलिए दंडित करती है क्योंकि वो उसकी समझ से परे होता है । और शायद यही एक जीनियस की दुखदायी विडम्बना है कि वो दुनिया के और दुनियादारी के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता, दूसरी ओर दुनियादारी में डूबी दुनिया न उसे समझ पाती है और न ही उसकी प्रतिभा के साथ न्याय कर पाती है । जीनियस अकेला होता है । लेकिन ... लेकिन होता तो इंसान ही है न ? उसे भी तो कोई समझने वाला चाहिए, कोई प्यार करने वाला चाहिए । और न मिले तो ? यही जीनियस गुरु दत्त की ट्रेजेडी थी ।  

जिस दिन मैंने 'वैतागवाड़ी' ब्लॉग पर 'ग़म की बारिश, नम-सी बारिश' को फिर से पढ़ा, उसी दिन शाम को नीम-अंधेरे में पूरी तनहाई और ख़ामोशी के आलम में यूट्यूब पर 'प्यासा' में गुरु दत्त पर फ़िल्माई गई साहिर की ग़ज़ल 'तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िन्दगी से हम' को देखा और सुना । फिर उसी फ़िल्म में स्थित साहिर की अमर नज़्म 'ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया' को भी देखा और सुना जिसकी शुरुआत में गाना शुरु करते हुए अंधेरे में दरवाज़े पर खड़े गुरु दत्त का साया सलीब पर टंगे जीसस क्राइस्ट की तरह दिखाई देता है । दोनों ही गीतों में मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ को अपने होठों पर लाते हुए गुरु दत्त के लिए ऐसा लगता है जैसे बोल उनके दिल की गहराई से निकल रहे हैं, वे लफ़्ज़ नहीं अहसास हैं जो बाहर आ रहे हैं - केवल उनके होठों पर नहीं, उनके चेहरे पर भी, उनकी आँखों में भी, सच कहा जाए तो उनके समूचे वजूद के ज़र्रे-ज़र्रे पर ।
गुरु दत्त ने स्वयं एक लेख लिखा था - 'क्लासिक्स एंड कैश' जिसमें उन्होंने इस बात को रेखांकित किया था कि इन दोनों शब्दों में समानता केवल इतनी ही है कि ये दोनों ही अंग्रेज़ी के अक्षर 'सी' से आरंभ होते हैं । अन्यथा जो रचना क्लासिक अर्थात् श्रेष्ठ है, उसे व्यावसायिक सफलता मिलना आवश्यक नहीं तथा जो रचना व्यावसायिक रूप से सफल है, उसका श्रेष्ठता के मानदंडों पर खरा उतरना आवश्यक नहीं । बाज़ार तथा धनार्जन का अपना दर्शन होता है । मामूली चीज़ें बहुत-सा पैसा कमा सकती हैं जबकि बेहतरीन चीज़ों को, हो सकता है कि कोई पूछने वाला ही न मिले । यह बात गुरु दत्त ने सम्भवतः 'कागज़ के फूल' (१९५९) फ़िल्म के संदर्भ में हुए अपने निजी अनुभव के आधार पर लिखी थी । लेकिन संसार सफलता को ही पूजता है, गुणों को नहीं; यह बात गुरु ने उससे भी पहले 'प्यासा' में बिना किसी लागलपेट के स्पष्टतः दर्शा दी थी । यह पाखंडी संसार गुणों का तो बस बखान ही करता है; सच तो यही है कि यहाँ जो बिकता है, वही चलता है ।

'प्यासा' के नायक विजय को आख़िर में किसी शख़्स से कोई शिकायत नहीं थी । उसे शिकायत थी समाज के उस ढाँचे से जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन लेता है, मतलब के लिए अपनों को बेगाना बना देता है । उसे शिकायत थी उस तहज़ीब से जिसमें मुरदों को पूजा जाता है और ज़िंदा इंसान को पैरों तले रौंदा जाता है, जिसमें किसी के दुख-दर्द पर दो आँसू बहाना बुज़दिली समझा जाता है और झुककर मिलने को कमज़ोरी समझा जाता है । ऐसे माहौल में उसे कभी शांति नहीं मिल सकती थी । कामयाबी को ही सब कुछ मानने वाले समाज में 'कागज़ के फूल' के नायक सुरेश सिन्हा के तजुर्बात भी कुछ ऐसे ही रहे थे । गुरु द्वारा सिरजे गए और निभाए गए ये दोनों ही किरदार शायद उसकी अपनी शख़्सियत में जज़्ब हो गए थे ।

और इसीलिए एक दिन गुरु को नाउम्मीदी हो गई अपनी ज़िंदगी से, ठीक 'प्यासा' के नायक की तरह जो कशमकश-ए-ज़िंदगी से तंग आ गया था और कह रहा था -

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम, ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बेदिली से हम
हम ग़मज़दा हैं लाएं कहाँ से ख़ुशी के गीत, देंगे वही जो पाएंगे इस ज़िंदगी से हम
लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद, लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम 

गुरु को अंधेरे से प्यार था, आँसुओं से भी । आख़िर में अंधेरा और आँसू ही उसके हाथ लगे । उसने प्यार भी किया, शादी भी; लेकिन उसे हमसफ़र न मिला । अपनी ज़िन्दगी की आख़िरी रात को उसने हर उस शख़्स को पुकारा जो उसके तपते दिल को कुछ राहत दे पाता, उस पर ठंडक का फाहा रख पाता । पर कोई न आया - न गीता, न वहीदा, न कोई दोस्त, न कोई हमनवा । 'प्यासा' का नायक उसके मुक़ाबले कहीं ख़ुशनसीब था जो उसे एक चाहने वाली, समझने वाली और अपनाने वाली मिली जिसके साथ वो उस मतलबी दुनिया से दूर जाने के सफ़र पर निकल गया । उस दुनिया से दूर जाने के लिए जिसके लिए उसके लबों पर यही था - 

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी; निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

यहाँ इक खिलौना है इंसां की हस्ती, ये बस्ती है मुरदापरस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है; वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है
जहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
और आख़िर में - 

जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है, तुम ही संभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 

दस अक्टूबर उन्नीस सौ चौंसठ की रात को अपनी मौत को गले लगाने से पहले शायद गुरु ने 'प्यासा' के नायक के मुँह से कहलवाए गए इन अशआर को ही याद किया, महसूस किया और इस दुनिया को ठुकरा दिया । 

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Tuesday, July 14, 2020

महासमर की महागाथा

हमारे देश में चेतन भगत ने साधारण अंग्रेज़ी में लिखे गए साधारण कथानकों वाले उपन्यासों का एक बाज़ार उत्पन्न किया और इस सरिता को अमीश त्रिपाठी ने भारतीय पौराणिक मिथकों को ही तोड़ मरोड़ कर सिरजे गए अपने उपन्यासों की प्रारंभिक त्रयी द्वारा एक सागर में परिवर्तित कर दिया जिससे भारतीय भाषाओं के पाठकगण अंग्रेज़ी में रचित भारतीय उपन्यासों के प्रति कुछ ऐसे आकृष्ट हुए कि पहले से ही सिमटता जा रहा भारतीय भाषाओं विशेषतः हिंदी के साहित्य का प्रसार-क्षेत्र और भी अधिक सिमटने लगा । जहाँ तक लोकप्रिय हिन्दी साहित्य का प्रश्न था, ले-देकर उसके इकलौते झंडाबरदार केवल पुराने योद्धा सुरेन्द्र मोहन पाठक रह गए । किन्तु सर्वविदित है कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है । २०१६ में नवोदित हिन्दी उपन्यासकार रमाकांत मिश्र (जो पहले से ही एक हिन्दी कथाकार के रूप में पहचाने जाते थे क्योंकि उनके द्वारा रचित कई कहानियां हिन्दी की लोकप्रिय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थीं) एक ताज़ा हवा के झोंके के समान अपना प्रथम हिन्दी उपन्यास 'सिंह मर्डर केस' लेकर प्रस्तुत हुए । थ्रिलर शैली में लिखे गए मन को छू लेने वाले उस उपन्यास को सफलता भी मिली और सराहना भी । दूसरी ओर सबा ख़ान के नाम से एक नवोदित लेखिका भी विदेशी लेखकों के उपन्यासों के अनुवाद के साथ-साथ अपने मौलिक सृजन से भी हिंदी साहित्य जगत में अपनी एक पहचान बना रही थीं । इन दोनों लेखकों ने एक वृहत् कथा को आकार देने के निमित्त संयुक्त प्रयास किया जिसका परिणाम 'महासमर' नामक एक महागाथा के रूप में सामने आया । दो भागों में प्रस्तुत इस अत्यंत विस्तृत कथा का प्रथम भाग - परित्राणाय साधूनाम् के रूप में २०१९ में पाठकों के सम्मुख आया तो द्वितीय भाग - सत्यमेव जयते नानृतम् के रूप में २०२० में अवतरित हुआ । बड़े आकार के नौ सौ से अधिक पृष्ठों में समाहित महाभारत सरीखी इस महागाथा की समीक्षा करना भी कोई सरल कार्य नहीं है क्योंकि गुण-दोषों को अलग रखा जाए तो कम-से-कम यह महाप्रयास अपने आप में ही महती सराहना का पात्र है ।
'महासमर' में लेखक-द्वय ने पर्यावरण संरक्षण की पृष्ठभूमि में एक तीव्र गति का थ्रिलर रचा है । प्राणी का शरीर तथा यह संपूर्ण सृष्टि भी पंच महाभूतों से निर्मित बताई जाती है - मृत्तिका अर्थात् मिट्टी, पानी, अग्नि, आकाश तथा वायु । गोस्वामी तुलसीदास की वाणी को उद्धृत किया जाए तो 'क्षिति जल पावक गगन समीरा' ही इस नश्वर देह तथा नश्वर संसार के मूल तत्व हैं । इन पाँच तत्वों में से एक तत्व - जल के महत्व को इस उपन्यास का आधार बनाया गया है एवं उसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है । पेशे से कीट वैज्ञानिक रमाकांत मिश्र की पारिस्थितिकी में रुचि होना स्वाभाविक ही लगता है लेकिन यह उपन्यास वस्तुतः पर्यावरण-प्रेमियों के लिए कम तथा रोमांच से युक्त फ़िक्शन पढ़ने में रुचि रखने वालों के लिए अधिक है ।

क्राइम फ़िक्शन के रसिया जिन पाठकों ने डॉन ब्राउन का 'द विंची कोड' या अश्विन सांघी के 'द रोज़ाबाल लाइन' और 'द कृष्णा की' जैसे उपन्यास पढ़े हैं, वे 'महासमर' के कथा-प्रवाह की शैली को भलीभांति समझ सकते हैं  (वैसे मूल रूप से ऐसी शैली के सृजक बाबू देवकीनंदन खत्री थे) । जल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए एक बाँध के टूटने से हुए जलप्लावन में विश्व बैंक के वित्तपोषण द्वारा निर्मित एक संस्थान के पूर्णरूपेण नष्ट हो जाने की घटना इस सुदीर्घ कथानक के मूल में है लेकिन ये बातें वास्तविक कथा की पृष्ठभूमि ही तैयार करती हैं । कथानक का रंगमंच तो ढेर सारी घुमावदार घटनाओं, हत्याओं, छुपे हुए तथ्यों की खोजबीन, अपराधियों की धरपकड़, नेता-पुलिस-व्यापारी-नौकरशाही गठजोड़, गुप्तचरों (तथा एक खोजी पत्रकार) की भागदौड़ एवं सरकारी तंत्र के अनुत्तरदायी व चरम सीमा तक भ्रष्ट चरित्र से उपजे परिणामों से अटा पड़ा है । ढेर सारे पात्र हैं, ढेर सारे ट्रैक और ढेर सारी घटनाएं । पाठक को आदि से अंत तक उपन्यास से चिपकाए रखने के लिए यह पर्याप्त से भी अधिक है ।

सवाल यह उठता है कि इस विशालकाय सृजन के पीछे इन अत्यन्त प्रतिभाशाली लेखकों का उद्देश्य क्या था या क्या है । यदि उद्देश्य एक अतिरोचक, अतिमनोरंजक कथा की रचना करना था तो वे उसमें पूर्णतः सफल रहे हैं । फ़ॉर्मूला कार रेस में कारें जिस तरह दौड़ती हैं, वैसी ही रफ़्तार से इस महागाथा का घटनाक्रम दौड़ता है और पढ़ने वाले को ठहर कर सोचना तो दूर, साँस लेने की भी फ़ुरसत नहीं देता मालूम होता है । एक दिलचस्प थ्रिलर में जो कुछ होने की उम्मीद उसे पढ़ने वाले को होती है, वह सब कुछ 'महासमर' में मौजूद है हालांकि मेरी राय में इसे कोई सस्पेंस-थ्रिलर नहीं कहा जा सकता क्योंकि थ्रिल ही है, कोई बड़ा राज़ कहीं दिखाई नहीं देता जिसके ख़ुलासे के लिए आख़िर तक इंतज़ार रहे । पढ़कर सन्तुष्टि भी होती है तथा एक प्रकार का असंतोष भी क्योंकि दो भागों में विस्तृत हो चुकने के उपरांत भी सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं दिए गए हैं । कई सिरे (बिलाशक़ जान-बूझकर) खुले छोड़े गए हैं जिन्हें पकड़कर आइंदा इस सिलसिले को आगे बढ़ाया जाएगा । लेखकों के आत्मसंतोष तथा भावी लेखन योजना के दृष्टिकोण से उनके लिए यह उचित हो सकता है परन्तु पाठक के दृष्टिकोण से यह उचित प्रतीत नहीं होता । मूल विचार अथवा कतिपय पात्रों को लेकर उपन्यासों की एक शृंखला रची जाने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लेकिन रची गई कृति अपने आप में सम्पूर्ण होनी चाहिए । कथानक से जुडे़ महत्वपूर्ण प्रश्नों को अनुत्तरित रखकर पाठक को त्रिशंकु की भांति अधर में झूलता छोड़ देना उसके प्रति अन्याय ही है ।

पात्रों की भाषा में व्यावहारिकता का ध्यान वहीं रखा गया है जहाँ गाली-गलौज है, अन्यथा अनेक स्थलों पर पात्रों द्वारा ऐसी भाषा बुलवाई गई है जो व्यवहार में प्रयुक्त नहीं होती । और जहाँ तक गाली-गलौज या अपशब्दों के प्रयोग का प्रश्न है, मैं निजी रूप से मानता हूँ कि यह यथासंभव कम-से-कम होना चाहिए और तभी होना चाहिए जब उसके बिना कथानक की गाड़ी न चल सकती हो । लेखकगण यदि चाहते तो निश्चय ही इसे कम कर सकते थे । इसके अतिरिक्त मुझे उपन्यास के दोनों ही भागों में स्त्रियों से संबंधित कुछ प्रसंग अनावश्यक लगे । यदि लेखकगण विशुद्ध व्यावसायिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिखने वाले उपन्यासकारों की श्रेणी में नहीं आते हैं तो इन प्रसंगों को उपन्यास में सम्मिलित करने से बचा जा सकता था ।

अब मैं पुनः लेखकद्वय के इस कथा के सृजन के उद्देश्य की अपनी बात पर लौटता हूँ । यदि उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन प्रदान करना न होकर पाठकों में पारिस्थितिकीय जागरूकता उत्पन्न करना था (और है) तो उनकी सफलता सीमित ही है क्योंकि वे उपन्यास में किसी भी स्थान पर इस संदर्भ में किसी प्रकार का भावोद्वेलन उत्पन्न नहीं कर सके हैं । ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उपन्यास में अंतर्निहित ऐसा कोई भाव पढ़ने के उपरान्त भी पाठक के साथ बना रहता है । लेकिन इस तथ्य की ओर ध्यानाकर्षण निस्संदेह सराहनीय है कि घोर स्वार्थी व्यवसायी अपने व्यापारिक लाभ के निमित्त प्राणलेवा रोग उत्पन्न करने वाले विषाणु तक उत्पन्न करके संपूर्ण मानवता के स्वास्थ्य (एवं जीवन) को भी संकट में डाल सकते हैं । इस कटु यथार्थ को रेखांकित करना भी श्लाघनीय है कि स्वार्थी लोग एवं स्वार्थी वर्ग अपने प्रत्येक कुकर्म को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए कोई-न-कोई (कु)तर्क ढूंढ ही लेते हैं ।

कुल मिलाकर उपन्यास पठनीय है । एक समीक्षक के रूप में मेरी आलोचना अपनी जगह है और उपन्यास की उत्तम गुणवत्ता अपनी जगह । बेस्टसेलर बनने की तमाम ख़ूबियां इसमें हैं । उपन्यास के अंत से ही स्पष्ट है कि लेखकगण की लेखनी थमने वाली नहीं है एवं इस महागाथा का नवीन विस्तार तथा इसके नवीन आयाम भविष्य में हिंदी के पाठकों के समक्ष आएंगे जिनकी प्रतीक्षा अभी से आरंभ हो गई है । प्रतिभाशाली तथा ऊर्जस्वी लेखकद्वय को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ।

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Friday, July 10, 2020

इतनी दूर की कौड़ी !

हिन्दी मुहावरे 'दूर की कौड़ी लाना' का अर्थ है बहुत दूर की सोच लेना अथवा किसी ऐसे काम को संभव बनाने (या उसके संभव हो जाने) की परिकल्पना करना जो प्रत्यक्षतः असंभव-सा लगता हो । हिन्दी उपन्यासकार स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा की कलम जब अपने पूरे जलाल पर थी, तब उन्होंने ऐसे कई उपन्यास लिख डाले थे जिनके प्रमुख पात्र दूर की कौड़ी लाने जैसी ही योजनाएं बनाया करते थे और उन पर अमल भी कर दिखाया करते थे । शर्मा जी की कथाओं की इस विशिष्टता ने ही वस्तुतः उन्हें एक विशेष लेखक बनाया जो दूसरे लेखकों की तरह घिसी-पिटी और बार-बार दोहराई जाने वाली कहानियों की जगह अपने पाठकों को हर बार कुछ नया पेश करता था और उस कहानी में ऐसे-ऐसे घुमाव होते थे जो पढ़ने वाले के हाथ से किताब न छूटने दें । यही कारण था कि वे सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर नब्बे के दशक के पूर्वार्द्ध तक भारत के सबसे लोकप्रिय हिंदी उपन्यासकार बने रहे । वे अपने उपन्यासों का प्रचार करते हुए पाठकों से कहते थे कि मैंने उपन्यास के पृष्ठों पर जगह-जगह करेंट-युक्त तार बिछा रखे हैं जो आपको बार-बार झटका देंगे । बहरहाल दूर की कौड़ी क्या होती है, इसे ठीक से समझना हो तो शर्मा जी के उस ज़माने के उपन्यासों को पढ़कर भी समझा जा सकता है ।

इक्कीसवीं सदी में वेद जी की कलम अपनी चमक खो बैठी और उनके ऐसे-ऐसे उपन्यास आने लगे जिन्हें पढ़कर लगता ही नहीं था कि वे उसी वेद प्रकाश शर्मा के लिखे हुए हैं जिसने कभी हिन्दी के पाठकों को अपनी कलम का दीवाना बना दिया था और जिसके नये उपन्यास के लिए पाठक महीनों इंतज़ार किया करते थे । फिर भी २००३ से २००५ के वक़्त में उनके लगातार छः ऐसे उपन्यास आए जिन्हें श्रेष्ठ माना जा सकता है । इनमें से छठे और आख़िरी उपन्यास का नाम ही था 'दूर की कौड़ी' । 
'दूर की कौड़ी' का कथानक इतना उलझा हुआ है कि उसके केन्द्रीय पात्र अजय श्रीवास्तव की वास्तविक योजना को समझ पाना ही आधे से अधिक उपन्यास को पढ़ चुकने पर भी पाठक के लिए टेढ़ी खीर ही बना रहता है । उपन्यास का नायक जिन लोगों को संकट में डालना चाहता है, उनके भावी कार्यकलापों तथा अपने कृत्यों पर उनकी सम्भावित प्रतिक्रियाओं का ऐसा सटीक अनुमान लगाता है कि पढ़कर आश्चर्य होने लगता है कि क्या कोई व्यक्ति वाक़ई इतनी दूर तक सही-सही सोच सकता है और अन्य व्यक्तियों के दिमाग़ों में झाँककर जान सकता है कि वे कब क्या करेंगे ? यह मास्टरमाइंड अपने आपको दूसरों के दिमाग़ों का अपहरण कर लेने में माहिर बताता है और उसे ऐसी शतरंजी चालें चल सकने का आत्मविश्वास है जिनके फलस्वरूप उसके शिकार हर कदम पर वही करेंगे जो वह चाहता है कि वे करें । उसकी यह मान्यता है कि यदि मस्तिष्क को तर्कपूर्ण ढंग से उपयोग में लिया जाए तो अन्य व्यक्तियों को कठपुतलियों की भांति नचाया जा सकता है ।

कथानक का यह मुख्य पात्र (चाहे इसे नायक कहें या खलनायक) अपनी योजना पर अकेले काम नहीं करता है । उसने अपना एक पूरा दल बनाया हुआ है लेकिन इस दल में उसका पूर्णतः विश्वस्त सहयोगी एक ही है जो जानता है कि जो किया जा रहा है, वह क्यों किया जा रहा है तथा अंतिम लक्ष्य क्या है । बाकी लोग केवल मोहरे हैं जो संपूर्ण योजना तथा उसके उद्देश्य से अनभिज्ञ हैं । इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो यह भी नहीं जानते कि योजना जब अपने कार्यान्वयन की चरम सीमा पर पहुँचेगी तो उनकी गणना भी शिकारों में ही होगी । बहरहाल मुख्य पात्र की योजना तथा उसका कार्य रूप में परिणत होना, दोनों ही इस उपन्यास को एक अत्यंत रोचक उपन्यास बना देते हैं जो आदि से अंत तक पाठक को बांधे रखता है तथा पूर्णतः पठित हो जाने पर एक सन्तुष्टि की अनुभूति प्रदान करता है ।

वेद प्रकाश शर्मा अपने स्वर्णकाल में कहा करते थे कि वे लोग मेरे उपन्यास न पढ़ें जिन्हें मारधाड़ वाले उपन्यास पसंद आते हैं, मेरे उपन्यास उन पाठकों के लिए हैं जिन्हें दिमाग़ी खुराक़ चाहिए । और उनके उस दौर के उपन्यासों के पेचीदा कथानक वास्तव में पढ़ने वालों के दिमाग़ों को ज़बरदस्त खुराक़ दिया करते थे । 'दूर की कौड़ी' तब लिखा गया था जब वे अपने स्वर्णकाल को बहुत पीछे छोड़ आए थे एवं एक लेखक के रूप में उनका करियर ढलान पर था लेकिन पाठकों को जो तगड़ी दिमाग़ी खुराक़ उन्होंने इस उपन्यास में दी है, वैसी खुराक़ शायद ही पहले किसी उपन्यास में दी हो । इस उपन्यास का पेचदार मगर दिलचस्प कथानक एक इतनी दूर की कौड़ी है कि उस पर यकीन होना ही मुश्किल है कि ऐसा भी मुमकिन है ।

कथानक का आधार भारतीय न्यायिक व्यवस्था एवं पुलिस व्यवस्था के दोष हैं जिनके कारण साधारण नागरिकों पर अन्याय होते हैं तथा अन्याय-पीड़ितो के मन में प्रतिशोध की भावना जागृत होती है । उपन्यास का प्रमुख पात्र तथा उसके दाएं हाथ जैसा विश्वस्त साथी ऐसे ही अन्याय से पीड़ित होने की ज्वाला जैसी अनुभूति अपने मन में लिए घूम रहे हैं तथा उनकी संपूर्ण योजना एवं अंतिम उद्देश्य उसी अनुभूति का परिणाम हैं । अ‍पना प्रतिशोध वे किसी सरल उपाय से नहीं, अत्यंत घुमावदार ढंग से लेना चाहते हैं । वे (अपनी दृष्टि में) अपने अपराधियों को उसी तरह तड़पाना चाहते हैं, जिस तरह से वे तड़पे हैं ।

लेकिन कथानक एक और महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित करता है । वह यह है कि आवश्यक नहीं कि कानून के रक्षक अपनी भ्रष्ट अथवा दुष्ट प्रवृत्ति के चलते ही किसी के साथ अन्याय करें । कई बार व्यवस्था इस प्रकार उनके हाथ बाँध देती है कि वे स्वयं ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ होते हुए भी असहाय हो जाते हैं तथा उनके हाथ से अनचाहे ही किसी के साथ अन्याय हो जाता है । कथानक के दो महत्वपूर्ण पात्रों जिनमें से एक न्यायाधीश है तथा दूसरा पुलिस अधिकारी, की स्थिति ऐसी ही है । कहानी के केन्द्रीय पात्र अजय श्रीवास्तव तथा उसके जोड़ीदार के साथ जो अन्याय उनके हाथों हो जाते हैं, उसके लिए व्यवस्था के दोष उत्तरदायी हैं, वे नहीं । लेकिन ऐसा होने के कारण वे निर्दोष होते हुए भी उनके प्रतिशोध के निशाने पर आ जाते हैं ।

मेरी एक शुभचिन्तिका जो स्वयं एक जानी-मानी लेखिका, कवयित्री एवं समीक्षिका होने के साथ-साथ मेरी ही तरह एक सरकारी संगठन में कार्यरत हैं, ने एक बार मेरे द्वारा की गई पुरानी फ़िल्म 'सत्यकाम' (१९६९) की समीक्षा के संदर्भ में मेरे साथ भ्रष्टाचार के विषय पर विचार-विमर्श किया था । तब मैंने यही विचार व्यक्त किया था कि कभी-कभी भला, ईमानदार एवं निर्दोष व्यक्ति भी व्यवस्था (एवं उसमें उसके चहुँओर उपस्थित अन्य भ्रष्ट लोगों) द्वारा अनुचित कार्य करने पर विवश कर दिया जाता है - ऐसा कार्य जिसे करने के लिए उसकी अपनी अन्तरात्मा सहमत नहीं है लेकिन उसे करना पड़ता है क्योंकि उसे उसी व्यवस्था में रहना है तथा अपने व अपने आश्रितों के लिए आजीविका कमानी है । 'दूर की कौड़ी' का कर्तव्यपरायण एवं ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर गोपाल दास गोखले एक ऐसा ही विवश सरकारी कर्मचारी है जिसे अजय अपनी दुर्गति का उत्तरदायी मानता है लेकिन गोखले की अपनी विवशता को उसके अलावा कोई नहीं समझ सकता ।

कुछ मिलती-जुलती स्थिति कभी-कभी कर्तव्यनिष्ठ एवं निष्कलंक न्यायाधीशों के साथ भी होती है क्योंकि उन्हें अपना निर्णय अपनी निजी जानकारी के स्थान पर उन तथ्यों व प्रमाणों के आधार पर देना होता है जो पुलिस एवं सरकारी वकील द्वारा उनके समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं । कई बार तो यह जानते हुए भी कि अभियुक्त के रूप में प्रस्तुत व्यक्ति वास्तव में अपराधी है, प्रमाणों के अभाव में उन्हें उसे छोड़ देना पड़ता है । इसके ठीक विपरीत कई बार आरोपित व्यक्ति की निर्दोषिता के विषय में व्यक्तिगत रूप से आश्वस्त होते हुए भी उन्हें उसे दंडित करना पड़ता है क्योंकि उसके विरूद्ध झूठे साक्ष्य उनके समक्ष प्रस्तुत कर दिए जाते हैं जिन्हें वे अनदेखा नहीं कर सकते । न्याय की देवी के नेत्रों पर पट्टी बंधी होती है, अतः वह सच व झूठ का निर्णय वास्तविकता को स्वयं देखकर नहीं कर सकती । 'दूर की कौड़ी' के न्यायाधीश सुदर्शन चक्रवर्ती एक ऐसे ही न्यायाधीश हैं जिन्हें जब पता चलता है कि झूठे प्रमाणों के आधार पर उन्होंने एक निर्दोष को दंडित कर दिया था जिसके फलस्वरूप उसका संपूर्ण परिवार तबाह हो गया था तो उनकी अन्तरात्मा तड़प उठती है । और यही अपराध-बोध उन्हें उन शातिरों के हाथों का खिलौना बना देता है जो उनसे अनजाने में हो गई उस भूल का प्रतिशोध लेने की आग में जल रहे हैं ।

लेकिन क्या बिना सोचे-समझे प्रतिशोध लेने के लिए मैदान में उतर पड़ना ठीक है और क्या किसी की भूल (या अपराध) का प्रतिशोध किसी अन्य निर्दोष से लिया जाना उचित है ? ये वे प्रश्न हैं जो मैंने निर्भया कांड के संदर्भ में लिखे गए अपने लेख 'आँखों वाला न्याय चाहिए, अंधा प्रतिशोध नहीं' में उठाए थे । अन्याय का प्रतिशोध अन्यायी से लिया जाए तो ठीक हो सकता है, किसी निर्दोष से लिया तो वह मूल पाप के समान एक दूसरा पाप ही तो हुआ । प्रतिशोध न्याय का पर्यायवाची नहीं है । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था - 'आँख के बदले आँख के नियम को लागू करने पर संपूर्ण विश्व ही अंधा हो जाएगा' । 'दूर की कौड़ी' भी अप्रत्यक्ष रूप से इसी बात का समर्थन करती है कि प्रतिशोध के आकांक्षी को प्रतिशोध के मार्ग पर उतरने से पूर्व इतना अवश्य सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि जिससे प्रतिशोध लिया जा रहा है, वह वास्तव में दोषी था या नहीं एवं जिस ढंग से वह प्रतिशोध लेने जा रहा है, वह अपने आप मेंं कितना उचित है ।

'दूर की कौड़ी' के कथानक की प्रेरणा शर्मा जी ने कहाँ से ली थी, वे ही जानते होंगे लेकिन उपन्यास अत्यंत प्रभावशाली है । अच्छा-ख़ासा कलेवर होते हुए भी इसमें फालतू बातें न के बराबर हैं तथा प्रत्येक घटना एवं संवाद सार्थक व मुख्य कथानक से जुड़ा हुआ है । किसी कलाकार या लेखक के लिए दीवानी हो जाने वाली कम आयु की अपरिपक्व लड़कियां किस प्रकार अपने जीवन का महत्वपूर्ण निर्णय करते समय भूल कर बैठती हैं, यह बहुत अच्छे ढंग से बताया गया है । बिना सोचे-समझे अपने माता-पिता को ग़लत समझ लेना और उनसे बग़ावत कर देना किस तरह ऐसी लड़कियों को मुश्किल में डाल सकता है, इसे इस उपन्यास को पढ़कर समझा जा सकता है । उपन्यास का सकारात्मक अंत यह भी बताता है कि दूर की कौड़ी लाने वाले अपने आपको बुद्धिमान समझें, यह तो ठीक है लेकिन यदि वे दूसरों को मूर्ख समझने लगते हैं तो एक दिन अपने ही जाल में फँस जाते हैं ।

चेहरे पर मेकअप करके या फ़ेसमास्क लगाकर दूसरी शक्ल बना लेने के प्रसंग कहानी की विश्वसनीयता को घटाते हैं लेकिन यह कमी तो वेद प्रकाश शर्मा के अधिकांश उपन्यासों में मिलती है ।

सरल हिन्दी में लिखा गया तथा रोचक घटनाओं व प्रभावी संवादों से भरपूर यह उपन्यास हिन्दी के पाठकों के लिए किसी दावत से कम नहीं है । दिमाग़ के खेल में जिन्हें दिलचस्पी हो, वे 'दूर की कौड़ी' को ज़रूर पढ़ें ।

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