Thursday, August 25, 2016

शर्तों पर प्रेम ?

सलमान ख़ान को प्रमुख भूमिका में प्रस्तुत करती हुई फ़िल्म 'सुल्तान' की मैंने बहुत प्रशंसा सुनी और पढ़ी थी लेकिन इसे देखने का अवसर कुछ विलंब से ही मिल पाया जब इसे मेरे नियोक्ता संगठन भेल के क्लब में प्रदर्शित किया गया । कहानी के प्रस्तुतीकरण के उद्देश्य की पूर्ति हेतु फ़िल्म के लेखक एवं निर्देशक द्वारा ली गई अनेक छूटों के बावजूद यह फ़िल्म जिस प्रकार सामान्य दर्शकों एवं स्थापित समीक्षकों को अच्छी लगी थी, उसी प्रकार मुझे भी अच्छी लगी । जीवन में पराजित एवं निराश हो चुके नितांत एकाकी एवं अवसादग्रस्त व्यक्तियों के लिए बड़ा प्रेरणास्पद संदेश है इस फ़िल्म में - किसी और से नहीं, अपने से जीतो; किसी और के लिए नहीं, अपने लिए जीतो; किसी और की दृष्टि में उठने से पूर्व अपनी दृष्टि में उठो । यह फ़िल्म सहज ही अनेक स्थलों पर मेरे हृदय को स्पर्श कर गई, अपने संदेश को मेरे हृदय-तल की गहनता में ले जाकर सदा के लिए स्थापित कर गई ।
लेकिन इस अत्यंत प्रभावशाली तथा किसी भी फ़िल्म की गुणवत्ता के मूल्यांकन के सभी मानकों पर खरी उतरने वाली इस फ़िल्म में एक ऐसी बात मैंने पकड़ी जो संभवतः किसी भी और समीक्षक ने या तो पकड़ी नहीं या पकड़कर भी उसे महत्व नहीं दिया । इस फ़िल्म में नायक को नायिका से सच्चे मन से प्रेम करते हुए दिखाया गया है जो नायिका का हृदय जीतने के लिए ही अपने निरर्थक तथा संसार की दृष्टि में हास्यास्पद जीवन को एक दिशा, एक सार्थकता प्रदान करने का निर्णय लेता है । इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु वह नायिका की ही भाँति एक पहलवान बनता है एवं कुश्ती के खेल में सफल हो चुकने के उपरांत नायिका की सहमति से उसे जीवन-संगिनी के रूप में प्राप्त करता है । उसके जीवन में दुखद मोड़ तब आता है जब अपनी गर्भवती पत्नी के मना करने पर भी वह विश्व चैम्पियनशिप में भाग लेने के लिए जाता है एवं उसकी अनुपस्थिति में नायिका के गर्भ से उत्पन्न उसकी संतान रक्ताल्पता के कारण बच नहीं पाती । नायिका नवजात शिशु के न बच पाने के लिए नायक को दोषी ठहरा कर उसे छोड़ देती है तथा वह पूर्णतः एकाकी एवं अवसादग्रस्त हो जाता है । चूंकि उसकी संतान अपने समूह का रक्त न मिल पाने के कारण नहीं बच सकी थी, अब उसकी एकमात्र अभिलाषा अपने आवासीय क्षेत्र में एक रक्त-बैंक स्थापित करने की है जिसे वह अपने कथित पाप के प्रायश्चित्त के रूप में देखता है । किन्तु कुश्ती छोड़ देने के कारण उसके पास आय का कोई समुचित साधन नहीं रहता तथा उसका लक्ष्य उससे आकाश-कुसुम की भाँति तब तक दूर रहता है जब तक वह इसी उद्देश्य के निमित्त पुनः कुश्ती से नाता जोड़कर एक पेशेवर प्रतिस्पर्द्धा में भाग नहीं लेता । अंत में उसे ठुकरा चुकी नायिका पुनः उसका हाथ थाम लेती है एवं उनके सुखी गृहस्थ-जीवन का नवीन आरंभ होता है ।

फ़िल्म देखकर मेरे मन में जो प्रश्न उठा, वह यह था कि नायक को तो नायिका से प्रेम था लेकिन नायिका को किससे प्रेम था - नायक के व्यक्तित्व एवं उसमें निहित एक सच्चे प्रेमी से या फिर नायक की भौतिक सफलता से ? नायक के सफल होने तक तो नायिका न केवल उसके प्रेम को ठुकराती है, वरन उसे यथोचित सम्मान भी नहीं देती लेकिन जैसे ही वह भौतिक सफलता के सांसारिक मानदंड पर खरा उतरकर दिखा देता है, वैसे ही नायिका उसके प्रणय-निवेदन को स्वीकार कर लेती है (यह स्वीकृति भी फ़िल्म में नायिका द्वारा यूं करते हुए दिखाया गया है मानो वह नायक पर कोई उपकार कर रही हो) । अर्थात् नायिका की न तो एक नारी के रूप में नायक रूपी पुरुष के प्रति कोई भावनाएं हैं और न ही वह एक पुरुष के रूप में अपने प्रति उसकी भावनाओं को कोई महत्व देती है । उसके लिए महत्वपूर्ण है तो केवल नायक की भौतिक सफलता । लेकिन यह प्रेम तो नहीं । यह तो सांसारिकता है । सारा संसार ही सफलता की पूजा करता है । ऐसे में नायिका ने ही क्या अलग किया ?

नायिका का फ़िल्म में सदा यही दृष्टिकोण दिखाया गया है कि नायक उसकी इच्छानुरूप ही चले, अपनी इच्छानुरूप नहीं । उसे कहीं पर भी स्वयं की किसी भूल को अनुभव करते या स्वीकार करते हुए नहीं बताया गया है । वह ओलंपिक से पूर्व गर्भवती हो जाती है तो ओलंपिक में भाग न लेकर एवं नायक की प्रसन्नता के लिए संतान को जन्म देने का निर्णय लेकर अपने इस निर्णय को नायक के प्रति त्याग (या उस पर किए गए उपकार) के रूप में प्रदर्शित करती है लेकिन जब उसे ओलंपिक में भाग लेना था तो संभावित गर्भधारण को रोकने के लिए वह स्वयं भी तो सचेत रह सकती थी (जैसा कि उसके पिता भी अनुभव करते हैं) । लेकिन अपने इस कथित त्याग का उसे प्रतिदान इस रूप में चाहिए कि जब उसके प्रसव का समय निकट आए तो नायक भी त्याग करते हुए विश्व कुश्ती प्रतियोगिता में भाग न ले । क्या प्रेम और त्याग व्यापार के सिद्धांतों पर किए जाते हैं ? नायक विश्व कुश्ती प्रतियोगिता में न जाकर उसके प्रसव के समय में उसके निकट रहकर क्या कोई महान कार्य करता ? नायक उसी के प्रेम के लिए पहलवान बना था और उसकी सभी सफलताओं से वह प्रसन्न थी लेकिन अब वह चाहती है कि वह उसी की इच्छा का मान रखने के लिए विश्व चैम्पियनशिप में भाग न ले । भौतिक सफलता प्राप्त करने के उपरांत फ़िल्म के नायक-नायिका पर्याप्त धनी एवं साधन-सम्पन्न हो चुके दिखाए गए हैं, ऐसे में नवजात शिशु से जुड़ी सभी संभावनाओं एवं आवश्यकताओं का ध्यान नायक की अनुपस्थिति में भी रखा जा सकता था (नायिका के पिता वहीं पर थे) । उसकी संतान रक्ताल्पता के कारण जी नहीं सकी, इसके लिए वह नायक को उत्तरदायी ठहराकर उसे छोड़ देती है । अंत में नायक के पास लौटकर भी वह अपने इस कार्य को यह कहकर न्यायोचित ही ठहराती है कि संतान के लिए माता का दर्द पिता से अधिक होता है । मुझे उसकी यह बात सत्य होते हुए भी अपनी भूल को न मानने एवं नायक को त्यागने को न्यायोचित सिद्ध करने का कुतर्क ही लगी । नायक उसके प्रति अपने प्रेम के कारण ही नियमित रूप से दरगाह जाता रहता है जहाँ वह आती है ताकि वह उसे देख सके । अंत में नायिका उसे बताती है कि वह भी इसीलिए नियमित रूप से दरगाह जाती थी ताकि वह उसे देख सके । यदि ऐसा ही था तो पूरे आठ वर्षों तक नायक के प्रेम को अपने नयनों से देखने के उपरांत भी उसका हृदय पिघला क्यों नहीं ? क्या पत्थरदिल होना ही नारी-शक्ति का प्रतीक है ? वह नायक के रक्त-बैंक स्थापित करने के पावन लक्ष्य को भी कहीं कोई महत्व देती हुई दिखाई नहीं देती । अंत में नायक के पास वह लौटती भी है तो तब जब वह सभी विपरीत परिस्थितियों के मुँह मोड़ता हुआ शक्तिशाली प्रतिस्पर्द्धियों को परास्त करते हुए पेशेवर प्रतियोगिता को जीतने के निकट पहुँचता है । यानी नायक के पास सफलता लौटी तो नायिका भी लौट आई और जब वह असफल और एकाकी था तो नायिका ने भी मुँह मोड़ रखा था । इससे यही सिद्ध हुआ कि नायिका को प्रेम नायक से नहीं उसकी सफलता से रहा ।

फ़िल्म में नायिका की भूमिका अनुष्का शर्मा ने निभाई है । उन्होंने ठीक ऐसी ही भूमिका कुछ वर्षों पूर्व आई फ़िल्म 'बैंड बाजा बारात' में भी निभाई थी । उस फ़िल्म को भी भारी व्यावसायिक सफलता मिली थी एवं उसका गुणगान विभिन्न लेखों में कुछ इस प्रकार किया गया था मानो वह कोई महान फ़िल्म हो । 'बैंड बाजा बारात' में भी उनके नायक (रणवीर सिंह) ने केवल उनके निकट रहने तथा उनका हृदय जीतने के लिए ही उनके साथ वैवाहिक प्रबंधक (वेडिंग प्लानर)  बनने के व्यवसाय में उनके साथ कदम रखा था एवं उसके बाद पग-पग पर उनका साथ निभाया था । उस व्यवसाय को छोटे पैमाने से उठाकर बड़े पैमाने पर ले जाने में भी नायक की ही प्रेरणा एवं विश्वास की मुख्य भूमिका रही थी । उस फ़िल्म में भी नायिका अपने सिद्धांतों एवं व्यवहार को नायक पर थोपती ही रही थी । वैसे तो मैं नहीं मानता कि कोई भी नारी अपने को प्रेम करने वाले पुरुष के निकट संपर्क में रहते हुए उसकी भावनाओं से अनभिज्ञ रह सकती है लेकिन यदि नायिका नायक की भावनाओं से अनभिज्ञ रही भी तो जब उसे उसके प्रति स्वयं अपनी भावनाओं का पता चला, तब तो उसका दृष्टिकोण बदल सकता था । उसने नायक से कहा था कि 'जिसके साथ व्यापार करो, उससे कभी न प्यार करो' के सिद्धान्त पर अमल करे एवं उसके निकट आने का प्रयास न करे और नायक ने उसकी यह बात उसके प्रति अपनी भावनाओं को अपने मन में ही दबाकर मानी । लेकिन जब वह स्वयं नायक से प्रेम कर बैठी तो अब वह चाहती थी कि नायक उस कथित सिद्धान्त का उल्लंघन करके उसके प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करे । अर्थात् नायक किसी सामान्य पुरुष की भांति नहीं, उसके हाथों की कठपुतली की भाँति व्यवहार करे । और जब नायक ऐसा नहीं कर पाता (या उसके एकतरफ़ा नज़रिए को ठीक से नहीं समझ पाता) तो वह नायक को अपने व्यवसाय तथा कार्यालय से अपमानित करके निकाल देती है । यह प्रेम है या कृतघ्नता ? फिर भी अंत में उनका पुनर्मिलन दिखाया गया है । मैं नहीं समझ सका कि अपने प्रति ऐसा अपमानजनक एवं कृतघ्नतापूर्ण व्यवहार करने वाली तथा अपनी भावनाओं को कभी भी सम्मान न देने वाली ऐसी नायिका के साथ नायक कैसे प्रेमपूर्वक जीवन बिता सकेगा विशेष रूप से तब जबकि नायिका को अपने किए का कोई पछतावा भी नहीं है ?

स्त्री-पुरुष समानता में मेरा दृढ़ विश्वास है लेकिन यह समानता सबसे अधिक प्रेम के क्षेत्र में होती है क्योंकि सच्चा प्रेम लिंग-भेद से ऊपर होता है । मुझे 'बैंड बाजा बारात' तथा 'सुल्तान' जैसी फ़िल्मों में यह देखकर दुख हुआ कि नारी-उत्थान एवं नारी-शक्ति के नाम पर नारी के एकांगी दृष्टिकोण तथा पुरुष के प्रति अवहेलनापूर्ण व्यवहार को स्थापित किया गया है एवं उसे न्यायोचित ठहराया गया है । हिन्दी फ़िल्मों में ऐसा पहली बार १९९९ में प्रदर्शित 'हम आपके दिल में रहते हैं' नामक फ़िल्म में किया गया था । ऐसा लगता है कि जिस प्रकार कुछ दशकों पूर्व तक की भारतीय फ़िल्में पुरुष-प्रधान दृष्टिकोण के आधार पर बनाई जाती थीं जिनमें नारी को नीचा दिखाते हुए पुरुष दर्शकों के अहं को संतुष्ट किया जाता था, उसी प्रकार आजकल की भारतीय फ़िल्में नारी-प्रधान दृष्टिकोण से बनाई जाती हैं जिनमें पुरुष को नीचा दिखाते हुए (कथित आधुनिक) स्त्री दर्शकों के अहं को संतुष्ट करने का लक्ष्य साधा जाता है । लेकिन नर-नारी का पारस्परिक प्रेम तो दोनों में से किसी को भी नीचा दिखाने में निहित नहीं । सच्चा प्रेम दूसरे के दृष्टिकोण को समझने में है, अपने दृष्टिकोण को दूसरे पर आरोपित करने में नहीं । किसी से सच्चा प्रेम वह करता (या करती) है जो विभिन्न बातों को अपने प्रियतम के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करता (या करती) है । अपने प्रिय के दृष्टिकोण एवं भावनात्मक आवश्यकता को समझना एवं तदनुरूप अपने आचरण को निर्धारित करना ही निस्वार्थ प्रेम है । 'सुल्तान' फ़िल्म में नायिका का यह दृष्टिकोण केवल एक दृश्य में दिखाई देता है जब उसे अपने गर्भवती होने का पता चलता है एवं वह नायक के पिता बनने की प्रसन्नता को अपने ओलंपिक में भाग लेने एवं पदक जीतने के लक्ष्य पर वरीयता देती है ।

'सुल्तान' फ़िल्म के आरंभिक भाग में में जब नायिका नायक को उसके किसी भी योग्य न होने का ताना देती है एवं कहती है कि स्त्री उस पुरुष से कैसे प्रेम कर सकती है जिसे वह सम्मान न दे सके तो मुझे महान साहित्यकार एवं स्वतन्त्रता सेनानी यशपाल जी के कालजयी उपन्यास 'झूठा-सच' की याद आ गई जिसमें यही बात कुछ भिन्न शब्दों में कही गई है - 'स्त्री सदैव पुरुष को अपने से बेहतर ही देखना चाहती है, वह उसी को अपना हृदय अर्पित करना सार्थक समझती है जो उसे अपने से बेहतर लगे' । मैं यशपाल जी के दृष्टिकोण से सहमत हूँ लेकिन मेरा प्रश्न यही है कि सम्मान किसका होना चाहिए - पुरुष के गुणों तथा स्त्री के प्रति उसकी भावनाओं का या फिर पुरुष की भौतिक सफलता का ? यदि स्त्री के लिए पुरुष की भौतिक सफलता ही सम्मान-योग्य है, पुरुष के वास्तविक गुण तथा उसका सच्चा प्रेम नहीं तो फिर स्त्री की स्वीकृति एवं समर्पण न तो सम्मान है और न ही प्रेम । वह तो सौदा है । और प्यार में सौदा नहीं होता । प्यार तो प्रिय को उसके गुण-दोषों के साथ यथावत् स्वीकार करने में है, उसे बलपूर्वक परिवर्तित करने में नहीं । न तो प्रेम शर्तों पर किया जा सकता है और न ही किसी को सम्मान देने के लिए उसकी भौतिक सफलता को शर्त बनाया जाना उचित है । मैंने 'आशिक़ी २' नामक अत्यंत प्रभावशाली फ़िल्म देखकर अनुभव किया था कि हृदय के तल से किया गया वास्तविक प्रेम भी स्वार्थी हो सकता है यदि वह प्रेयस या प्रेयसी की वास्तविक इच्छाओं एवं भावनाओं को समझे बिना उस पर अपनी आकांक्षाओं को आरोपित करते हुए किया जाए । उस फ़िल्म में नायक द्वारा नायिका को अपने से मुक्ति देने हेतु किया गया आत्मघात भी वस्तुतः उसकी स्वार्थपरता ही है क्योंकि ऐसा वह नायिका की वास्तविक भावनाओं एवं प्रसन्नता के स्रोत को समझे बिना अपने एकांगी दृष्टिकोण के आधार पर करता है । आवश्यक तो नहीं कि जिसे आप अपने प्रिय के लिए ठीक समझते हों, आपका प्रिय भी उसी को अपने लिए ठीक समझे । उसकी वास्तविक प्रसन्नता किसी और बात में भी हो सकती है । और आपके प्रेम की सत्यता की कसौटी यही है कि आप उस तथ्य को जानने एवं आत्मसात् करने का प्रयास करें ।

निजी अनुभव से मैं जानता हूँ कि सम्मान प्रेम से पहले आता है और बात चाहे पुरुष की हो या नारी की, प्रेम उसी से किया जा सकता है जिसे आप अपने हृदय में सम्मान भी देते हों । लेकिन प्रेम एवं सम्मान जैसी उदात्त भावनाएं सांसारिक सफलता पर निर्भर नहीं होनीं चाहिए । प्रेम एवं सम्मान की अर्हता स्थापित करने के लिए यह मानदंड उचित नहीं है क्योंकि सांसारिक दृष्टि से असफल व्यक्ति भी वस्तुतः गुणी हो सकता है एवं अवगुणी व्यक्ति भी भौतिक रूप से अत्यंत सफल हो सकता है । मूल्य प्रेमी के मन में अपने प्रति विद्यमान भावनाओं का होना चाहिए, न कि उसकी भौतिक उपलब्धियों का । व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रेम का पर्यायवाची नहीं हो सकता क्योंकि प्रेम हृदय करता है, मस्तिष्क नहीं । जो सशर्त है, वह और कुछ भी हो सकता है लेकिन प्रेम नहीं । मैं 'सुल्तान' फ़िल्म के नायक के स्थान पर होता तो फ़िल्म के अंत में अपने पास लौटने वाली नायिका को फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' में स्वर्गीय मुकेश जी द्वारा गाया गया अमर गीत सुनाते हुए कहता - 'कोई शर्त होती नहीं प्यार में मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया . . . ।'

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Friday, August 19, 2016

स्वप्नद्रष्टा को नमन

आज राजीव गाँधी का ७३ वां जन्मदिवस है । वे इक्कीसवीं शताब्दी में अवतरित होने जा रहे उन्नत प्रौद्योगिकी सम्पन्न आधुनिक भारत के स्वप्नद्रष्टा थे । इस अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मैं उनके जीवन एवं व्यक्तित्व का आकलन अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

गाँधीवादी सांसद फ़िरोज़ तथा लौह-महिला इन्दिरा के इस ज्येष्ठ पुत्र ने माता और पिता दोनों ही के सद्गुण अपने व्यक्तित्व में पाए किन्तु राजनीति में कभी रुचि नहीं ली और विमान-चालक बनकर ही प्रसन्न रहे । राजनीति का क्षेत्र अपने अनुज संजय के लिए छोड़कर वे प्रेमिका से अर्द्धांगिनी बन चुकीं सोनिया तथा दोनों के उत्कट और पवित्र प्रेम के प्रतीक दो नौनिहालों के साथ एक शांत और सुखी गृहस्थ जीवन बिताते रहे । लेकिन जैसा कि कहते हैं - मेरे मन कछु और है, विधना के कछु और; विधि के विधान ने उनके जीवन को एक अप्रत्याशित मोड़ दे दिया जब संजय की अकाल-मृत्यु हो गई एवं तदोपरांत राष्ट्रीय राजनीति में एकाकी अनुभव कर रहीं अपनी माता का संबल बनने के लिए उन्हें अनिच्छा से राजनीति में प्रवेश करना पड़ा । अपने भ्राता संजय के संसदीय क्षेत्र अमेठी को ही उन्होंने भी अपनी राजनीतिक कर्मभूमि चुना पर तीन वर्ष से अधिक समय तक वे सुर्खियों से दूर ही रहते हुए भारतीय राजनीति की बारीकियाँ समझते रहे । लेकिन ३१ अक्टूबर, १९८४ को  उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक क्षण आ पहुँचा, फ़ैसले की घड़ी आ गई । उनकी माता और भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी की हत्या ने उनकी नियति को सुनिश्चित कर दिया । तत्कालीन वित्त-मंत्री प्रणब मुखर्जी की आपत्तियों एवं चालों को अनदेखा करते हुए उनके परिवार के प्रति निष्ठावान ज्ञानी ज़ैल सिंह ने भारत के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में अपने आपातकालीन संवैधानिक अधिकार का उपयोग करते हुए उन्हें उसी दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी । इस तरह चालीस वर्ष की आयु में वे भारत के ही नहीं वरन विश्व के सर्वाधिक युवा शासन-प्रमुख बने ।


अनुभवहीन एवं राजनीतिक दृष्टि से अपरिपक्व राजीव गाँधी ने पूर्ववर्ती मंत्रिपरिषद् को ही यथावत् रखा एवं इन्दिरा गाँधी की मृत्यु से उत्पन्न समुदाय-विशेष को लक्ष्य करती हुई हिंसा की लहर से निपटने का दायित्व तत्कालीन गृह मंत्री पी॰वी॰ नरसिंह राव पर डाल दिया जिसके निर्वहन में वे सर्वथा असफल रहे क्योंकि हिंसक दंगे सहस्रों निर्दोष जीवनों को लील गए । ऐसे में उनकी अपरिपक्व प्रतिक्रिया -'जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है' मैंने दूरदर्शन पर उनके मुख से सुनी और आज बत्तीस वर्षों के उपरांत मैं पाता हूँ कि अंजाने में मुखर हुई उनकी उस अपरिपक्व वाणी को आज भी उनके राजनीतिक विरोधी उनके विरुद्ध उद्धृत करते हैं । उन्हें और उनके राजनीतिक दल को देश का एक प्रमुख समुदाय कभी क्षमा नहीं कर सका किन्तु उनकी माता की लोकप्रियता से उद्भूत सहानुभूति लहर ने उन्हें अभूतपूर्व चुनावी सफलता दिलाई । तीन चौथाई से अधिक बहुमत पाकर वे पुनः भारत के प्रधानमंत्री बने एवं नव-संकल्प, नव-उत्साह, नव-दृष्टिकोण के साथ देश की बागडोर संभाली । इस अवसर पर हिन्दी के मूर्धन्य कवि डॉ॰ हरिराम आचार्य जी ने उनका मार्गदर्शन करने वाली एक प्रेरक कविता लिखी जिसकी कतिपय पंक्तियाँ थीं :

ये हार इसलिए तुझको पिन्हाये हैं हमने
कि तुझे ध्यान रहे रास्ते के शूलों का
नये सिरे से तेरा इसलिए है अभिनंदन
तुझे खयाल रहे अब तलक की भूलों का

राजीव गाँधी ने अपनी भूलों से कुछ सबक सीखे, कुछ नहीं सीखे लेकिन उनके हृदय में राष्ट्र को प्रगति-पथ पर ले जाने की जो उदात्त एवं निश्छल भावना थी, वही उनकी पथ-प्रदर्शक बनी । दंगों के दौरान अपने कर्तव्य-निर्वहन में विफल रहे पी॰वी॰ नरसिंह राव के स्थान पर शंकरराव चव्हाण को गृह मंत्री बनाकर उन्होंने नरसिंह राव को मानव-संसाधन विभाग में भेज दिया जबकि अति-महत्वाकांक्षी प्रणब मुखर्जी को सीधे मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाकर स्वच्छ छवि वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह को वित्त मंत्री बनाया । अब राजीव गाँधी जनता और नौकरशाही दोनों के समक्ष एक स्वप्नद्रष्टा के रूप में आए एवं यह सिद्ध करने में लग गए कि युवा नेता के व्यक्तित्व ही नहीं, विचारों एवं कार्यशैली में भी यौवन का उत्साह और सुगंध थी ।

स्त्री-पुरुष समानता एवं साथ ही प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विकेन्द्रीकरण एवं स्थानीय प्रशासन में जनसहभागिता में अटूट विश्वास करने वाले राजीव गाँधी ने पंचायती राज की अवधारणा को प्रस्तुत किया जिसके आधार पर कुछ वर्षों के उपरांत (उनके देहावसान के उपरांत) संविधान का ७३ वां संशोधन पारित हुआ एवं पंचायती राज की अवधारणा को प्रसृत किए जाने के साथ-साथ उसमें आधी जनसंख्या के यथेष्ट प्रतिनिधित्व के निमित्त महिला प्रतिनिधियों हेतु ३३ प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया । उनके अपने ही दल द्वारा पोषित दलबदल के नासूर को मिटाने हेतु उन्होंने दलबदल विरोधी विधान पारित करवाकर उसे संविधान की १०वीं अनुसूची में सम्मिलित करवाया । वे स्वच्छ राजनीति में विश्वास रखते थे एवं सत्ता के कारण अपने दल में आई विकृतियों को दूर करना चाहते थे । इसलिए दिसंबर १९८५ में बंबई में आयोजित कांग्रेस के शताब्दी अधिवेशन में उन्होंने दल एवं सरकार को सत्ता के दलालों से मुक्त करने का आह्वान किया तथा प्रशासनिक भ्रष्टाचार को साहसिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि सरकार द्वारा जनकल्याण हेतु भेजे गए एक रुपये में से केवल पंद्रह पैसे ही वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँच पाते हैं (बाकी पिच्चासी पैसे भ्रष्टाचारियों की ज़ेबों में चले जाते हैं) । उन्होंने उद्योगपतियों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रष्टाचार तथा निर्भय होकर कर-वंचन करने वालों पर अंकुश लगाने के लिए अपने वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने की खुली छूट दी जिसका लाभ उठाकर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने न केवल व्यवसाय एवं उद्योग जगत की बड़ी मछलियों पर जाल फेंका वरन अपनी निजी छवि को भी चमकाया और अंततः सार्वजनिक जीवन में शुचिता के प्रबल पक्षधर राजीव गाँधी को ही भ्रष्टाचार के आरोप में लपेटकर जनता-जनार्दन की दृष्टि से पतित कर दिया । यह राजीव गाँधी की सरलता तथा विश्वासी स्वभाव (जो कि उन्हें अपनी माता से मिला था) का ही परिणाम था जो विश्वनाथ प्रताप सिंह इस भाँति उनकी पीठ में छुरा भोंक सके ।

राजीव गाँधी जब प्रधानमंत्री बने तो पंजाब, असम एवं मिज़ोरम जैसे राज्य हिंसक आंदोलन की अग्नि में झुलस रहे थे । राजीव गाँधी ने इन राज्यों में शांति-स्थापना को सत्ता पर प्राथमिकता देते हुए आंदोलनकारी समूहों के साथ समझौते किए एवं उन्हें चुनाव लड़कर मुख्यधारा में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया । मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की वार्ता करने की प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें पंजाब का राज्यपाल बनाकर राजीव गाँधी ने भारतीय राजनीति के सभी विशेषज्ञों को चौंका दिया । अर्जुन सिंह ने स्वयं को सौंपे गए अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील दायित्व का भलीभाँति निर्वहन करते हुए अकाली दल के वरिष्ठ नेता सरदार हरचरण सिंह लोंगोवाल के साथ केंद्रीय सरकार का समझौता करवाया जिसमें पंजाब में दीर्घकाल से चल रहे आंदोलन से जुड़े सभी महत्वपूर्ण विवादों का समाधान निकालने का प्रयास किया गया । इसी ढंग से असम के आंदोलनकारी छात्र-नेताओं के साथ असम समझौता एवं मिज़ोरम में हिंसक आंदोलन कर रहे मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ो समझौता किया गया । ये समझौते राजीव गाँधी द्वारा जनहित में उठाया गया ऐसा कदम था जिसमें उनके दल के सत्ता गंवा देने का पूरा-पूरा जोखिम था । लेकिन राजीव गाँधी ने जानते-बूझते राष्ट्र और इन राज्यों के जनसमुदाय के हित में यह राजनीतिक जोखिम लिया और सिद्ध किया कि वे सत्तालोभी नहीं थे वरन जनहित को सर्वोपरि मानने वाले राष्ट्र के सच्चे सेवक थे । समझौतों के उपरांत हुए विधानसभा चुनावों में तीनों ही राज्यों में कांग्रेस सत्ताच्युत हो गई । पंजाब में अकाली दल ने सरकार बनाई तथा सुरजीत सिंह बरनाला मुख्यमंत्री बने । असम में असम गण परिषद ने सरकार बनाई एवं बत्तीस वर्षीय प्रफुल्ल कुमार महंत देश के सर्वाधिक युवा मुख्यमंत्री बने । मिज़ोरम में मिज़ो नेशनल फ्रंट ने सरकार बनाई एवं उसके नेता लालदेंगा मुख्यमंत्री बने । लेकिन सत्ता गंवाकर भी राजीव गाँधी को अशांत राज्यों में शांति-स्थापना करने एवं सामान्य स्थिति को लौटाने का सार्थक प्रयास करने का आत्मिक संतोष प्राप्त हुआ । आज लोकप्रिय-से लोकप्रिय-राजनेता से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह सत्ता गंवाने का जोखिम लेकर जनहित में कोई कार्य करेगा । ऐसा साहस एवं नैतिक बल अब किसी भारतीय राजनेता में नहीं है । लेकिन राजीव गाँधी ने ऐसा किया और इसीलिए वे असाधारण थे । उनके मन में राजनीतिक दावपेंचों के स्थान पर मूलभूत ईमानदारी और निश्छलता थी जो कि भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ वस्तु ही है ।

लेकिन देश के साथ-साथ पड़ोसी देश की भी शांति-स्थापना में सहायता करने के चक्कर में अपनी अनुभवहीनता और अति-सरलता के चलते राजीव गाँधी से गंभीर राजनीतिक भूल हुई । वे श्रीलंका के प्रजातीय समीकरणों को बिसरा कर वहाँ के तत्कालीन राष्ट्रपति जे.आर. जयवर्धने के कूटनीतिक जाल में फंस गए तथा अपने सम्मान के लिए संघर्षरत तमिल विद्रोहियों के संगठन लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑव तमिल ईलम) से लड़ने के लिए भारतीय शांति सेना को वहाँ भेज बैठे । उनकी इस भूल के कारण न केवल राष्ट्र को भारी धनराशि तथा अनेक सैनिकों की आहुति उस व्यर्थ के हवन में देनी पड़ी वरन वे स्वयं भी लिट्टे की दृष्टि में खलनायक बन गए जिसके कारण लिट्टे द्वारा रचे गए एक वृहत् षड्यंत्र का शिकार होकर उन्हें अपनी इस भूल का मूल्य २१ मई, १९९१ को श्रीपेरुम्बुदूर में अपने प्राणों के रूप में चुकाना पड़ा ।

अपने मन में सत्तामोह से रहित तथा निस्वार्थ होते हुए भी संभवतः अपने इर्द-गिर्द उपस्थित गुट की ग़लत सलाहों के असर में राजीव गाँधी ने और भी कई ग़लतियां कीं जिसने आगे चलकर उनके दल को सत्ता की सियासत में भारी नुकसान पहुँचाया । ऐसा कहा जाता है कि माखनलाल फ़ोतेदार, कैप्टन सतीश शर्मा, गोपी अरोड़ा, अर्जुन सिंह आदि उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता तथा अनुभवहीनता का लाभ उठाकर उन्हें अनुचित परामर्श देते थे । बहरहाल चाहे जिस कारण से भी सही, राजीव गाँधी ने कई ग़लत कदम उठाए । उन्होंने एक ओर तो रामजन्मभूमि मंदिर का ताला खुलवा दिया और दूसरी ओर चर्चित शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियमपारित करवा दिया । इससे न केवल उत्तर प्रदेश और बिहार में हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों ही समुदाय कांग्रेस दल से दूर हो गए वरन आरिफ़ मोहम्मद ख़ान जैसे प्रगतिशील विचारों वाले युवा मुस्लिम नेता का साथ भी उनसे छूट गया । दलित समुदाय को तो पहले ही कांशीराम बरगला कर अपने साथ ले जा चुके थे जिसका राजीव गाँधी को समय रहते भान तक नहीं हुआ था । परिणाम यह हुआ कि देश के दो सबसे बड़े एवं राष्ट्रीय राजनीति के दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में उनका दल अपनी राजनीतिक भूमि खो बैठा ।

राजीव गाँधी ने एक ओर तो मुफ़्ती मोहम्मद सईद जैसे ज़मीन से जुड़े काश्मीरी नेता को अपने मंत्रिमंडल में लेकर काश्मीर से दूर कर दिया, दूसरी ओर फ़ारूक अब्दुल्ला जैसे मौकापरस्त और ग़ैर-जिम्मेदार नेता के नेतृत्व में कांग्रेस को काश्मीर की सत्ता में साझीदार बना दिया । इससे मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने रुष्ट होकर पहले मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया और अंततः कांग्रेस पार्टी ही छोड़ दी जिससे कांग्रेस के अपने बलबूते पर जम्मू-काश्मीर की सत्ता में आने की संभावनाएं लगभग समाप्त हो गईं । दूसरी ओर फ़ारूक अब्दुल्ला की नाकामियों का ठीकरा कांग्रेस के सर पर भी फूटा ।

राजीव गाँधी ने देश के संवैधानिक प्रमुख ज्ञानी ज़ैल सिंह के साथ मधुर संबंध बनाकर नहीं रखे और कमलकान्त तिवारी जैसे विवेकहीन मंत्री को उनके विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करने की खुली छूट दे दी जबकि उनके प्रधानमंत्री बनने का मुख्य श्रेय ज्ञानी जी को ही जाता था । आख़िर ज्ञानी जी ने अपनी ताक़त दिखाते हुए सेवानिवृत्त होने से केवल एक दिन पहले राष्ट्राध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने की धमकी देकर राजीव गाँधी को कमलकांत तिवारी को मंत्रिपरिषद से बाहर करने पर मजबूर कर दिया । इससे राजीव गाँधी की सार्वजनिक छवि पर विपरीत प्रभाव ही पड़ा ।

लेकिन भूलें अपनी जगह हैं तथा योगदान अपनी जगह । सर्वगुणसंपन्न तो कोई भी नहीं होता । राजीव गाँधी भी मानव ही थे और मानव से भूलें होती ही हैं । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राष्ट्र के उन्नयन में उनके योगदान को अनदेखा कर दिया जाए । उनका सबसे बड़ा योगदान राष्ट्र के विकास में आधुनिक प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के रूप में रहा । वे सैम पित्रोदा के रूप में एक विशेषज्ञ को आगे लेकर आए और देश में दूरसंचार तथा सूचना प्रौद्योगिकी क्रान्ति का सूत्रपात किया । यह उनका स्वप्न था कि इक्कीसवीं शताब्दी का भारत कंप्यूटर से काम करने वाले, दूरसंचार के अत्याधुनिक साधनों से युक्त तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन करने वाले नागरिकों का भारत हो । उनके इस स्वप्न का उनके राजनीतिक विरोधी उपहास करते थे लेकिन आज हम देख सकते हैं कि उस स्वप्नद्रष्टा का स्वप्न साकार हो चुका है । हर हाथ में मोबाइल है, कंप्यूटर पर काम करना रोज़मर्रा की बात हो चुकी है, इंटरनेट के माध्यम से हम सारे संसार से जुड़ चुके हैं एवं सभी महत्वपूर्ण घटनाओं की अद्यतन जानकारी अविलंब हम तक पहुँचती हैं ।

अपनी स्वच्छ छवि तथा राजनीतिक ईमानदारी के चलते १९८५ में राजीव गाँधी को 'मिस्टर क्लीन' के नाम से पुकारा जाने लगा था । लेकिन इस 'मिस्टर क्लीन' पर बोफ़ोर्स तोप सौदे में दी गई कथित ६४ करोड़ रुपयों की दलाली की कालिख पोतने का काम उन्हीं विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया जिन्हें राजीव गाँधी ने बड़े विश्वास एवं आशाओं के साथ वित्त एवं रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे थे । आज जब हजारों करोड़ के घोटाले सामने आ चुके हैं और उनके आरोपी न्यायालय से दंड पा चुकने के उपरांत भी सीना तानकर चलते हैं तो ६४ करोड़ रुपये की मामूली राशि के लिए राजीव गाँधी के नाम को निराधार कलंकित किया जाना उनके प्रति घोर अन्याय ही है । विश्वनाथ प्रताप सिंह तो उन पर यह झूठा आरोप लगाकर एवं उन्हें बदनाम करके प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने में सफल रहे (कुर्सी को पाने के लिए राजीव गाँधी की पीठ में छुरा भोंकने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कुर्सी मिल जाने के उपरांत अपने पर अंधा विश्वास करने वाले देश के करोड़ों युवाओं के साथ भी विश्वासघात ही किया) लेकिन अपने देहावसान के ढाई दशक बाद भी राजीव गाँधी के माथे पर बिना किसी प्रमाण के यह झूठा कलंक आज तक लगाया जाता है । यह बात भी ग़ौरतलब है कि जिन बोफ़ोर्स तोपों की ख़रीद को मुद्दा बनाकर यह सारा नाटक किया गया, उन्हीं बोफ़ोर्स तोपों ने १९९९ में कारगिल के युद्ध में गरज-गरज कर दुश्मनों को मुँहतोड़ जवाब दिया ।

राजीव गाँधी के आकस्मिक निधन से उनके राजनीतिक दल को ही नहीं, भारतीय राजनीति तथा राष्ट्र को भी अपूरणीय क्षति पहुँची । उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस को अपना खोया हुआ जनाधार पाने में कभी सफलता नहीं मिली क्योंकि उसके पुनरुत्थान के लिए कोई मार्गदर्शक एवं प्रेरक नेता ही नहीं रहा । इन दोनों ही राज्यों की राजनीति सम्पूर्ण जनता के स्थान पर जाति विशेष एवं वर्ग विशेष पर केन्द्रित होकर रह गई क्योंकि विभाजक दृष्टिकोण वाले नेताओं की बन आई । दलित राजनीति का झण्डा कांशीराम-मायावती तथा रामविलास पासवान ने उठा लिया तो मण्डल आयोग के प्रतिवेदन पर आधारित पिछड़े वर्गों की राजनीति पर यादवी कब्ज़ा हो गया । जात-पांत तथा वर्ग-भेद के टुकड़ों में बंट चुकी इन दो वृहत् राज्यों की राजनीति से राष्ट्रीय दृष्टिकोण तथा समष्टि के हित-साधन की भावना तिरोहित हो गई । यह हानि केवल दल-विशेष की न होकर, सम्पूर्ण समाज एवं राष्ट्र की रही ।

आज जब हम स्मार्ट फ़ोन और इंटरनेट के माध्यम से संसार से प्रतिपल जुड़े रहते हैं, ज्ञानार्जन करते हैं तथा व्यवसाय के माध्यम से धनार्जन भी करते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी इस प्रगति का स्वप्न तीन दशक पूर्व हमारे युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने देखा था जो देश को कर्म और विचार दोनों ही से आधुनिक बनाना चाहते थे एवं बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गों व समुदायों के भारतीय नागरिकों के जीवन में गुणात्मक सुधार करना चाहते थे । उस कर्मशील स्वप्नद्रष्टा के योगदान को विस्मृत करना कृतघ्नता ही होगी । और हम भारतीयों के संस्कार तथा हमारे शास्त्र हमें कृतज्ञता ही सिखाते हैं, कृतघ्नता नहीं ।

आज सद्भावना दिवस पर सर्वत्र सद्भावना के प्रसार में विश्वास रखने वाले उस विशाल हृदयी स्वप्नदृष्टा को मेरा नमन ।
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Thursday, August 4, 2016

काश्मीर : जटिल समस्या की सरलीकृत व्याख्या से उसका समाधान संभव नहीं

काश्मीर में अलगाववादी आंदोलन तथा उससे जुड़ी हिंसा भारत की एक गंभीर समस्या के रूप में देखी जाती है । विभिन्न मंचों पर विचारक समस्या की अपनी-अपनी व्याख्या तथा उससे उद्भूत अपने-अपने समाधान प्रस्तुत करते हैं । ऐसे अधिकतर लेख वस्तुनिष्ठ एवं निरपेक्ष न होकर लेखकों के अपने-अपने पूर्वाग्रहों एवं सामाजिक, धार्मिक अथवा राजनीतिक झुकावों के अनुरूप होते हैं तथा इस उलझी हुई समस्या को सरलीकृत रूप में देखते हैं एवं इसीलिए उनकी व्यावहारिक उपादेयता सीमित होती है । काश्मीर की गुत्थी जटिल है जिसे वहाँ की जमीनी सच्चाईयों से कटकर केवल सतही जानकारी एवं एकांगी दृष्टिकोण के द्वारा नहीं समझा जा सकता ।

कुछ वर्षों पूर्व फ़िल्मकार राहुल ढोलकिया ने इस विषय पर हिन्दी फिल्म 'लम्हा' प्रस्तुत की थी । फ़िल्म से दर्शकों तथा समीक्षकों दोनों ही को वृहत् अपेक्षाएं थीं जिन पर फ़िल्म खरी नहीं उतर सकी और इसीलिए आलोचना का पात्र बनी । लेकिन मैंने जब यह फ़िल्म इसके प्रदर्शन के समय ही बड़े चित्रपट पर देखी थी, तब भी एवं हाल ही में इसे इन्टरनेट पर पुनः देखने पर भी मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा कि फ़िल्मकार के अथक परिश्रम एवं निष्ठायुक्त प्रयास के प्रति समीक्षक एवं दर्शक दोनों की ही प्रतिक्रिया आवश्यकता से अधिक कठोर रही थी । ढोलकिया ने फ़िल्म की अवधि बहुत कम रखी तथा सीमित समय में ही इस जटिल समस्या के अनेक पक्षों को टटोलने का प्रयास किया एवं यही कारण रहा कि किसी भी पक्ष के साथ न्याय करने के लिए वे स्वयं को पर्याप्त समय नहीं दे सके । तथापि इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि उनका यह प्रयास एक शोधपूर्ण, निष्पक्ष एवं ईमानदार प्रयास था जिसकी प्रासंगिकता आज भी वैसी ही है जैसी कई वर्षों पूर्व तब थी जब यह फ़िल्म बनकर प्रदर्शित हुई थी ।


हाल ही में मैंने पत्रकार मनु जोसफ का इस विषय पर एक लेख पढ़ा जिसमें उनकी यह बात मुझे बिलकुल सटीक लगी कि काश्मीर की समस्या को उलझाने के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी वे लोग हैं जो स्वयं काश्मीर में नहीं रहते लेकिन दूरस्थ नियंत्रण (रिमोट कंट्रोल) द्वारा काश्मीर की उन गतिविधियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जिनके दुष्परिणाम स्वयं उन्हें नहीं भुगतने पड़ते (क्योंकि वे तो भौतिक रूप से वहाँ रहते नहीं), ये दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं उन निर्दोषों को जो वहाँ रहते हैं लेकिन जिनके जीवन इन दूर बैठे शतरंज के खिलाड़ियों के हाथों मोहरों से अधिक कुछ नहीं होते । दूर बैठे साधन-सम्पन्न लोगों और नज़दीक रहकर भी जनसामान्य के दुख-दर्द से प्रभावित न होने वाले पाखंडी राजनेताओं के अपने-अपने स्वार्थ हैं जिनके अनुरूप वे समस्या की सरलीकृत व्याख्याएं गढ़ते एवं प्रचारित करते हैं ।

हाल ही में एक नवीन फ़िल्म के विज्ञापन-चित्र (टीज़र) में कहा गया है कि किसी भी बात के तीन पहलू होते हैं - प्रथम दूसरे पक्ष का दृष्टिकोण, द्वितीय अपना दृष्टिकोण और तृतीय सत्य । काश्मीर के मुद्दे पर भी यही बात लागू है क्योंकि इस पर अपना-अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाले न तो अन्य पक्षों के दृष्टिकोणों को समझने का प्रयास करते हैं और न ही सत्य के उस भाग को जानने का प्रयास करते हैं जो कि निहित स्वार्थों द्वारा छुपा दिया जाता है तथा जिससे केवल भुक्तभोगी ही अवगत होते हैं । सियासतदानों के घड़ियाली आँसू आम काश्मीरी के दर्द को बयां नहीं कर सकते । आम काश्मीरियों के दर्द को काश्मीर में उनके मध्य रहकर ही समझा जा सकता है जिसके लिए उन विषम परिस्थितियों में रहने और उन संकटों का सामना करने का धैर्य और साहस होना चाहिए जिनसे वे बदनसीब रोज़ दो-चार होते हैं ।

राहुल ढोलकिया ने 'लम्हा' में जिस्मफ़रोशी के जहन्नुम में जाने के लिए मजबूर की जाने काश्मीरी लड़कियों के दर्द को उनके मुँह से यूं बयां करवाया है - 'हमें तो हर कोई लूटता है चाहे वे जेहादी हों या मिलिटरी वाले' । आम काश्मीरी का दर्द दरअसल इन्हीं और इनके जैसे अल्फ़ाज़ में ही छुपा है जो बरसों से बहरे कानों पर ही पड़ रहे हैं । भारतीय सेना के साहस और धैर्य दोनों ही की भूरि-भूरि प्रशंसा करने के साथ-साथ मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि काली भेड़ें उनमें भी हैं जिनकी पहचान करना बहुत आवश्यक है । यदि सेना में सभी देवदूत ही होते तो कोर्ट-मार्शल जैसी व्यवस्था की आवश्यकता ही नहीं होती । ढोलकिया ने जहाँ एक ओर ईमानदार सैनिकों के दर्द को उन्हीं के मुख से कहलवाया है जिन्हें जान जोखिम में डालकर कर्तव्य-निर्वहन करने के उपरांत भी पर्याप्त वेतन नहीं मिलता, वहीं दूसरी ओर भ्रष्ट सैनिकों की गतिविधियों पर भी प्रकाश डाला है जो सीमा पार के घुसपैठियों से भारी राशि रिश्वत के रूप में लेकर उनकी सुविधानुसार अल्पकाल के लिए चुपचाप सीमा खोल देते हैं और इस प्रकार अपनी ज़ेबें भरने के लिए निर्दोषों के जीवन और काश्मीर की शांति के शत्रुओं के सहयोगी बन बैठते हैं । ढोलकिया ने उन महिलाओं का दर्द भी शिद्दत से बयां किया है जिनके परिवारों के पुरुषों को पूछताछ के नाम पर पुलिस वाले या सैनिक उनके घरों से बलपूर्वक उठा ले गए और फिर वे कभी नहीं लौटे । ऐसी दुखी और लाचार महिलाओं को उन उठा ले गए पुरुषों के बारे में पूछताछ करने के लिए पुलिस या सैन्य अधिकारियों तक पहुँचने पर यथोचित सहयोग भी नहीं दिया जाता है और स्पष्ट झूठ कह दिया जाता है कि उन्हें तो उठाया ही नहीं गया था । यह सैन्य उच्चाधिकारियों का ही दायित्व है कि वे काश्मीर में उपस्थित सैन्यबल की गतिविधियों पर पैनी दृष्टि रखें ताकि न तो कर्तव्यपरायण सैनिकों की समस्याएं अनसुनी रहें और न ही उनकी नाक के नीचे हो रही उनके ही कतिपय अधीनस्थों की भ्रष्ट, अनैतिक एवं क्रूर कार्रवाईयां अनदेखी रहें ।

ढोलकिया ने फ़िल्म की नायिका अज़ीज़ा (बिपाशा बसु) के चरित्र के माध्यम से संकेत किया है कि सही सोच वाली महिलाएं किस प्रकार वहाँ के हालात सुधारने में अहम भूमिका निभा सकती हैं यद्यपि ज़ाहिल एवं गुमराह मुस्लिम महिलाओं की एक भीड़ द्वारा अज़ीज़ा की पिटाई एवं मुँह काला किए जाने के एक हृदयविदारक दृश्य के माध्यम से उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उनकी राह किस सीमा तक कठिन हो सकती है । आतिफ़ (कुणाल कपूर) के चरित्र के माध्यम से उन्होंने बताया है कि काश्मीरियों की खुशहाली बंदूक के रास्ते से नहीं आ सकती लेकिन चुनावी राजनीति की मुख्यधारा में सम्मिलित होकर वे अपनी समस्याओं के हल के लिए अपनी आवाज़ सही माध्यम से बुलंद कर सकते हैं और अपने भाग्य-नियंता स्वयं बन सकते हैं । आतिफ़ द्वारा अपने चुनाव प्रचार के दौरान जम्मू में काश्मीरी पंडितों के शिविर में जाकर उनके साथ खड़े होने तथा उनसे काश्मीर घाटी में वापस लौटने का आह्वान करने के प्रसंग से ढोलकिया ने इस अटल सत्य को रेखांकित किया है कि काश्मीरी मुस्लिम तभी अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ सकते हैं जब वे पंडितों को भी काश्मीर का अंग समझें तथा उन्हें घाटी में पुनः लौटने में व्यावहारिक सहयोग तथा भावनात्मक एवं नैतिक समर्थन दें । यह दृष्टिकोण वस्तुतः फारूक अब्दुल्ला एवं महबूबा मुफ़्ती जैसे स्वार्थी एवं दोगले राजनेताओं के मुँह पर तमाचा है जो मजहबी अलगाववाद को परोक्ष समर्थन देते हैं तथा यही चाहते हैं कि काश्मीरी पंडित घाटी में कभी न लौटें एवं घाटी पूर्णतः मुस्लिम जनसंख्या वाला प्रदेश बन जाए ।

मुझे यह देखकर दुख एवं आश्चर्य दोनों होते हैं कि काश्मीरियों के दर्द की बात करने वाले सभी लेखक, बुद्धिजीवी एवं राजनेता जम्मू एवं लद्दाख की समस्याओं के हल पर चुप्पी साध लेते हैं या ऐसा प्रदर्शन करते हैं मानो जम्मू एवं लद्दाख में कोई समस्या है ही नहीं । सत्य यह है कि अलगाववादी आंदोलन तो काश्मीर के स्थान पर जम्मू में होना चाहिए था जहाँ की समस्याओं के प्रति इस राज्य की तथा केंद्र की भी सभी सरकारों ने उपेक्षा ही दर्शाई । सभी संसाधन काश्मीर घाटी में झोंक दिये जाते हैं एवं विधान सभा का ढाँचा प्रारम्भ से ही ऐसा बनाया गया है कि जम्मू का व्यक्ति मुख्यमंत्री बन ही नहीं सकता । जब जम्मू से आने वाले राजनेता ग़ुलाम नबी आज़ाद को उनके दल ने मुख्यमंत्री बनाया था तो महबूबा मुफ़्ती इसी बात को लेकर सड़कों पर उतर आई थीं कि जम्मू का व्यक्ति मुख्यमंत्री कैसे बना ? ऐसे में कोई ग़ैर-मुस्लिम तो राज्य का मुख्यमंत्री बनने की सोच तक नहीं सकता । लद्दाख में रहने वाले बौद्धों की तो बात ही छोड़ दीजिए । उनकी सुध लेने की तो किसी को भी फुरसत नहीं । हजारों करोड़ रुपया काश्मीर घाटी में फूंक दिये जाने के उपरांत भी वहाँ अशांति ही है और विकास नाम की चिड़िया तक दिखाई नहीं देती । सब ओर काश्मीर-काश्मीर का ही शोर सुनाई देता है । जम्मू और लद्दाख की पीड़ा इसी शोर में खो जाती है जिसे सुनने वाला कोई नहीं ।

तीन दशक पूर्व कांग्रेसी नेता एवं हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल ने पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू-काश्मीर को मिलाकर 'महापंजाब' नामक एक वृहत् राज्य बनाए जाने का सुझाव दिया था । उनके आला दिमाग के मुताबिक ऐसा करने से न केवल पंजाब एवं हरियाणा के मध्य सीमा तथा जल संबंधी विवाद समाप्त हो सकते थे वरन जम्मू-काश्मीर से जुड़ी समस्याओं के भी समाधान ढूंढे जा सकते थे । उनका यह सुझाव अव्यावहारिक ही नहीं था, उनके दिमागी दिवालियेपन का भी प्रमाण था । लेकिन इसका उलटा करने के विषय में सोचा जाना चाहिए तथा विचार पर स्थिरमति हो जाने के उपरांत उसे अमली जामा पहनाए जाने का भी सार्थक प्रयास किया जाना चाहिए । जम्मू-काश्मीर राज्य को एक बनाकर रखने का अब कोई अर्थ नहीं है विशेष रूप से तब जबकि काश्मीर घाटी तथा जम्मू की जनता में स्पष्ट राजनीतिक विभाजन भी हो चुका है जो विगत विधानसभा चुनाव में दृष्टिगोचर हुआ था । अतः एक साहसिक कदम उठाते हुए इस राज्य को काश्मीर तथा जम्मू नाम के दो पृथक राज्यों तथा लद्दाख नाम के केन्द्रशासित प्रदेश में विभाजित कर दिया जाना चाहिए । लद्दाख पूर्णतः केंद्र के नियंत्रण में रहे जबकि जम्मू की अपनी पृथक विधानसभा हो, पृथक शासन-प्रशासन हो । संविधान का विवादित अनुच्छेद ३७० केवल काश्मीर घाटी पर लागू हो जबकि जम्मू एवं लद्दाख को उसके दायरे से बाहर कर दिया जाए । ऐसे में न केवल सीमापार से संचालित होने वाले आतंकवाद को काश्मीर घाटी में ही केंद्रीकृत करके उससे बेहतर ढंग से निपटा जा सकेगा वरन जम्मू एवं लद्दाख के सदा से उपेक्षित प्रदेशों के साथ भी न्याय हो सकेगा । 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, राज्य के विकास के नाम पर काश्मीर घाटी में हजारों करोड़ रुपये का पैकेज झोंकने से काश्मीरियों को अपना नहीं बनाया जा सकता जो कि भारत को भी उसी तरह से एक दूसरा देश समझते हैं जिस तरह से वे पाकिस्तान को समझते हैं । भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३७० तथा महाराजा हरी सिंह द्वारा हस्ताक्षरित विलय-पत्र का संदर्भ भी व्यर्थ है क्योंकि १९४७ से अब तक झेलम में इतना पानी बह चुका है कि ये बातें अपना अर्थ खो चुकी हैं एवं अलगाववादी आंदोलन की आँधी से प्रभावित काश्मीरी इन्हें न समझते हैं, न समझना चाहते हैं । काश्मीर को केवल सेना के बल पर स्थायी रूप से भारत से जोड़कर नहीं रखा जा सकता । सुशिक्षित काश्मीरी मुस्लिम युवक भी मजहबी अपनत्व के कारण पाकिस्तान से ही हमदर्दी रखते हैं जबकि भारत के प्रति कोई सौहार्द्र अपने मन में रखे बिना भी भारत के ही संसाधनों का उपयोग अपने हित-साधन के लिए करने में वे किसी झिझक का अनुभव नहीं करते । अब उनका स्वप्न एक सार्वभौम इस्लामी काश्मीर राज्य का है जो शरीयत के अनुरूप चले एवं जो भारत एवं पाकिस्तान दोनों से ही स्वतंत्र हो । पाकिस्तान की खोखली एवं बनावटी हमदर्दी में बहकर वे यह नहीं समझ पा रहे कि पाकिस्तान ही उनका यह स्वप्न कभी पूरा नहीं होने देगा । भारतीय सेना के सभी अच्छे कार्यों के बावजूद उसकी छवि काश्मीरी अवाम की नज़र में उसी तरह बिगड़ी हुई है जिस तरह पुलिस की बिगड़ी हुई है । जम्मू-काश्मीर को जब हम भावनात्मक रूप से अपनेपन का अहसास कभी नहीं करवा सके तो केवल संसाधनों को झोंककर और सैन्य बलों को तैनात करके उसे भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने की आशा करना स्वयं को धोखा देना ही है । हम में तो इतनी भी हिम्मत नहीं है कि पाक-अधिकृत काश्मीर को आज़ाद करवा सकें । वस्तुतः सैन्यबल का प्रयोग तो इस कार्य में होना चाहिए था । १९९९ में कारगिल में घुसपैठ करके एवं हम पर अप्रत्याशित युद्ध थोपकर पाकिस्तान ने हमें एक ऐतिहासिक भूल को सुधारने का ऐतिहासिक अवसर दिया था जिसे हमारी सरकार ने कतिपय पूर्ववर्ती सरकारों की ही लीक पर चलते हुए गंवा दिया । मौजूदा हालात में तो संयुक्त राष्ट्र के संज्ञान में जनमत-संग्रह में भी कोई हर्ज़ नहीं है बशर्ते कि वह जनमत संग्रह काश्मीर के दोनों ही भागों में एक साथ समान रूप से हो तथा उसके आधार पर संयुक्त काश्मीर के लिए निर्णय लिया जाए ।

तथापि यदि हम काश्मीर को सच्चे मन से भारतवर्ष का अभिन्न अंग मानते हैं एवं उसे अपने साथ बनाए रखना चाहते हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वहाँ की जनता की जिस सेक्यूलर मानसिकता के कारण काश्मीर मजहबी उन्माद की नींव पर बने पाकिस्तान के स्थान पर उदार भारत के साथ जुड़ा था, वह अब हमारी अपनी ही भूलों एवं दुर्बलताओं के कारण तिरोहित हो चुकी है । उसे पुनः जागृत करने के लिए हजारों करोड़ के पैकेज जैसा कोई शॉर्टकट या वहाँ जाकर दिवाली मनाने जैसा कोई स्टंट या सैन्यबल के माध्यम से शक्ति-प्रदर्शन काम नहीं आने वाला । काश्मीरियों को कृतघ्न मानकर उनके लिए अपने मन में वितृष्णा पालना भी अनुचित ही होगा । इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक दीर्घकालिक परियोजना बनाकर अत्यंत धैर्य के साथ कार्य आरंभ करना होगा, मनोमस्तिष्क खुला रखते हुए पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सभी तथ्यों पर निरपेक्ष भाव से विचार करना होगा, हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों ही समुदायों के घावों पर मरहम लगाना सीखना होगा, तोड़ने वालों को मानसिक रूप से पराजित करके लोगों को एकदूसरे से जोड़ना होगा, वाणी में संयम एवं उदारता बरतनी होती तथा अन्याय से पीड़ित लोगों को वास्तविक अर्थों में न्याय देना होगा क्योंकि अन्याय-पीड़ित के मन के घाव तभी भरते हैं और पीड़ा तभी घटती है जब उसे न्याय मिलता है । राहुल ढोलकिया की फ़िल्म 'लम्हा' का नायक विक्रम (संजय दत्त) भारत सरकार का एक गुप्तचर ही नहीं वरन एक अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति भी है जो एकांगी दृष्टिकोण न रखते हुए संतुलित भाव से प्रत्येक तथ्य का विश्लेषण करता है एवं तदनुरूप अपना कर्तव्य निर्धारित करता है । ऐसे ही संवेदनशील प्रतिनिधियों को काश्मीर में वहाँ के जनसामान्य के बीच रहते हुए वहाँ की जटिल एवं बहुआयामी परिस्थिति को समझकर काश्मीरियों को अपना बनाने का दायित्व सौंपना होगा । तभी इस मकड़ी के जाले की भांति उलझी हुई जटिल समस्या का वांछित समाधान हो सकेगा ।

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